बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ज्जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वे जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषे च शास्त्रं प्रवर्तते। “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके” (क० उ० १ । १ । २०)- इत्युपक्रम्य “अस्तीत्येवोपलब्धव्यः” (क० उ० २ । ३ । १३) इत्येवमादिनिर्णयदर्शनात्। “यथा च मरणं प्राप्य” (क० उ० २ । २ । ६) इत्युपक्रम्य “योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्” (क० उ० २ । २ । ७) इति च। “स्वयञ्ज्योतिः” (बृ० उ० ४ । ३ । ६) इत्युपक्रम्य “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते” (४ । ४ । २) “पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन” (३ । २ । १३) इति च। “ज्ञपयिष्यामि” (बृ० उ० २ । १ । १५) इत्युपक्रम्य “विज्ञानमयः” | जन्मान्तर--सम्बन्धी आत्माके अस्तित्व और जन्मान्तरकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषका निरूपण करनेमें प्रवृत्त होता है। जैसा कि [श्रुतिमें] “मृत मनुष्यके विषयमें जो ऐसी शङ्का होती है कि कोई तो कहते हैं [शरीरादिसे अतिरिक्त देहान्तरसम्बन्धी] आत्मा रहता है और कोई कहते हैं यह नहीं रहता” इस प्रकार उपक्रम करके “आत्मा है—ऐसा ही जानना चाहिये” इत्यादि निर्णय देखा जाता है तथा “[ब्रह्मको न जाननेसे] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है” इस प्रकार आरम्भ करके “जिसने जैसा कर्म किया है तथा जिसने जैसा शास्त्रज्ञान प्राप्त किया है उसके अनुसार कोई तो देह धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त हो जाते हैं और कोई स्थावर हो जाते हैं” इस प्रकार कहा है। एवं “स्वयं प्रकाश है” इस प्रकार आरम्भ कर “ज्ञान और कर्म उसके जन्मान्तरके आरम्भक होते हैं” तथा “वह पुण्यकर्मसे पुण्यवान् और पापकर्मोंसे पापमय होता है” इत्यादि कहा गया है। इसी प्रकार “बतलाऊँगा” ऐसा उपक्रम कर “आत्मा विज्ञान- |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| (२। १। १६) इति च व्यतिरिक्तात्मास्तित्वम् ।<br><br>तत्प्रत्यक्षविषयमेवेति चेन्न, प्रत्यक्षानुमानाभ्यां नात्मनोऽस्तित्वसिद्धिः वादिविप्रतिपत्तिदर्शनात् । न हि देहान्तरसम्बन्धिन आत्मनः प्रत्यक्षेणास्तित्वविज्ञाने लोकायतिका बौद्धाश्च नः प्रतिकूलाः स्युर्नास्त्यात्मेति वदन्तः । न हि घटादौ प्रत्यक्षविषये कश्चिद्विप्रतिपद्यते नास्ति घट इति । स्थाण्वादौ पुरुषादिदर्शनान्नेति चेन्न, निरूपितेऽभावात् । न हि प्रत्यक्षेण निरूपिते स्थाण्वादौ विप्रतिपत्तिर्भवति । वैनाशिकास्त्वहमितिप्रत्यये जायमानेऽपि देहान्तरव्यतिरिक्तस्य नास्तित्वमेव प्रतिजानते । तस्मात्प्रत्यक्षविषयवैलक्षण्यात् प्रत्यक्षान्नात्मास्तित्वसिद्धिः । | मय है'' इस प्रकार देहसे भिन्न आत्माका अस्तित्व बतलाया गया है।<br><br>यदि कहो कि आत्माका अस्तित्व तो प्रत्यक्ष प्रमाणका ही विषय है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इसके सम्बन्धमें विभिन्न वादियोंका मतभेद देखा जाता है। यदि देहान्तरसम्बन्धी आत्माके अस्तित्वका ज्ञान प्रत्यक्ष होता तो लोकायतिक और बौद्ध 'आत्मा नहीं है' ऐसा कहते हुए हमारे प्रतिकूल न होते। घटादि जो प्रत्यक्षप्रमाणके विषय हैं, उनमें 'घट नहीं है' ऐसा संदेह किसीको नहीं होता। यदि कहो कि स्थाणु (ठूँठ) आदिमें पुरुषादिका भ्रम देखा जानेके कारण प्रत्यक्ष वस्तुमें संशयका अभाव नहीं बताया जा सकता तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि अच्छी तरह देख लेनेपर उस संशयका अभाव हो जाता है। स्थाणु आदिका प्रत्यक्ष निरूपण हो जानेपर उसमें किसीको संदेह नहीं रहता। किंतु वैनाशिक तो 'अहम्' ऐसी वृत्तिके उदय होनेपर भी देहान्तरसे भिन्न आत्माके न होनेका ही निश्चय करते हैं। अतः प्रत्यक्ष प्रमाणके विषयसे विलक्षण होनेके कारण प्रत्यक्षसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती। |
बृ० उ० ३—
