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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


| हेतुत्वाच्च। शास्त्रजनितो हि प्राणात्माभिमानः । तस्मादेवंविदः पाप्मा दूरं भवतीति युक्तं विरोधात् । तदेतत्प्रदर्शयति— | उत्पन्न होता है । तथा प्राणात्माभिमान शास्त्रजनित है । अतः विरोध होनेके कारण इस प्रकार जाननेवालेसे पाप दूर रहता है—यह ठीक ही है । इसी अर्थको श्रुति प्रदर्शित करती है— |

सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥

उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको हटाकर जहाँ इन दिशाओंका अन्त है वहाँ पहुँचा दिया । वहाँ इनके पापको उसने तिरस्कारपूर्वक स्थापित कर दिया । अतः 'मैं पापरूप मृत्युसे संश्लिष्ट न हो जाऊँ' इस भयसे अन्त्यजनके पास न जाय और अन्त दिशामें भी न जाय ॥ १० ॥

| सा वा एषा देवतेत्युक्तार्थम् ।<br><br>एतासां वागादीनां देवतानां<br><br>पाप्मानं मृत्युं स्वाभाविकाज्ञानप्रयुक्तेन्द्रियविषयसंसर्गासङ्गजनितेन हि पाप्मना सर्वो म्रियते, स ह्यतो मृत्युः, तं प्राणात्माभिमानरूपाभ्यो देवताभ्योऽपच्छिद्यापहृत्य, प्राणात्माभिमानमात्रतयैव | 'सा वा एषा देवता' इस वाक्यका अर्थ कहा जा चुका है । उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको—स्वाभाविक अज्ञानप्रेरित इन्द्रियविषयोंके संसर्गजनित अभिनिवेशसे होनेवाले पापसे ही सब जीव मरते हैं, इसलिये वही मृत्यु है। उसे प्राणात्माभिमानरूप देवताओंसे अपहृत्य—अलग कर । [ अन्य देवताओंका ] प्राणस्वरूपमात्रमें ही अभिमान होनेके कारण यहाँ मुख्य प्राणको अपहन्ता कहा |

| १२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

| १२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ | | :--- | :--- |

| प्राणोऽपहन्तेत्युच्यते। विरोधादेव तु पाप्मैवंविदो दूरं गतो भवति। किं पुनश्चकार देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य ? इत्युच्यते—यत्र यस्मिन्नासां प्राच्यादीनां दिशामन्तोऽवसानं तत्तत्र गमयाञ्चकार गमनं कृतवानित्येतत्। | गया है, उससे विरोध होनेके कारण ही इस प्रकार जाननेवालेका पाप दूर चला जाता है। देवताओंके पापरूप मृत्युको उनसे अलग कर फिर प्राणदेवताने क्या किया, सो बतलाया जाता है—जहाँ यानी जिस स्थानपर इन पूर्वादि दिशाओंका अन्त-अवसान है वहाँ उसे पहुँचा दिया अर्थात् वहाँ उसका गमन करा दिया। | | ननु नास्ति दिशामन्तः कथमन्तं गमितवान् ? इत्युच्यते— | किंतु दिशाओंका तो अन्त ही नहीं है, फिर उसे दिशान्तमें कैसे पहुँचा दिया ? इसपर हमारा कथन यह है कि दिशाओंकी कल्पना श्रौत-विज्ञानवान् पुरुषोंकी सीमापर्यन्त ही की गयी है, अतः उनसे विरुद्ध आचरणवाले लोगोंसे बसा हुआ देश ही दिशाओंका अन्त है; जैसे कि देशका अन्त अरण्य होता है उसी प्रकार ऐसा माननेमें भी दोष नहीं है। | | श्रौतविज्ञानवज्जनावधिनिमित्तकल्पितत्वादिशां तद्विरोधिजनाध्युषित एव देशो दिशामन्तः, देशान्तोऽरण्यमिति यद्वदित्यदोषः। | | | तत्तत्र गमयित्वा आसां देवतानाम्, पाप्मन इति द्वितीयाबहुवचनम्, विन्यदधाद्विविधं न्यग्भावेनादधात्स्थापितवती प्राणदेवता। प्राणात्माभिमानशून्येषु | इन देवताओंके पापोंको वहाँ पहुँचाकर प्राणदेवताने उसे विविध प्रकारसे निम्नभावसे (तिरस्कारपूर्वक) निहित-स्थापित कर दिया। ‘पाप्मनः’ पद द्वितीयाबहुवचनान्त है। प्रसङ्गके सामर्थ्यसे ज्ञात होता है कि उसे प्राणात्माभिमानशून्य |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७


