बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पद्यते, तथेमानि बृहन्नित्येवमादीनि मम नामानीत्यगृहीतसम्बन्धत्वात्प्राणो न गृह्णाति सम्बोधनार्थं शब्दम्, न त्वविज्ञातृत्वादेवेति चेत् ? | उसी प्रकार 'ये बृहत् इत्यादि मेरे ही नाम हैं'—ऐसा सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राण अपनेको सम्बोधन करनेके लिये प्रयोग किये हुए शब्दोंको ग्रहण नहीं करता, अविज्ञाता होनेके कारण ही नहीं; तो ? |
| न; देवताभ्युपगमेऽग्रहणानुपपत्तेः। यस्य हि चन्द्राद्यभिमानिनी देवता अध्यात्मं प्राणो भोक्ता अभ्युपगम्यते, तस्य तथा संव्यवहाराय विशेषनाम्ना सम्बन्धोऽवश्यं ग्रहीतव्यः, अन्यथा आह्वानादिविषये संव्यवहारोऽनुपपन्नः स्यात् । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, क्योंकि देवता माना जानेके कारण उसका नामसे सम्बन्ध ग्रहण न करना सम्भव नहीं है।^१ जिसके मतमें चन्द्र आदिका अभिमानी देवता अध्यात्म प्राण भोक्ता माना जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार उस प्रकारके सम्यग् व्यवहारके लिये उसे अपने विशेष नामसे अवश्य सम्बन्ध ग्रहण करना चाहिये; नहीं तो आवाहन आदिके विषयमें ठीक-ठीक व्यवहार होना असम्भव होगा।^२ |
| व्यतिरिक्तपक्षेऽप्यप्रतिपत्तेरयुक्तमिति चेत् ? यस्य च प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता, तस्यापि बृहन्नित्यादिनामभिः सम्बोधने बृहत्त्वादिनाम्नां तदा तद्विषयत्वा- | पूर्व०—[ भोक्ताको प्राणादिसे ] व्यतिरिक्त माना जाय तब भी तो वह [ पुकारनेपर ] नहीं समझता, इसलिये तुम्हारा कथन ठीक नहीं है। अर्थात् जिसके मतमें भोक्ता प्राणसे भिन्न है, उसके सिद्धान्तानुसार भी जब उसे बृहन् इत्यादि नामोंसे पुकारा जाय तो |
१. क्योंकि देवता सर्वज्ञ होता है।
२. तात्पर्य यह है कि यदि चन्द्राभिमानी देवताको अपने अभिधायक नामके साथ अपने सम्बन्धका ज्ञान न होगा तो उसके उद्देश्यसे किये हुए आवाहन, स्तुति, याग एवं प्रणामादिकी सफलता नहीं होगी।
४२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| त्प्रतिपत्तिर्युक्ता । न च कदाचिदपि बृहत्त्वादिशब्दैः सम्बोधितः प्रतिपद्यमानो दृश्यते । तस्मादकारणमभोक्तृत्वे सम्बोधनाप्रतिपत्तिरिति चेत् ? <br><br> न; तद्वतस्तावन्मात्राभिमानानुपपत्तेः । यस्य प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता स प्राणादिकरणवान्प्राणी । तस्य न प्राणदेवतामात्रेऽभिमानो यथा हस्ते । तस्मात्प्राणनामसम्बोधने कृत्स्नाभिमानिनो युक्तैवाप्रतिपत्तिः; न तु प्राणस्यासाधारणनामसंयोगे, देवतात्म- | उसे उसका ज्ञान होना चाहिये; क्योंकि उस समय बृहत्त्वादि नाम उसीको विषय करनेवाले होते हैं । किंतु उसे भी बृहत्त्वादि शब्दोंसे पुकारे जानेपर कभी उनका ज्ञान होता दिखायी नहीं देता । अतः सम्बोधनको न समझना यह अभोक्तृत्वमें कारण नहीं हो सकता—ऐसा कहें तो ? <br><br> सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्राणादिमान्को केवल प्राणादिमात्रका अभिमान होना सम्भव नहीं है । जिसके मतमें भोक्ता प्राणादिसे भिन्न है [उसके सिद्धान्तानुसार ] वह प्राणादि इन्द्रियोंवाला प्राणी होना चाहिये । उसे प्राणदेवतामात्रमें [आत्मत्वका] अभिमान नहीं हो सकता, जैसे हाथमें [ हाथवालेका अभिमान नहीं होता]। अतः सम्पूर्ण शरीरके अभिमानीको, केवल प्राणका नाम लेकर पुकारे जानेपर उसमें अप्रतिपत्ति होना उचित ही है; किंतु प्राणका, उसके किसी असाधारण नामसे संयोग होनेपर न समझना युक्त नहीं है । १ आत्माको |
१. अभिप्राय यह है कि यदि कोई कहे 'बृहन्' 'पाण्डरवास' आदि नाम साधारण प्राणके वाचक नहीं हैं; अपितु प्राणाभिमानी देवताके वाचक हैं, इसलिये यदि उनके द्वारा किये हुए सम्बोधनको प्राणने ग्रहण नहीं किया तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जातिवाचक गौ
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९
| त्वानभिमानाच्चात्मनः। | तो देवतात्मत्वका अभिमान न होनेके कारण [ इस प्रकारकी अप्रतिपत्ति हो सकती है ] । |
| स्वनामप्रयोगेऽप्यप्रतिपत्तिदर्श- | पूर्व०— अपने नामका प्रयोग |
| नाद्युक्तमिति चेत् ? सुषुप्तस्य | करनेपर भी अप्रतिपत्ति होती देखी |
| यल्लौकिकं देवदत्तादि नाम तेनापि | जाती है, इसलिये ऐसा कहना उचित नहीं। अर्थात् सोये हुए पुरुषका |
| सम्बोध्यमानः कदाचिन्न प्रति- | जो देवदत्तादि लौकिक नाम होता है उसके द्वारा पुकारे जानेपर भी कभी- |
| पद्यते सुषुप्तः । तथा भोक्तापि | कभी सुषुप्त पुरुषको उसका ज्ञान नहीं होता, इसी प्रकार भोक्ता होते |
