बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| यस्मादयं पुरुषार्ध आकाशः स्त्र्यर्थशून्यः पुनरुद्वहनात्तस्मात्पूर्यते स्त्र्यर्थेन, पुनः सम्पुटीकरणेनेव विदलार्थः । तां स प्रजापतिर्मन्वाख्यः शतरूपाख्यामात्मनो दुहितरं पत्नीत्वेन कल्पितां समभवन्मैथुनमुपगतवान् । ततस्तस्मात्तदुपगमनाद् मनुष्या अजायन्तोत्पन्नाः ॥३॥ | क्योंकि यह पुरुषार्ध आकाश स्त्र्यर्थसे शून्य है, इसलिये पुनः विवाह करनेपर यह स्त्र्यर्थसे पूर्ण होता है, जिस प्रकार कि विदलार्ध पुनः सम्पुटित कर दिये जानेपर । तब वह मनुसंज्ञक प्रजापति अपनी पत्नीरूप कल्पना की हुई उस अपनी ही शतरूपा नामकी कन्यासे संयुक्त हुआ अर्थात् मैथुनधर्ममें प्रवृत्त हुआ । उस मैथुनकी प्रवृत्तिसे मनुष्य उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥ |
मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि
सो हेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु मात्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्तत एकशफमजायताजेतराभवद्बस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥४॥
उस [ शतरूपा ] ने यह विचार किया कि 'अपनेहीसे उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ, अतः वह गौ हो गयी, तो दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए । तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया, फिर वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ हों गया और उससे
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७६
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७६
सम्भोग करने लगा । इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया । फिर वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा होकर उससे समागम करने लगा । इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुष-रूप जोड़े) हैं उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ ४ ॥
| सा शतरूपा उ ह इयं सेयं दुहितृगमने स्मार्तं प्रतिषेधमनुस्मरन्तीक्षाञ्चक्रे । कथं न्विदमकृत्यं यन्मा मामात्मन एव जनयित्वोत्पाद्य सम्भवत्युपगच्छति । यद्यप्ययं निर्घृणोऽहं हन्तेदानीं तिरोऽसानि जात्यन्तरेण तिरस्कृता भवानि । इत्येवमीक्षित्वासौ गौरभवत् । उत्पाद्यप्राणिकर्म्मभिश्चोद्यमानायाः पुनःपुनः सैव मतिः शतरूपाया मनोश्चाभवत् । ततश्च ऋषभ इतरः । तां समेवाभवदित्यादि पूर्ववत् । ततो गावोऽजायन्त ।<br><br>तथा वडवेतराभवदश्ववृष इतरः । तथा गर्दभीतरा गर्दभ इतरः । तत्र वडवाश्ववृषादीनां सङ्गमात्तत एकशफमेकखुरमश्वाश्वतरगर्दभाख्यं त्रयमजायत । | वह यह शतरूपा स्मृतिके कन्यागमनसम्बन्धी प्रतिषेधवाक्यको स्मरण कर यह विचार करने लगी । यह ऐसा अकरणीय कार्य क्यों करता है जो मुझे अपनेहीसे उत्पन्नकर मेरे साथ सम्भोग करता है । यद्यपि यह तो निर्दय है तथापि मैं अब छिप जाती हूँ—जात्यन्तररूपसे अपनेको छिपाये लेती हूँ । ऐसा विचारकर वह गौ हो गयी । किंतु उत्पन्न किये जाने योग्य प्राणियोंके कर्मोंसे प्रेरित हुई शतरूपाकी और मनुकी भी पुनःपुनः वैसी ही मति होती रही । अतः मनु वृषभ हो गया और पूर्ववत् उसके साथ समागम करने लगा । उससे गाय-बैल उत्पन्न हुए ।<br><br>फिर शतरूपा घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ तथा उसके पश्चात् वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ । तब उन घोड़ी और अश्वश्रेष्ठादिके समागमसे घोड़ा, खच्चर और गधा—ये तीन एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । |
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१८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा अजेतराभवद्वस्त इतरश्छाग इतरः, तथाऽविरितरा मेष इतरः, तां समेवाभवत् । तां तामिति वीप्सा । तामजां तामविं चेतिसमभवदेवेत्यर्थः । ततोऽजाश्वावयश्चाजावयोऽजायन्त । एवमेव यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदं मिथुनं स्त्रीपुंसलक्षणं द्वन्द्वम्, आ पिपीलिकाभ्यः पिपीलिकाभिः सहानेनैव न्यायेन तत्सर्वमसृजत जगत्सृष्टवान् ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा तथा वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा हो गया और उससे समागम करने लगा । यहाँ 'ताम्' शब्दकी 'तां ताम्' ऐसी द्विरुक्ति समझनी चाहिये अर्थात् उस बकरीसे और उस भेड़से समागम करने लगा। तब भेड़-बकरियोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आपिपीलिकाभ्यः—चींटीसे लेकर ये जो कुछ भी मिथुन—स्त्री-पुरुषरूप जोड़े हैं, उसने इसी न्यायसे इन सबकी रचना की, अर्थात् इस सारे जगत्को उत्पन्न किया ॥ ४ ॥ |
