बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५
होता है वह बतलाता है; क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [ आत्मासंज्ञक प्रजापति ] ने समस्त पापोंको उषित—दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है वह उसे दग्ध कर देता है जो उससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥
| आत्मैवात्मेति प्रजापतिः प्रथमोऽण्डजः शरीर्यभिधीयते। वैदिकज्ञानकर्मफलभूतः स एव। किम् ? इदं शरीरभेदजातं तेन प्रजापतिशरीरेणाविभक्तम्। आत्मैवासीदग्रे प्राक्शरीरान्तरोत्पत्तेः। स च पुरुषविधः पुरुषप्रकारः शिरःपाण्यादिलक्षणो विराट्। | 'आत्मैव'—यहाँ 'आत्मा' इस शब्दसे अण्डेसे उत्पन्न हुआ प्रथम शरीरी प्रजापति ही कहा जाता है। वही वैदिक ज्ञान और कर्मका फलभूत है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह शरीरादि भेदसमुदाय उस प्रजापतिके शरीरसे अभिन्न है। कारण, शरीरान्तरकी उत्पत्तिसे पूर्व आत्मा ही था। वह पुरुषविध—पुरुषकी तरह शिर एवं हाथ-पैर आदि लक्षणवाला विराट् पुरुष था। |
| स एव प्रथमः सम्भूतोऽनुवीक्ष्यान्वालोचनं कृत्वा, कोऽहं किंलक्षणो वास्मीति, नान्यद्वस्त्वन्तरम् आत्मनः प्राणपिण्डात्मकार्यकरणरूपान्न अपश्यन्न ददर्श। केवलं त्वात्मानमेव सर्वात्मानमपश्यत्। तथा पूर्वजन्मश्रौतविज्ञानसंस्कृतः, सोऽहं प्रजापतिः सर्वात्माहमस्मीत्यग्रे व्याहरद्व्याहृतवान्। ततस्तस्माद्यतः पूर्वज्ञानसंस्काराद् आत्मानमेवाहमित्यभ्यधादग्रे | प्रथम उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने अन्वीक्ष्य—अन्वालोचन कर 'मैं कौन हूँ और कैसे लक्षणोंवाला हूँ' इत्यादि रूपसे विचारकर अपने प्राणसमुदायरूप देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न कोई और पदार्थ नहीं देखा। केवल अपनेको ही सर्वात्मरूपसे देखा तथा पूर्वजन्मके 'वह मैं सर्वात्मा प्रजापति हूँ' इस श्रौतविज्ञानजनित संस्कारसे युक्त होनेके कारण सबसे पहले “अहमस्मि” ऐसा कहा। इसीसे, क्योंकि पूर्वज्ञानके संस्कारसे उसने आरम्भमें अपनेको 'अहम्' ऐसा |
| १६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
| १६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तस्मादहंनामाभवत् । तस्योपनिषदहमिति श्रुतिप्रदर्शितमेव नाम वक्ष्यति । | कहा था, इसलिये वह अहंनामवाला हुआ। उसका श्रुतिप्रदर्शित ही 'अहम्' यह नाम उपनिषद् आगे बतावेगी। | | तस्माद्यस्मात्कारणे प्रजापतावेवं वृत्तं तस्मात्, तत्कार्यभूतेषु प्राणिषु एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले आमन्त्रितः कस्त्वमित्युक्तः सन्नहमयमित्येवाग्र उक्त्वा कारणात्माभिधानेन आत्मानमभिधायाग्रे पुनर्विशेषनामजिज्ञासवेऽथानन्तरं विशेषपिण्डाभिधानं देवदत्तो यज्ञदत्तो वेति प्रब्रूते कथयति यन्नामास्य विशेषपिण्डस्य मातापितृकृतं भवति तत्कथयति । | इसीसे, क्योंकि कारणरूप प्रजापतिमें यह वृत्तान्त घटित हुआ इसीलिये एतर्हि—इस समय भी उसके कार्यभूत जीवोंमें जब किसीको 'तू कौन है' ऐसा कहकर पुकारा जाता है तो पहले 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अपनेको कारणरूप नामसे बतलाकर फिर जो विशेष नामको जानना चाहता है उसे अपने विशेष शरीरका 'देवदत्त' या 'यज्ञदत्त' ऐसा कोई नाम बतलाता है अर्थात् जो नाम इसके विशेष पिण्डके माता-पिताका रखा हुआ होता है, उसे बतलाता है। | | स च प्रजापतिरतिक्रान्तजन्मनि सम्यक्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः साधकावस्थायां यद्यस्मात्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः प्रजापतित्वं प्रतिपित्सूनां पूर्वः प्रथमः सन् अस्मात्प्रजापतित्वप्रतिपित्सुसमुदायात्सर्वस्माद् आदौ औषद्- | उस प्रजापतिने अपने पूर्वजन्ममें साधकावस्थामें सम्यक् कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंद्वारा, इस कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंसे प्रजापतित्वकी प्राप्तिकी इच्छावालोंसे पूर्ववर्ती अर्थात् पहला होनेके कारण, इस प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छावाले सम्पूर्ण समुदायसे पूर्व |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| दहत् ! किम् ? आसङ्गाज्ञानलक्षणान्सर्वान्पाप्मनः प्रजापतित्वप्रतिबन्धकारणभूतान् । यस्मादेवं तस्मात्पुरुषः, पूर्वमौषदिति पुरुषः । | उषन—दग्ध कर दिया था; किसे?—प्रजापतित्वके प्रतिबन्धक कारणरूप अभिनिवेश और अज्ञानादि सम्पूर्ण पापोंको। क्योंकि ऐसा हुआ, इसलिये यह 'पुरुष' हुआ। पूर्वमें ओषण किया, इसलिये 'पुरुष' कहलाया। |