| सन्प्राणो न प्रतिपद्यत इति चेत् ? | हुए भी प्राणको उसका ज्ञान नहीं होता—यदि ऐसी बात हो तो ? |
| न, आत्मप्राणयोः सुप्तासुप्तत्व- | सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि शरीर और प्राणमें सुप्त और असुप्त रहने- |
| विशेषोपपत्तेः । सुषुप्तत्वात्प्राण- | का भेद उपपन्न है। शरीर सोया रहता है, उसकी इन्द्रियाँ प्राणग्रस्त- |
| ग्रस्ततयोपरतकरण आत्मा स्वं | रहनेके कारण निवृत्त हो जाती हैं; इसलिये उसे अपने नामका प्रयोग |
| नाम प्रयुज्यमानमपि न प्रति- | किये जानेपर भी उसका ज्ञान नहीं होता। किंतु प्राण [ उस समय भी ] |
| पद्यते । न तु तदसुप्तस्य प्राणस्य | नहीं सोता, इसलिये उसका भोक्तृत्व |
शब्द प्रत्येक व्यक्तिका भी बोधन करता है, उसी प्रकार व्यापक प्राणको भी प्राणा- भिमानी वायु, चन्द्र इत्यादि देवताओंसे अभिन्न होनेका अभिमान होना ही चाहिये और उनके नामद्वारा पुकारे जानेपर उसकी प्रतिपत्ति भी होनी ही चाहिये । इस- पर यदि कोई कहे कि प्राणव्यतिरिक्त आत्मा भी तो व्यापक है, फिर प्राणाभिमानी देवताओंके नामोंसे उसे ही बोध क्यों नहीं होता ? तो इसके उत्तरमें आगेकी बात कही गयी है ।
४३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| भोक्तृत्व उपरतकरणत्वं सम्बोधनाग्रहणं वा युक्तम् । | माननेपर उनमें उपरतकरणत्व और सम्बोधनके अग्रहणकी उपपत्ति नहीं हो सकती । |
| अप्रसिद्धनामभिः सम्बोधनमयुक्तमिति चेत्—सन्ति हि प्राणविषयाणि प्रसिद्धानि प्राणादिनामानि, तान्यपोह्य अप्रसिद्धैर्बृहत्त्वादिनामभिः सम्बोधनमयुक्तम्, लौकिकन्यायापोहात् । तस्माद्भोक्तुरेव सतः प्राणस्याप्रतिपत्तिरिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु अप्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधन करना तो उचित नहीं है। प्राणसम्बन्धी प्राण आदि प्रसिद्ध नाम भी हैं ही; उन्हें छोड़कर बृहत्त्वादि अप्रसिद्ध नामोंसे पुकारना तो उचित नहीं है, क्योंकि इससे लौकिक न्याय भी भंग होता है। इसीसे भोक्ता होनेपर भी प्राणको उसकी अप्रतिपत्ति हुई—ऐसा कहें तो ? |
| न देवताप्रत्याख्यानार्थत्वात् । केवलसम्बोधनमात्राप्रतिपत्त्यैव असुप्तस्याध्यात्मिकस्य प्राणस्याभोक्तृत्वे सिद्धे यच्चन्द्रदेवताविषयैर्नामभिःसम्बोधनम्, तच्चन्द्रदेवता प्राणोऽस्मिञ्शरीरे भोक्तेति गार्ग्यस्य विशेषप्रतिपत्तिनिराकरणार्थम् । न हि तल्लौकिकनाम्ना सम्बोधने शक्यं कर्तुम् । प्राणप्रत्याख्याने- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह सम्बोधन देवताका प्रत्याख्यान (निषेध) करनेके लिये था। केवल सम्बोधनमात्रकी अप्रतिपत्तिसे ही असुप्त आध्यात्मिक प्राणका अभोक्तृत्व सिद्ध हो सकनेपर भी जो उसे चन्द्रदेवतासम्बन्धी नामोंसे सम्बोधन किया गया है, वह गार्ग्यकी इस विशेष प्रतिपत्तिका निराकरण करनेके लिये है कि इस शरीरमें चन्द्रदेवता ही भोक्ता प्राण है। यह निराकरण [प्राणादि] लौकिक नाम-से सम्बोधन करनेपर नहीं किया जा सकता था। प्राणके प्रत्याख्यानसे |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नैव प्राणग्रस्तत्वात्करणान्तराणां प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्भोक्तृत्वाशङ्कानुपपत्तिः। देवतान्तराभावाच्च। | ही अन्य इन्द्रियोंके भोक्तृत्वकी आशङ्का भी नहीं हो सकती, क्योंकि सुषुप्तिके समय प्राणमें ही लीन रहनेके कारण उनकी प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है। तथा शरीरमें इनसे भिन्न कोई और देवता नहीं है; [ इसलिये देवतान्तरको भोक्ता मानना भी युक्तिसंगत नहीं है ] । |
| नन्वतिष्ठा इत्याद्यात्मन्वीत्यन्तेन ग्रन्थेन गुणवद्देवताभेदस्य दर्शितत्वादिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु ‘अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्’ से लेकर ‘आत्मन्वी ह भवति’ यहाँतकके ग्रन्थसे विशेष-विशेष गुणोंसे युक्त देवताका भेद दिखलाये जानेके कारण [ प्राणसे भिन्न कोई अन्य देवता नहीं है—ऐसा कहना उचित नहीं है ] । |
| न, तस्य प्राण एवैकत्वाभ्युपगमात्सर्वश्रुतिष्वरनाभिनिदर्शनेन। “सत्येनच्छन्नम् प्राणो वा अमृतम्” (बृ० उ० १।६।३) इति च प्राणबाह्यस्यान्यस्यानभ्युपगमाद्भोक्तुः; “एष उ ह्येव सर्वे देवाः” “कतम एको देव इति प्राणः” (३।९।९) इति च सर्वदेवानां प्राण एवैकत्वोपपादनाच्च। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि सारी श्रुतियोंमें अर और नाभिके दृष्टान्तद्वारा उनका प्राणमें ही एकत्व माना गया है। “सत्यसे आच्छादित है, प्राण ही अमृत है” इत्यादि वाक्योंसे प्राणसे बाह्य अन्य भोक्ता स्वीकार नहीं किया गया, तथा “यही समस्त देवगण है” “वह एक देव कौन है ? प्राण” इस वाक्यसे भी प्राणमें ही समस्त देवताओंके एकत्वका उपपादन किया गया है। |