| अन्त्यजनेष्विति सामर्थ्यात् । इन्द्रियसंसर्गजो हि स इति प्राण्याश्रयतावगम्यते । <br><br> तस्मात्तमन्त्यं जनं नेयान्न गच्छेत्सम्भाषणदर्शनादिभिर्न संसृजेत् । तत्संसर्गे पाप्मना संसर्गः कृतः स्यात्पाप्माश्रयो हि सः । तज्जननिवासं चान्तं दिगन्तशब्दवाच्यं नेयाज्जनशून्यमपि, जनमपि तद्देशवियुक्तमित्यभिप्रायः । <br><br> नेदिति परिभयार्थे निपातः । <br><br> इत्थं जनसंसर्गे पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति । अनु अव अयानीत्यनुगच्छेयमिति, एवं भीतो न जनमन्तं चेयादिति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ १० ॥ | अन्त्यजनोंमें स्थापित कर दिया । वह पाप इन्द्रियसंसर्गसे ही होनेवाला है, इसलिये उसका प्राणियोंके आश्रित रहना ज्ञात होता है । <br><br> अतः उन अन्त्यजनोंके पास न जाय, अर्थात् सम्भाषण और दर्शनादिसे भी उनका संसर्ग न करे । उनका संसर्ग करनेपर पापसे भी संसर्ग होगा, क्योंकि वह पापका आश्रय है । उन लोगोंके निवासस्थान अन्त यानी दिगन्तशब्दवाच्य देशमें उसके जनशून्य होनेपर भी, न जाय; तथा उस देशसे अलग हुए अन्त्य जनके पास भी न जाय—ऐसा इसका अभिप्राय है । <br><br> 'नेत्' यह 'परिभय' ( सर्वतः भय ) के अर्थमें निपात है । इस प्रकार इन अन्त्य जनोंके संसर्गमें जानेसे मैं पापरूप मृत्युको 'अन्ववायानि'—'अनु अव अयानि' अर्थात् अनुगत होऊँगा, इस प्रकार डरता हुआ उन अन्त्यजन और अन्त देशोंमें न जाय—इस प्रकार इसका पूर्वक्रियापद 'इयात्' से सम्बन्ध है ॥ १० ॥ |


प्राणद्वारा वागादिका अग्न्यादि देवभावको प्राप्त कराया जाना

सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैना मृत्युमत्यवहत ॥ ११ ॥

१२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१२८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्मभावको प्राप्त ] कर दिया ॥ ११ ॥

| सा वा एषा देवता, तदेतत्प्राणात्मज्ञानकर्मफलं वागादीनामग्न्याद्यात्मत्वमुच्यते । अथैना मृत्युमत्यवहत् यस्मादाध्यात्मिकपरिच्छेदकरः पाप्मा मृत्युः प्राणात्मविज्ञानेनापहतस्तस्मात्स प्राणोऽपहन्ता पाप्मनो मृत्योः । तस्मात्स एव प्राण एना वागादिदेवताःप्रकृतं पाप्मानं मृत्युमतीत्य अवहत्प्रापयत्स्वं स्वमपरिच्छिन्नमग्न्यादिदेवतात्मरूपम् ॥११॥ | ‘सा वा एषा देवता’ इस श्रुतिसे प्राणात्मज्ञानरूप कर्मके फलस्वरूपसे वागादिकी अग्न्यादिरूपताका वर्णन किया जाता है । इसके अनन्तर प्राणदेवताने उनको मृत्युके पार कर दिया । क्योंकि आध्यात्मिक परिच्छेदकर्ता पापरूप मृत्यु प्राणात्मज्ञानद्वारा नष्ट हो गया इसलिये प्राण पापरूप मृत्युका नाश करनेवाला है । अतः उस प्राणने ही इन वागादि देवताओंको, इनके प्रकृत पापरूप मृत्युको पारकर, इनके अपरिच्छिन्न अग्न्यादि देवतात्मस्वरूपको प्राप्त करा दिया ॥ ११ ॥ |


स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥

उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया । वह वाक् जिस समय मृत्युसे पार हुई यह अग्नि हो गयी। वह यह अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है ॥ १२ ॥

| स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । स प्राणो वाचमेव प्रथमां प्रधानामित्येतत् । उद्गीथकर्मणी- | ‘स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्’— उस प्रसिद्ध प्राणने प्रथमा यानी प्रधाना वाक्‌का [मृत्युसे] अतिवहन किया । उद्गीथकर्ममें अन्य |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२९


| तरकरणापेक्षया साधकतमत्वं प्राधान्यं तस्याः । तां प्रथमाम-त्यवहद्वहनं कृतवान् ।<br><br>तस्याः पुनर्मृत्युमतीत्योढायाः किं रूपम्? इत्युच्यते-सा वाग्यदा यस्मिन्काले पाप्मानं मृत्युम् अत्यमुच्यतातित्यामुच्यत मौचि-ता स्वयमेव, तदा सोऽग्निरभवत्। सा वाक्पूर्वमप्यग्निरेव सती मृत्युवियोगेऽप्यग्निरेवाभवत् । एतावांस्तु विशेषो मृत्युवियोगे ।<br><br>सोऽयमतिक्रान्तोऽग्निः परेण मृत्युं परस्तान्मृत्योर्दीप्यते । प्राङ् मोक्षान्मृत्युप्रतिबद्धो अध्यात्म-वागात्मना नेदानीमिव दीप्ति-मानासीत्, इदानीं तु मृत्युं परेण दीप्यते मृत्युवियोगात् ॥१२॥ | इन्द्रियोंकी अपेक्षा साधकतम होना ही उसकी प्रधानता है । उस प्रथमा वाग्देवताका उसने अतिवहन किया ।<br><br>किंतु मृत्युको पार करके ले जाय़ी गयी उस वाणीका क्या रूप है, सो बतलाया जाता है—वह वाक् जब—जिस समयमें पापरूप मृत्युको पार करके मुक्त हुई—स्वयं ही मृत्युसे छूट गयी, उस समय वह अग्नि हो गयी । वह वाक् पहले भी अग्निरूपा ही थी, अब मृत्युका वियोग हो जानेपर भी अग्नि ही हो गयी । विशेषता इतनी ही है कि मृत्युका वियोग होनेपर ।<br><br>वह यह [ मृत्युको ] अतिक्रान्त करनेवाला अग्नि 'परेण मृत्युम्'—मृत्युसे परे देदीप्यमान है, उससे मुक्त होनेसे पूर्व अध्यात्मवाग्रूप मृत्युसे प्रतिबद्ध होनेके कारण वह इस समयके समान दीप्तिमान् नहीं था; अब मृत्युका वियोग हो जानेके कारण वह मृत्युसे परे होकर देदीप्यमान है ॥ १२ ॥ |


