बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥१०॥
'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीनका' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है; अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य-] पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है। इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥१०॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। कति स्तोत्रियाः स्तोष्यतीत्ययमुद्गाता। स्तोत्रिया नाम ऋक्सामसमुदायः कतिपयानामृचाम्। स्तोत्रिया वा शस्या वा याः | 'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [अभिमुख करनेके लिये] कहा, 'यह उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' 'स्तोत्रिया' यह कुछ ऋचाओंके ऋक्सामसमुदायका नाम है। स्तोत्रिया हो अथवा शस्या, जो कुछ |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| काश्चन ऋचः, ताः सर्वास्तिस्र एवेत्याह । ताश्च व्याख्याताः— पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीयेति । | भी ऋचाएँ हैं, वे सब तीन ही प्रकारकी हैं—यही बात अब बतायी जाती है। उन्हींकी पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या—ऐसा कहकर व्याख्या की गयी है। |
| तत्र पूर्वमुक्तम्—यत्किञ्चेदं प्राणभृत् सर्वं जयतीति तत् केन सामान्येन ? इत्युच्यते—कतमास्तास्तिस्र ऋचो या अध्यात्मं भवन्तीति । प्राण एव पुरोनुवाक्या, पशब्दसामान्यात् । अपानो याज्या, आनन्तर्यात् । अपानेन हि प्रत्तं हविर्देवता ग्रसन्ति, यागश्च प्रदानम् । | यहाँ पहले (मन्त्र ७ में) जो यह कहा गया है कि यह जो कुछ प्राणिवर्ग है, उस सभीको जीत लेता है, सो किस समानताके कारण है—यह कहते हैं अर्थात् 'इनमें जो अध्यात्म (देहान्तर्वर्ती) हैं, वे तीन ऋचाएँ कौन-सी हैं'—इस प्रश्नद्वारा यह बतलाया जाता है—प्राण ही पुरोनुवाक्या है; क्योंकि 'प' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है। अपान याज्या है क्योंकि आनन्तर्यमें दोनोंकी समानता है।² इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसे ही ग्रहण करते हैं; और प्रदान ही याग है [अतः अपान याज्या ऋचाएँ हैं]। |
| व्यानः शस्या—"अप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति" (छा० उ० १ । ३ । ४) । इति श्रुत्यन्तरात् । | व्यान शस्या है, जैसा कि "प्राण अपान-व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है। |
१. प्रगीत ऋचाओंको स्तोत्र कहते हैं और अप्रगीत ऋचाओंको शस्त्र। इनमें स्तोत्र ही स्तोत्रिया ऋचाएँ हैं और शस्त्र शस्या हैं।
२. कारण जैसे अपान प्राणके अनन्तर है, उसी प्रकार याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं।
६४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| किं ताभिर्जयतीति व्याख्यातम् । तत्र विशेषसम्बन्धसामान्यमनुक्तमिहोच्यते, सर्वमन्यद् व्याख्यातम् । लोकसम्बन्धसामान्येन पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयति, अन्तरिक्षलोकं याज्यया, मध्यमत्वसामान्यात् । द्युलोकं शस्ययोर्ध्वत्वसामान्यात् । ततो ह तस्मादात्मनः प्रश्ननिर्णयादसौ होता अश्वल उपरराम नायमस्मद्गोचर इति ॥ १० ॥ | ‘किं ताभिर्जयति’ (उनसे किसपर विजय प्राप्त करता है)—इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है। वहाँ जो इनका विशेषसम्बन्धसामान्य नहीं बतलाया गया, वह यहाँ बतलाया जाता है; और सब (संख्यासामान्यादि) की व्याख्या तो कर दी गयी है। लोकसम्बन्धी सामान्य होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही विजय प्राप्त करता है। मध्यमत्वमें समानता होनेके कारण याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर जय प्राप्त करता है तथा ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेसे शस्यासे द्युलोकपर जय प्राप्त करता है। तब उस अपने प्रश्नके निर्णयसे होता अश्वल यह समझकर कि ‘यह याज्ञवल्क्य हमारे काबूका नहीं है’ चुप हो गया ॥ १० ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये प्रथममश्वलब्राह्मणम् ॥ १ ॥
</div>१. लोकोंमें पृथिवीलोक प्रथम है और ऋचाओंमें पुरोनुवाक्या ऋचाएँ प्रथम हैं। इस प्रकार 'प्रथमत्व' रूप सम्बन्धकी दोनोंमें समानता होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकको ही जीतता है।
द्वितीय ब्राह्मण
द्वितीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-आर्तभाग-संवाद
| उपक्रमः आख्यायिकासम्बन्धः प्रसिद्ध एव। मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता काललक्षणात् कर्मलक्षणाच्च। कः पुनरसौ मृत्युर्यस्मादतिमुक्तिर्व्याख्याता ? स च स्वाभाविकज्ञानासङ्गास्पदोऽध्यात्माधिभूतविषयपरिच्छिन्नो ग्रहातिग्रहलक्षणो मृत्युः। तस्मात् परिच्छिन्नरूपान्मृत्योरतिमुक्तस्य रूपाण्यग्न्यादित्यादीन्युद्गीथप्रकरणे व्याख्यातानि। अश्वलप्रश्ने च तद्गतो विशेषः कश्चित्। तच्चैतत् कर्मणां ज्ञानसहितानां फलम्। <br><br> एतस्मात् साध्यसाधनरूपात् संसारान्मोक्षः कर्तव्य इत्यतो बन्धनरूपस्य मृत्योः स्वरूपमुच्यते। बद्धस्य हि मोक्षः कर्तव्यः। यदप्यतिमुक्तस्य स्वरूपमुक्तं तत्रापि ग्रहातिग्रहाभ्यामविनिर्मुक्त एव | आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध ही है। कालरूप और कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या की गयी। किंतु जिससे अतिमुक्तिकी व्याख्या की गयी है, वह मृत्यु क्या है? वह मृत्यु स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिका स्थान, अध्यात्म और अधिभूत विषयसे परिच्छिन्न ग्रह-अतिग्रहरूप है। उस परिच्छिन्नरूप मृत्युसे अतिमुक्त हुए पुरुषके अग्नि-आदित्यादि [अपरिच्छिन्न] रूपोंकी व्याख्या उद्गीथ-प्रकरणमें की गयी है। अश्वलके प्रश्नमें उसीके अन्तर्वर्ती किसी विशेष¹ का वर्णन है। वह यह विशेष ज्ञानसहित² कर्मोंका फल है। <br><br> इस साध्यसाधनरूप संसारसे मोक्ष करना है, इसलिये यहाँसे बन्धनरूप मृत्युका स्वरूप बतलाया जाता है; क्योंकि बद्धको ही मुक्त करना होता है। तथा जो अतिमुक्तका स्वरूप बतलाया गया है, वहाँ भी वह मृत्युरूप ग्रह और अतिग्रहसे |
१. अर्थात् अग्न्यादिमें ही दृष्टिभेदका।
२. देवताज्ञान अर्थात् उपासनासहित।
६४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| मृत्यूरुपभ्याम् । तथा चोक्तं "अशनाया हि मृत्युः" (बृ० उ० १ । २ । १) "एष एव मृत्युः" इति । आदित्यस्थं पुरुषमङ्गीकृत्याह "एको मृत्युर्बह्वेवा" इति च । <br><br> तदात्मभावापन्नो हि मृत्योरप्रिमतिमुच्यत इत्युच्यते । न च तत्र ग्रहातिग्रहौ मृत्युरूपौ न स्तः । "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यः" ( बृ० उ० १ । ५ । १२) "मनश्च ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतः" (३ । २ । ७) इति, वक्ष्यति "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण" (३ । २ । २) इति, "वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण" (३।