३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| कर्मज्ञानकाण्डयोः प्रयोजनम्<br><br>तथानुमानादपि¹ । श्रुत्यात्मास्तित्वे लिङ्गस्य दर्शितत्वाल्लिङ्गस्य च प्रत्यक्षविषयत्वान्नेति चेन्न, जन्मान्तरसम्बन्धस्याग्रहणात् । आगमेन त्वात्मास्तित्वेऽवगते वेदप्रदर्शितलौकिकलिङ्गविशेषैश्च तदनुसारिणो मीमांसकास्तार्किकाश्च अहम्प्रत्ययलिङ्गानि च वैदिकान्येव स्वमतिप्रभवाणीति कल्पयन्तो वदन्ति प्रत्यक्षश्चानुमेयश्चात्मेति ।<br><br>सर्वथाप्यस्त्यात्मा देहान्तरसम्बन्धीत्येवं प्रतिपत्तुर्देहान्तरगतेष्टा- | इसी प्रकार अनुमानसे भी [ आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता ]¹ । यदि कहो कि श्रुतिने आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग² ( बीज ) दिखलाया है और लिङ्ग प्रत्यक्षप्रमाणका विषय होता है, इसलिये आत्मा [ प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणका भी विषय है ] केवल आगमका ही विषय नहीं है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जन्मान्तरके सम्बन्धका किसी अन्य प्रमाणसे ग्रहण नहीं होता । आगमप्रमाणसे तथा वेदोक्त लौकिक लिङ्गविशेषोंके द्वारा आत्माका अस्तित्व जान लेनेपर ही उसीका अनुसरण करनेवाले मीमांसक और नैयायिक वैदिक अहंंप्रतीति और वैदिक लिङ्गोंको ही ‘ये हमारी बुद्धिसे निकले हुए तर्क हैं’ ऐसी कल्पना करते हुए कहते हैं कि ‘आत्मा प्रत्यक्ष और अनुमानका भी विषय है’ ।<br><br>सब प्रकार देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है—ऐसा जाननेवाले तथा देहान्तरगत इष्टप्राप्ति और |
१. अनुमानका स्वरूप यों है—इच्छा आदि किसीके आश्रित होते हैं; क्योंकि वे गुण हैं, जैसे रूप आदि । इस प्रकारके अनुमानद्वारा इच्छादिके आश्रयरूपसे भी आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इच्छादिका अधिष्ठान मन ही प्रसिद्ध है, मनसे अतिरिक्त इच्छादिकी उपलब्धि नहीं होती ।
२. 'यः प्राणेन प्राणिति' इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्राणनादि व्यापार ही आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग है ।
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| निष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषार्थिनस्तद्विशेषज्ञापनाय कर्मकाण्डमारब्धम् । न त्वात्मन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छाकारणमात्मविषयमज्ञानं कर्तृभोक्तृस्वरूपाभिमानलक्षणं तद्विपरीतब्रह्मात्मस्वरूपविज्ञानेनापनीतम् । यावद्धि तन्नापनीयते तावदयं कर्मफलरागद्वेषादिस्वाभाविकदोषप्रयुक्तः शास्त्रविहितप्रतिषिद्धातिक्रमेणापि वर्तमानो मनोवाक्कायैर्दृष्टादृष्टानिष्टसाधनानि अधर्मसंज्ञकानि कर्माण्युपचिनोति बाहुल्येन, स्वाभाविकदोषबलीयस्त्वात् । ततः स्थावरान्ताधोगतिः । कदाचिच्छास्त्रकृतसंस्कारबलीयस्त्वम्, ततो मनआदिभिरिष्टसाधनं बाहुल्येनोपचिनोति धर्माख्यम् । तद्द्विविधम्-ज्ञानपूर्वकं केवलञ्च । तत्र केवलं पितृलोकादिप्राप्तिफलम् । ज्ञानपूर्वकं देवलोकादि- | अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषको जाननेकी इच्छावाले पुरुषोंको उस विशेष उपायका ज्ञान करानेके लिये कर्मकाण्ड आरम्भ किया गया है। उसमें आत्माकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छाके कारण कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानरूप आत्मविषयक अज्ञानको उससे विपरीत ब्रह्मात्मस्वरूप ज्ञानके द्वारा दूर नहीं किया गया। जबतक उस (अज्ञान) की निवृत्ति नहीं होती, तबतक यह जीव कर्मफलके राग-द्वेषादिरूप स्वाभाविक दोषोंसे प्रेरित होनेके कारण शास्त्रकथित विधि और निषेधका उल्लङ्घन करके भी बर्तता हुआ मन, वाणी और शरीरसे दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टके साधनभूत अधर्मसंज्ञक कर्मोंको अधिकतासे करता रहता है, क्योंकि स्वभावजनित दोष बहुत प्रबल होता है। इससे उसे स्थावरपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है। कभी शास्त्रोक्त संस्कारोंकी प्रबलता होती है, उस समय यह मन आदिसे अधिकतर धर्मसंज्ञक इष्टसाधनोंका सम्पादन करता है। वे ज्ञान (उपासना) पूर्वक और केवल भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें केवल धर्म पितृलोकादिकी प्राप्तिरूप फलवाले हैं और ज्ञानपूर्वक धर्म देवलोकसे |
३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| ब्रह्मलोकान्तप्राप्तिफलम् । तथा च शास्त्रम्—“आत्मयाजी श्रेयान्देवयाजिनः” (शत० ब्राह्म०) इत्यादि । स्मृतिश्च “द्विविधं कर्म वैदिकम्” (मनु० १२।८८) इत्याद्या । साम्ये च धर्माधर्मयोः मनुष्यत्वप्राप्तिः। एवं ब्रह्माद्या स्थावरान्ता स्वाभाविकाविद्यादिदोषवती धर्माधर्मसाधनकृता संसारगतिर्नामरूपकर्माश्रया । तदेवेदं व्याकृतं साध्यसाधनरूपं जगत्प्रागुत्पत्तेरव्याकृतमासीत् । स एष बीजाङ्कुरादिवदविद्याकृतः संसार आत्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणोऽनादिरनन्तोऽनर्थः, इत्येतस्माद्विरक्तस्याविद्यानिवृत्तये तद्विपरीतब्रह्मविद्याप्रतिपत्तयेऽथोपनिषदारभ्यते । <br><br> अस्य त्वश्वमेधकर्मसम्बन्धिनो <br> (अश्वमेधब्राह्मण-प्रयोजनम्) विज्ञानस्य प्रयोजनं येषामश्वमेधे न | लेकर ब्रह्मलोकतककी प्राप्तिरूप फलवाले हैं। ऐसा ही शास्त्र भी कहता है—“देवोपासककी अपेक्षा आत्मोपासक श्रेष्ठ है।