| तथा करणभेदेष्वनाशङ्का, देहभेदेष्विव स्मृतिज्ञानेच्छादि- | इसी प्रकार नेत्रादि विभिन्न इन्द्रियोंमें भी भोक्तृत्वकी आशङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि विभिन्न देहोंके समान उनमें स्मृति-ज्ञान एवं इच्छादिका |
४३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
४३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| प्रतिसन्धानानुपपत्तेः; न ह्यन्यदृष्टमन्यः स्मरति जानातीच्छति प्रतिसन्दधाति वा। तस्मान्न करणभेदविषया भोक्तृत्वाशङ्काविज्ञानमात्रविषया वा कदाचिदप्युपपद्यते। | प्रतिसन्धान होना सम्भव नहीं है। अन्य पुरुषके देखे हुए पदार्थके विषयमें कोई दूसरा पुरुष स्मरण, जानकारी, इच्छा अथवा प्रतिसन्धान नहीं करता इसलिये विभिन्न इन्द्रियोंके विषयमें अथवा विज्ञानमात्रके विषयमें भोक्तृत्वकी आशङ्का होनी कभी उचित नहीं है। |
| ननु सङ्घात एवास्तु भोक्ता, किं व्यतिरिक्तकल्पनयेति ? | पूर्व०-अच्छा तो संघातको ही भोक्ता मान लिया जाय, उससे भिन्न भोक्ताकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है ? |
| न; आपेषणे विशेषदर्शनात् । यदि हि प्राणशरीरसङ्घातमात्रो भोक्ता स्यात्सङ्घातमात्राविशेषात्सदा आपिष्टस्यानापिष्टस्य च प्रतिबोधे विशेषो न स्यात् । सङ्घातव्यतिरिक्ते तु पुनर्भोक्तरि सङ्घातसम्बन्धविशेषानेकत्वात् पेषणापेषणकृतवेदनायाः सुख- | सिद्धान्ती-ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उसे हाथसे दबानेपर विशेष अनुभव होता देखा जाता है। यदि प्राण और शरीरका संघात ही भोक्ता होता तो [ जागने और न जागनेके समय ] संघातमात्रमें सदा ही कोई अन्तर न होनेके कारण उसे दबाया जाय अथवा न दबाया जाय उसके जागे रहनेमें कोई विशेषता नहीं होनी चाहिये। किंतु यदि भोक्ता संघातसे भिन्न होगा तो संघातके साथ उसके सम्बन्धविशेषोंकी अनेकता होनेके कारण दबाने या न दबानेसे होनेवाले ज्ञान तथा उत्तम, मध्यम और |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३३
| दुःखमोहमध्यमाधमोत्तमकर्मफल-<br>भेदोपपत्तेश्च विशेषो युक्तः। न<br>तु सङ्घातमात्रे सम्बन्धकर्मफल-<br>भेदानुपपत्तेर्विशेषो युक्तः। | अधम कर्मोंके सुख-दुःख और मोह-<br>रूप फलभेद सम्भव होनेके कारण<br>उसमें विशेषता हो सकती है। केवल<br>संघातमात्रको भोक्ता माननेपर तो<br>उसके सम्बन्ध और कर्मफलका भेद<br>सम्भव न होनेके कारण कोई<br>विशेषता हो नहीं सकती। |
| तथा शब्दादिपटुमन्द्यादि-<br>कृतश्च। अस्ति चायं विशेषः—<br>यस्मात्स्पर्शमात्रेणाप्रतिबुध्यमानं<br>पुरुषं सुप्तं पाणिना आपेषमापि-<br>ष्यापिष्य बोधयाञ्चकाराजातशत्रुः।<br>तस्माद्य आपेषणेन प्रतिबुबुधे<br>ज्वलन्निव स्फुरन्निव कुतश्चिदागत<br>इव पिण्डं च पूर्वविपरीतं बोध-<br>चेष्टाकारविशेषादिमत्त्वेनापाद-<br>यन्, सोऽन्योऽस्ति गार्ग्याभिमत-<br>ब्रह्मभ्यो व्यतिरिक्त इति सिद्धम्। | तथा [केवल संघातको भोक्ता<br>माननेपर] शब्दादिके पटुत्व-<br>मन्दत्वादिके होनेवाला अनुभवका<br>भेद भी नहीं हो सकता। किंतु यह<br>भेद है ही, क्योंकि अजातशत्रुने,<br>स्पर्शमात्रसे न उठनेवाले सुप्त पुरुष-<br>को हाथसे दबा-दबाकर जगाया<br>था। अतः जो दबानेसे जगा तथा<br>जिसने ज्वलित और स्फुरित होते<br>हुएके समान देहमें मानो कहींसे<br>आकर उसे पहलेसे विपरीत बोध,<br>चेष्टा एवं आकारविशेषादिसे युक्त<br>कर दिया वह गार्ग्यके माने हुए<br>ब्रह्मोंसे भिन्न है—ऐसा सिद्ध<br>होता है। |
| संहतत्वाच्च पारार्थ्योपपत्तिः<br>(प्राणस्य पारार्थ्योपपादनम्)<br>प्राणस्य। गृहस्य<br>स्तम्भादिवच्छरीरस्य<br>अन्तरुपष्टम्भकः प्राणः शरीरा-<br>दिभिः संहत इत्यवोचाम। | संहत होनेके कारण भी प्राणकी<br>परार्थता सिद्ध होती है। घरके स्तम्भा-<br>दिके समान शरीरका आन्तर आधार-<br>भूत प्राण शरीरादिसे संहत है—<br>ऐसा हम पहले कह चुके हैं। तथा |
बृ० उ० २८—