| यथायं प्रजापतिरोषित्वा प्रतिबन्धकान्पाप्मनः सर्वान्पुरुषः प्रजापतिरभवत्, एवमन्योऽपि ज्ञानकर्मभावनानुष्ठानवह्निना केवलं ज्ञानबलाद्वौषति भस्मीकरोति ह वै स तम्; कम् ? योऽस्माद्विदुषः पूर्वः प्रथमः प्रजापतिर्बुभूषति भवितुमिच्छति तमित्यर्थः । तं दर्शयति य एवं वेदेति । सामर्थ्याज्ज्ञानभावनाप्रकर्षवान् । | जिस प्रकार यह प्रजापति सम्पूर्ण प्रतिबन्धक पापोंका ओषण करके पुरुषरूप प्रजापति हुआ उसी प्रकार दूसरा भी ज्ञान और कर्मकी भावनाके अनुष्ठानरूप अग्निसे अथवा केवल ज्ञानबलसे उसका ओषण करता है—उसे भस्म कर देता है, किसे ? जो इस विद्वान्से पहले प्रजापति होना चाहता है उसको—ऐसा इसका तात्पर्य है। उस (विद्वान्) को श्रुति दिखलाती है—जो इस प्रकार जानता (उपासना करता) है। उसकी सामर्थ्यसे जाना जाता है कि वह ज्ञानभावनामें बढ़ा-चढ़ा होता है। |
| नन्वनर्थाय प्राजापत्यप्रतिपित्सा, एवंविदा चेद्दह्यते । | शङ्का—यदि वह इस प्रकार उपासना करनेवालेसे दग्ध करदिया जाता है तब तो प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छा अनर्थकी ही हेतु है। |
| नैष दोषः, ज्ञानभावनोत्कर्षाभावात्प्रथमं प्रजापतित्वप्रतिपत्त्यभावमात्रत्वाद्दाहस्य । उत्कृष्ट- | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि ज्ञानभावनाके उत्कर्षका अभाव होनेके कारण पहले प्रजापतित्व प्राप्त न कर सकना ही उसका |
| १६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
| १६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| साधनः प्रथमं प्रजापतित्वं प्राप्नुवन् न्यूनसाधनो न प्राप्नोतीति, स तं दहतीत्युच्यते । न पुनः प्रत्यक्षमुत्कृष्टसाधनेन इतरो दह्यते । यथा लोके आजिसृतां यः प्रथममाजिमुपसर्पति तेनेतरे दग्धा इवापहृतसामर्थ्या भवन्ति तद्वत् ॥ १ ॥ | दाह है। तात्पर्य यह है कि जो उत्कृष्ट साधनवाला होता है वह पहले प्रजापतित्व प्राप्त करता है और न्यून साधनवाला प्राप्त नहीं करता; अतः वह उसे भस्म कर देता है—ऐसा कहा गया है। उत्कृष्ट साधनवाला अपनेसे भिन्न—न्यून साधनवालेको साक्षात् जला ही डालता हो—ऐसी बात नहीं है। जिस प्रकार लोकमें किसी मर्यादातक दौड़कर जानेवालोंमें जो पहले मर्यादापर पहुँचता है उसके द्वारा दूसरे लोग दग्ध-से होकर अपहृतसामर्थ्य—हतोत्साह हो जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति
| यदिदं तुष्टूषितं कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मफलं प्राजापत्यलक्षणं नैव तत्संसारविषयमत्यक्रामदितीयमर्थं प्रदर्शयिष्यन्नाह— | यहाँ जिस प्रजापतित्वरूप कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मके फलकी स्तुति करनी अभीष्ट है वह सांसारिक विषयसे बाहर नहीं है—इस बातको दिखानेके लिये श्रुति कहती है— |
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सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षां चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभेष्यद् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥२॥
वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
हूँ?' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सोऽबिभेत्स प्रजापतिर्योऽयं प्रथमः शरीरी पुरुषविधो व्याख्यातः । सोऽबिभेद्भीतवानस्मदादिवदेवेत्याह । यस्मादयं पुरुषविधः शरीरकरणवान् आत्मनाशविपरीतदर्शनवत्त्वाद् अबिभेत्, तस्मात्तत्सामान्यादद्यत्वेऽप्येकाकी बिभेति । किञ्चास्मदादिवदेव भयहेतुविपरीतदर्शनापनोदकारणं यथाभूतात्मदर्शनम् । सोऽयं प्रजापतीरीक्षामीक्षणं चक्रे कृतवान्ह । कथम् ? इत्याह — यद्यस्मान्मत्तोऽन्यदात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरं प्रतिद्वन्द्वीभूतं नास्ति, तस्मिन्नात्मविनाशहेत्वभावे कस्मान्नु बिभेमीति । तत एव यथाभूतात्मदर्शनादस्य प्रजापतेर्भयं वीयाय विस्पष्टमपगतवत् । | वह भयभीत हो गया । अर्थात् वह प्रजापति, जिसकी पुरुषाकार प्रथम शरीरके रूपमें व्याख्या की गयी है, हमारे समान ही भयभीत हो गया—ऐसा श्रुति कहती है । क्योंकि यह पुरुषविध शरीरेन्द्रियवान् प्रजापति आत्मनाशरूप विपरीत ज्ञानवाला होनेके कारण डर गया था, इसलिये उससे समानता होनेके कारण आज भी अकेला होनेपर पुरुष डरता है । इसके सिवा हमारे समान ही प्रजापतिके भी भयके हेतुभूत विपरीत ज्ञानकी निवृत्तिका कारण यथार्थ आत्मज्ञान ही हुआ । उस इस प्रजापतिने ईक्षा—ईक्षण (विचार) किया । किस प्रकार विचार किया ? सो श्रुति बतलाती है—यदि इस मेरेसे भिन्न अर्थात् आत्माके सिवा इसका प्रतिद्वन्द्वी कोई और पदार्थ नहीं है, तो उस आत्मनाशके कारणके अभावमें मैं किससे डरता हूँ ? उसीसे यानी उस यथार्थ आत्मदर्शनसे ही इस प्रजापतिका भय विगत—विस्पष्टतया निवृत्त हो गया । |