प्रजापतिकी सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूपसे उसकी उपासना करनेका फल
सोऽवेदहं वाव सृष्टि॒रस्म्यहँ॒ हीदँ॒ सर्व॑मसृक्षीति ततः सृष्टि॑रभवत्सृ॒ष्ट्याँ॒ हास्यै॒तस्यां॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ ५ ॥
उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैंने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की इस सृष्टिमें [स्रष्टा] होता है ॥ ५ ॥
| स प्रजापतिः सर्वमिदं जगत्सृष्ट्वा अवेत् । कथम्? अहं वावाहमेव सृष्टिः, सृज्यते इति सृष्टं जगदुच्यते सृष्टिरिति । यन्मया | उस प्रजापतिने इस सम्पूर्ण जगत्को रचकर जाना। किस प्रकार जाना ? 'मैं ही सृष्टि हूँ।' उसका सर्जन (निर्माण) किया जाता है, इसलिये वह सृष्ट (उत्पन्न) हुआ जगत् सृष्टि कहलाता है। [उसने विचार किया—] 'मेरेद्वारा |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८१
| सृष्टं जगन्मदभेदत्वादहमेवास्मि न मत्तो व्यतिरिच्यते । कुत एतत् ? अहं हि यस्मादिदं सर्वं जगदसृक्षि सृष्टवानस्मि तस्मादित्यर्थः । | जो जगत् रचा गया है वह मुझसे अभिन्न होनेके कारण मैं ही हूँ, वह मुझसे अलग नहीं है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि मैंने ही इस सम्पूर्ण जगत्को रचा है, इसलिये'—[ यह मुझसे अभिन्न है ] ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| यस्मात्सृष्टिशब्देन आत्मानमेवाभ्यधातप्रजापतिः, ततस्तस्मात्सृष्टिरभवत् सृष्टिनामाभवत् । सृष्ट्यां जगति, हास्य प्रजापतेरेतस्यामेतस्मिञ्जगति, स प्रजापतिवत्स्रष्टा भवति स्वात्मनोऽनन्यभूतस्य जगतः, कः ? य एवं प्रजापतिवद्यथोक्तं स्वात्मनोऽनन्यभूतं जगत्साध्यात्मदिभूताधिदैवं जगदहमस्मीति वेद ॥५॥ | क्योंकि प्रजापतिने 'सृष्टि' नामसे अपनेको ही कहा था, इसलिये वह सृष्टि अर्थात् सृष्टि नामवाला हुआ । इस प्रजापतिकी सृष्टिमें अर्थात् इस जगत्में वह प्रजापतिके समान अपनेसे अनन्यभूत जगत्का स्रष्टा होता है; कौन ? जो इस प्रकार प्रजापतिके समान उपर्युक्त अपनेसे अभिन्न जगत्को, 'अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवके सहित सारा जगत् मैं हूँ' इस प्रकार जानता है ॥ ५ ॥ |
प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निममसृजत तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः । तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवाः । अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा
१८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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इदँ् सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमनिरन्नादः
सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः । यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ
यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां
हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥
फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूपी योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे लोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे लोमरहित ही होती है। अतः [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस ( अग्नि ) का यजन करो, इस ( इन्द्र ) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह गीला है उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अतिसृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की—स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अतिसृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं स प्रजापतिर्जगदिदं मिथुनात्मकं सृष्ट्वा ब्राह्मणादिवर्णनियन्त्रीर्देवताः सिसृक्षुरादौ, अथेति शब्दद्वयमभिनयप्रदर्शनार्थम्, अनेन प्रकारेण मुखे हस्तौ प्रक्षिप्याभ्यमन्थदभिमुख्येन मन्थनमकरोत् । स मुखहस्ताभ्यां मथित्वा मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां | इस प्रकार उस प्रजापतिने इस मिथुनात्मक जगत्की रचना कर ब्राह्मणादि वर्णोंका नियन्त्रण करनेवाली देवताओंकी रचना करनेकी इच्छासे पहले—यहाँ 'अथ' और 'इति' ये दो शब्द अभिनय प्रदर्शित करनेके लिये हैं—इस प्रकारसे मुखमें हाथ डालकर 'अभ्यमन्थत्'—अभिमुखतासे मन्थन किया। उसने मुखको हाथोंसे मथकर मुखरूप योनिसे हाथरूप योनियोंके द्वारा |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| च योनिभ्यामग्निं ब्राह्मणजातेरनुग्रहकर्तारमसृजत सृष्टवान् । | ब्राह्मण जातिपर अनुग्रह करनेवाले अग्निदेवको उत्पन्न किया । |