४३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अरनेमिवच्च, नाभिस्थानीय एतस्मिन्सर्वमिति च। तस्माद् गृहादिवत्स्वावयवसमुदायजातीयव्यतिरिक्तार्थं संहन्यत इत्येवमवगच्छाम। | जिस प्रकार अरे और नेमि संहत हैं उसी प्रकार देह और प्राण मिले हुए हैं, एवं नाभिस्थानीय प्राणमें सब इन्द्रियाँ समर्पित हैं [—ऐसा भी कहा जा चुका है]। अतः वह [ देहादिसंघात ] गृहादिके समान अपने अवयव-समुदायकी जातिवाले पदार्थोंसे भिन्न [ आत्मा ] के लिये संहत हुआ है—ऐसा हमें जान पड़ता है। | | स्तम्भकुड्यतृणकाष्ठादिगृहावयवानां स्वात्मजन्मोपचयापचयविनाशनामाकृतिकार्यधर्मनिरपेक्षलब्धसत्तादितद्विषयद्रष्टृश्रोतृमन्तृविज्ञातृअर्थत्वं दृष्ट्वा मन्यामहे, तत्सङ्घातस्य च—तथा प्राणाद्यवयवानां तत्सङ्घातस्य च स्वात्मजन्मोपचयापचयविनाशनामाकृतिकार्यधर्मनिरपेक्षलब्धसत्तादितद्विषयद्रष्टृश्रोतृमन्तृविज्ञातृअर्थत्वं भवितुमर्हतीति। | गृहके स्तम्भ, भित्ति, तृण एवं काष्ठादि अवयवोंके जन्म, वृद्धि, क्षय, विनाश, नाम, आकृति और कार्य-रूप धर्मसे निरपेक्ष रहकर जिसने सत्ता और स्फूर्ति आदि प्राप्त की है, वही इन विषयोंका द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है तथा उसीके लिये इन स्तम्भ आदिकी और इनके संघातकी स्थिति है—यह देखकर हम ऐसा मानते हैं कि प्राणादि अवयव और उनका संघात भी उसीके लिये होने चाहिये जिसने इनके जन्म, वृद्धि, क्षय, विनाश, नाम, आकृति और कार्यरूप धर्मसे निरपेक्ष रहकर सत्ता आदि प्राप्त की हो और जो इन प्राणादि विषयोंका द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता भी हो। | | देवताचेतनावत्त्वे समत्वाद् गुणभावानुपगम इति चेत्— | **पूर्व०—**प्राणदेवता चेतनावान् होनेके कारण भोक्ताके तुल्य ही है, इसलिये उसका गौणत्व ( अप्रधानत्व ) नहीं माना जा सकता। [तात्पर्य यह है कि |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| प्राणस्य विशिष्टैर्नामभिरामन्त्रणदर्शनाच्चेतनावत्त्वमभ्युपगतम् । चेतनावत्त्वे च पारार्थ्योपगमः समत्वादनुपपन्न इति चेत् ?<br><br>न; निरुपाधिकस्य केवलस्य विजिज्ञापयिषितत्वात् । क्रियाकारकफलात्मकता ह्यात्मनो नामरूपोपाधिजनिता अविद्याध्यारोपिता। तन्निमित्तो लोकस्य क्रियाकारकफलाभिमानलक्षणःसंसारः। स निरुपाधिकात्मस्वरूपविद्यया निवर्तयितव्य इति तत्स्वरूपविजिज्ञापयिषयोपनिषदारम्भः"ब्रह्म ते ब्रवाणि" (बृ० उ० २।१।१) "नैतावता विदितं भवति" (२।१।१४) इति चोपक्रम्य "एतावदरे खल्वमृतत्वम्" (४।५।१५) इति चोपसंहारात् । न चातोऽन्यदन्तराले विवक्षितमुक्तं | प्राणका विशिष्ट नामोंद्वारा आमन्त्रण देखे जानेसे उसका चेतनावान् होना माना गया है। अतः चेतनावान् होनेपर भोक्ताके तुल्य ही होनेके कारण उसको परार्थ मानना उचित नहीं है—ऐसा कहें तो ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि यहाँ केवल निरुपाधिक आत्माका ही ज्ञान कराना अभीष्ट है । आत्माकी क्रिया, कारक एवं फलरूपता तो नाम और रूपकी उपाधिके कारण अविद्यासे आरोपित है। उसीके कारण पुरुषको क्रिया, कारक एवं फलाभिमानरूप संसारकी प्राप्ति हुई है। उसे निरुपाधिक आत्मस्वरूपके ज्ञानसे निवृत्त करना है, इसलिये उसके स्वरूपका विज्ञान करानेकी इच्छासे ही इस उपनिषद्का आरम्भ हुआ है; क्योंकि "मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ", "इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता" इस प्रकार आरम्भ करके "अरे, निश्चय इतना ही अमृतत्व है" इस प्रकार उपसंहार किया गया है। बीचमें भी इससे भिन्न कोई और विवक्षित पदार्थ नहीं बतलाया गया। |
४३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| वास्ति। तस्मादनवसरः समत्वाद् गुणभावानुपगम इति चोद्यस्य। | अतः 'तुल्य होनेके कारण इसका गुणभाव (पदार्थत्व या अप्रधानत्व) नहीं माना जा सकता'—ऐसी शङ्काके लिये यहाँ अवकाश नहीं है। | | विशेषवतो हि सोपाधिकस्य संव्यवहारार्थो गुणगुणिभावः, न विपरीतस्य। निरूपाख्यो हि विजिज्ञापयिषितः सर्वस्यामुपनिषदि। "स एष नेति नेति" (३।९।२६) इत्युपसंहारात्। तस्मादादित्यादिब्रह्मभ्य एतेभ्योऽविज्ञानमयेभ्यो विलक्षणोऽन्योऽस्ति विज्ञानमय इत्येतत्सिद्धम् ॥ १५ ॥ | विशेषतः सोपाधिकका ही सम्यक् व्यवहारके लिये गुणगुणिभाव (शेष-शेषिभाव) होता है, इससे विपरीत (निरुपाधिक) का नहीं। और समस्त उपनिषद्में निरुपाधिकका ही विज्ञान कराना अभीष्ट है, क्योंकि "वह यह कार्य नहीं है, कारण नहीं है" इस प्रकार उपसंहार किया गया है। अतः यह सिद्ध होता है कि इन अविज्ञानमय आदित्यादि ब्रह्मोंसे विज्ञानमय ब्रह्म भिन्न है ॥ १५ ॥ |
सुषुप्तिमें विज्ञानमयकी स्थितिके विषयमें अजातशत्रुका प्रश्न
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और यह कहाँसे आया?' किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥ १६ ॥
| स एवमजातशत्रुर्व्यतिरिक्तात्मास्तित्वं प्रतिपाद्य गार्ग्यमुवाच— | उस अजातशत्रुने इस प्रकार देहसे व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व प्रतिपादन करके गार्ग्यसे कहा—'जिस | | यत्र यस्मिन्काले एष विज्ञानमयः | समय यह विज्ञानमय पुरुष हाथसे |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४३७ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४३७ | | :--- | :--- |