१७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तस्य प्रजापतेर्यद्भयं तत्केवलाविद्यानिमित्तमेव परमार्थदर्शनेऽनुपपन्नमित्याह—कस्माद्ध्यभेष्यत किमित्यसौ भीतवान्परमार्थनिरूपणायां भयमनुपपन्नमेवेत्यभिप्रायः। यस्माद् द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति। द्वितीयं च वस्त्वन्तरमविद्याप्रत्युपस्थापितमेव; न ह्यदृश्यमानं द्वितीयं भयजन्मनो हेतुः “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) इति मन्त्रवर्णात्। यच्चैकत्वदर्शनेन भयमपनुनोद तद्युक्तम्। कस्मात्? द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति, तदेकत्वदर्शनेन द्वितीयदर्शनमपनीतमिति नास्ति यतः। | उस प्रजापतिको जो भय था वह केवल अविद्याके ही कारण था, परमार्थज्ञान होनेपर उसका होना असम्भव था, यही बात श्रुति कहती है—'वह क्यों डरा?'—इसका क्या कारण है कि उसे भय हुआ ? तात्पर्य यह है कि परमार्थतः विचार किया जाय तो उसे भय होना अयुक्त ही है; क्योंकि भय तो दूसरे-से ही होता है। और [ आत्मासे भिन्न ] दूसरी वस्तु तो अविद्या-द्वारा प्रस्तुत की हुई ही है; क्योंकि न दीखनेवाली कोई दूसरी वस्तु भयकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो सकती; जैसा कि "उस अवस्थामें निरन्तर एकत्वदर्शन करनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है।¹ प्रजापतिने जो एकत्व-दर्शनके द्वारा अपने भयको निवृत्त किया सो उचित ही है। क्यों उचित है? क्योंकि द्वितीय यानी अन्य वस्तुसे ही भय होता है। वह द्वितीयदर्शन आत्माके एकत्वदर्शन-से निवृत्त हो गया; क्योंकि वास्तव-में द्वितीय है नहीं। |
१. यदि कोई कहे कि प्रजापतिका भय विराट् पुरुषके साथ एकत्वज्ञानसे ही निवृत्त हुआ था, अद्वैतदृष्टिके कारण नहीं—तो इसका उत्तर श्रुति आगेके वाक्यसे देती है।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अत्र चोदयन्ति—कुतः प्रजापतेरेकत्वदर्शनं जातम् ? को वास्मै उपदिदेश ? अथानुपदिष्टमेव प्रादुरभूत्, अस्मदादेरपि तथा प्रसङ्गः । अथ जन्मान्तरकृतसंस्कारहेतुकम्, एकत्वदर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः । यथा प्रजापतेरतिक्रान्तजन्मावस्थस्य एकत्वदर्शनं विद्यमानमप्यविद्याबन्धकारणं नापनिन्थे, यतः अविद्यासंयुक्त एवायं जातोऽबिभेत्, एवं सर्वेषामेकत्वदर्शनानर्थक्यं प्राप्नोति । अन्त्यमेव निवर्तकमिति चेन्न, पूर्ववत्पुनः प्रसङ्गेनानैकान्त्यात् । तस्मादनर्थकमेवैकत्वदर्शनमिति । | यहाँ यह शङ्का करते हैं कि प्रजापतिको किससे एकत्वज्ञान हुआ ? उसे किसने उपदेश किया था ? अथवा बिना उपदेशके ही उसका प्रादुर्भाव हो गया, तब तो हमारे लिये भी वैसा ही प्रसङ्ग हो सकता है। यदि उसे जन्मान्तरकृत संस्कारसे होनेवाला माना जाय तो एकत्वदर्शनकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। अर्थात् जिस प्रकार अपने पूर्वजन्ममें स्थित प्रजापतिके एकत्वदर्शनने विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप बन्धनके कारणकी निवृत्ति नहीं की—क्योंकि अविद्यासंयुक्त उत्पन्न होनेके कारण ही उसे भय हुआ था—इसी प्रकार सभीके एकत्वदर्शनकी व्यर्थता प्राप्त होती है। यदि कहो कि सबके अन्तमें होनेवाला एकत्वज्ञान ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला होता है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि पूर्ववत् पुनः प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर उसका अव्यभिचारित्व नहीं रह सकेगा अतः एकत्वदर्शन व्यर्थ ही है। |
| नैष दोषः, उत्कृष्टहेतूद्भवत्वाल्लोकवत् । यथा पुण्यकर्मो- | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि व्यवहारमें अन्य लोगोंके समान प्रजापतिका जन्म उत्कृष्ट हेतुसे हुआ है। जिस प्रकार पुण्य- |
१७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| द्भवैर्विविक्तैः कार्यकारणैः संयुक्ते जन्मनि सति प्रज्ञामेधास्मृतिवैशारद्यं दृष्टम्, तथा प्रजापतेः धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यविपरीतहेतुसर्वपाप्मदाहात् विशुद्धैः कार्यकारणैः संयुक्तमुत्कृष्टं जन्म, तदुद्भवं चानुपदिष्टमेव युक्तमेकत्वदर्शनं प्रजापतेः। तथा च स्मृतिः—"ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगतपतेः। ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सहसिद्धं चतुष्टयम्॥" इति। | कर्मोंसे प्राप्त हुए पवित्र देह और इन्द्रियोंसे युक्त जन्म होनेपर बुद्धि, मेधाशक्ति और स्मृतिकी विशदता देखी जाती है उसी प्रकार धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यके विपरीत अधर्मादिके कारण होनेवाले समस्त पापोंका दाह हो जानेसे प्रजापतिका विशुद्ध देह और इन्द्रियोंसे युक्त उत्कृष्ट जन्म है, उससे होनेवाला प्रजापतिका एकत्वदर्शन भी बिना उपदेश किया हुआ ही है ऐसा मानना युक्तिसङ्गत ही है। ऐसा ही यह स्मृति भी कहती है—"जिस जगत्पतिका निरंकुश ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म—ये चारों सहसिद्ध (जन्मसिद्ध) हैं" इत्यादि। | | सहसिद्धत्वे भयानुपपत्तिरिति चेत्। न ह्यादित्येन सह तम उदेति। | शङ्का— किंतु इनके सहसिद्ध होनेपर उसे भय होना अनुपपन्न है, सूर्यके साथ अन्धकारका उदय नहीं हो सकता। | | न, अन्यानुपदिष्टार्थत्वात्सहसिद्धवाक्यस्य। | समाधान— ऐसा मत कहो; क्योंकि इस सहसिद्धवाक्यका तात्पर्य उसके ज्ञानको इसके द्वारा अनुपदिष्ट बतलानेमें है। | | श्रद्धातात्पर्यप्रणिपातादीनामहेतुत्वमिति चेत् स्यान्मतम् 'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः | शङ्का— यदि ऐसा माना जायगा तो श्रद्धा, तत्परता एवं प्रणिपातादिकी ज्ञानोत्पत्तिमें अहेतुता प्राप्त होगी। अर्थात्—यदि प्रजापतिके समान |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| संयतेन्द्रियः” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) इत्येवमादीनां श्रुतिस्मृतिविहितानां ज्ञानहेतूनामहेतुत्वम्, प्रजापतिरिव जन्मान्तरकृतधर्महेतुत्वे ज्ञानस्येति चेत् ? | जन्मान्तरकृत धर्म ही ज्ञानका हेतु होगा तो “जितेन्द्रिय एवं तत्पर श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है” “उस ज्ञानको प्रणिपात करके जानो” इत्यादि प्रकारके श्रुति-स्मृतिवाक्योंद्वारा विहित ज्ञानके हेतुओंकी अहेतुता प्राप्त होगी। |
| न; निमित्तविकल्पसमुच्चयगुणवदगुणवत्त्वभेदोपपत्तेः। लोके हि नैमित्तिकानां कार्याणां निमित्तभेदोऽनेकधा विकल्प्यते। तथा निमित्तसमुच्चयः। तेषां च विकल्पितानां समुच्चितानां पुनर्गुणवदगुणवत्त्वकृतो भेदो भवति। तद्यथा-रूपज्ञान एव तावन्नैमित्तिके कार्ये-तमसि विनालोकेन चक्षूरूपसन्निकर्षो नक्तञ्चराणां रूपज्ञाने निमित्तं भवति। मन एव केवलं रूपज्ञाननिमित्तं योगिनाम्। अस्माकं तु सन्निकर्षालोकाभ्यां सह तथादित्यचन्द्राद्यालोकभेदैः समुच्चिता निमित्तभेदा भवन्ति। | समाधान—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि निमित्तोंके विकल्प, समुच्चय, गुणवत्त्व, अगुणवत्त्व—ऐसे भेद हो सकते हैं। लोकमें निमित्तसे होनेवाले कार्योंके निमित्तका भेद अनेक प्रकारसे विकल्पित किया जाता है। इसी प्रकार निमित्तका समुच्चय भी अनेक प्रकारसे होता है। उन विकल्पित और समुच्चित हेतुओंका भी गुणवत्त्व और अगुणवत्त्वके कारण भेद होता है। सो इस प्रकार है—पहले नैमित्तिक कार्यभूत रूपज्ञानमें ही [ निमित्त-भेद यों है— ] निशाचरोंको बिना प्रकाशके अन्धकारमें ही होनेवाला नेत्र और रूपका संनिकर्ष रूपज्ञानमें कारण होता है, योगियोंका मन ही रूपज्ञानमें हेतु है तथा हमें चक्षुःसंनिकर्ष और प्रकाश दोनोंके होनेपर रूपज्ञान होता है। इसी प्रकार सूर्य और चन्द्र आदि प्रकाशोंके भेदसे भिन्न-भिन्न |
१७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा आलोकविशेषगुणवदगुणवत्त्वेन भेदाः स्युः। | निमित्तोंका समुच्चय होता है तथा प्रकाशविशेषोंके गुणवान् या गुणहीन होनेसे भी निमित्तोंके भेद हो जाते हैं। | | एवमेव आत्मैकत्वज्ञानेऽपि क्वचिज्जन्मान्तरकृतं कर्म निमित्तं भवति, यथा प्रजापतेः। क्वचित्तपो निमित्तम्, “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” (तै० उ० ३।२।१) इति श्रुतेः। क्वचित् “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) “आचार्याद्वैव” (छा० उ० ४।९।३) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यः” (बृ० उ० २।४।५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्य एकान्तज्ञानलाभनिमित्तत्वं श्रद्धाप्रभृतीनाम् अधर्मादिनिमित्तवियोगहेतुत्वात्। वेदान्तश्रवणमनननिदिध्यासनानां च साक्षाज्ज्ञेयविषयत्वात्। पापादिप्रतिबन्धक्षये चात्ममनसोर्भूतार्थज्ञाननिमित्तस्वाभाव्यात्। तस्मादहेतुत्वं न जातु ज्ञानस्य श्रद्धाप्रणिपातादीनामिति ॥ २॥ | इसी प्रकार आत्मैकत्वज्ञानमें भी कहीं जन्मान्तरकृत कर्म निमित्त होता है, जैसा कि प्रजापतिका; कहीं तप निमित्त है, जैसा कि “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा करो” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है और कहीं “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है”, “श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है”, “उसे प्रणिपात करके जानो”, “आचार्यके द्वारा ही [विद्या स्थिरताको प्राप्त होती है]” एवं “यह आत्मा द्रष्टव्य है, श्रोतव्य है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंके अनुसार श्रद्धाप्रभृति, अधर्मादिके हेतुओंकी निवृत्तिके कारण होनेसे ज्ञानलाभके नियत निमित्त हैं। वेदान्तके श्रवण, मनन और निदिध्यासन तो साक्षात् ज्ञेय वस्तु (ब्रह्म) को ही विषय करनेवाले हैं तथा पापादि प्रतिबन्धका क्षय होनेपर आत्मा और मनका भी परमार्थज्ञानमें निमित्त होना स्वाभाविक है; इसलिये श्रद्धा और प्रणिपातादिका ज्ञानकी उत्पत्तिमें अहेतुत्व कभी नहीं हो सकता ॥२॥ |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५