| यस्माद्दाहकस्याग्नेर्योनिरेतदुभयं हस्तौ मुखं च, तस्मादुभयमप्येतदलोमकं लोमविवर्जितम् । किं सर्वमेव ? न, अन्तरतोऽभ्यन्तरतः; अस्ति हि योन्या सामान्यमुभयस्यास्य । किम् ? अलोमका हि योनिरन्तरतः स्त्रीणाम् । तथा ब्राह्मणोऽपि मुखादेव जज्ञे प्रजापतेः । तस्मादेकयोनित्वाज्ज्येष्ठेनेवानुजोऽनुगृह्यते अग्निना ब्राह्मणः । तस्माद्ब्राह्मणोऽग्निदेवत्यो मुखवीर्यश्चेति श्रुतिस्मृतिसिद्धम् । | क्योंकि ये हाथ और मुख दोनों दाह करनेवाले अग्निदेवकी योनि हैं । इसलिये ये दोनों ही लोमशून्य हैं। क्या सारे ही लोमशून्य हैं ? —नहीं, अन्तरतः —भीतरसे । इन दोनोंकी योनिसे समानता है । क्या समानता है ? स्त्रियोंकी योनि भी भीतरसे लोमशून्य ही होती है । इसी प्रकार ब्राह्मण भी प्रजापतिके मुखसे ही उत्पन्न हुआ है । अतः एक ही योनिसे उत्पन्न होनेवाले होनेसे जिस प्रकार बड़े भाईका छोटे भाईपर अनुग्रह रहता है उसी प्रकार अग्नि भी ब्राह्मणपर अनुग्रह करता है । अतः अग्नि ही ब्राह्मणकी देवता है और वह मुखरूप वीर्यवाला है—यह बात श्रुति-स्मृतिसिद्ध है । |
| तथा बलाश्रयाभ्यां बाहुभ्यां बलभिदादिकं क्षत्रियजातिनियन्तारं क्षत्रियं च । तस्मादैन्द्रं क्षत्रं बाहुवीर्यं चेति श्रुतौ स्मृतौ चावगतम् । तथोरुत ईहा चेष्टा | इसी प्रकार बलकी आश्रयभूता भुजाओंसे उसने क्षत्रियजातिके नियन्ता इन्द्रादि और क्षत्रियोंको रचा । इसीसे क्षत्रिय इन्द्रदेवताका अनुग्राह्य और बाहुरूप वीर्यवाला होता है—यह बात श्रुति और स्मृतिमें विख्यात है । तथा ईहा यानी चेष्टा उसके आश्रय- |
१८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तदाश्रयाद्वस्वादिलक्षणं विशो नियन्तारं विशं च । तस्मात्कृष्यादिपरो वस्वादिदैवत्यश्च वैश्यः । तथा पूषणं पृथ्वीदैवतं शूद्रं च पद्भ्यां परिचरणक्षममसृजतेति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेः । | भूत ऊरुओंसे वैश्यजातिके नियन्ता वसु आदिको और वैश्यजातिको उत्पन्न किया । अतः वैश्य कृषि आदि कर्मोंमें संलग्न रहनेवाला और वसु आदि देवताओंसे अनुगृहीत होता है । इसी तरह पृथ्वीदैवत पूषा और परिचर्यापरायण शूद्रजातिको चरणोंसे रचा—ऐसा श्रुति-स्मृति जनित प्रसिद्धिसे सिद्ध होता है । | | तत्र क्षत्रादिदेवतासर्गमिहानुक्तं वक्ष्यमाणमप्युक्तवदुपसंहरति सृष्टिसाकल्यानुकीर्त्यै । यथेयं श्रुतिर्व्यवस्थिता तथा प्रजापतिरेव सर्वे देवा इति निश्चितोऽर्थः ।<br><br>स्रष्टुरनन्यत्वात्सृष्टानाम् । प्रजापतिनैव तु सृष्टत्वाद् देवानाम् । | उनमें क्षत्रियादिके देवताओंकी सृष्टिका यद्यपि यहाँ (मूलमें) उल्लेख नहीं है, और वह आगे कही जानेवाली है तो भी सृष्टिकी सर्वाङ्गताका अनुकीर्तन करनेके लिये श्रुति उसका कहे हुएके समान उपसंहार करती है । जैसी कि इस श्रुतिकी व्यवस्था है उसके अनुसार प्रजापति ही सर्व देवरूप है—यह इसका निश्चित अर्थ है, क्योंकि सृष्ट पदार्थ स्रष्टासे अभिन्न होते हैं और प्रजापतिने ही सब देवोंकी सृष्टि की है । | | अथैवं प्रकरणार्थे व्यवस्थिते तत्स्तुत्यभिप्रायेणाविद्वन्मतान्तरनिन्दोपन्यासः; अन्यनिन्दान्यस्तुतये । तत्तत्र कर्मप्रकरणे केवल- | अब इस प्रकार इस प्रकरणका अर्थ निश्चित होनेपर उसकी स्तुतिके लिये अविद्वान्के मतान्तरकी निन्दाका उपन्यास किया जाता है, क्योंकि एककी निन्दा दूसरेकी स्तुतिके लिये होती है । इसलिये अभिप्राय यह है कि वहाँ कर्मप्रकरणमें केवल |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| याज्ञिका यागकाले यदिदं वच आहुः—'अमुमग्निं यजामुमिन्द्रं यज' इत्यादि—नामशस्त्रस्तोत्रकर्मादिभिन्नत्वाद्छिन्नमेवाग्न्यादिदेवमेकैकं मन्यमाना आहुरित्यभिप्रायः। तन्न तथा विद्यात्, यस्मादेतस्यैव प्रजापतेः सा विसृष्टिर्देवभेदः सर्व एष उ ह्येव प्रजापतिरेव प्राणः सर्वे देवाः। | याज्ञिकलोग यज्ञके समय जो अग्नि आदि देवताओंमेंसे प्रत्येकके नाम, शस्त्र, स्तोत्र और कर्म भिन्न-भिन्न होनेके कारण एक-एकको अलग-अलग मानते हुए ऐसा वचन बोलते हैं कि 'इस अग्निका यजन करो, इस इन्द्रका यजन करो' उसे उस रूपमें (ठीक) नहीं समझना चाहिये; क्योंकि यह सम्पूर्ण विसृष्टि-देवभेद इस प्रजापतिका ही है, अतः प्राणरूप प्रजापति ही सर्वदेव है। |
| अत्र विप्रतिपद्यन्ते—पर एव हिरण्यगर्भ इत्येके। संसारीत्यपरे। | इस विषयमें विद्वानोंका मतभेद है—किन्हींका तो कथन है कि परमात्मा ही हिरण्यगर्भ है और कोई कहते हैं कि वह संसारी है। |