| पुरुष एतत्स्वपनं सुप्तोऽभूत्प्रा-<br>क्पाणिपेषप्रतिबोधात्; विज्ञानं<br>विज्ञायतेऽनेनेत्यन्तःकरणं बुद्धि-<br>रुच्यते, तन्मयस्तत्प्रायो विज्ञान-<br>मयः किं पुनस्तत्प्रायत्वम् ? तस्मि-<br>न्नुपलभ्यत्वं तेन चोपलभ्यत्वमु-<br>पलब्धृत्वं च; कथं पुनर्मयटोऽने-<br>कार्थत्वे प्रायार्थतैवावगम्यते "स<br>वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो<br>मनोमयः” ( बृ० उ० ४ । ४ ।<br>५ ) इत्येवमादौ प्रायार्थ एव प्रयो-<br>गदर्शनात्, परविज्ञानविकारत्व-<br>स्याप्रसिद्धत्वात्, “य एष विज्ञान-<br>मयः” ( २ । १ । १६ ) इति | दबानेपर जागनेसे पूर्व सोया हुआ<br>था [ उस समय वह कहाँ था ? ]¹<br>जिससे विशेषरूपसे जाना जाता है<br>उस अन्तःकरण यानी बुद्धिको<br>'विज्ञान' कहते हैं; जो तन्मय अर्थात्<br>तत्प्राय हो वह विज्ञानमय है। किंतु<br>आत्माकी तत्प्रायता (विज्ञानमयता)<br>क्या है ?² जो उस ( विज्ञान ) में<br>प्राप्त होने योग्य है, अथवा जिसे उस<br>( विज्ञान ) के ही द्वारा प्राप्त किया<br>जा सकता है तथा जो उपलब्धा<br>( साक्षी ) है, उसको 'तत्प्राय'<br>( विज्ञानप्राय ) कहते हैं, उसका<br>भाव तत्प्रायत्व है। किंतु 'मयट्'<br>प्रत्ययके अनेक अर्थ होनेपर भी यहाँ<br>उसकी प्रायार्थता ही कैसे जानी<br>जाती है ? "वह यह आत्मा—ब्रह्म<br>विज्ञानमय और मनोमय है" इत्यादि<br>श्रुतियोंमें इसका प्रायः अर्थमें ही<br>प्रयोग देखा जानेसे, परमात्मरूप<br>विज्ञानका विकारत्व प्रसिद्ध न होनेसे<br>“जो यह विज्ञानमय है” इत्यादि |
१. यहाँ विज्ञानमय शब्दमें जो मयट् प्रत्यय है, उसको विकारार्थक मानकर विज्ञानमय शब्दका अर्थ कोई यह न समझ ले कि 'विज्ञान—परमात्माके विकारभूत जीव ही विज्ञानमय हैं।' इसके लिये भाष्यकार विज्ञानमयकी व्युत्पत्ति करते हैं।
२. यहाँ यह शङ्का होती है आत्मा तो असङ्ग है, उसका बुद्धिसे सम्पर्क नहीं हो सकता; अतः आत्माको विज्ञानमय—अन्तःकरणमय बताना उचित नहीं है, इस शङ्काको मिटानेके लिये तत्प्रायत्वका निरूपण करते हैं।
४३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| च प्रसिद्धवदनुवादाद् अवयवोपमार्थयोश्चात्रासम्भवात् पारिशेष्यात्प्रायार्थतैव। तस्मात्संकल्पविकल्पाद्यात्मकमन्तःकरणं तन्मय इत्येतत्। पुरुषः पुरि शयनात्। | श्रुतियोंमें 'यह' इस प्रकार विज्ञानमयका प्रसिद्धवत् अनुवाद करनेसे तथा [ जीव विज्ञानका अवयव या विज्ञानसदृश है—इस प्रकार ] अवयव और उपमारूप अर्थ सम्भव न होनेसे परिशेषतः इसकी प्रायार्थता ही सिद्ध होती है। अतः संकल्प-विकल्पादिरूप अन्तःकरण विज्ञान है, तन्मय आत्मा है—ऐसा इसका भावार्थ है। पुरमें ( शरीररूप नगरमें ) शयन करनेके कारण वह 'पुरुष' है। | | कैष तदाभूदिति प्रश्नः स्वभावविजिज्ञापयिषया—प्राक्प्रतिबोधात्क्रियाकारकफलविपरीतस्वभाव आत्मेति कार्याभावेन दिदर्शयिषितम्; न हि प्राक्प्रतिबोधात्कर्मादिकार्यं सुखादि किञ्चन गृह्यते; तस्मादकर्मप्रयुक्तत्वात्तथास्वाभाव्यमेवात्मनोऽवगम्यते—यस्मिन्स्वाभाव्येऽभूत्, यतश्च स्वाभाव्यात्प्रच्युतः संसारी स्वभावविलक्षण इति—एतद्विवक्षया | उस समय यह कहाँ था ?—यह प्रश्न आत्माके स्वभाव (स्वरूप) का विशेषरूपसे बोध करानेकी इच्छासे है—जागनेसे पहले आत्मा क्रिया-कारक-फलरूपतासे विपरीत स्वभाववाला है—यह उसके कार्याभावसे दिखाना अभीष्ट है; क्योंकि जागनेसे पहले कर्मादिका कार्य सुख आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता। अतः अकर्मप्रयुक्त होनेके कारण आत्माकी अकर्मस्वभावता ज्ञात होती है—जिस स्वभाववालेमें यह था और जिस स्वभाववालेसे च्युत होकर यह संसारी और भिन्नस्वभाव होता है—यह बतानेकी इच्छासे, जिसमें प्रतिभा- |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३९
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३९