२।३) इति च । तथा ऽन्नविभागे व्याख्यातमस्माभिः । सुविचारितं चैतद् यदेव प्रवृत्तिकारणं तदेव निवृत्तिकारणं न भवतीति । | अतिमुक्त (विशेषरूपसे मुक्त) नहीं है । इस विषयमें कहा भी है— "भूख ही मृत्यु है" "यही मृत्यु है" इत्यादि । आदित्यान्तर्गत पुरुषको अङ्गीकार करके श्रुति कहती है "एक ही मृत्यु बहुत प्रकारकी है।" <br><br> अग्न्यादिके तादात्म्यको प्राप्त हुआ पुरुष मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा कहा जाता है; किंतु वहाँ मृत्युके रूप ग्रह और अतिग्रह न हों—ऐसी बात नहीं है । "तथा इस मनका द्युलोक शरीर है और ज्योतीरूप वह आदित्य है" "मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा श्रुति कहेगी भी, तथा "प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है" और "वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा भी श्रुति कहेगी । तीन अन्नोंका विभाग करते समय हमने इनकी ऐसी ही व्याख्या भी की है । तथा इस बातका भी अच्छी तरह विचार किया जा चुका है कि जो प्रवृत्तिका कारण होता है, वही निवृत्तिका भी कारण नहीं होता ।² |
१. उपनिषद्में 'मनो वै' पाठ है ।
२. अर्थात् कर्म तो फलभोगका निमित्त होनेके कारण बन्धनका ही कारण है, वह मुक्तिका कारण नहीं हो सकता ।
ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९ |
|---|
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| केचित्तु सर्वमेव निवृत्तिकारणं मन्यन्ते। अतःकारणात् पूर्वस्मात् पूर्वस्मान्मृत्योर्मुच्यते उत्तरमुत्तरं प्रतिपद्यमानो व्यावृत्त्यर्थमेव प्रतिपद्यते न तु तादर्थ्यम्, इत्यत आ द्वैतक्षयात् सर्वं मृत्युः, द्वैतक्षये तु परमार्थतो मृत्योराप्तिमतिमुच्यते। अतश्च आपेक्षिकी गौणी मुक्तिरन्तराले । सर्वमेतद् एवम् अबार्हदारण्यकम् । | कोई-कोई तो सारे ही साधनोंको निवृत्तिका कारण मानते हैं। इस कारणसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट फलको प्राप्त होनेवाला कर्मठ भी पूर्व-पूर्व मृत्युसे मुक्त हो जाता है, अतः वह उस उत्कृष्ट फलको त्यागनेके लिये ही प्राप्त करता है, तद्रूप होनेके लिये नहीं। इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेतक सब मृत्यु ही है, द्वैतका क्षय होनेपर तो वह परमार्थतः मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है। इसलिये बीचमें जो मुक्ति बतलायी जाती है, वह आपेक्षिकी और गौणी ही है। इस प्रकार यह सब कल्पनाएँ बृहदारण्यकसे बाहरकी ही हैं। |
| ननु सर्वैकत्वं मोक्षः “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १ । ४ । १०) इति श्रुतेः। | पूर्व०—किंतु सबकी एकता तो मोक्ष ही है, क्योंकि “इसलिये वह सर्व हो गया” ऐसी श्रुति है। |
| बाढं भव्येतदपि, न तु “ग्रामकामो यजेत, पशुकामो यजेत” इत्यादिश्रुतीनां तादर्थ्यम् । यदि ह्यद्वैतार्थत्वमेव आसां ग्रामपशुस्वर्गाद्यर्थत्वं नास्तीति ग्रामपशु- | सिद्धान्ती—ठीक है, यह तो बृहदारण्यकका विषय है। परंतु “ग्रामकी इच्छावाला यजन करे, पशुओंकी इच्छावाला यजन करे” इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य मोक्षमें नहीं हो सकता। यदि इनका तात्पर्य अद्वैतमें ही हो तो इनका ग्राम, पशु अथवा स्वर्गादिके लिये होना सम्भव नहीं है और इनसे |