¹” तथा “वैदिक कर्म दो प्रकारका है” (प्रवृत्ति-प्रधान और निवृत्तिप्रधान) ऐसी स्मृति भी है। धर्म और अधर्मकी समान मात्रा होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार धर्म एवं अधर्मरूप साधनसे होनेवाली ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त नाम, रूप एवं कर्मके आश्रित स्वाभाविक अविद्यादि दोषवाली सांसारिक गति है। वह यह साध्यसाधनरूप व्याकृत जगत् उत्पत्तिसे पूर्व अव्याकृत था। आत्मामें क्रिया, कारक एवं फलका आरोपरूप यह अविद्याकृत संसार बीजाङ्कुरादिके समान [प्रवाहरूपसे] अनादि और अनन्त अनर्थरूप है; अतः इससे विरक्त हुए पुरुषकी अविद्याकी निवृत्तिके लिये इससे विपरीत ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाली यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है। <br><br> [इस उपनिषद्के आरम्भमें कहे हुए] इस अश्वमेधकर्मसम्बन्धी विज्ञानका तो यही प्रयोजन है कि |
१. सर्वत्र परमात्मबुद्धि रखकर नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष आत्मयाजी (आत्मोपासक) है और कामनापूर्वक देवताओंकी उपासना करनेवाला देवयाजी (देवोपासक) है।
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| अधिकारस्तेषामस्मादेव विज्ञानात् फलप्राप्तिः। 'विद्यया वा कर्मणा वा' "तद्धैतल्लोकजिदेव" (बृ० उ० १।३।२८) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः। | जिनका [असामर्थ्यवश] अश्वमेध यज्ञमें अधिकार नहीं है उन्हें इस विज्ञानसे ही उसके फलकी प्राप्ति हो जाय; जैसा कि “ज्ञान (उपासना) से अथवा कर्मसे [उसके फलकी प्राप्ति होती है]” “वह यह (प्राणदर्शन) लोक-प्राप्तिका साधन है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | कर्मविषयत्वमेव विज्ञानस्येति चेन्न, "योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद" इति विकल्पश्रुतेः। | यदि कहो कि अश्वमेधविज्ञान अश्वमेधकर्मसे ही सम्बन्ध रखता है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि “जो अश्वमेधसे यजन करता है अथवा जो इसे इस प्रकार जानता है [वह सब पापोंको पार कर जाता है]” | | विद्याप्रकरणे चाम्नानात् कर्मान्तरे च सम्पादनदर्शनाद् विज्ञानात् तत्फलप्राप्तिरस्तीत्यवगम्यते। | इस प्रकार कर्मके ज्ञान और अनुष्ठानका विकल्प बतलानेवाली श्रुति है। इसके सिवा इसका उल्लेख उपासनाप्रकरणमें होनेसे तथा अश्वमेधसे भिन्न [चित्याग्नि] कर्ममें¹ इसका सम्पादन देखा जानेसे भी यह ज्ञात होता है कि अश्वमेध-विज्ञानसे भी अश्वमेधका ही फल मिलता है। | | सर्वेषां च कर्मणां परं कर्माश्वमेधः समष्टिव्यष्टिप्तिफलत्वात्। तस्य चेह ब्रह्मविद्याप्रारम्भ आम्नानं सर्वकर्मणां संसारविषयत्वप्रदर्श- | समष्टि और व्यष्टि हिरण्यगर्भकी प्राप्तिरूप फलवाला होनेसे समस्त कर्मोंमें अश्वमेध कर्म उत्कृष्ट है। यहाँ ब्रह्मविद्याके आरम्भमें उसका उल्लेख समस्त कर्मोंका |
¹ 'अयं वै लोकोऽग्निः' (बृ० उ० ६।२।११) इत्यादि वाक्यद्वारा।
३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| नार्थम् । तथा च दर्शयिष्यति फलमशनायामृत्युभावम् । | संसारसम्बन्धित्व प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है। इसी प्रकार श्रुति हिरण्यगर्भको क्षुधारूप मृत्युभावकी प्राप्ति दिखलावेगी। | | न नित्यानां संसारविषयफलत्वमिति चेन्न, सर्वकर्मफलोपसंहारश्रुतेः। सर्वं हि पत्नीसम्बद्धं कर्म । “जाया मे स्यात्..... एतावान्वै कामः” (बृ०उ० १।४।१७) इति निसर्गत एव सर्वकर्मणां काम्यत्वं दर्शयित्वा, पुत्रकर्मापरविद्यानां च “मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोकः” (बृ०उ० १।५।१६) इति फलं दर्शयित्वा, त्र्यन्नात्मकतां चान्ते उपसंहरिष्यति “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” ( बृ० उ० १।६।