अथ प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥१३॥

बृ० उ० ६—

१३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१३०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

फिर प्राणका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ वह वायु हो गया। वह यह अतिक्रान्त वायु मृत्युसे परे बहता है ॥१३॥

| तथा प्राणो घ्राणम्—वायुरभवत्। स तु पवते मृत्युं परेणातिक्रान्तः। सर्वमन्यदुक्तार्थम् ॥१३॥ | इसी प्रकार प्राण अर्थात् घ्राण-वायु हो गया। वह मृत्युसे पार होकर बहता है। और सबका अर्थ कहा जा चुका है ॥ १३ ॥ |


अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत्सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति ॥ १४ ॥

फिर चक्षुका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह आदित्य हो गया। वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है ॥१४॥

| तथा चक्षुरादित्योऽभवत्स तु तपति ॥ १४ ॥ | इसी प्रकार चक्षु आदित्य हो गया और वह तपता है ॥ १४ ॥ |


अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवंस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥१५॥

फिर श्रोत्रका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह दिशा हो गया। वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं ॥ १५ ॥

| तथा श्रोत्रं दिशोऽभवत्। दिशः प्राच्यार्दिभागेनावस्थिताः ॥१५॥ | तथा श्रोत्र दिशा हो गया। दिशाएँ पूर्वाधिके विभागसे स्थित हैं ॥ १५ ॥ |


अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥

फिर मनका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह चन्द्रमा हो गया। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। इसी प्रकार यह देवता उसका मृत्युसे अतिवहन करती है जो कि इसे इस प्रकार जानता है ॥ १६ ॥

| मनश्चन्द्रमा भाति। यथा पूर्व-यजमानं वागाद्यग्न्यादिभावेन मृत्युमत्यवहत्, एवमेनं वर्तमान-यजमानमपि ह वा एषा प्राण-देवता मृत्युमतिवहति वागाद्य-ग्न्यादिभावेन। एवं यो वागा-दिपञ्चकविशिष्टं प्राणं वेद। “तं यथा यथोपासते तदेव भवति” इति श्रुतेः ॥ १६ ॥ | मन चन्द्रमा होकर प्रकाशित होता है। जिस प्रकार प्राणने पूर्व यजमानको वागादिके अग्न्यादि-भावसे मृत्युसे अतिवहन किया था उसी प्रकार यह प्राणदेवता इस वर्तमान यजमानको भी वागादिके अग्न्यादिभावद्वारा मृत्युसे अतिक्रान्त कर देती है जो कि इस प्रकार प्राणको वागादि पञ्चदेवविशिष्ट जानता है, जैसा कि “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ १६ ॥ |


प्राणका अन्नाद्यागान

अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किञ्चान्नमध्यतेऽनेनैव तद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥

फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यका आगान किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नसे प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥

१३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| यथा वागादिभिरात्मार्थमागानं कृतं तथा मुख्योऽपि प्राणः सर्वप्राणसाधारणं प्राजापत्यफलमागानं कृत्वा त्रिषु पवमानेषु, अथानन्तरं शिष्टेषु नवसु, स्तोत्रेषु, आत्मने आत्मार्थमन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं चान्नाद्यमागायत्। | जिस प्रकार वागादिने अपने लिये आगान किया था उसी प्रकार मुख्य प्राणने भी तीन पवमानोंमें समस्त प्राणोंके लिये समान प्राजापत्यरूप फलका आगान कर इसके पश्चात् शेष नौ स्तोत्रोंमें अपने लिये अन्नाद्यका¹—जो अन्न हो और आद्य (भक्ष्य) भी हो उस अन्नाद्यका आगान किया। | | कर्तुः कामसंयोगो वाचनिक इत्युक्तम्। कथं पुनस्तदन्नाद्यं प्राणेनात्मार्थमागीतमिति गम्यते? | उद्गानकर्ताको जो यह इच्छित पदार्थका संयोग होता है, वह वाचनिक है—ऐसा पहले² कहा जा चुका है। किंतु प्राणने उस अन्नाद्यका अपने लिये आगान किया—यह कैसे जाना जाता है? | | इत्यत्र हेतुमाह—यत्किञ्चेति सामान्यान्नमात्रपरामर्शार्थः। हीति हेतौ। यस्माल्लोके प्राणिभिर्यत्किञ्चिदन्नमद्यते भक्ष्यते तदनेनैव। अन इति प्राणस्याख्या प्रसिद्धा अनःशब्दः सान्तः शकटवाची, यस्त्वन्यः स्वरान्तः स प्राणपर्यायः। | इसमें श्रुति हेतु बतलाती है—'यत्किञ्च'—यह पद सामान्यरूपसे अन्नमात्रका परामर्श करनेके लिये है। 'हि' यह अव्यय हेत्वर्थमें है। अर्थात् क्योंकि लोकमें प्राणियोंद्वारा जो कुछ भी अन्न भक्षण किया जाता है वह अन—प्राणके द्वारा ही खाया जाता है। 'अन' यह प्राणका नाम प्रसिद्ध है। सान्त 'अनस्' शब्द शकटका वाचक है और जो दूसरा स्वरान्त (अकारान्त) है वह प्राणका |