| पृच्छति गार्ग्यं प्रतिभानरहितं बुद्धिव्युत्पादनाय । <br><br> क्वौष तदाभूत् ? कुत एतदागात् इत्येतदुभयं गार्ग्येणैव प्रष्टव्यमासीत्, तथापि गार्ग्येण न पृष्टमिति नोदास्ते अजातशत्रुः, बोधयितव्य एवेति प्रवर्तते । ज्ञापयिष्याम्येवेति प्रतिज्ञातत्वात् । <br><br> एवमसौ व्युत्पाद्यमानोऽपि गार्ग्यो यत्रैष आत्माभूत्प्राक्प्रतिबोधाद् यतश्चैतदागमनमागात् तदुभयं न व्युत्पेदे वक्तुं वा प्रष्टुं वा गार्ग्यो ह न मेने न ज्ञातवान् ॥ १६ ॥ | की कमी जान पड़ती है, उस गार्ग्यसे उसकी बुद्धिको व्युत्पन्न (सूक्ष्म विचार-शक्तिसे युक्त) करनेके लिये राजा अजातशत्रु पूछता है । <br><br> 'उस समय यह कहाँ था ? और यह कहाँसे आया है' ये दोनों प्रश्न गार्ग्यको ही पूछने चाहिये थे; किंतु गार्ग्यने इन्हें नहीं पूछा, इससे अजातशत्रुने उदासीन भाव धारण नहीं किया; अपितु यह निश्चय करके कि इसे बोध कराना ही है, वह स्वयं प्रवृत्त हो गया; क्योंकि उसने 'बोध कराऊँगा ही', ऐसी प्रतिज्ञा की थी । <br><br> इस प्रकार सचेत करनेपर भी 'जहाँ यह आत्मा जागनेसे पहले था और जहाँसे इसने आगमन किया है' इन दोनों बातोंको गार्ग्य न समझ सका अर्थात् इन्हें बतलाने या पूछनेका उसे ज्ञान नहीं हुआ ॥ १६ ॥ |
विज्ञानात्माके शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥
४४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब यह सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञानके द्वारा इन प्राणोंके विज्ञानको ग्रहण कर यह जो हृदयके भीतर आकाश है उसमें शयन करता है। जिस समय यह उन विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुषका 'स्वपिति' नाम होता है। उस समय प्राण गृहीत रहता है, वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है और मन भी गृहीत रहता है' ॥ १७॥
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स होवाचाजातशत्रुर्विवक्षितार्थ-समर्पणाय—यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदेष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदा-भूत् ? कुत एतदागात् ? इति यदपृच्छाम, तच्छृणूच्यमानम्- — | उस अजातशत्रुने विवक्षित अर्थ-को समर्पण करनेके लिये कहा—यह जो विज्ञानमय पुरुष है; जिस समय यह सोया हुआ था उस समय यह कहाँ था और कहाँसे यह आया है?—इस प्रकार जो हमने पूछा था उसका उत्तर दिया जाता है, सुनो— |
| यत्रैष एतत् सुप्तोऽभूत्तदा तस्मिन्काले एषां वागादीनां प्राणानां विज्ञानेनान्तःकरणगताभिव्यक्ति-विशेषविज्ञानेन उपाधिस्वभाव-जनितेन आदाय विज्ञानं वागा-दीनां स्वस्वविषयगतसामर्थ्यं गृहीत्वा, य एषोऽन्तर्मध्य हृदये हृदयस्याकाशः, य आकाशशब्देन पर एव स्व आत्मोच्यते, तस्मि-न्स्वे आत्मन्याकाशे शेते स्वाभा-विकेऽसांसारिके । न केवल आकाश एव, श्रुत्यन्तरसामर्थ्यात्— | जिस समय यह सोया हुआ था, उस समय अन्तःकरणरूप उपाधिके स्वभावसे जनित विज्ञानसे यानी अन्तःकरणगत अभिव्यक्ति (आभास)-विशेषरूप विज्ञानसे वागादिके विज्ञानको अर्थात् अपने-अपने विषयों-में उनके सामर्थ्यको ग्रहणकर यह जो हृदयान्तर्गत—हृदयके मध्य-में आकाश है, जो 'आकाश' शब्दसे अपना परम आत्मा ही कहा गया है, उस स्वाभाविक असांसारिक स्वात्माकाशमें ही शयन करता है। "हे सौम्य ! उस समय यह सत्को ही प्राप्त हो जाता है" इस अन्य श्रुतिकी सामर्थ्यसे |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४१ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६।८।१) इति। लिङ्गोपाधिसम्बन्धकृतं विशेषात्मस्वरूपमुत्सृज्य अविशेषे स्वाभाविके आत्मन्येव केवले वर्तते इत्यभिप्रायः। | केवल भूताकाशमें ही शयन नहीं करता। तात्पर्य यह है कि लिङ्गोपाधिके सम्बन्धसे होनेवाले अपने विशेष रूपको त्यागकर स्वाभाविक अविशेष शुद्ध आत्मामें ही विद्यमान रहता है। |
| यदा शरीरेन्द्रियाध्यक्षतामुत्सृजति, तदासौ स्वात्मनि वर्तत इति कथमवगम्यते ? नामप्रसिद्ध्या। कासौ नामप्रसिद्धिः? इत्याह—तानि वागादेर्विज्ञानानि यदा यस्मिन्काले गृह्णात्यादत्ते अथ तदा हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम—एतन्नामास्य पुरुषस्य तदा प्रसिद्धं भवति। गौणमेवास्य नाम भवति स्वमेवात्मानमपीत्यपिगच्छतीति स्वपितीत्युच्यते। | जिस समय यह शरीर और इन्द्रियोंकी अध्यक्षता छोड़ देता है, उस समय स्वात्मामें ही विद्यमान रहता है, यह कैसे जाना जाता है ? —नामकी प्रसिद्धिसे। वह नामकी प्रसिद्धि क्या है ? सो श्रुति बतलाती है—जिस समय यह उन वागादिके विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय यह पुरुष 'स्वपिति' नामवाला होता है—उस समय इस पुरुषका यही नाम प्रसिद्ध होता है। यह इसका गुणजनित ही नाम है। यह स्व अर्थात् आत्माको ही अपीति—अपिगच्छति अर्थात् प्राप्त हो जाता है, इसलिये 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है। |
| सत्यं स्वपितीतिनामप्रसिद्ध्या आत्मनः संसारधर्मविलक्षणं रूपमवगम्यते, न त्वत्र युक्तिरस्तीत्याशङ्क्याह—तत्तत्र स्वापकाले | सचमुच, 'स्वपिति' इस नामकी प्रसिद्धिसे तो आत्माका रूप सांसारिक धर्मोंसे विलक्षण जान पड़ता है—परंतु इसमें कोई युक्ति नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—उस समय—उस सुषुप्ति-कालमें प्राण |