६५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| स्वर्गादयो न गृह्येरन्, गृह्यन्ते तु कर्मफलवैचित्र्यविशेषाः । यदि च वैदिकानां कर्मणां तादर्थ्यमेव, संसार एव नाभाविष्यत् । | ग्राम, पशु और स्वर्गादिका ग्रहण भी नहीं होना चाहिये, परंतु कर्मफलवैचित्र्यरूप विशेषोंका ग्रहण होता ही है। यदि वैदिक कर्म मोक्षार्थ ही होते तो संसार ही नहीं रह सकता था ।^१ | | अथ तादर्थ्येऽपि अनुनिष्पादितपदार्थस्वभावः संसार इति चेत् । यथा च रूपदर्शनार्थ आलोके सर्वोऽपि तत्रस्थः प्रकाश्यत एव । | पूर्व०—यद्यपि कर्मश्रुति मोक्षार्थक है, तो भी उसके पीछे निष्पन्न हुए पदार्थका स्वभाव ही संसार है, जिस प्रकार कि प्रकाश रूपदर्शनके लिये होनेपर भी उससे वहाँ रखे हुए सभी पदार्थ प्रकाशित होते ही हैं। [ अतः कर्मके मोक्षार्थक होनेपर संसार ही नहीं रह सकता था, ऐसी शङ्का नहीं उठानी चाहिये ] । | | न; प्रमाणानुपपत्तेः। अद्वैतार्थत्वे वैदिकानां कर्मणां विद्यासहितानाम् अन्यस्यानुनिष्पादितत्वे प्रमाणानुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानमत एव च नागमः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। यदि ज्ञानसहित वैदिक कर्मोंको मोक्षार्थक माना जाय तो उनसे किसी अन्य पदार्थके अनुनिष्पन्न होनेमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। इसमें न प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है न अनुमान और इसीसे आगम प्रमाण भी नहीं हो सकता । |
१. संसारका मूल तो कर्मफल ही है। उसीके भोगके लिये उत्तमाधम योनियोंकी प्राप्ति होती है। यदि कर्मोंका फल मोक्ष ही माना जाय तो फिर संसारका कोई कारण ही नहीं रहता ।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
| उभयम् एकेन वाक्येन प्रदर्श्यत इति चेत् कुल्याप्रणयनालोकादिवत् । तन्नैवम्; वाक्यधर्मानुपपत्तेः। न च एकवाक्यगतस्यार्थस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिसाधनत्वमवगन्तुं शक्यते । कुल्याप्रणयनालोकाद्यार्थस्य प्रत्यक्षत्वाददोषः ।<br><br>यदप्युच्यते मन्त्रा अस्मिन्नर्थे दृष्टा इति । अयमेव तु तावदर्थः प्रमाणागम्यः। मन्त्राः पुनः किम् अस्मिन्नर्थ आहोस्विदन्यस्मिन्नर्थ इति मृग्यमेतत् । तस्माद् ग्रहातिग्रहलक्षणो मृत्युर्बन्धः, तस्मा- | पूर्वं०—यदि ऐसा मानें कि नाली निकालने और प्रकाश करने आदिके समान एक ही वाक्यसे [ कर्मफल और मोक्ष ] दोनोंका प्रदर्शन हो जाता है तो?¹<br><br>सिद्धान्ती—यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि ऐसा होना वाक्यका धर्म नहीं हो सकता। एक ही वाक्यका अर्थ प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंका साधन हो—यह नहीं जाना जा सकता। नाली निकालने और प्रकाश करने आदिमें तो यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है, इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है।<br><br>और ऐसा जो कहा जाता है कि इस अर्थमें [ 'विद्यां चाविद्यां च' इत्यादि ] मन्त्र देखे गये हैं, सो पहले तो यह विषय ही किसी भी प्रमाणसे अवगत होनेवाला नहीं है। मन्त्र भी क्या इसी अर्थमें हैं? अथवा किसी अन्य अर्थमें हैं?—यह बात भी विचारणीय ही है।<br><br>अतः ग्रहातिग्रहरूप मृत्यु बन्धन है, उससे मुक्त होनेका उपाय |
१. नाली खेती सींचनेके लिये निकाली जाती है, परंतु वह आचमनादिमें भी उपयोगी होती है; प्रकाश रूपप्रकाशनके लिये किया जाता है, परंतु वह गमनादि क्रियाओंमें भी सहायक होता है, इसी प्रकार एक ही कर्मप्रतिपादक वाक्य कर्मफल और मोक्ष दोनोंकी प्राप्तिका कारण हो सकता है—यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है।