| पर एव तु मन्त्रवर्णात्। "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः" इति श्रुतेः। "एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवाः" (ऐ० उ० ५।३) इति च श्रुतेः। स्मृतेश्च— "एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्" (मनु० १२।१२३) इति, "योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः। सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ"। (मनु० १।७) इति च। | प्रथम पक्ष—मन्त्राक्षरोंसे सिद्ध होनेके कारण परमात्मा ही हिरण्यगर्भ है। "उसे इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं" इस श्रुतिसे तथा "यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है, यह प्रजापति (विराट्) है और यह सम्पूर्ण देवगण है" इस श्रुतिसे, एवं "इस परमात्माको कोई अग्नि, कोई मनु और कोई प्रजापति कहते हैं", "यह जो अतीन्द्रिय, अग्राद्य, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय और अचिन्त्य परमात्मा है वही स्वयं प्रकट हुआ" इन स्मृतियोंसे यही सिद्ध होता है। |
१८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संसार्येव वा स्यात्। "सर्वान्पाप्मन औषत्" (बृ० उ० १। ४। १) इति श्रुतेः। न ह्यसंसारिणः पाप्मदाहप्रसङ्गोऽस्ति। भयारतिसंयोगश्रवणाच्च। "अथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत" (बृ० उ० १। ४। ६) इति च। "हिरण्यगर्भं पश्यति जायमानम्" (श्वे० उ० ४। १२) इति च मन्त्रवर्णात्। स्मृतेश्च कर्मविपाकप्रक्रियायाम्—"ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च। उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः" (मनु० १२। ५०) इति। | द्वितीय पक्ष—अथवा संसारी ही हिरण्यगर्भ होना चाहिये, जैसा कि "उसने समस्त पापोंको दग्ध कर दिया" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, क्योंकि असंसारी परमात्माके लिये तो पापदाहका प्रसंग ही नहीं है। इसके सिवा उसका भय और अरतिके साथ संयोग भी सुना गया है; यहाँ यह भी कहा है कि "उसने स्वयं मर्त्य होकर भी अमृतों (देवताओं) की रचना की।" तथा "उसने उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भको देखा" इस मन्त्रवर्णसे भी यही सिद्ध होता है। और कर्मविपाक-प्रक्रियामें "ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ), प्रजापतिगण, धर्म, महत्तत्त्व और अव्यक्त—इन्हें मनीषीगण उत्तम सात्त्विकी गति बतलाते हैं" इत्यादि स्मृति भी है। | | अथैवं विरुद्धार्थानुपपत्तेः प्रामाण्यव्याघात इति चेत् ? | शङ्का—किंतु इस प्रकार विरुद्ध अर्थ तो संगत नहीं हो सकता। इसलिये इससे श्रुतिके प्रामाण्यका विघात होता है। | | न, कल्पनान्तरोपपत्तेरविरोधात्। | समाधान—ऐसा मत कहो, क्योंकि एक अन्य कल्पना सम्भव होनेके कारण इनमें अविरोध हो सकता है। | | उपाधिविशेषसम्बन्धाद्विशेषकल्पनान्तरमुपपद्यते। "आसीनो दूरं | उपाधिविशेषके सम्बन्धसे एक विशेष प्रकारकी कल्पना होनी सम्भव है। "वह स्थिर होने- |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| व्रजति शयानो याति सर्वतः ।<br>कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातु-<br>मर्हति" (क०उ० १।२।२१)<br>इत्येवमादिश्रुतिभ्य उपाधिवशा-<br>त्संसारित्वं न परमार्थतः। स्वतो-<br>ऽसंसार्येव । | पर भी दूर चला जाता है, शयन<br>किये होनेपर भी सब ओर जाता है,<br>उस हर्ष और विषादयुक्त देवको मेरे<br>सिवा और कौन जान सकता है ?"<br>इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उसका<br>उपाधिके ही कारण संसारित्व है,<br>परमार्थतः नहीं। स्वतः तो वह<br>असंसारी ही है। |
| एवमेकत्वं नानात्वं च हिर-<br>ण्यगर्भस्य । तथा सर्वजीवानाम्,<br>"तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८-<br>१६) इति श्रुतेः । हिरण्यगर्भ-<br>स्तु उपाधिशुद्धयतिशयापेक्षया<br>प्रायशः पर एवेति श्रुतिस्मृति-<br>वादाः प्रवृत्ताः । संसारित्वं तु<br>क्वचिदेव दर्शयन्ति । जीवानां<br>उपाधिगताशुद्धिबाहुल्यात्संसा-<br>रित्वमेव प्रायशोऽभिलप्यते ।<br>व्यावृत्तकृत्स्नोपाधिभेदापेक्षया तु<br>सर्वः परत्वेनाभिधीयते श्रुति-<br>स्मृतिवादैः । | इस प्रकार हिरण्यगर्भका एकत्व<br>भी है और नानात्व भी। इसी<br>तरह सब जीवोंका भी एकत्व और<br>नानात्व है, जैसा कि "तू वह है"<br>इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। हिरण्य-<br>गर्भ तो उपाधिकी शुद्धिकी अति-<br>शयताकी अपेक्षासे प्रायः परमात्मा<br>ही है—ऐसी श्रुति-स्मृतिवादोंकी<br>प्रवृत्ति है। वे उसका संसारित्व<br>तो कहीं-कहीं ही दिखाते हैं। किंतु<br>जीवोंका तो उपाधिगत अशुद्धिकी<br>अधिकताके कारण प्रायः संसारित्व<br>ही बतलाया जाता है। तथा<br>सम्पूर्ण उपाधिभेदके बाधकी अपेक्षा-<br>से श्रुति और स्मृतिके वादोंद्वारा<br>सबका परमात्मभावसे निरूपण<br>किया जाता है। |
| तार्किकैस्तु परित्यक्तागमबलै-<br>रस्ति नास्ति कर्ताकर्तेत्यादि | जो शास्त्रका बल छोड़ चुके हैं<br>तथा 'आत्मा है—नहीं है, वह<br>कर्ता है—अकर्ता है' इस प्रकार |