४४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| गृहीत एवं प्राणो भवति। प्राण इति घ्राणेन्द्रियम्, वागादिप्रकरणात्; वागादिसम्बन्धे हि सति तदुपाधित्वादस्य संसारधर्मित्वं लक्ष्यते। वागादयश्चोपसंहृता एव तदा तेन। कथम् ? गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः। तस्मादुपसंहृतेषु वागादिषु क्रियाकारकफलात्मताभावात्स्वात्मस्थ एवात्मा भवतीत्यवगम्यते॥१७॥ | गृहीत ही हो जाता है। यहाँ वागादिका प्रकरण होनेसे 'प्राण' शब्दसे घ्राणेन्द्रिय समझना चाहिये; क्योंकि वागादिका सम्बन्ध होनेपर ही उनकी उपाधिसे युक्त होनेके कारण इसका संसारधर्मयुक्त होना देखा जाता है। उस समय उन वागादिका वह उपसंहार ही कर लेता है। किस प्रकार ? उस समय वाक् गृहीत रहती है, चक्षु गृहीत रहता है, श्रोत्र गृहीत रहता है। और मन भी गृहीत रहता है अतः यह ज्ञात होता है कि वागादि इन्द्रियोंका उपसंहार हो जानेपर क्रिया, कारक और फल-रूपताका अभाव हो जानेसे आत्मा अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है॥१७॥ |
स्वप्नवृत्तिका स्वरूप
| ननु दर्शनलक्षणायां स्वप्नावस्थायां कार्यकारणवियोगेऽपि संसारधर्मित्वमस्य दृश्यते। यथा च जागरिते सुखी दुःखी बन्धुवियुक्तः शोचति मुह्यते च; तस्माच्छोकमोहधर्मवानेवायम्। | पूर्व०—किंतु दर्शनरूपा स्वप्नावस्थामें तो शरीर और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर भी इसकी संसारधर्मता देखी जाती है। जिस प्रकार यह जागरित-अवस्था में होता है, उसी प्रकार स्वप्नमें भी सुखी, दुःखी और बन्धुओंसे वियुक्त होता है तथा शोक करता और मोहित होता है; इसलिये यह शोक-मोहरूप धर्मोंवाला ही है। |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४४३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४४३
| नास्य शोकमोहादयः सुखदुःखा-<br>दयश्च कार्यकारणसंयोगजनित-<br>भ्रान्त्याध्यारोपिता इति ।<br>न; मृषात्वात् । | इसके शोक-मोहादि तथा सुख-<br>दुःखादि देह और इन्द्रियोंके संयोगसे<br>होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित नहीं<br>हैं।<br>सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि स्वप्न मिथ्या होता है। |
स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकास्तदु-<br>तेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं<br>निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान्गृहीत्वा स्वे<br>जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान्गृहीत्वा<br>स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥
जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय इसके वे लोक ( कर्मफल ) उदित होते हैं। वहाँ भी यह महाराज होता है या महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची-नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर ( स्वाधीन कर ) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमें यथेच्छ विचरता है ॥ १८ ॥
| स प्रकृत आत्मा यत्र यस्मि-<br>न्काले दर्शनलक्षणया स्वप्न्यया<br>स्वप्नवृत्त्या चरति वर्तते तदा ते<br>हास्य लोकाः कर्मफलानि । के<br>ते ? तत्तत्रोतापि महाराज इव<br>भवति। सोऽयं महाराजत्वमिवास्य<br>लोकः, न महाराजत्वमेव जाग-<br>रित इव । तथा महाब्राह्मण इव, | वह प्रकृत आत्मा जिस समय<br>दर्शनरूपा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है,उस<br>समय उसके वे लोक—कर्मफल<br>उदित होते हैं वे कौन ? तब-उस<br>अवस्थामें भी वह महाराज-सा हो<br>जाता है। उसका वह लोक ( कर्म-<br>फल) महाराजत्वके समान होता है,<br>जागरित अवस्थाकी तरह महाराजत्व<br>ही नहीं होता। इसी प्रकार महा-<br>ब्राह्मणके समान होता है, अथवा |
४४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| उताप्युच्चावचमुच्चं च देवत्वाद्यवचं च तिर्यक्त्वादि, उच्चमिवावचमिव च निगच्छति। मृषैव महाराजत्वादयोऽस्य लोकाः, इव-शब्दप्रयोगाद् व्यभिचारदर्शनाच्च। तस्मान्न बन्धुवियोगादिजनितशोकमोहादिभिः स्वप्ने सम्बध्यत एव। | ऊँची-नीची—ऊँची देवत्वादि और नीची तिर्यक्तत्वादि, इस प्रकार ऊँची-नीचीके सदृश [ गतियों ] को प्राप्त होता है। किंतु इसके ये महाराजत्वादि लोक मिथ्या ही हैं; क्योंकि इनके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है और [ स्वप्नेतर अवस्थाओंमें ] इनका व्यभिचार (त्याग) भी देखा जाता है। इसलिये स्वप्नावस्थामें बन्धुवियोगादिजनित शोक-मोहादिसे सम्बन्ध होता ही हो—ऐसी बात नहीं है। | | ननु च यथा जागरिते