१. 'अथात्मनेऽन्नाद्यमागायत्' इस श्रुतिवचनसे विहित।
२. मन्त्र १।३।२ के भाष्यमें।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३३ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३३

प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः ।<br><br>किञ्च न केवलं प्राणेनाद्यत एवान्नाद्यम्, तस्मिञ्छरीराकारपरिणतेऽन्नाद्य इह प्रतितिष्ठति प्राणः । तस्मात्प्राणेनात्मनः प्रतिष्ठार्थमागीतमन्नाद्यम् । यदपि प्राणेनान्नादनं तदपि प्रतिष्ठार्थमेवेति न वागादिष्विव कल्याणासङ्गजपाप्मसम्भवः प्राणेऽस्ति ॥ १७ ॥पर्याय है, अतः वह अनेन अर्थात् प्राणसे ही खाया जाता है ।<br><br>इसके सिवा अन्नाद्य प्राणसे केवल खाया ही नहीं जाता, अपि तु उस अन्नाद्यके शरीराकारमें परिणत होनेपर उसमें ही प्राण प्रतिष्ठित होता है । अतः अपनी प्रतिष्ठाके लिये प्राणने अन्नाद्यका आगान किया । प्राणके द्वारा जो अन्नका अदन ( भक्षण ) होता है वह भी उसकी प्रतिष्ठाके ही लिये है; अतः वागादिके समान प्राणमें शुभाभिनिवेशजनित पापकी सम्भावना नहीं है ॥ १७ ॥

प्राणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनाका फल

नन्ववधारणमयुक्तं प्राणेनैव तदद्यत इति, वागादीनामपि अन्ननिमित्तोपकारदर्शनात् ।<br><br>नैष दोषः; प्राणद्वारत्वात्तदुपकारस्य । कथं प्राणद्वारकोऽन्नकृतो वागादीनामुपकार इत्येतमर्थं प्रदर्शयन्नाह—शङ्का—किंतु ऐसा जो निश्चय किया है कि वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है यह तो ठीक नहीं है, क्योंकि अन्नसे होनेवाला उपकार तो वागादिको भी होता देखा जाता है ।<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह उपकार प्राणके ही द्वारा होता है । अन्नके कारण होनेवाला वागादिका उपकार प्राणके द्वारा होनेवाला कैसे है? इसी बातको दिखानेके लिये श्रुति कहती है—

१३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदग्ँ सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै माभिसंविशतेति तथेति तग्ँ समन्तं परिष्व्यविशन्त । तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवग्ँ ह वा एनग्ँ स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाग्ँ श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदग्ँ स्वेषु प्रति प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनु भवति यो वैतमनु भार्यान्बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥

वे देवगण बोले, "यह जो अन्न है वह सब तो इतना ही है; उसे तुमने अपने लिये आगान कर लिया है। अतः अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमें भागी बनाओ।" [ प्राणने कहा ] "वे तुमलोग सब ओरसे मुझमें प्रवेश कर जाओ।" तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वे सब ओरसे उसमें प्रवेश कर गये। अतः प्राणके द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे ये प्राण भी तृप्त होते हैं। अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वह स्वजनोंका भरण करनेवाला, उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करनेवाला और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार जाननेवालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है—जो भी इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है॥ १८॥

ते वागादयो देवाः, स्वविषय-<br><br>द्योतनाद्देवाः, अब्रुवन्नुक्तवन्तो<br><br>मुख्यं प्राणम् इदमेतावन्नातोऽधि-उन वागादि देवताओंने, जो अपने विषयका द्योतन (प्रकाशन) करनेके कारण देवता हैं, मुख्य प्राणसे कहा—"यह [अन्न] तो इतना ही है, इससे अधिक नहीं

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
कमस्ति । वा इति स्मरणार्थः । इदं तत्सर्वमेतावदेव, किम् ? यदन्नं प्राणस्थितिकरमद्यते लोके तत्सर्वमात्मन आत्मार्थमागासीः आगीतवानसि आगानेनात्मसात्कृतमित्यर्थः । वयं चान्न मन्तरेण स्थातुं नोत्सहामहे । अतोऽनु पश्चान्नोऽस्मानस्मिन्नन्ने आत्मार्थे तवान्ने आभजस्व आभाजयस्व । णिचोऽश्रवणं छान्दसम् । अस्मांश्चान्नभागिनः कुरु ।है । इसमें 'वै' यह निपात स्मरणके लिये है । यह वह सब इतना ही है । वह क्या ? लोकमें प्राणकी स्थिति करनेवाला जो भी अन्न भक्षण किया जाता है उस सबका तो तुमने अपने लिये आगान कर लिया; अर्थात् आगानके द्वारा उसे अपने अधीन कर लिया । हम भी अन्नके बिना रहनेमें समर्थ नहीं हैं । अतः अब पीछेसे अपने लिये आगान किये हुए अपने इस अन्नमेंसे हमें भी भाग प्राप्त कराओ, 'आभजस्व' में णिच्का श्रवण न होना छान्दस है । अर्थात् हमें भी अन्नका भागी बनाओ ।"
इतर आह—ते यूयं यद्यन्नार्थिनो वै, मा मामभिसंविशत समन्ततो मामाभिमुख्येन निविशत । इत्येवमुक्तवति प्राणे तथेत्येवमिति, तं प्राणं परिसमन्तं परिसमन्तान्न्यविशन्त निश्चयेनाविशन्त, तं प्राणं परिवेष्टय निविष्टवन्त इत्यर्थः । तथा निविष्टानां प्राणानुज्ञया तेषां प्राणेनैवाद्यमन्नं प्राणस्थितिकरं सदन्नं तृप्तिकरं भवति न स्वातन्त्र्येण ।तब उनसे इतर—मुख्य प्राणने कहा, "वे तुम, यदि अन्नप्राप्तिके इच्छुक हो तो सब ओरसे अभिमुख भावसे मुझमें प्रवेश कर जाओ ।" प्राणके इस प्रकार कहनेपर वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उस प्राणमें निश्चय ही उसे सब ओरसे घेरकर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार प्राणकी आज्ञासे प्रविष्ट हुए उन सबकी, जो प्राणके द्वारा खाया जाता है वह प्राणकी स्थिति करनेवाला अन्न ही तृप्ति करनेवाला होता है । वागादिका स्वतन्त्रतासे अन्नके साथ सम्बन्ध नहीं होता ।