६५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| न्मोक्षो वक्तव्य इत्यत इदमारभ्यते। <br><br> न च जानीमो विषयसन्धात्रि- <br> वान्तरालेऽवस्थानमर्धजरतीयं कौ- <br> शलम् । यत्तु मृत्योरतिमुच्यत <br> इत्युक्त्वा ग्रहातिग्रहावुच्येते, तच्च- <br> र्थसम्बन्धात् । सर्वोऽयं साध्य- <br> साधनलक्षणो बन्धः, ग्रहातिग्रहा- <br> विनिर्मोक्षात् । निगडे हि निर्ज्ञाते <br> निगडितस्य मोक्षाय यत्नः कर्तव्यो <br> भवति; तस्मात्तदर्थ्येनारम्भः । | बतलाना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। जैसे जाग्रत्-स्वप्न आदि दो विषयोंकी सन्धिमें स्थित होना असम्भव है, उसी प्रकार वैदिक कर्मोंसे न बन्धन होता है न मोक्ष, अपितु बीचकी अवस्था प्राप्त होती है-ऐसी कल्पना भी असङ्गत है, अतः हम इस प्रकार अर्धजरतीय व्याख्या करनेकी युक्ति नहीं जानते।¹ यहाँ जो मृत्युसे अतिमुक्त हो जाता है-ऐसा कहकर ग्रह और अतिग्रहका वर्णन किया जाता है, वह तो अर्थके सम्बन्धसे है, यह सब साध्य-साधनरूप बन्धन है; क्योंकि उसके द्वारा ग्रह और अतिग्रहसे उसकी मुक्ति नहीं होती। बन्धनका ज्ञान होनेपर ही उसमें बँधे हुए पुरुषका उससे मुक्त होनेके लिये यत्न करना आवश्यक होता है; अतः मोक्षके लिये ही इसका आरम्भ हुआ है। |
ग्रह और अतिग्रहकी संख्या एवं स्वरूप
अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञ- वल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥
१. जैसे आधी गाय बूढ़ी हो जाय और आधी जवान रहकर बच्चा देती रहे। यह अर्धजरतीय कल्पना असम्भव है, उसी प्रकार कर्मकाण्ड साक्षात् मोक्ष या बन्धनका नहीं, दोनोंके बीचकी स्थितिका कारण है—ऐसा अर्थ भी असंगत ही है।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३
फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा; वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं।' [ आर्तभाग- ] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन-से हैं?' ॥ १ ॥
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| **अथ हैनम्-**हशब्द ऐतिह्यार्थः ! अथानन्तरमश्वले उपरते प्रकृतं याज्ञवल्क्यं जरत्कारुगोत्रो जारत्कारवः-ऋतभागस्यापत्यमार्तभागः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाचेत्यभिमुखीकरणाय । पूर्ववत् प्रश्नः—कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः । | 'अथ हैनम्' इसमें 'ह' शब्द इतिहासको सूचित करनेके लिये है। अथ-अनन्तर यानी अश्वलके चुप हो जानेपर उस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो जरत्कारुगोत्रवाला था उस जारत्कारव आर्तभाग—ऋतभागके पुत्रने पूछा। वह अपने अभिमुख करनेके लिये बोला—'हे याज्ञवल्क्य !'। 'कितने ग्रह हैं और कितने अतिग्रह हैं। यह प्रश्न पहलेहीके समान है। इसमें 'इति' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। |
| तत्र निर्ज्ञातेषु वा ग्रहातिग्रहेषु प्रश्नः स्यादनिर्ज्ञातेषु वा ? यदि तावद्ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाताः, तदा तद्गतस्यापि गुणस्य सङ्ख्याया निर्ज्ञातत्वात् कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति सङ्ख्याविषयः प्रश्नो नोपपद्यते । अथानिर्ज्ञातास्तदा | किंतु यह प्रश्न सम्यक् प्रकारसे जाने हुए ग्रह और अतिग्रहोंके विषयमें है अथवा न जाने हुओंके विषयमें ? यदि ग्रह और अतिग्रह सम्यक् प्रकारसे ज्ञात हों तो उनमें रहनेवाला गुण जो संख्या है, वह भी ज्ञात ही रहेगी; उस अवस्थामें 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं, ऐसा संख्याविषयक प्रश्न उपपन्न नहीं होगा। और यदि उन्हें अज्ञात माना |