१) इति। सर्वकर्मणां फलं व्याकृतं संसार एवेति । | यदि कहो कि नित्यकर्म संसारविषयक फलवाले नहीं हैं तो यह ठीक नहीं, क्योंकि समस्त कर्मफलोंका [ सांसारिक विषयोंमें ही ] उपसंहार किया जाता है—ऐसी श्रुति है। सारे ही कर्मोंका सम्बन्ध स्त्रीसे है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो... इतनी ही कामना है” इस प्रकार स्वभावसे ही समस्तकर्मोंकी सकाम्यता दिखलाकर फिर पुत्र, कर्म और अपरा विद्याके “मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक” इस प्रकार विभिन्न फल दिखाते हुए श्रुति “यह जगत् नाम, रूप और कर्म—इन तीन अवयवोंसे युक्त है” ऐसा कहकर अन्तमें इसकी तीन अन्नरूपताका उपसंहार करेगी। तात्पर्य यह है कि समस्त कर्मोंका फल व्याकृत संसार ही है। | | इदमेव त्रयं प्रागुत्पत्तेस्तर्ह्यव्याकृतमासीत्। तदेव पुनः सर्वप्राणिकर्मवशाद्व्याक्रियते बीजादिव वृक्षः। सोऽयं व्याकृता- | यही त्रय उत्पत्तिसे पूर्व तो अव्याकृत ही था। वही बीजसे वृक्षके समान समस्त प्राणियोंके कर्मवश व्याकृत हो जाता है। वह यह व्यक्ताव्यक्तरूप संसार अविद्याका |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्याकृतरूपः संसारोऽविद्याविषयः; क्रियाकारकफलात्मकतया आत्मरूपत्वेनाध्यारोपितः अविद्ययैव मूर्त्तामूर्त्ततद्वासनात्मकः। अतो विलक्षणोऽनामरूपकर्मात्मकोऽद्वयो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽपि क्रियाकारकफलभेदादिविपर्ययेणावभासते। अतोऽस्मात्क्रियाकारकफलभेदस्वरूपाद् एतावादिदमिति साध्यसाधनरूपाद्विरक्तस्य कामादिदोषकर्मबीजभूताविद्यानिवृत्तये रज्ज्वामिव सर्पविज्ञानापनयाय ब्रह्मविद्या आरभ्यते। | विषय है। अविद्यासे ही मूर्त्त, अमूर्त्त और उनकी वासनारूप यह संसार क्रिया, कारक और फलरूप होनेसे आत्मभावसे आरोपित होता है। इससे भिन्न आत्मा नाम, रूप और कर्मसे रहित, अद्वितीय तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप होनेपर भी क्रिया, कारक और फल-भेदादि विपरीत भावसे प्रतीत होता है। अतः इस साध्य-साधनरूप एवं क्रिया, कारक और फल-भेदरूप संसारसे 'यह इतना ही है' इस प्रकार विरक्त हुए पुरुषकी कामादि दोषमय कर्मोंकी बीजभूता अविद्याकी, रज्जुमें सर्पज्ञानके बाधके समान, निवृत्ति करनेके लिये ब्रह्मविद्याका आरम्भ किया जाता है। |
| तत्र तावदश्वमेधविज्ञानाय 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि। | उसमें अश्वमेधविद्याका वर्णन करनेके लिये 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि मन्त्र कहा जाता है। |
| तत्राश्वविषयमेव दर्शनमुच्यते प्राधान्यादश्वस्य। प्राधान्यं च तन्नामाङ्कितत्वात्क्रतोःप्राजापत्यत्वाच्च। | अश्वमेध यज्ञमें अश्वकी प्रधानता होनेके कारण यहाँ अश्वविषयक दृष्टि ही कही गयी है। यह यज्ञ 'अश्व' नामसे अङ्कित है और इसका देवता प्रजापति है, इसीलिये इसमें अश्वकी प्रधानता मानी गयी है। |
अश्वके अवयवोंमें कालादि-दृष्टि
ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्य्यश्चक्षु-
४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाशस्थित मेघ) मांस हैं, बालू ऊवध्य (उदरस्थित अर्धपक्व अन्न) है, नदियाँ नाडी हैं, पर्वत यकृत् (जिगर) और हृदयगत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ लोम हैं, ऊपरकी ओर जाता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और नीचेकी ओर जाता हुआ सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और वाणी ही उसकी वाणी है॥ १ ॥
| उषा इति, ब्राह्मो मुहूर्त उषाः । | ‘उषा वा’ इत्यादि। ब्राह्ममुहूर्तका नाम उषा है। | | वैशब्दः स्मरणार्थः प्रसिद्धं कालं स्मारयति । | ‘वै’ शब्द स्मरण करानेके लिये है। यह प्रसिद्ध काल-का स्मरण कराता है। | | शिरः प्राधान्यात् । | वह प्रसिद्ध उषाकाल प्रधान होनेके कारण |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| शिरश्च प्रधानं शरीरावयवानाम् ।<br><br>अश्वस्य मेध्यस्य मेधार्हस्य यज्ञियस्योषाः शिर इति सम्बन्धः ।<br><br>कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात् कालादिदृष्टयः शिर आदिषु क्षिप्यन्ते । प्राजापत्यत्वं च प्रजापतिदृष्ट्यध्यारोपणात् । काल-लोकदेवतात्वाध्यारोपणं च प्रजापतित्वकरणं पशोः । एवंरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरणमिव प्रतिमादौ । | शिर है। शिर भी शरीरके अवयवोंमें प्रधान है। अतः मेध्य—मेधार्ह (यज्ञार्ह) यानी यज्ञसम्बन्धी अश्वका उषा शिर है—ऐसा इसका अन्वय है। कर्मके अङ्गभूत पशुका संस्कार किया जाना चाहिये, इसलिये उसके शिर आदिमें कालादिदृष्टियाँ की जाती हैं। उसमें प्रजापति-दृष्टिका अध्यारोप किया जाता है, इसीसे यह प्राजापत्य (प्रजापतिदेवतासम्बन्धी) है। काल, लोक और देवत्वका आरोप करना ही पशुका प्रजापतित्व सम्पादन करना है। जिस प्रकार प्रतिमादिमें विष्णुत्वादिकी प्रतिष्ठा की जाती है उसी प्रकार यह उक्तरूपसे प्रजापति है। |