१३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्माद्युक्तमेवावधारणम् अनेनैव तदद्यत इति । तदेव चाह— तस्माद्यस्मात्प्राणाश्रयतयैव प्राणानुज्ञयाभिसंनिविष्टा वागादिदेवताः तस्माद्यदन्नमनेन प्राणेनात्ति लोकस्तेनान्नेनैता वागाद्यास्तृप्यन्ति । | अतः "वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है" ऐसा निश्चय करना उचित ही है। वही बात श्रुति भी कहती है—अतः क्योंकि प्राणके आश्रित रहकर ही प्राणकी आज्ञासे वागादि देवता उसमें प्रविष्ट हुए हैं इसलिये लोक अन यानी प्राणके द्वारा जो अन्न खाते हैं उसी अन्नसे ये वागादि भी तृप्त होते हैं। | | वागाद्याश्रयं प्राणं यो वेद वागादयश्च पञ्च प्राणाश्रया इति तमप्येवमेवं ह वै स्वा ज्ञातय अभिसंविशन्ति वागादय इव प्राणम् । ज्ञातीनामाश्रयणीयो भवतीत्यभिप्रायः । अभिसंनिविष्टानां च स्वानां प्राणवदेव वागादीनां स्वान्नेन भर्ता भवति । तथा श्रेष्ठः पुरोऽग्रत एता गन्ता भवति वागादीनामिव प्राणः । तथान्नादोऽनामयावीत्यर्थः । अधिपतिरधिष्ठाय च पालयिता स्वतन्त्रः पतिः प्राणवदेव वागा- | वागादिके आश्रयभूत प्राणको जो 'वागादि पाँच प्राणके आश्रित हैं' इस प्रकार जानता है उसको भी इसी प्रकार ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रित करते हैं, जैसे प्राणको वागादि। तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञातियोंका आश्रय होने योग्य हो जाता है। तथा वागादिके भर्ता प्राणके समान वह भी अपने आश्रित ज्ञातिजनोंका अपने अन्नद्वारा भरण करनेवाला होता है; तथा वह उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे जानेवाला होता है, जैसे वागादिके आगे प्राण। इसी तरह वह अन्नाद अर्थात् अनामयावी (निरामय—व्याधिशून्य) और अधिपति--वागादिके अधिपति प्राणके समान ही ज्ञातिजनोंका अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र स्वामी होता है |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३७

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३७

संस्कृतहिन्दी
दीनाम् । य एवं प्राणं वेद तस्यै- <br> तद्यथोक्तं फलं भवति ।जो प्राणको इस प्रकार जानता है <br> उसे उपर्युक्त फल मिलता है।
किञ्च य उ हैवंविदं प्राणविदं <br> प्रति स्वेषु ज्ञातीनां मध्ये प्रतिः <br> प्रतिकूलो बुभूषति प्रतिस्पर्धी <br> भवितुमिच्छति, सोऽसुरा इव <br> प्राणप्रतिस्पर्धिनो न हैवालं न <br> पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणीयेभ्यो <br> भवति भर्तुमित्यर्थः। अथ <br> पुनर्य एव ज्ञातीनां मध्ये एत- <br> मेवंविदं वागादय इव प्राणम् <br> अनु अनुगतो भवति, यो वैत- <br> मेवंविद मन्वेवानुवर्तयन्नेव आत्मी- <br> यान्भार्यान् बुभूषति भर्तुमि- <br> च्छति, यथैव वागादयः प्राणा- <br> नुवृत्त्यात्मबुभूषव आसन् । स <br> हैवालं पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणी- <br> येभ्यो भवति भर्तुं नेतरः <br> स्वतन्त्रः । सर्वमेतत्प्राणगुण- <br> विज्ञानफलमुक्तम् ॥ १८ ॥इसके सिवा स्वजनों यानी <br> ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार <br> जाननेवाले इस प्राणवेत्ताके प्रति <br> प्रतिकूल यानी उसका प्रतिस्पर्धी <br> होना चाहता है वह प्राणके प्रति- <br> स्पर्धी असुरोंके समान अपने भर- <br> णीयों (आश्रितों) का भरण करने- <br> में अलम् अर्थात् समर्थ नहीं होता। <br> तथा ज्ञातियोंमेंसे जो भी, प्राणके <br> अनुगामी वागादिके समान, इस <br> प्रकार जाननेवाले इस प्राणवेत्ताका <br> अनु—अनुगत होता है अर्थात् जो <br> भी इस प्राणवेत्ताका अनुवर्तन करते <br> हुए ही अपने आत्मीय यानी भरणी- <br> योंका भरण करनेकी इच्छा करता <br> है, जिस प्रकार कि वागादि प्राणका <br> अनुवर्तन करते हुए अपनेको भरण <br> करनेके इच्छुक थे, वह अपने <br> भरणीयोंके प्रति उनका भरण <br> करनेमें अलम् अर्थात् समर्थ होता <br> है, अन्य जो स्वतन्त्र है वह ऐसा <br> करनेमें समर्थ नहीं होता। यह <br> सब प्राणके गौण विज्ञानका फल <br> कहा गया है ॥ १८ ॥