जाग्रत्कालाव्यभिचारिणो लोकाः, एवं स्वप्नेऽपि तेऽस्य महाराजत्वादयो लोकाः स्वप्नकालभाविनः स्वप्नकालाव्यभिचारिण आत्मभूता एव, न त्वविद्याध्यारोपिता इति। | पूर्व०-किंतु जिस प्रकार जागरित अवस्थाके कर्मफल जाग्रत्-कालमें व्यभिचरित होनेवाले नहीं होते, उसी प्रकार वे स्वप्नकालमें होनेवाले कर्मफल स्वप्नकालमें अव्यभिचारी और आत्मस्वरूप ही होते हैं; वे अविद्यासे आरोपित नहीं होते। | | ननु च जाग्रत्कार्यकरणात्मत्वं देवतात्मत्वं चाविद्याध्यारोपितं न परमार्थत इति व्यतिरिक्तविज्ञानमयात्मप्रदर्शनेन प्रदर्शितम्। | सिद्धान्ती-परंतु जाग्रत्कालका भी देहेन्द्रियात्मत्व और देवतात्मत्व अविद्यासे आरोपित ही है, परमार्थतः नहीं है—यह बात विज्ञानमय आत्माको प्राणादिव्यतिरिक्त प्रदर्शित करके दिखा दी गयी है। ऐसी |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४५ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४५ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्कथं दृष्टान्तत्वेन स्वप्नलोकस्य मृत इवोज्जीविष्यन्प्रादुर्भाविष्यति? | स्थितिमें वह (जाग्रत्कर्मफल) पुनरुज्जीवित होनेवाले मृतकके समान स्वप्नगत कर्मफलका दृष्टान्त बननेके लिये किस प्रकार प्रादुर्भूत हो सकता है?¹ |
| सत्यम्, विज्ञानमये व्यतिरिक्ते कार्यकारणदेवतात्मत्वप्रदर्शनम् अविद्याध्यारोपितम्—शुक्तिकायामिव रजतत्वदर्शनम्—इत्येतत्सिद्ध्यति व्यतिरिक्तात्मास्तित्वप्रदर्शनन्यायेनैव, न तु तद्विशुद्धिपरतयैव न्याय उक्तः; इत्यसन्नपि दृष्टान्तो जाग्रत्कार्यकरणदेवतात्मत्वदर्शनलक्षणः पुनरुद्भाव्यते । सर्वो हि न्यायः किञ्चिद्विशेषमपेक्षमाणोऽपुनरुक्तीभवति । | पूर्व०—ठीक है, आत्मा प्राणादि व्यतिरिक्त है—यह प्रदर्शन करनेके लिये प्रयोग किये हुए न्यायसे ही विज्ञानमयके अतिरिक्त सिद्ध होनेपर कार्य-करण-देवतात्मप्रदर्शन शुक्तिमें रजतदर्शनके समान अविद्याध्यारोपित है—यह सिद्ध हो जाता है; किंतु वह न्याय आत्माकी विशुद्धि सिद्ध करनेके लिये [अर्थात् आत्मासे भिन्न अन्य सारा प्रपञ्च मिथ्या है—यह सिद्ध करनेके लिये] ही नहीं कहा गया; इसलिये असत् होनेपर भी इस जाग्रत् कार्य-करण-देवतात्मरूप दृष्टान्तकी पुनः उद्भावना की जाती है । सभी न्याय कुछ विशेषताकी अपेक्षा रखनेपर अपुनरुक्त माने जाते हैं । |
| न तावत्स्वप्नेऽनुभूतमहाराजत्वादयो लोका आत्मभूताः; आत्म- | सिद्धान्ती—किंतु स्वप्नमें अनुभव होनेवाले महाराजत्वादि कर्मफल अपने स्वरूपसे हैं भी तो नहीं, |
१. अर्थात् यदि जाग्रत्कालिक कर्मफल स्वयं ही अविद्याध्यारोपित है तो उसके दृष्टान्तद्वारा स्वाप्न प्रपञ्चका सत्यत्व कैसे सिद्ध किया जा सकता है ?
४४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| नोऽन्यस्य जाग्रत्प्रतिविम्बभूतस्य लोकस्य दर्शनात् । महाराज एव तावद्व्यस्तसुप्तासु प्रकृतिषु पर्यङ्के शयानःस्वप्नान्पश्यन्नुपसंहतकरणः पुनरुपगतप्रकृतिं महाराजमिवात्मानं जागरित इव पश्यति यात्रागतं भुञ्जानमिव च भोगान् । न च तस्य महाराजस्य पर्यङ्के शयनाद् द्वितीयोऽन्यः प्रकृत्युपेतो विषये पर्यटन्नहनि लोके प्रसिद्धोऽस्ति, यमसौ सुप्तः पश्यति । न चोपसंहृतकरणस्य रूपादिमतो दर्शनमुपपद्यते । न च देहे देहान्तरस्य तत्तुल्यस्य सम्भवोऽस्ति, देहस्थस्यैव हि स्वप्नदर्शनम् । | क्योंकि उस अवस्था में आत्मा से भिन्न जाग्रत्काल का प्रतिबिम्बभूत कर्मफल देखा जाता है । उस समय जिसकी इन्द्रियाँ आत्मामें लीन रहती हैं, वह पलंग पर सोया हुआ महाराज ही, अन्य सब सेवकों के जहाँ-तहाँ सोते रहने पर स्वप्न देखता हुआ अपने को जागरितअवस्था के समान पुनः सेवकादि से युक्त महाराज के समान यात्रा में जाते हुए तथा भोग भोगते हुए देखता है । उस महाराज के पलंग पर शयन करनेवाले देह के अतिरिक्त सेवकादिके सहित देशमें भ्रमण करनेवाला कोई अन्य देह दिन में नहीं देखा जाता, जिसे वह स्वप्नावस्था में देखता हो । तथा जिसकी इन्द्रियाँ लीन हो गयी हैं ऐसे उस सुप्त शरीर को रूपादिमान् पदार्थों का दर्शन होना भी सम्भव नहीं है । देहके भीतर भी उसके समान किसी अन्य देहका होना सम्भव नहीं है और स्वप्नदर्शन देहस्थ जीवको ही होता है । | | ननु पर्यङ्के शयानः पथि प्रवृत्तमात्मानं पश्यति—न बहिः स्वप्नान्पश्यतीत्येतदाह—स महाराजो जानपदाञ्जनपदे भवान्राजोपकर- | मगर पलंगपर सोनेवाला देह ही तो अपने को [ देहसे बाहर ] मार्ग में चलता हुआ देखता है ? ऐसी आशङ्का करके कहते हैं, नहीं; वह शरीर से बाहर स्वप्न नहीं देखता—इसी विषय में श्रुतिका यह कथन है—वह महाराज जानपदों—जनपद ( देश ) में रहनेवाले राजाके |