| सूर्यश्चक्षुः शिरसोऽनन्तरत्वात् सूर्याधिदैवतत्वाच्च । वातः प्राणो वायुस्वाभाव्यात् । व्यात्तं विवृतं मुखमग्निर्वैश्वानरः । वैश्वानर इत्यग्नेर्विशेषणम् । वैश्वानरो नामाग्निर्विवृतं मुखमित्यर्थो मुखस्याग्निदैवतत्वात् । संवत्सर आत्मा, संवत्सरो द्वादशमासस्त्रि- | [जिस प्रकार उषाके अनन्तर सूर्य दिखायी देता है उसी प्रकार] शिरके अनन्तर नेत्र हैं और सूर्य ही नेत्रोंका अभिमानी देव है, इसलिये सूर्य उसका नेत्र है। वायु प्राण है, क्योंकि वह वायुके-से स्वभाववाला है। वैश्वानर अग्नि व्यात्त यानी खुला हुआ मुख है। 'वैश्वानर' यह अग्निका विशेषण है। अर्थात् वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है; क्योंकि मुखका अधिष्ठातृदेव अग्नि ही है। संवत्सर आत्मा है; संवत्सर बारह या तेरह महीनेका होता है, |
४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| योदशमासो वा, आत्मा शरीरम्। कालावयवानां च संवत्सरः शरीरम्, शरीरं चात्मा "मध्यं ह्येषा- मङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः। अश्वस्य मेध्यस्येति सर्वत्रानु- षङ्गार्थं पुनर्वचनम्। | वह उसका आत्मा यानी शरीर है। कालके अवयवोंका संवत्सर ही शरीर है, और "इन सब अङ्गोंका मध्यभाग आत्मा है" इस श्रुतिके अनुसार शरीर ही आत्मा है। 'अश्वस्य मेध्यस्य' इसकी पुनरुक्ति इसका सबके साथ सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये है। | | द्यौः पृष्ठमूर्ध्वत्वसामान्यात्। अन्तरिक्षमुदरं सुषिरत्वसामान्यात्। पृथिवी पाजस्यं पादस्यं पाजस्य- मिति वर्णव्यत्ययेन, पादासन- स्थानमित्यर्थः। दिशश्चतस्रोऽपि पार्श्वे पार्श्वेन दिशां सम्बन्धात्। | ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेके कारण द्युलोक उसका पृष्ठभाग है, अवकाश या छिद्ररूपतामें समानता होनेके कारण अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पाजस्य–पादस्य यानी पैर रखनेका स्थान है। 'पादस्य' के वर्ण (द) का ['व्यत्ययो बहुलम्' (पा०सू० ३।१। ८५) इस सूत्रके अनुसार जकारके रूपमें] व्यत्यय होनेसे 'पाजस्य' हुआ है। चारों दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, क्योंकि पार्श्वसे दिशाओंका सम्बन्ध है। | | पार्श्वयोर्दिशां च सङ्ख्यावैषम्या- दयुक्तमिति चेन्न, सर्वमुखत्वोप- पत्तेरश्वस्य पार्श्वभ्यामेव सर्वदिशां सम्बन्धाददोषः। अवान्तरदिश | [यदि कहो कि ] पार्श्व और दिशाओंकी ¹संख्यामें समानता न होनेके कारण ऐसा कहना उचित नहीं है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि अश्वका मुख सभी दिशाओंकी ओर हो सकता है, अतः उसके पार्श्वोंका सभी दिशाओंसे सम्बन्ध होनेके कारण इसमें कोई दोष नहीं है। |
१. क्योंकि दिशाएँ चार हैं और पार्श्व केवल दो होते हैं।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| आग्नेय्याद्याः पर्शवः पार्श्वस्थीनि ।<br><br>ऋतवोऽङ्गानि संवत्सरावयवत्वादङ्गसाधर्म्यात् । मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाणि सन्धयः सन्धिसामान्यात् ।<br><br>अहोरात्राणि प्रतिष्ठाः । बहुवचनात् प्राजापत्यदैवपित्र्यमानुषाणि, प्रतिष्ठाः पादाः प्रतितिष्ठत्येतैरिति । अहोरात्रैर्हि कालात्मा प्रतितिष्ठत्यश्वश्च पादैः । | आग्नेयी आदि अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ अर्थात् पार्श्वभागकी अस्थियाँ हैं। ऋतुएँ अङ्ग हैं, क्योंकि संवत्सरके अवयव होनेके कारण अङ्गोंसे उनकी समानता है। मास और अर्धमास पर्व—सन्धियाँ हैं; क्योंकि सन्धिसे उनकी समानता है।<br><br>दिन और रात्रि प्रतिष्ठा है। 'अहोरात्राणि' इस पदमें बहुवचन होनेके कारण प्रजापति, देवता, पितृगण और मनुष्य सभीके दिन-रात¹ प्रतिष्ठा अर्थात् पाद हैं, क्योंकि इनसे वह प्रतिष्ठित होता है। कालात्मा दिनरात्रिके द्वारा प्रतिष्ठित होता है और अश्व पैरोंके द्वारा। |
| नक्षत्राण्यस्थीनि शुक्लत्वसामान्यात् । नभो नभःस्था मेघा अन्तरिक्षस्योदरत्वोक्तेः, मांसान्युदकरुधिरसेचनसामान्यात् । ऊवध्यं उदरस्थमर्धजीर्णमशनं सिकता | शुक्लत्वमें समानता होनेके कारण नक्षत्र अस्थियाँ हैं। आकाश अर्थात् आकाशस्थित मेघ, क्योंकि अन्तरिक्ष (आकाश) की उदररूपता कही जा चुकी है, मांस हैं, क्योंकि जलरूप रुधिर बरसानेमें उनकी मांससे समानता है। अवयवोंके बिलग-बिलग रहनेमें समानता होनेके कारण बालू ऊवध्य- |
१. प्रजापतिका एक अहोरात्र दो सहस्र युगका होता है, देवताओंका अहोरात्र उत्तरायण और दक्षिणायनरूप है, पितृगणका अहोरात्र शुक्लपक्ष और कृष्ण पक्ष है तथा मनुष्यका अहोरात्र एक दिन और एक रात्रि है।