१८८ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १८८ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| विरुद्धं बहु तर्कयद्भिर्व्याकुलीकृतः शास्त्रार्थः, तेनार्थनिश्चयो दुर्लभः। ये तु केवलशास्त्रानुसारिणः शान्तदर्पास्तेषां प्रत्यक्षविषय इव निश्चितः शास्त्रार्थो देवतादिविषयः। | बहुत-से विरुद्ध तर्क करते हैं उन तार्किकोंने तो शास्त्रको दुर्विज्ञेय कर दिया है, इससे उसके तात्पर्यका निश्चय होना कठिन हो गया है। किंतु जो केवल शास्त्रका ही अनुसरण करनेवाले और दर्पहीन पुरुष हैं उन्हें तो शास्त्रका देवतादि-विषयक अभिप्राय प्रत्यक्षके समान निश्चित है। | | तत्र प्रजापतेरेकस्य देवस्यात्राद्यलक्षणो भेदो विवक्षित इति तत्राग्निरुक्तोऽत्ता, आद्यः सोम इदानीमुच्यते—अथ यत्किञ्चेदं लोक आर्द्रं द्रवात्मकं तद्रेतस आत्मनो बीजादसृजत; “रेतस आपः” (ऐ० उ० १ । ४) इति श्रुतेः। द्रवात्मकश्च सोमः। तस्माद्यदार्द्रं प्रजापतिना रेतसः सृष्टं तदु सोम एव। | इतना निश्चय हो जानेपर अब एक देव प्रजापतिके अत्ता (भोक्ता) और आद्य (भोग्य) रूप भेदका निरूपण करना अभीष्ट है, उसमें 'अत्ता' रूप अग्निका वर्णन तो कर दिया गया, अब 'आद्य' रूप सोम-का वर्णन किया जाता है। यह जो कुछ लोकमें आर्द्र--द्रवात्मक है उसे उसने अपने बीज रेतस् (वीर्य) से उत्पन्न किया; जैसा कि “रेतस्से जल हुआ” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सोम भी द्रवात्मक होता है। अतः प्रजापतिके द्वारा जो कुछ अपने वीर्यसे द्रवात्मक रचा गया है वह सोम ही है। | | एतावद्वै एतावदेव नातोऽधिकमिदं सर्वम्। किं तत्? अन्नं चैव सोमो द्रवात्मकत्वादाप्याय- | यह सब इतना ही है, इससे अधिक नहीं है। वह क्या है? यही कि द्रवात्मक होनेके कारण |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१८९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१८९
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| कम्। अन्नादश्चाग्निरौष्ण्याद् रूक्षत्वाच्च। तत्रैवमवध्रियते, सोम एवान्नं यद्यते तदेव सोम इत्यर्थः। य एवात्ता स एवाग्निः; अर्थबलाद्ध्यवधारणम्। अग्निरपि क्वचिद् हूयमानः सोमपक्षस्यैव। सोमोऽपीज्यमानोऽग्निरेवात्तृत्वात्। एवमग्नीषोमात्मकं जगदात्मत्वेन पश्यन्न केनचिद्दोषेण लिप्यते, प्रजापतिश्च भवति। | सोम पोषक अन्न है और उष्णता तथा रूक्षताके कारण अग्नि अन्नाद है। यहाँ यह निश्चय होता है कि सोम ही अन्न है, अर्थात् जो भक्षण किया जाता है वही सोम है। इसी प्रकार जो ही अत्ता (भक्षण करनेवाला) है वही अग्नि है, अर्थके बलसे ही ऐसा निश्चय किया जाता है। कहीं हवन किया जानेवाला होनेसे अग्नि भी सोमपक्षका ही हो जाता है और कहीं यजन किया जानेवाला होनेपर अत्ता होनेके कारण सोम भी अग्नि ही माना जाता है। इस प्रकार अग्नीषोमात्मक जगत्को आत्मभावसे देखनेवाला पुरुष किसी भी दोषसे लिप्त नहीं होता तथा वह प्रजापति हो जाता है। |
| सैषा ब्रह्मणः प्रजापतेरतिसृष्टिरात्मनोऽप्यतिशया। का सा? इत्याह—यच्छ्रेयसः प्रशस्यतरान्नात्मनः सकाशाद्यस्मादसृजत देवांस्तस्माद्देवसृष्टिरतिसृष्टिः। कथं पुनरात्मनोऽतिशया सृष्टिः? इत्यत आह—अथ यद्यस्मान्मर्त्यः सन्मरणधर्मा सन्नमृतानमरण- | वह यह प्रजापति ब्रह्माकी अतिसृष्टि अर्थात् अपनेसे भी बढ़ी हुई सृष्टि है। वह क्या है? इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि प्रजापतिने देवताओंको अपनी अपेक्षा श्रेयसः—प्रशस्यतर रचा है, इसलिये देवसृष्टि अतिसृष्टि है। [प्रजापतिकी] यह सृष्टि अपनी अपेक्षा बढ़कर क्यों है? इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि इसने स्वयं मर्त्य--मरणधर्मा होनेपर |
१९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| धर्मिणो देवान् कर्मज्ञानवह्निना सर्वान्पाप्मन ओषित्वाऽसृजत, तस्मादियमतिसृष्टिरुत्कृष्टज्ञानस्य फलमित्यर्थः । तस्मादेतामतिसृष्टिं प्रजापतेरात्मभूतां यो वेद स एतस्यामतिसृष्ट्यां प्रजापतिरिव भवति प्रजापतिवदेव स्रष्टा भवति ॥ ६ ॥ | भी कर्मज्ञानरूप अग्निसे अपने समस्त पापोंको दग्धकर इन अमृत—अमरणधर्मा देवताओंकी रचना की है। इसलिये यह अतिसृष्टि अर्थात् उत्कृष्ट ज्ञानका फल है। इसलिये प्रजापतिकी आत्मभूता इस अतिसृष्टिको जो जानता है वह इस अतिसृष्टिमें प्रजापतिके समान होता है, अर्थात् प्रजापतिके समान ही जगत्का स्रष्टा होता है ॥ ६ ॥ |
अव्याकृत कारण ब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति, दोनोंका अभेद और इस अभेदोपासनाका फल