प्रजापतिसे मिथुनकी उत्पत्ति
| इतश्च संसारविषय एव प्रजापतित्वम्, यतः। | प्रजापतित्व इसलिये भी संसारका ही विषय है, क्योंकि— |
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स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत्। स हैतावानास यथा स्त्रीपुमाँसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥
वह रममाण नहीं हुआ। इसीसे एकाकी पुरुष रममाण नहीं होता। उसने दूसरेकी इच्छा की। वह जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं वैसे ही परिमाणवाला हो गया। उसने इस अपने देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [पुरुषाद्धं] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ; उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥
| स प्रजापतिर्वै नैव रेमे रतिं नान्वभवत्, अरत्याविष्टोऽभूदित्यर्थः, अस्मदादिवदेव यतः, इदानीमपि तस्मादेकाकित्वादिधर्मवत्त्वादेकाकी न रमते रतिं नानुभवति। रतिर्नामेष्टार्थसंयोगजा | वह प्रजापति रममाण नहीं हुआ—उसने रतिका अनुभव नहीं किया अर्थात् वह हमारे ही समान अरतिसे भर गया। क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये इस समय भी एकाकित्वादि धर्मवान् होनेसे पुरुष अकेलेमें नहीं रमता—रतिका अनुभव नहीं करता। इष्टविषयके संयोगसे |
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| १७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
| १७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| क्रीडा, तत्प्रसङ्गिन इष्टवियोगा-<br>न्मनस्याकुलीभावोऽरतिरित्युच्यते। | होनेवाली क्रीडाका नाम रति है, उसमें आसक्त पुरुषके मनसे इष्ट वस्तुका वियोग होनेपर जो व्याकुलता होती है उसे अरति कहते हैं। |
| स तस्या अरतेरपनोदाय द्विती-<br>यम् अरत्यपघातसमर्थं स्त्रीवस्त्वै-<br>च्छद्गृद्धिमकरोत्। तस्य चैवं<br>स्त्रीविषयं गृध्यतः स्त्रिया परि-<br>ष्वक्तस्येवात्मनो भावो बभूव।<br>स तेन सत्येप्सुत्वाद् एतावानेत-<br>त्परिमाण आस बभूव ह। | उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने अरतिका नाश करनेमें समर्थ दूसरी वस्तु—स्त्रीकी इच्छा यानी अभिलाषा की। इस प्रकार स्त्री-विषयक इच्छा करनेपर उसे अपने देहका स्त्रीसे आलिङ्गित हुएके समान भाव हो गया। सत्यसंकल्प होनेके कारण वह उस भावसे इतना अर्थात् ऐसे ही परिमाणवाला हो गया। |
| किंपरिमाणः ? इत्याह—यथा<br>लोके स्त्रीपुमांसौ अरत्यपनोदाय<br>सम्परिष्वक्तौ यत्परिमाणौ स्यातां<br>तथा तत्परिमाणौ बभूवेत्यर्थः। | किस परिमाणवाला हो गया ?<br>सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें स्त्री और पुरुष अरतिकी निवृत्तिके लिये परस्पर आलिङ्गित होते हैं, वे जिस परिमाणवाले होते हैं उसी परिमाणवाला वह हो गया—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| स तथा तत्परिमाणमेव इममात्मानं<br>द्वेधा द्विप्रकारमपातयत्पातितवान्<br>इममेवेत्यवधारणं मूलकारणाद्वि-<br>राजो विशेषणार्थम्। न क्षीरस्य<br>सर्वोपमर्देन दधिभावापत्तिवद्विराट्<br>सर्वोपमर्देनैतावानास; किं | उसने वैसे—उस परिमाणवाले अपने इस देहको ही द्वेधा-दो प्रकारसे पतित किया। 'इमम् एव' (इस देहको ही) इस प्रकार निश्चय करना मूल कारणसे विराट्की विशेषता बतलानेके लिये है। दूधके सारे स्वरूपका नाश करके होनेवाली दधिभावकी प्राप्तिके समान विराट् अपने पूर्ववर्ती सारे स्वरूपका |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१७७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१७७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तर्हि ? आत्मना व्यवस्थितस्यैव विराजः सत्यसंकल्पत्वादात्मव्यतिरिक्तं स्त्रीपुंसपरिष्वक्तपरिमाणं शरीरान्तरं बभूव । स एव च विराट् तथाभूतः स हैतावानासेति सामानाधिकरण्यात् । | तिरोभाव करके ऐसा नहीं हुआ ? तो फिर किस प्रकार हुआ। अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही विराट्-के सत्यसंकल्प होनेके कारण उसके उस शरीरसे भिन्न परस्पर आलिङ्गित हुए स्त्री-पुरुषोंके परिमाणवाला एक देहान्तर हो गया; क्योंकि वही पूर्वरूपमें स्थित विराट् था और वही ऐसा हो गया—इस प्रकार यहाँ [ विराट्के वाचक ] ‘स’ का ‘एतावान्’ से सामानाधिकरण्य है। |