४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| विश्लिष्टावयवत्वसामान्यात् । सिन्धवः स्यन्दनसामान्यान्नद्यो गुदा नाड्यो बहुवचनाच्च । यकृच्च क्लोमानश्च हृदयस्याधस्ताद्दक्षिणोत्तरौ मांसखण्डौ । क्लोमान इति नित्यं बहुवचनमेकस्मिन्नेव । पर्वताः काठिन्यादुच्छ्रितत्वाच्च । ओषधयश्च क्षुद्राः स्थावरा वनस्पतयो महान्तो लोमानि केशाश्च यथासम्भवम् ।<br><br>उद्यन्नुद्गच्छन्भवति सविता आमध्याह्नादश्वस्य पूर्वार्धो नाभेरूर्ध्वमित्यर्थः । निम्लोचन्नस्तं यन्नामध्याह्नाज्जघनार्धोऽपरार्धः पूर्वापरत्वसाधर्म्यात् । यद्विजृम्भते गात्राणि विनामयति विक्षिपति तद्विद्योतते विद्योतनं मुखघनविदारणसामान्यात्। यद्विधूनुते गा- | उदरस्थित अर्धजीर्ण अन्न है। सिन्धु अर्थात् स्यन्दन (बहने) में समानता होनेके कारण नदियाँ गुदा-नाडियाँ हैं, क्योंकि यहाँ 'सिन्धवः' और 'गुदाः' दोनों ही पद बहुवचनान्त हैं¹। कठिन और ऊँचे उठे हुए होनेके कारण पर्वत यकृत् और क्लोमा हैं। 'यकृत्' और 'क्लोमा'—हृदयके अधोभागमें सीधे और बायें दो मांसखण्ड हैं। 'क्लोमानः' यह एकके ही अर्थमें नित्य बहुवचनान्त होता है। ओषधि—क्षुद्र स्थावर और वनस्पति—महान् स्थावर ये यथासम्भव लोम और केश हैं।<br><br>सूर्य जो मध्याह्नकालपर्यन्त उदित होता—ऊपरकी ओर जाता है वह अश्वका पूर्वार्ध यानी नाभिसे ऊपरका भाग है और निम्लोचन् अर्थात् मध्याह्नकालसे अस्तकी ओर जाता हुआ वह सूर्य जघनार्ध—अपरार्ध ( नीचेका भाग ) है, क्योंकि पूर्वत्व और अपरत्वमें उन ( उदित और अस्त होते हुए सूर्य ) की समानता है। तथा वह जो जमुहाई लेता अर्थात् अङ्गोंको फैलाता यानी उन्हें विशेषरूपसे झाड़ता है। वह बिजलीका चमकना है, क्योंकि विद्योतन और मुख एवं मेघके विदारणमें |
१. अतएव यहाँ 'गुदा' शब्द लोकप्रसिद्ध नितम्ब-अर्थका बोधक नहीं हो सकता।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
| गात्राणि कम्पयति तत्स्तनयति गर्जनशब्दसामान्यात् । यन्मेहति मूत्रं करोत्यश्वस्तद्वर्षति वर्षणं तत् सेचनसामान्यात् । वागेव शब्द एवास्याश्वस्य वागिति, नात्र कल्पनेत्यर्थः ॥ १ ॥ | समानता है। तथा वह जो हिलाता अर्थात् शरीरको कम्पित करता है वह मेघका गर्जन है; क्योंकि इन दोनोंहीमें गर्जन-शब्द रहनेमें समानता है। और वह अश्व जो मूत्रत्याग करता है वही वर्षा होना है, क्योंकि भिगोनेमें इन दोनोंकी समानता है। वाक् अर्थात् शब्द ही इस अश्वकी वाणी है; तात्पर्य यह है कि यहाँ कोई कल्पना नहीं है ॥ १ ॥ |
अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि
| अहर्वा इति । सौवर्णराजतौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वस्याग्रतः पृष्ठतश्च स्थाप्येते तद्विषयमिदं दर्शनम्— | ‘अहर्वा’ इत्यादि। अश्वके आगे और पीछे महिमा नामके सोने और चाँदीके दो ग्रह (यज्ञीय पात्रविशेष) रखे जाते हैं; उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली यह दृष्टि है— |
अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः। हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वासुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ; उसकी पूर्व समुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; उसकी अपर (पश्चिम) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह
४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय १]
| ४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय १] |
|---|
हुए। इसने हय होकर देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥
| अहः सौवर्णो ग्रहो दीप्ति-सामान्याद्वै। अहरश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायतेति कथम् ? अश्वस्य प्रजापतित्वात्। प्रजापतिर्ह्यादित्यादिलक्षणोऽह्ना लक्ष्यते। अश्वं लक्षयित्वाजायत सौवर्णो महिमा ग्रहो वृक्षमन्ु विद्योतते विद्युदिति यद्वत्। तस्य ग्रहस्य पूर्वे पूर्वः समुद्रे समुद्रो योनिर्विभक्तिव्यत्ययेन। योनिरित्यासादनस्थानम्। | दीप्तिमें समानता होनेके कारण दिन ही सुवर्णमय ग्रह है। दिन ही इस अश्वके सामने महिमारूपसे प्रकट हुआ, सो किस प्रकार ? क्योंकि यह अश्व प्रजापतिरूप है; आदित्यादिरूप प्रजापति ही दिनसे लक्षित होता है। जिस प्रकार वृक्षको लक्ष्य बनाकर बिजली चमकती है उसी प्रकार इस अश्वको लक्षित कराकर दिनरूप सुवर्णमय महिमासंज्ञक ग्रह प्रकट हुआ है। उस ग्रहका 'पूर्वे समुद्रे' अर्थात् पूर्वसमुद्र योनि है। योनि अर्थात् प्राप्तिस्थान है। यहाँ [ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार ] प्रथमा विभक्तिका सप्तमीके रूपमें व्यत्यय हुआ है, अतः 'पूर्वे समुद्रे' का 'पूर्वः समुद्रः' अर्थ किया गया है। | | तथा रात्री राजतो ग्रहो वर्णसामान्याज्जघन्यत्वसामान्याद्वा। एनमश्वं पश्चात्पृष्ठतो महिमान्वजायत, तस्यापरे समुद्रे योनिः। महिमा महत्त्वात्। अश्वस्य हि | इसी प्रकार वर्णमें और निकृष्टतामें समानता होनेके कारण रात्रि—राजत (चाँदीका) ग्रह है। यह इस अश्वके पीछेकी ओर यानी पृष्ठभागमें महिमारूपसे प्रकट हुई। उसका पश्चिमसमुद्र उद्गमस्थान है। महत्ताके कारण ये 'महिमा' कहलाते हैं। यह अश्वकी विभूति ही है कि |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