| सर्वं वैदिकं साधनं ज्ञानकर्मलक्षणं कर्त्राद्यनेककारकापेक्षं प्रजापतित्वफलावसानं साध्यमेतावदेव यदेतद्व्याकृतं जगत्संसारः । अथैतस्यैव साध्यसाधनलक्षणस्य व्याकृतस्य जगतो व्याकरणात्प्राग्बीजावस्था या तां निर्दिदिक्षत्यङ्कुरादिकार्यानुमितामिव वृक्षस्य, कर्मबीजोऽविद्याक्षेत्रो ह्यसौ संसारवृक्षः समूल उद्धर्तव्य इति । | कर्तादि अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला ज्ञान और कर्मरूप सम्पूर्ण वैदिक साधन तथा प्रजापतित्वरूप फलमें समाप्त होनेवाला साध्य इतना ही है जो कि यह व्याकृत जगत् यानी संसार है। अब, जिसका बीज कर्म है और क्षेत्र अविद्या है उस संसारवृक्षको समूल उखाड़ना है—इसलिये अङ्कुरादि कार्यसे अनुमित होनेवाली वृक्षकी पूर्व बीजावस्थाके समान इस साध्यसाधनरूप व्याकृत जगत्के व्याकृत होनेसे पूर्व इसकी जो बीजावस्था थी उसका श्रुति निर्देश करना चाहती है; क्योंकि |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
| तदुद्धरणे हि पुरुषार्थपरिसमाप्तिः। तथा चोक्तम्—“ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः” (२।३।१) इति काठके। गीतासु च “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्” (१५।१) इति। पुराणे च—“ब्रह्मवृक्षः सनातनः” इति। | उस संसारवृक्षके उखड़नेमें ही पुरुषार्थकी परिसमाप्ति होती है। ऐसा ही कठोपनिषदमें “ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः”, गीतामें “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्” और पुराणमें “ब्रह्मवृक्षः सनातनः” इत्यादि वाक्योंसे कहा भी है। |
तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतासौनामायमिदँ रूप इति तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौनामाऽयमिदँ रूप इति । स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुला ये तं न पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । वदन्वाक्पश्यँश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव । स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदाकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिँ श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥७॥
वह यह जगत् उस समय (उत्पत्तिसे पूर्व) अव्याकृत था। वह नाम-रूपके योगसे व्यक्त हुआ; अर्थात् 'यह इस नाम और इस रूपवाला है' इस प्रकार व्यक्त हुआ। अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु 'इस नाम और इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। वह यह (व्याकर्ता) इस (शरीर) में नखाग्रपर्यन्त प्रवेश किये हुए है, जिस
१९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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प्रकार कि छुरा छुरेके घरमें छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करने-वाला अग्नि अग्निके आश्रय (काष्ठादि) में गुप्त रहता है। परंतु उसे लोग देख नहीं सकते। वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रियाके कारण ही वह प्राण है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं। अतः इनमेंसे जो एक-एककी उपासना करता है वह नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है। वह एक-एक विशेषणसे ही युक्त होता है। अतः 'आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस (आत्मा) में ही वे सब एक हो जाते हैं। यह जो आत्मा है वही इस सबका प्राप्तव्य है, क्योंकि यह आत्मा है, इस आत्माके ज्ञात होनेसे ही इस सब जगत्को जानता है। जिस प्रकार पदों (खुर आदिके चिह्नों) द्वारा [खोये हुए पशुको] प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह इसके द्वारा यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| तद्धेदं तदिति बीजावस्थं जगत्प्रागुत्पत्तेस्तर्हि तस्मिन्काले; परोक्षत्वात्सर्वनाम्नाप्रत्यक्षाभिधानेनाभिधीयते, भूतकालसम्बन्धित्वादव्याकृतभाविनो जगतः; सुखग्रहणार्थमैतिह्यप्रयोगो हशब्दः। एवं ह तदा आसीदित्युक्यमाने सुखं तां परोक्षामपि जगतो बीजा- | 'तद्धेदम्'—तत् अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व बीजरूपमें स्थित जगत् 'तर्हि' उस समय—यहाँ अव्याकृतसे होनेवाला जगत् भूतकालसे सम्बद्ध होनेके कारण परोक्ष होनेसे 'तत्' और 'इदम्' इन दो सर्वनामोंद्वारा परोक्षरूपसे कहा गया है। तथा 'ह' इस ऐतिह्यवाचक अव्ययका प्रयोग उस (परोक्ष जगत्) का सुगमतासे ग्रहण (बोध) करानेके लिये किया गया है। अर्थात् 'एवं ह तदा आसीत्'¹—इस प्रकार कहनेपर, परोक्ष होनेपर भी उस जगत्की बीजावस्थाको श्रोता अनायास ही |