१३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

प्राणके आङ्गिरसत्वकी उपपत्ति

कार्यकरणानामात्मत्वप्रतिपादनाय प्राणस्याङ्गिरसत्वमुपन्यस्तं सोऽयास्य आङ्गिरस इति । अस्माद्धेतोरयमाङ्गिरस इत्याङ्गिरसत्वे हेतुर्नोक्तः । तद्धेतुसिद्धयर्थमारभ्यते, तद्धेतुसिद्ध्यायत्तं हि कार्यकारणात्मत्वं प्राणस्य । अनन्तरं च वागादीनां प्राणाधीनतोक्ता सा च कथमुपपादनीया ? इत्याह—भूत और इन्द्रियोंका आत्मत्व प्रतिपादन करनेके लिये 'सोऽयास्य आङ्गिरसः' इस वाक्यसे प्राणके आङ्गिरसत्वका उल्लेख किया था। किंतु यह इसलिये आङ्गिरस है—इस प्रकार इसकी आङ्गिरसतामें हेतु नहीं बताया गया था। उस हेतुकी सिद्धिके लिये अब आरम्भ किया जाता है; क्योंकि उसके हेतुकी सिद्धिके अधीन ही प्राणकी कार्यकरणरूपता है। आङ्गिरसत्वके पश्चात् जो वागादिकी प्राणाधीनता बतलायी गयी है उसका उपपादन किस प्रकार किया जा सकता है ? सो बतलाते हैं—

सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानाꣳ हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानाꣳ रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अङ्गानाꣳ रसः ॥ १६ ॥

वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि वह अङ्गोंका रस (सार) है। प्राण ही अङ्गोंका रस है, निश्चय प्राण ही अङ्गोंका रस है; क्योंकि जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण कर जाता है, वह उसी जगह सूख जाता है, अतः यही अङ्गोंका रस है ॥ १६ ॥

सोऽयास्य आङ्गिरस इत्यादि ।'सोऽयास्य आङ्गिरसः' इत्यादि

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१३९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१३९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यथोपन्यस्तमेवोपादीयते उत्तरार्थम् 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' इत्येवमन्तं वाक्यं यथाव्याख्यानार्थमेव पुनः स्मारयति ।वाक्यका जिस प्रकार पहले उल्लेख हो चुका है उसीको अब श्रुति उत्तर देनेके लिये ग्रहण करती है । 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' यहाँतकके वाक्यका ऊपर की हुई व्याख्याके अनुसार ही श्रुति पुनः स्मरण कराती है ।
कथम् ? 'प्राणो वा अङ्गानां रसः' इति । 'प्राणो हि'—हिशब्दः प्रसिद्धौ—अङ्गानां रसः । प्रसिद्धमेतत्प्राणस्याङ्गरसत्वं न वागादीनाम् । तस्माद्युक्तं प्राणो वा इति स्मारणम् ।किस प्रकार स्मरण कराती है ? प्राण ही अङ्गोंका रस है—इस प्रकार । 'प्राणो हि' इसमें 'हि' शब्द प्रसिद्धिके अर्थमें है । अङ्गोंका रस है । प्राणका ही यह अङ्गरसत्व प्रसिद्ध है, वागादिका नहीं । अतः 'प्राणो वै' इस प्रकार उसका स्मरण करना उचित ही है ।
कथं पुनः प्रसिद्धत्वम् ? इत्यत आह । तस्माच्छब्द उपसंहारार्थ उपरित्त्वेन सम्बध्यते । यस्माद्यतोऽवयवात्कस्मादनुक्तविशेषात्, यस्मात्कस्माद्यतः कुतश्चिच्च अङ्गाच्छरीरावयवादविशेषितात्प्राणकिंतु, उसकी प्रसिद्धि किस प्रकार है ? सो श्रुति अब बतलाती है । 'तस्मात्' शब्द उपसंहारके लिये है; अतः वह उपरित्त्वभावसे [आगेके वाक्यसे] सम्बन्ध रखता है¹ । 'यस्मात्'—जिस अवयवसे और 'कस्मात्' जिसका विशेष बतलाया नहीं गया ऐसे किसी भी अवयवसे । अतः यस्मात्-कस्मात्—जिस-किसी भी अविशेषित अङ्ग यानी शरीरके

१. अर्थात् इस वाक्यका अन्वय इस प्रकार है—'यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति तस्मादेष हि वा अङ्गानां रसः।'