| विभूतिरेषा यत्सौवर्णो राजतश्च ग्रहावुभयतः स्थाप्येते। तावेतौ वै महिमानौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वमभितः सम्बभूवतुरुक्तलक्षणावेव सम्भूतौ। इत्थमसावश्वो महत्त्वयुक्त इति पुनर्वचनं स्तुत्यर्थम्। | इसके आगे-पीछे सुवर्ण और चाँदीके ग्रह (पात्रविशेष) रखे जाते हैं। वे ये महिमा अर्थात् ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाले महिमासंज्ञक ग्रह ही अश्वके आगे-पीछे प्रकट हुए हैं। इस प्रकार यह अश्व महत्त्वयुक्त है—यह पुनरुक्ति अश्वकी स्तुतिके लिये है। |
| तथा च हयो भूत्वेत्यादि स्तुत्यर्थमेव। हयो हिनोतेर्गतिकर्मणो विशिष्टगतिरित्यर्थः। जातिविशेषो वा। देवानवहद् देवत्वमगमयत्प्रजापतित्वात्। देवानां वा वोढाभवत्। | तथा 'हयो भूत्वा' इत्यादि वाक्य भी अश्वकी स्तुतिके ही लिये है। गतिकर्मक 'हि' धातुका रूप 'हय' है, अतः 'हय' का अर्थ विशिष्टगतिमान् है। अथवा 'हय' अश्वकी जातिविशेष है। हय होकर उसने देवताओंको वहन किया अर्थात् प्रजापति होनेके कारण उन्हें देवत्वको प्राप्त कराया; अथवा वह देवताओंका वाहन हुआ। |
| ननु निन्दैव वाहनत्वम्। | शङ्का—किंतु वाहन होना तो निन्दा ही है [ स्तुतिके लिये कैसे कहा ? ]। |
| नैष दोषः, वाहनत्वं स्वाभाविकमश्वस्य। स्वाभाविकत्वादुच्छ्रायप्राप्तिर्देवादिसम्बन्धोऽश्वस्येति स्तुतिरेवैषा। तथा वाज्यादयो जातिविशेषाः। वाजी भूत्वा | समाधान—यह कोई दोषकी बात नहीं है, अश्वका वाहन होना तो स्वाभाविक ही है। स्वाभाविक होनेके कारण देवादिसे सम्बन्ध होना तो उच्च पदकी प्राप्ति ही है, अतः यह उसकी स्तुति ही है। इसी प्रकार वाजी आदि भी जाति विशेष हैं। |
४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| गन्धर्वानवहदित्यनुषङ्गः । तथार्वा भूत्वासुरान् । अश्वो भूत्वा मनुष्यान्। समुद्र एवेति परमात्मा बन्धुर्बन्धनं बध्यतेऽस्मिन्निति । समुद्रो योनिः कारणमुत्पत्तिं प्रति। एवमसौ शुद्धयोनिः शुद्धस्थितिरिति स्तूयते । “अप्सु योनिर्व्वा अश्वः” इति श्रुतेः प्रसिद्ध एव वा समुद्रो योनिः ॥ २ ॥ | अतः इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—वाजी होकर उसने गन्धर्वोंका वहन किया तथा अर्वा होकर असुरोंका और अश्व होकर मनुष्योंका वहन किया । समुद्र अर्थात् परमात्मा ही इसका बन्धु–बन्धन है, क्योंकि इसीमें यह बाँधा जाता है तथा समुद्र ही योनि यानी इसकी उत्पत्तिमें कारण है। इस प्रकार यह शुद्ध योनि और शुद्ध स्थितिवाला है—ऐसा कहकर इसकी स्तुति की जाती है। अथवा “अश्व जलमें योनिवाला है” इस श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध समुद्र ही इसकी योनि है ॥ २ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथममश्वमेधब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
अश्वमेधसम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति
| अथाग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्योत्पत्तिरुच्यते । तद्विषयदर्शनविवक्षयैवोत्पत्तिः स्तुत्यर्था । | अब आगे अश्वमेधमें उपयोगी अग्निकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है। तद्विषयक दृष्टि कहनेकी इच्छासे ही जो उसकी उत्पत्ति कही जाती है वह स्तुतिके लिये है। |
नैवेह किञ्चनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत् ।
अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥
पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त होऊँ' ऐसा मन किया। उसने अर्चन (पूजन) करते हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ है, अतः यही अर्कका¹ अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् । इह संसारमण्डले किञ्चन किञ्चिदपि नामरूपप्रविभक्तविशेषं नैवासीद् न बभूव अग्रे प्रागुत्पत्तेर्मनआदेः । | पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। अर्थात् मन आदिकी उत्पत्तिसे पूर्व यहाँ-इस संसारमण्डलमें किञ्चनमात्र—कुछ भी—नाम-रूपमें विभक्त हुआ कोई भी पदार्थविशेष नहीं था। |