| ततस्तस्मात्पातनात्पतिश्च पत्नी चाभवतामिति दम्पत्योर्निर्वचनं लौकिकयोः । अत एव तस्मात्, यस्मादात्मन एवार्धः पृथग्भूतो येयं स्त्री, तस्मादिदं शरीरमात्मनोऽर्धवृगलमर्धं च तद् वृगलं विदलं च तदर्धवृगलम् अर्धविदल-मिवेत्यर्थः । प्राक्स्त्र्युद्वहनात्कस्यार्धवृगलम् ? इत्युच्यते—स्व आत्मन इति । एवमाह स्मोक्तवान्किल याज्ञवल्क्यः, यज्ञस्य वल्को वक्ता यज्ञवल्कस्तस्यापत्यं याज्ञवल्क्यो दैवरातिरित्यर्थः । ब्रह्मणो वापत्यम् । | उससे—उस द्विधा पातनसे पति और पत्नी हुए—यह लौकिक पति-पत्नियों [ के पति-पत्नी नाम ] का निर्वचन किया गया है। इसीसे, क्योंकि यह जो स्त्री है शरीरका ही पृथग्भूत अर्धभाग है, इसलिये यह शरीर आत्माका अर्धबृगल है। जो अर्ध ( आधा ) हो और बृगल—विदल हो उसे अर्धबृगल (दो दलोंमेंसे एक दल) कहते हैं अर्थात्—अर्धविदल-सा है। किंतु स्त्रीसे विवाह करनेसे पूर्व यह किसका अर्धबृगल होता है, सो श्रुति बतलाती है—स्व अर्थात् अपना ही—ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा है। यज्ञका वल्क—वक्ता यज्ञवल्क कहलाता है, उसका पुत्र याज्ञवल्क्य अर्थात् दैवराति अथवा ब्रह्माका पुत्र याज्ञवल्क्य। |
बृ० उ० १२—
१७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| यस्मादयं पुरुषार्ध आकाशः स्त्र्यर्थशून्यः पुनरुद्वहनात्तस्मात्पूर्यते स्त्र्यर्थेन, पुनः सम्पुटीकरणेनेव विदलार्थः । तां स प्रजापतिर्मन्वाख्यः शतरूपाख्यामात्मनो दुहितरं पत्नीत्वेन कल्पितां समभवन्मैथुनमुपगतवान् । ततस्तस्मात्तदुपगमनाद् मनुष्या अजायन्तोत्पन्नाः ॥३॥ | क्योंकि यह पुरुषार्ध आकाश स्त्र्यर्थसे शून्य है, इसलिये पुनः विवाह करनेपर यह स्त्र्यर्थसे पूर्ण होता है, जिस प्रकार कि विदलार्ध पुनः सम्पुटित कर दिये जानेपर । तब वह मनुसंज्ञक प्रजापति अपनी पत्नीरूप कल्पना की हुई उस अपनी ही शतरूपा नामकी कन्यासे संयुक्त हुआ अर्थात् मैथुनधर्ममें प्रवृत्त हुआ । उस मैथुनकी प्रवृत्तिसे मनुष्य उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥ |
मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि
सो हेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु मात्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्तत एकशफमजायताजेतराभवद्बस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥४॥
उस [ शतरूपा ] ने यह विचार किया कि 'अपनेहीसे उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ, अतः वह गौ हो गयी, तो दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए । तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया, फिर वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ हों गया और उससे
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७६
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७६
सम्भोग करने लगा । इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया । फिर वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा होकर उससे समागम करने लगा । इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुष-रूप जोड़े) हैं उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ ४ ॥
| सा शतरूपा उ ह इयं सेयं दुहितृगमने स्मार्तं प्रतिषेधमनुस्मरन्तीक्षाञ्चक्रे । कथं न्विदमकृत्यं यन्मा मामात्मन एव जनयित्वोत्पाद्य सम्भवत्युपगच्छति । यद्यप्ययं निर्घृणोऽहं हन्तेदानीं तिरोऽसानि जात्यन्तरेण तिरस्कृता भवानि । इत्येवमीक्षित्वासौ गौरभवत् । उत्पाद्यप्राणिकर्म्मभिश्चोद्यमानायाः पुनःपुनः सैव मतिः शतरूपाया मनोश्चाभवत् । ततश्च ऋषभ इतरः । तां समेवाभवदित्यादि पूर्ववत् । ततो गावोऽजायन्त ।<br><br>तथा वडवेतराभवदश्ववृष इतरः । तथा गर्दभीतरा गर्दभ इतरः । तत्र वडवाश्ववृषादीनां सङ्गमात्तत एकशफमेकखुरमश्वाश्वतरगर्दभाख्यं त्रयमजायत । | वह यह शतरूपा स्मृतिके कन्यागमनसम्बन्धी प्रतिषेधवाक्यको स्मरण कर यह विचार करने लगी । यह ऐसा अकरणीय कार्य क्यों करता है जो मुझे अपनेहीसे उत्पन्नकर मेरे साथ सम्भोग करता है । यद्यपि यह तो निर्दय है तथापि मैं अब छिप जाती हूँ—जात्यन्तररूपसे अपनेको छिपाये लेती हूँ । ऐसा विचारकर वह गौ हो गयी । किंतु उत्पन्न किये जाने योग्य प्राणियोंके कर्मोंसे प्रेरित हुई शतरूपाकी और मनुकी भी पुनःपुनः वैसी ही मति होती रही । अतः मनु वृषभ हो गया और पूर्ववत् उसके साथ समागम करने लगा । उससे गाय-बैल उत्पन्न हुए ।<br><br>फिर शतरूपा घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ तथा उसके पश्चात् वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ । तब उन घोड़ी और अश्वश्रेष्ठादिके समागमसे घोड़ा, खच्चर और गधा—ये तीन एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । |
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१८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| १८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा अजेतराभवद्वस्त इतरश्छाग इतरः, तथाऽविरितरा मेष इतरः, तां समेवाभवत् । तां तामिति वीप्सा । तामजां तामविं चेतिसमभवदेवेत्यर्थः । ततोऽजाश्वावयश्चाजावयोऽजायन्त । एवमेव यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदं मिथुनं स्त्रीपुंसलक्षणं द्वन्द्वम्, आ पिपीलिकाभ्यः पिपीलिकाभिः सहानेनैव न्यायेन तत्सर्वमसृजत जगत्सृष्टवान् ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा तथा वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा हो गया और उससे समागम करने लगा । यहाँ 'ताम्' शब्दकी 'तां ताम्' ऐसी द्विरुक्ति समझनी चाहिये अर्थात् उस बकरीसे और उस भेड़से समागम करने लगा। तब भेड़-बकरियोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आपिपीलिकाभ्यः—चींटीसे लेकर ये जो कुछ भी मिथुन—स्त्री-पुरुषरूप जोड़े हैं, उसने इसी न्यायसे इन सबकी रचना की, अर्थात् इस सारे जगत्को उत्पन्न किया ॥ ४ ॥ |
प्रजापतिकी सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूपसे उसकी उपासना करनेका फल
सोऽवेदहं वाव सृष्टि॒रस्म्यहँ॒ हीदँ॒ सर्व॑मसृक्षीति ततः सृष्टि॑रभवत्सृ॒ष्ट्याँ॒ हास्यै॒तस्यां॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ ५ ॥
उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैंने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की इस सृष्टिमें [स्रष्टा] होता है ॥ ५ ॥
| स प्रजापतिः सर्वमिदं जगत्सृष्ट्वा अवेत् । कथम्? अहं वावाहमेव सृष्टिः, सृज्यते इति सृष्टं जगदुच्यते सृष्टिरिति । यन्मया | उस प्रजापतिने इस सम्पूर्ण जगत्को रचकर जाना। किस प्रकार जाना ? 'मैं ही सृष्टि हूँ।' उसका सर्जन (निर्माण) किया जाता है, इसलिये वह सृष्ट (उत्पन्न) हुआ जगत् सृष्टि कहलाता है। [उसने विचार किया—] 'मेरेद्वारा |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८१
| सृष्टं जगन्मदभेदत्वादहमेवास्मि न मत्तो व्यतिरिच्यते । कुत एतत् ? अहं हि यस्मादिदं सर्वं जगदसृक्षि सृष्टवानस्मि तस्मादित्यर्थः । | जो जगत् रचा गया है वह मुझसे अभिन्न होनेके कारण मैं ही हूँ, वह मुझसे अलग नहीं है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि मैंने ही इस सम्पूर्ण जगत्को रचा है, इसलिये'—[ यह मुझसे अभिन्न है ] ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| यस्मात्सृष्टिशब्देन आत्मानमेवाभ्यधातप्रजापतिः, ततस्तस्मात्सृष्टिरभवत् सृष्टिनामाभवत् । सृष्ट्यां जगति, हास्य प्रजापतेरेतस्यामेतस्मिञ्जगति, स प्रजापतिवत्स्रष्टा भवति स्वात्मनोऽनन्यभूतस्य जगतः, कः ? य एवं प्रजापतिवद्यथोक्तं स्वात्मनोऽनन्यभूतं जगत्साध्यात्मदिभूताधिदैवं जगदहमस्मीति वेद ॥५॥ | क्योंकि प्रजापतिने 'सृष्टि' नामसे अपनेको ही कहा था, इसलिये वह सृष्टि अर्थात् सृष्टि नामवाला हुआ । इस प्रजापतिकी सृष्टिमें अर्थात् इस जगत्में वह प्रजापतिके समान अपनेसे अनन्यभूत जगत्का स्रष्टा होता है; कौन ? जो इस प्रकार प्रजापतिके समान उपर्युक्त अपनेसे अभिन्न जगत्को, 'अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवके सहित सारा जगत् मैं हूँ' इस प्रकार जानता है ॥ ५ ॥ |
प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निममसृजत तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः । तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवाः । अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा
१८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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इदँ् सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमनिरन्नादः
सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः । यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ
यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां
हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥
फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूपी योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे लोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे लोमरहित ही होती है। अतः [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस ( अग्नि ) का यजन करो, इस ( इन्द्र ) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह गीला है उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अतिसृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की—स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अतिसृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं स प्रजापतिर्जगदिदं मिथुनात्मकं सृष्ट्वा ब्राह्मणादिवर्णनियन्त्रीर्देवताः सिसृक्षुरादौ, अथेति शब्दद्वयमभिनयप्रदर्शनार्थम्, अनेन प्रकारेण मुखे हस्तौ प्रक्षिप्याभ्यमन्थदभिमुख्येन मन्थनमकरोत् । स मुखहस्ताभ्यां मथित्वा मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां | इस प्रकार उस प्रजापतिने इस मिथुनात्मक जगत्की रचना कर ब्राह्मणादि वर्णोंका नियन्त्रण करनेवाली देवताओंकी रचना करनेकी इच्छासे पहले—यहाँ 'अथ' और 'इति' ये दो शब्द अभिनय प्रदर्शित करनेके लिये हैं—इस प्रकारसे मुखमें हाथ डालकर 'अभ्यमन्थत्'—अभिमुखतासे मन्थन किया। उसने मुखको हाथोंसे मथकर मुखरूप योनिसे हाथरूप योनियोंके द्वारा |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| च योनिभ्यामग्निं ब्राह्मणजातेरनुग्रहकर्तारमसृजत सृष्टवान् । | ब्राह्मण जातिपर अनुग्रह करनेवाले अग्निदेवको उत्पन्न किया । |
| यस्माद्दाहकस्याग्नेर्योनिरेतदुभयं हस्तौ मुखं च, तस्मादुभयमप्येतदलोमकं लोमविवर्जितम् । किं सर्वमेव ? न, अन्तरतोऽभ्यन्तरतः; अस्ति हि योन्या सामान्यमुभयस्यास्य । किम् ? अलोमका हि योनिरन्तरतः स्त्रीणाम् । तथा ब्राह्मणोऽपि मुखादेव जज्ञे प्रजापतेः । तस्मादेकयोनित्वाज्ज्येष्ठेनेवानुजोऽनुगृह्यते अग्निना ब्राह्मणः । तस्माद्ब्राह्मणोऽग्निदेवत्यो मुखवीर्यश्चेति श्रुतिस्मृतिसिद्धम् । | क्योंकि ये हाथ और मुख दोनों दाह करनेवाले अग्निदेवकी योनि हैं । इसलिये ये दोनों ही लोमशून्य हैं। क्या सारे ही लोमशून्य हैं ? —नहीं, अन्तरतः —भीतरसे । इन दोनोंकी योनिसे समानता है । क्या समानता है ? स्त्रियोंकी योनि भी भीतरसे लोमशून्य ही होती है । इसी प्रकार ब्राह्मण भी प्रजापतिके मुखसे ही उत्पन्न हुआ है । अतः एक ही योनिसे उत्पन्न होनेवाले होनेसे जिस प्रकार बड़े भाईका छोटे भाईपर अनुग्रह रहता है उसी प्रकार अग्नि भी ब्राह्मणपर अनुग्रह करता है । अतः अग्नि ही ब्राह्मणकी देवता है और वह मुखरूप वीर्यवाला है—यह बात श्रुति-स्मृतिसिद्ध है । |
| तथा बलाश्रयाभ्यां बाहुभ्यां बलभिदादिकं क्षत्रियजातिनियन्तारं क्षत्रियं च । तस्मादैन्द्रं क्षत्रं बाहुवीर्यं चेति श्रुतौ स्मृतौ चावगतम् । तथोरुत ईहा चेष्टा | इसी प्रकार बलकी आश्रयभूता भुजाओंसे उसने क्षत्रियजातिके नियन्ता इन्द्रादि और क्षत्रियोंको रचा । इसीसे क्षत्रिय इन्द्रदेवताका अनुग्राह्य और बाहुरूप वीर्यवाला होता है—यह बात श्रुति और स्मृतिमें विख्यात है । तथा ईहा यानी चेष्टा उसके आश्रय- |
१८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| १८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तदाश्रयाद्वस्वादिलक्षणं विशो नियन्तारं विशं च । तस्मात्कृष्यादिपरो वस्वादिदैवत्यश्च वैश्यः । तथा पूषणं पृथ्वीदैवतं शूद्रं च पद्भ्यां परिचरणक्षममसृजतेति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेः । | भूत ऊरुओंसे वैश्यजातिके नियन्ता वसु आदिको और वैश्यजातिको उत्पन्न किया । अतः वैश्य कृषि आदि कर्मोंमें संलग्न रहनेवाला और वसु आदि देवताओंसे अनुगृहीत होता है । इसी तरह पृथ्वीदैवत पूषा और परिचर्यापरायण शूद्रजातिको चरणोंसे रचा—ऐसा श्रुति-स्मृति जनित प्रसिद्धिसे सिद्ध होता है । | | तत्र क्षत्रादिदेवतासर्गमिहानुक्तं वक्ष्यमाणमप्युक्तवदुपसंहरति सृष्टिसाकल्यानुकीर्त्यै । यथेयं श्रुतिर्व्यवस्थिता तथा प्रजापतिरेव सर्वे देवा इति निश्चितोऽर्थः ।<br><br>स्रष्टुरनन्यत्वात्सृष्टानाम् । प्रजापतिनैव तु सृष्टत्वाद् देवानाम् । | उनमें क्षत्रियादिके देवताओंकी सृष्टिका यद्यपि यहाँ (मूलमें) उल्लेख नहीं है, और वह आगे कही जानेवाली है तो भी सृष्टिकी सर्वाङ्गताका अनुकीर्तन करनेके लिये श्रुति उसका कहे हुएके समान उपसंहार करती है । जैसी कि इस श्रुतिकी व्यवस्था है उसके अनुसार प्रजापति ही सर्व देवरूप है—यह इसका निश्चित अर्थ है, क्योंकि सृष्ट पदार्थ स्रष्टासे अभिन्न होते हैं और प्रजापतिने ही सब देवोंकी सृष्टि की है । | | अथैवं प्रकरणार्थे व्यवस्थिते तत्स्तुत्यभिप्रायेणाविद्वन्मतान्तरनिन्दोपन्यासः; अन्यनिन्दान्यस्तुतये । तत्तत्र कर्मप्रकरणे केवल- | अब इस प्रकार इस प्रकरणका अर्थ निश्चित होनेपर उसकी स्तुतिके लिये अविद्वान्के मतान्तरकी निन्दाका उपन्यास किया जाता है, क्योंकि एककी निन्दा दूसरेकी स्तुतिके लिये होती है । इसलिये अभिप्राय यह है कि वहाँ कर्मप्रकरणमें केवल |