१४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| उत्क्रामत्यपसर्पति तदेव तत्रैव तदङ्गं शुष्यति नीरसं भवति शोषमुपैति । तस्मादेष हि वा अङ्गानां रस इत्युपसंहारः ।<br><br>अतः कार्यकारणनामात्मा प्राण इत्येतत्सिद्धम् । आत्मापाये हि शोषो मरणं स्यात्तस्मात्तेन जीवन्ति प्राणिनः सर्वे । तस्मादपास्य वागादीन्प्राण एवोपास्य इति समुदायार्थः ॥१९॥ | अवयवसे प्राण उत्क्रान्त—अपसर्पित हो जाता है वह अङ्ग वहाँ ही शुष्क—नीरस हो जाता है अर्थात् सूख जाता है। अतः निश्चय यही अङ्गोंका रस है—ऐसा इसका उपसंहार है।<br><br>इससे यह सिद्ध होता है कि प्राण भूत और इन्द्रियोंका आत्मा है। आत्माका वियोग होनेपर ही शोष—मरण होता है; अतः समस्त प्राणी उसीसे जीवित रहते हैं। इसलिये वागादि समस्त प्राणोंको त्यागकर प्राण ही उपासनीय है—यह इसका समुदायार्थ है ॥१९॥ |


प्राणके बृहस्पतित्वकी उपपत्ति

| न केवलं कार्यकारणयोरेवात्मा प्राणो रूपकर्मभूतयोः। किं तर्हि ?<br><br>ऋग्यजुःसाम्नां नामभूतानामात्मेति सर्वात्मकतया प्राणं स्तुवन्महीकरोत्युपास्यत्वाय— | प्राण रूपात्मक पञ्चभूतों और कर्मभूत¹ इन्द्रियोंका ही आत्मा नहीं है तो और किसका है ? वह नाम स्वरूप ऋक्, यजुः और सामका भी आत्मा है। इस प्रकार सर्वात्मकताद्वारा प्राणकी स्तुति करते हुए वेद उसके उपास्यत्वके लिये उसे महिमान्वित करता है। |

एष एव उ बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥

यह ही बृहस्पति है। वाक् ही बृहती है; उसका यह पति है; इसलिये यह बृहस्पति है ॥ २० ॥


१. प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय होनेके कारण स्थूलशरीर अर्थात् भूत रूपात्मक और ज्ञान तथा क्रियाकी शक्तिवाली होनेसे इन्द्रियाँ कर्म हैं।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४१


संस्कृतहिन्दी
एष उ एव प्रकृत आङ्गिरसो बृहस्पतिः। कथं बृहस्पतिः? इत्युच्यते—वाग्वै बृहती बृहतीच्छन्दः षट्त्रिंशदक्षरा। अनुष्टुप् च वाक्। कथम्? "वाग्वा अनुष्टुप्" (नृसिं० पू० १।१) इति श्रुतेः। सा च वागनुष्टुब्बृहत्यां छन्दस्यन्तर्भवति। अतो युक्तं वाग्वै बृहतीति प्रसिद्धवद्वक्तुम्। बृहत्यां च सर्वा ऋचोऽन्तर्भवन्ति प्राणसंस्तुतत्वात्। "प्राणो बृहती प्राण ऋच इत्येव विद्यात्" इति श्रुत्यन्तरात्। वागात्मकत्वाच्चर्चां प्राणेऽन्तर्भावः।<br><br>तत्कथम्? इत्याह—तस्या वाचो बृहत्या ऋच एष प्राणः पतिः। तस्या निर्वर्तकत्वात्। कौष्ठ्याग्निप्रेरितमारुतनिर्वर्त्या हि ऋक्। पालनाद्वा वाचः पतिः। प्राणेनयह प्राण ही प्रकृत आङ्गिरस बृहस्पति है। किस प्रकार बृहस्पति है? सो बतलाया जाता है—वाक् ही बृहती—छत्तीस अक्षरोंवाली बृहती छन्द है। वाक् अनुष्टुप् भी है। किस प्रकार? "वाक् ही अनुष्टुप् है" इस श्रुतिके अनुसार। किंतु वह अनुष्टुप् वाक् बृहती छन्दमें अन्तर्भूत हो जाती है। 'अतः वाक् ही बृहती है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान कहना उचित ही है। "प्राण बृहती है, प्राण ऋक् है—इस प्रकार ही जाने" इस अन्य श्रुतिसे प्राणरूपसे बृहतीकी स्तुति की जानेके कारण बृहतीमें भी समस्त ऋचाओंका अन्तर्भाव हो जाता है। समस्त ऋचाएँ वाग्रूपा हैं, इसलिये भी उनका प्राणमें अन्तर्भाव होता है।<br><br>सो किस प्रकार? इसपर श्रुति कहती है—उस वाक्का—बृहतीका यानी ऋक्का यह प्राण पति है, क्योंकि यही उसको ¹अभिव्यक्त करनेवाला है—जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुसे ही ऋक् निष्पन्न होती है अथवा वाणीका पालन करनेके कारण यह उसका

१. जठराग्निद्वारा प्रेरित जो शरीरान्तर्गत प्राणवायु है वही ऊपरकी ओर जाकर कण्ठादिसे आहत हो वर्णोंके रूपमें अभिव्यक्त होता है। देवताधिकरणमें वाक्‌को प्राणात्मिका ही निश्चित किया गया है और ऋक् वागात्मिका बतलायी गयी है इसलिये उसका प्राणमें अन्तर्गत होना उचित ही है।

१४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| हि पाल्यते वाक् । अप्राणस्य शब्दोच्चारणसामर्थ्याभावात् । तस्मादु बृहस्पतिर्ऋचां प्राण आत्मेत्यर्थः ॥ २० ॥ | पति है। प्राणसे ही वाणीका पालन होता है, क्योंकि प्राणहीनको शब्दोच्चारणकी शक्ति नहीं होती। अतः यह बृहस्पति यानी ऋचाओंका प्राण अर्थात् आत्मा है ॥२०॥ |


प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वकी उपपत्ति

तथा यजुषाम् । कथम् ?इसी प्रकार यह यजुर्मन्त्रोंका भी आत्मा है। किस प्रकार ?