१. उस समय वह ऐसा था।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वस्थां प्रतिपद्यते, युधिष्ठिरो ह किल राजासीदित्युकते यद्वत् । इदमिति व्याकृतनामरूपात्मकं साध्यसाधनलक्षणं यथावर्णितमभिधीयते । तदिदंशब्दयोः परोक्षाप्रत्यक्षावस्थजगद्वाचकयोः सामानाधिकरण्यादेकत्वमेव परोक्षाप्रत्यक्षावस्थस्य जगतोऽवगम्यते । तदेवेदमिदमेव च तद्व्याकृतमासीदिति । अथैवं सति नासत उत्पत्तिर्न सतो विनाशः कार्यस्येत्यवधृतं भवति । | ग्रहण कर लेता है, जैसे 'यु^१धिष्ठिरो ह किल राजासीद्' ऐसा कहनेपर [युधिष्ठिरको] । 'इदम्' इस शब्दसे जिसके नाम और रूप अभिव्यक्त हो गये हैं वह साध्यसाधनरूप पूर्वोक्त जगत् ही कहा जाता है । [ इस प्रकार ] परोक्ष और प्रत्यक्षरूपसे स्थित जगत्के वाचक 'तत् और 'इदम्' शब्दोंका सामानाधिकरण्य होनेसे प्रत्यक्ष और परोक्षावस्थ जगत्की एकता ज्ञात होती है । वह ( अव्याकृत ) ही यह जगत् है और यही वह अव्याकृत था । ऐसा होनेसे यह निश्चय होता है कि असत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती और सत्कार्यका नाश नहीं हो सकता । |
| तदेवम्भूतं जगदव्याकृतं सन्नामरूपाभ्यामेव नाम्ना रूपेणैव च व्याक्रियत । व्याक्रियेतेति कर्मकर्तृप्रयोगात्तत्स्वयमेवात्मैव व्याक्रियत, वि आ अक्रियत, विस्पष्टं नामरूपविशेषावधारणमर्यादं व्यक्तीभावमापद्यत सामर्थ्या- | वह इस प्रकारका जगत् अव्याकृत रहकर 'नामरूपाभ्याम्—नाम और रूपके द्वारा ही व्याकृत हुआ । 'व्याक्रियत' ऐसा ^२कर्मकर्तृ प्रयोग होनेके कारण [ यह निश्चय होता है कि ] वह आत्मा ^३सामर्थ्यसे आक्षिप्त हुए नियन्ता, कर्ता और साधनरूप क्रियाके निमित्तोंवाले जगत्के रूपमें स्वयं ही 'व्याक्रियत'-- |
१. प्रसिद्ध है कि युधिष्ठिरनामक एक राजा हुआ था ।
२. जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो वह कर्मकर्ता कहलाता है ।
३. कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति होनी असम्भव है—इस सामर्थ्यसे
बृ० उ० १३—
१९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| दाक्षिप्तमन्नियन्तृकर्तृसाधनक्रिया-<br><br>निमित्तम् ।<br><br>असौनामाति सर्वनाम्नाविशेष-<br><br>भिधानेन नाममात्रं व्यपदिशति।<br><br>देवदत्तो यज्ञदत्त इति वा नामास्य<br><br>इत्यसौनामायम् । तथेदमिति<br><br>शुक्लकृष्णादीनामविशेषः । इदं<br><br>शुक्लमिदं कृष्णं वा रूपमस्येतीदं-<br><br>रूपः । तदिदमव्याकृतं वस्तु<br><br>एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले नामरूपा-<br><br>भ्यामेव व्याक्रियते असौनामा-<br><br>यमिदंरूप इति ।<br><br>यदर्थः सर्वशास्त्रारम्भः, यस्मि-<br><br>न्नविद्यया स्वाभाविक्या कर्तृक्रिया-<br><br>फलाध्यारोपणा कृता, यः कारणं<br><br>सर्वस्य जगतः, यदात्मके नामरूपे<br><br>सलिलादिव स्वच्छान्मलमिवफेन-<br><br>मव्याकृते व्याक्रियेते, यश्च ताभ्यां | वि आ अक्रियत अर्थात् विशिष्टरूपसे नामरूपविशेषके निश्चयकी मर्यादासे युक्त व्यक्तीभावको प्राप्त हुआ ।<br><br>‘असौनामा’ इस पदके ‘असौ’ इस सर्वनामसे किसी प्रकारका विशेष न बतलाकर श्रुति नाममात्रका प्रतिपादन करती है—देवदत्त या यज्ञदत्त इत्यादि इसके नाम हैं, इसलिये यह पुरुष ‘असौनामा’ है। तथा ‘इदम्’ यह शुक्ल-कृष्णादि वर्णोंका सामान्य वाचक है—यह ‘शुक्ल’ अथवा यह ‘कृष्ण’ इसका रूप है इसलिये यह इदंरूप है। इसीसे यह अव्याकृत वस्तु इस समय भी नाम-रूपके द्वारा ही ‘इस नामवाली है’, ‘इस रूपवाली है’ इस प्रकार व्यक्त होती है।<br><br>जिसके लिये सारे शास्त्रका आरम्भ हुआ है, जिसमें स्वाभाविकी अविद्यासे कर्ता, क्रिया और फलका आरोप किया गया है, जो सारे जगत्का कारण है, जिसके स्वरूपभूत नाम और रूप स्वच्छ जलसे मलरूप फेनके समान अव्याकृत-रूपसे स्थित हुए ही व्याकृत होते |
जिनका आक्षेप करना आवश्यक है उन नियन्ता—प्रेरक, कर्त्ता—उत्पत्तिका अनुकूल शरीर एवं इन्द्रियादिका व्यापार करनेवाला तथा साधन—इन्द्रियव्यापार इन क्रियाके निमित्तोंसे युक्त होकर व्यक्त हुआ ।
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १९५ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १९५ |
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| नामरूपाभ्यां विलक्षणः स्वतः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः, स एषोऽव्याकृते आत्मभूते नामरूपे व्याकुर्वन्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु देहेष्विह कर्मफलाश्रयेष्वशनायादिमत्सु प्रविष्टः । | हैं और जो उन नामरूपसे विलक्षण स्वयं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वरूप है वह यह [ आत्मा ] अव्याकृत एवं आत्मभूत नामरूपोंको व्यक्त करता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इन कर्मफलके आश्रयभूत एवं क्षुधादि-मान् समस्त देहोंमें प्रवेश किये हुए है । | | [व्याकृतप्रपञ्चे परमात्मानुप्रवेश-मीमांसा]<br>ननु अव्याकृतं स्वयमेव व्याक्रियतेत्युक्तम्, कथमिदानीम् उच्यते, पर एव तु आत्माव्याकृतं व्याकुर्वन्निह प्रविष्ट इति । | **शङ्का—**किंतु पहले यह कहा गया है कि अव्याकृत स्वयं ही व्याकृत होता है । अब यह कैसे कहा जाता है कि परमात्मा ही अव्याकृतको व्यक्त करता हुआ इसमें प्रविष्ट है । | | नैष दोषः, परस्याप्यात्मनोऽव्याकृतजगदात्मत्वेन विवक्षितत्वात् । आक्षिप्तनियन्तृकर्तृक्रियानिमित्तं हि जगदव्याकृतं व्याक्रियेतेत्यवोचाम । इदंशब्दसामानाधिकरण्याच्चाव्याकृतशब्दस्य ।