| किं शून्यमेव स्यात् “नैवेह किञ्चन” इति श्रुतेः । <br><br> (सत्कारणवाद-साधनम्) <br><br> न कार्यं कारणं वासीत् । उत्पत्तेश्च, उत्पद्यते हि घटः, अतः प्रागुत्पत्तेर्घटस्य नास्तित्वम् । | शून्यवादी—तो क्या उस समय शून्य ही था, क्योंकि "यहाँ कुछ भी नहीं था" ऐसी श्रुति है। अतः कार्य या कारण कुछ भी नहीं था। इसके सिवा उत्पत्ति होनेसे भी यही सिद्ध होता है। घट उत्पन्न होता है, इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व घटकी सत्ता नहीं होती। |
| ननु कारणस्य न नास्तित्वं मृत्पिण्डादिदर्शनात् । यन्नोप- | सिद्धान्ती—किंतु कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि [घटोत्पत्तिसे पूर्व भी] मृत्पिण्डादि देखे |
१. 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिसके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उसका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।
बृ० उ० ४—
५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| लभ्यते तस्यैव नास्तिता। अस्तु कार्यस्य न तु कारणस्य, उपलभ्यमानत्वात्। | जाते हैं। जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती उसीका अभाव होता है। अतः कार्यका अभाव भले ही रहे कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि वह तो उपलब्ध होता ही है। |
| न; प्रागुत्पत्तेः सर्वानुपलम्भात्। अनुपलब्धिश्चेदभावहेतुः सर्वस्य जगतः प्रागुत्पत्तेर्न कारणं कार्यं वोपलभ्यते। तस्मात्सर्वस्यैवाभावोऽस्तु। | शून्यवादी-नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व तो सभीकी उपलब्धि नहीं होती। यदि अनुपलब्धि ही अभावका कारण है तो उत्पत्तिसे पूर्व तो सारे जगत्का कारण या कार्य उपलब्ध नहीं होता। अतः सभीका अभाव होना चाहिये। |
| न; “मृत्युनैवेदमावृतमासीत्” इति श्रुतेः। यदि हि किञ्चिदपि नासीद् येनाव्रियते यच्चाव्रियते तदा नावक्ष्यत् ‘मृत्युनैवेदमावृतम्’ इति। न हि भवति गगनकुसुमच्छन्नो बन्ध्यापुत्र इति। ब्रवीति च ‘मृत्युनैवेदमावृतमासीत्’ इति, तस्माद्येनावृतं कारणेन, यच्चावृतं कार्यं प्रागुत्पत्तेस्तदुभयमासीत्, श्रुतेः प्रामाण्यादनुमेयत्वाच्च। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ "यह मृत्युसे ही आवृत था" ऐसी श्रुति है। यदि उस समय कुछ भी न होता तो जिससे आवृत होता है और जो आवृत होता है उसके विषयमें श्रुति यह न कहती कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था।' वन्ध्यापुत्र आकाश-कुसुमसे आच्छादित होता हो—ऐसा कभी नहीं होता। किंतु श्रुति ऐसा कह रही है कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था', अतः जिस कारणसे आवृत था और जो कार्य आवृत था, उत्पत्तिसे पूर्व वे दोनों ही थे, क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है और ऐसा अनुमान भी किया जा सकता है। |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
| अनुमीयते च प्रागुत्पत्तेः कार्यकारणयोरस्तित्वम्; कार्यस्य हि सतो जायमानस्य कारणे सत्युत्पत्तिदर्शनात्, असति चादर्शनात्। जगतोऽपि प्रागुत्पत्तेः कारणास्तित्वमनुमीयते घटादिकारणास्तित्ववत् । | उत्पत्तिसे पूर्व कार्य और कारणके अस्तित्वका अनुमान भी किया जा सकता है; क्योंकि उत्पन्न होनेवाले सत्य कार्यकी ही सत्य कारणमें उत्पत्ति देखी जाती है; असत्यमें नहीं देखी जाती। घटादिके कारणकी सत्ताके समान उत्पत्तिसे पूर्व जगत्के कारणकी सत्ताका भी अनुमान किया जा सकता है।^१ |
| घटादिकारणस्याप्यसत्त्वमेव, अनुपमृद्य मृत्पिण्डादिकं घटायनुत्पत्तेरिति चेत् ? | शून्यवादी—किंतु घटादिके कारणकी भी तो सत्ता नहीं है, क्योंकि मृत्पिण्डादिको नष्ट किये बिना घटादिकी उत्पत्ति ही नहीं होती—यदि ऐसा कहें तो ?^२ |
| न; मृदादेः कारणत्वात् । मृत्सुवर्णादि हि तत्र कारणं घटरुचकादेः, न पिण्डाकारविशेषः, तदभावे भावात् । असत्यपि पिण्डाकारविशेषे मृत्सुवर्णादिकारणद्रव्यमात्रादेव घट- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि कारण तो मृत्तिकादि हैं। घट और रुचक (कण्ठभूषण) आदिके कारण तो मृत्तिका और सुवर्णादि हैं, उनका पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है, क्योंकि उसका अभाव होनेपर भी उन (मृत्तिकादि) की सत्ता तो रहती ही है। पिण्डाकारविशेषके न रहनेपर भी मृत्तिका और सुवर्णादि कारण-द्रव्यमात्रसे ही |
१. इससे कारणकी सत्ताका अनुमान किया जाता है। अनुमानका प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'विमतं सत्पूर्वं कार्यत्वाद् घटवत्' विवादका विषयभूत जगत् सत् (कारण) पूर्वक है, क्योंकि वह कार्य है, जैसे घट।
२. अतः यह (घटरूप) दृष्टान्त साध्यविकल होनेके कारण उक्त अनुमान प्रामाणिक नहीं है।