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥

यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है, उसका यह पति है, इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है ॥ २१ ॥

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म, ब्रह्म यजुः, तच्च वाग्विषेष एव । तस्या वाचो यजुषो ब्रह्मण एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः पूर्ववत् ।<br><br>कथं पुनरेतदवगम्यते बृहतीब्रह्मणोर्ऋग्यजुष्ट्वं न पुनरन्यार्थत्वम् ? इत्युच्यते—वाचोऽन्ते सामसामानाधिकरण्यनिर्देशात् “वाग्वै साम” (१।३।२२) इति ।यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है। ब्रह्म अर्थात् यजुः है, क्योंकि वह भी एक प्रकारकी वाणी ही है। उस वाक्—यजुः यानी ब्रह्मका यह पति है; इसलिये पूर्ववत् यह ब्रह्मणस्पति है।<br><br>किंतु यह कैसे जाना जाता है कि बृहती और ब्रह्म क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं, इनका कोई दूसरा अर्थ नहीं है ? इसपर कहा जाता है—अन्तमें [ अर्थात् आगे चलकर ] “वाग्वै साम” इस वाक्यद्वारा वाणीका सामके साथ सामानाधिकरण्य दिखलाया है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १४३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तथा च 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इति च वाक्समानाधिकरणयोरृग्यजुष्ट्वं युक्तम् ।उसीके समान 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इन वाक्योंमें जो वाक्के समानाधिकरण [बृहती और ब्रह्म] हैं उसका ऋक् और यजुः होना उचित ही है।
परिशेषाच्च—साम्नि अभिहिते ऋग्यजुषी एव परिशिष्टे । वाग्विशेषत्वाच्च—वाग्विशेषौ हि ऋग्यजुषौ । तस्मात् तयोर्वाचा समानाधिकरणता युक्ता ।यही बात परिशेषसे भी सिद्ध होती है—सामके कह देनेपर ऋक् और यजुः ही परिशिष्ट (शेष) रहते हैं। तथा वाग्विशेष होनेसे भी यही बात मालूम होती है—ऋक् और यजुः ये वाग्विशेष ही हैं। अतः वाणीके साथ उन दोनोंका समानाधिकरण होना उचित ही है।
अविशेषप्रसङ्गाच्च—सामोद्गीथ इति च स्पष्टं विशेषाभिधानत्वम्, तथा बृहतीब्रह्मशब्दयोरपि विशेषाभिधानत्वं युक्तम् । अन्यथा ऽनिर्धारितविशेषयोरानर्थक्यापत्तेश्च विशेषाभिधानस्य वाङ्मात्रत्वे चोभयत्र पौनरुक्त्यात् ।<br><br>ऋग्यजुःसामोद्गीथशब्दानां च श्रुतिष्वेवंक्रमदर्शनात् ॥ २१ ॥इसके सिवा [बृहती और ब्रह्मका रूढ अर्थ लेनेसे] अविशेषका प्रसङ्ग होगा। [आगे] साम और उद्गीथ कहकर स्पष्टतया विशेषका उल्लेख किया है, उसी प्रकार बृहती और ब्रह्म शब्दोंका भी विशेष अर्थ बतलाना आवश्यक है। अन्यथा विशेषका निश्चय न होनेसे उनकी निरर्थकता ही सिद्ध होगी। यदि उनका विशेष वाक् ही बतलाया जाय तो दोनों जगह पुनरुक्तिका प्रसङ्ग होगा। तथा ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथ—इन शब्दोंका श्रुतियोंमें ऐसा ही क्रम देखा गया है। [इसलिये बृहती और ब्रह्म शब्द क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं] ॥२१॥

१४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१४४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

प्राणके सामत्वकी उपपत्ति

एष उ एव साम वाग्वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्। यद्वेव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥

यह ही साम है। वाक् ही 'सा' है और यह (प्राण) 'अम' है। 'सा' और 'अम' ही साम हैं; यही सामका सामत्व है; क्योंकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान है इसीसे यह साम है। जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है ॥ २२ ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एष उ एव साम। कथम्? इत्याह-<br><br>वाग्वै सा यत्किञ्चित्स्त्रीशब्दाभिधेयं सा वाक्। सर्वस्त्रीशब्दाभिधेयवस्तुविषयो हि सर्वनाम 'सा' शब्दः। तथा अम एष प्राणः। सर्वपुंशब्दाभिधेयवस्तुविषयोऽमः शब्दः। "केन मे पौंस्नानि नामान्याप्नोषीति, प्राणेनेति ब्रूयात्केन मे स्त्रीनामानीति वाचा" (कौषी०यही साम है। किस प्रकार ?<br>सो बतलाते हैं—वाक् ही 'सा' है। जो कुछ भी स्त्रीशब्दवाच्य है वह वाक् है। 'सा' यह सर्वनाम शब्द समस्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। तथा 'अम' यह प्राण है। 'अम' शब्द समस्त पुँल्लिङ्ग-शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय करता है। "[यदि कोई पूछे] मेरे पुँल्लिङ्ग नामोंको तू किसके द्वारा प्राप्त करता है ? तो 'प्राणसे' ऐसा कहे और [यदि पूछे कि] स्त्रीलिङ्ग नामोंको किससे प्राप्त करता है तो