<br><br>यथेदं जगन्नियन्त्राद्यनेककारकनिमित्तादिविशेषवद्व्याकृतम्, | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँ परमात्मा ही अव्याकृत जगद्रूपसे विवक्षित है । हमने कहा था कि [ सामर्थ्यसे ] आक्षिप्त हुए नियन्ता और कर्ता [ एवं साधन ] रूप क्रियाके निमित्तोंसे युक्त अव्याकृत जगत् ही व्याकृत होता है । इसके सिवा 'अव्याकृत' शब्दका 'इदम्' शब्दके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे भी यही सिद्ध होता है ।<br><br>जिस प्रकार यह व्याकृत जगत् प्रेरक आदि अनेक कारणरूप निमित्तादि विशेषसे युक्त है उसी प्रकार वह |
१९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तथा अपरित्यक्तान्यतमविशेषवदेव तद्व्याकृतम्। व्याकृताव्याकृतमात्रं तु विशेषः। | अव्याकृत भी उनमेंसे किसी विशेषका त्याग न करके उनसे युक्त ही है। उनमें व्याकृत और अव्याकृत होनेका ही अन्तर है। | | दृष्टश्च लोके विवक्षातः शब्दप्रयोगो ग्राम आगतो ग्रामः शून्य इति । कदाचिद् ग्रामशब्देन निवासमात्रविवक्षायां ग्रामः शून्य इति शब्दप्रयोगो भवति, कदाचिन्नितवासिजनविवक्षायां ग्राम आगत इति, कदाचिदुभयविवक्षायामपि ग्रामशब्दप्रयोगो भवति ग्रामं च न प्रविशेदिति यथा । तद्वदिहापि जगदिदं व्याकृतमव्याकृतं चेत्यभेदविवक्षायाम् आत्मानात्मनोर्भवति व्यपदेशः । तथेद्ं जगदुत्पत्तिविनाशात्मकमिति केवलजगद्व्यपदेशः। तथा “महानज आत्मा” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) “अस्थूलोऽनणुः” “स एष नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यादि केवलात्मव्यपदेशः । | लोकमें भी विवक्षाके अनुसार शब्दका प्रयोग होता देखा गया है जैसे ‘गाँव आ गया’, ‘गाँव सूना है’ इन वाक्योंमें कभी तो ‘गाँव’ शब्दसे निवासस्थानमात्र बतलाना अभीष्ट होनेपर ‘गाँव सूना है’ ऐसा शब्द प्रयोग होता है और कभी गाँवमें रहनेवाले लोगोंकी विवक्षासे ‘गाँव आ गया’ ऐसा प्रयोग होता है। तथा कभी दोनोंकी विवक्षासे भी ‘गाँव’ शब्दका प्रयोग होता है जैसे ‘गाँवमें प्रवेश न करे’ इस वाक्यमें। इसी प्रकार यहाँ भी ‘यह जगत् व्याकृत और अव्याकृत है’ इस वाक्यमें अभेदकी विवक्षासे आत्मा और अनात्माका निर्देश हुआ है तथा ‘यह जगत् उत्पत्ति-विनाशात्मक है’ इस वाक्यमें केवल जगत्का व्यपदेश है। इसी तरह “यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह न स्थूल है, न अणु (सूक्ष्म)”, “वह यह आत्मा ऐसा (कारणरूप) नहीं है, ऐसा (कार्यरूप) नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंमें केवल आत्माका व्यपदेश है। |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९७
| ननु परेण व्याकर्त्रा व्याकृतं सर्वतो व्याप्तं सर्वदा जगत्, स कथमिह प्रविष्टः परिकल्प्यते ? अप्रविष्टो हि देशः परिच्छिन्नेन प्रवेष्टुं शक्यते, यथा पुरुषेण ग्रामादिः । नाकाशेन किञ्चिन्नित्यप्रविष्टत्वात् । | **शङ्का—**किंतु जगत्को व्यक्त करनेवाले परमात्माने उसे व्यक्त कर सर्वदा सब ओरसे व्याप्त कर रखा है; फिर 'उसने इसमें प्रवेश किया' ऐसी कल्पना क्यों की जाती है ? किसी परिच्छिन्न पदार्थद्वारा अपनेसे अप्रविष्ट देशमें ही प्रवेश किया जा सकता है, जैसे पुरुषसे ग्रामादि। आकाशके द्वारा किसी भी पदार्थमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो सबमें नित्य प्रविष्ट ही है। |
| पाषाणसर्पादिवद्धर्मान्तरेणेति चेत् । अथापि स्यात्, न पर आत्मा स्वेनैव रूपेण प्रविवेश, किं तर्हि ? तत्स्थ एव धर्मान्तरेणोपजायते, तेन प्रविष्ट इत्युपचर्यते । यथा पाषाणे सहजोऽन्तःस्थः सर्पो नालिकेरे वा तोयम् । | **सिद्धान्ती—**किंतु यदि पाषाण और सर्पादिके समान उसने धर्मान्तररूपसे प्रवेश किया हो तो ? अर्थात् ऐसा भी हो सकता है कि परमात्माने अपने ही रूपसे प्रवेश नहीं किया, तो फिर क्या हुआ ? वह उसमें स्थित हुआ ही धर्मान्तररूपसे उत्पन्न हो गया, इसीसे 'उसने प्रवेश किया' ऐसा उपचार होता है, जिस प्रकार कि पत्थरमें उसके भीतर रहनेवाला एवं उसके साथ उत्पन्न हुआ सर्प<sup>१</sup> अथवा नारियलमें जल। |
| न, “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १) | **पूर्व०—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया”—ऐसी श्रुति है। |
१. पाषाणमें स्थित जो पञ्चमहाभूत हैं उन्हींका परिणाम होनेसे सर्पको सहज (उसके साथ उत्पन्न होनेवाला) कहा है।