६५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| सङ्ख्येयविषयप्रश्न इति के ग्रहाः केऽतिग्रहा इति प्रष्टव्यं न तु कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति प्रश्नः। | जाय तो संख्येयविषयक प्रश्न होगा। ऐसी दशामें 'ग्रह कौन हैं और अतिग्रह कौन हैं' इस प्रकार प्रश्न करना चाहिये। 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं।' ऐसा प्रश्न नहीं। | | अपि च निर्ज्ञातसामान्यकेषु विशेषविज्ञानाय प्रश्नो भवति— यथा कतमेऽत्र कठाः कतमेऽत्र कालापा इति। न चात्र ग्रहातिग्रहा नाम पदार्थाः केचन लोके प्रसिद्धाः, येन विशेषार्थः प्रश्नः स्यात्। | इसके सिवा, जिनके सामान्य स्वरूपका ज्ञान होता है, उन्हींके विशेषरूप जाननेके लिये ऐसा प्रश्न हुआ करता है, जिस प्रकार [ ये ब्राह्मण कठशाखा और कलापशाखाके हैं-ऐसा सामान्य ज्ञान होनेपर ] यह प्रश्न हो सकता है कि 'इनमें कठशाखाके कौन-से हैं और कलापशाखाके कौन-से हैं ?' किंतु यहाँ ग्रह और अतिग्रह नामवाले कोई पदार्थ लोकमें प्रसिद्ध नहीं हैं, जिससे कि उनके विशेष ज्ञानके लिये प्रश्न किया जाय। | | ननु च 'अतिमुच्यते' इत्युक्तम्, ग्रहगृहीतस्य हि मोक्षः; 'स मुक्तिः सातिमुक्तिः' इति हि द्विरुक्तम्, तस्मात्प्राप्ता ग्रहा अतिग्रहाश्च। | किंतु पहले 'अतिमुच्यते'—अतिमुक्त होता है—ऐसा कहा गया है और मुक्ति ग्रहगृहीतकी ही होती है; और वहाँ 'वह मुक्ति है, वह अतिमुक्ति है' इस प्रकार दो बार कहा है, इससे ग्रह और अतिग्रह दोनोंहीकी प्राप्ति होती है। | | ननु तत्रापि चत्वारो ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाता वाक्चक्षुः | शङ्का—किंतु वहाँ तो वाक्, चक्षु, प्राण और मन—इन चार ग्रह और अतिग्रहोंका ज्ञान है ही; अतः |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५
| प्राणमनांसि, तत्र कतीति प्रश्नो नोपपद्यते निर्ज्ञातत्वात् । <br><br> न; अनवधारणार्थत्वात्; न हि चतुष्ट्वं तत्र विवक्षितम्, इह तु ग्रहातिग्रहदर्शनेऽष्टत्वगुणविवक्षया कतीति प्रश्न उपपद्यत एव । तस्मात् ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इति मुक्त्यतिमुक्ती द्विरुक्ते । ग्रहातिग्रहा अपि सिद्धाः, अतः कतिसङ्ख्याका ग्रहाः कति वा अतिग्रहा इति पृच्छति । इतर आह—अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति । ये तेऽष्टौ ग्रहा अभिहिताः कतमे ते नियमेन ग्रहीतव्या इति ॥ १ ॥ | सम्यक् प्रकारसे ज्ञान होनेके कारण उनके विषयमें 'वे कितने हैं' ऐसा प्रश्न होना उपपन्न नहीं है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वहाँ ऐसा निश्चय नहीं किया गया अर्थात् वहाँ यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि वे चार ही हैं; यहाँ तो ग्रह-अतिग्रह दर्शनमें उनका आठ होना—यह गुण बतलाना अभीष्ट है, इसलिये वे कितने हैं? ऐसा प्रश्न बन ही सकता है। पूर्व ब्राह्मणवाक्यसे ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इस प्रकार मुक्ति और अतिमुक्ति दो बतलाये गये हैं, इसलिये ग्रह और अतिग्रह भी सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे आर्तभाग यह प्रश्न करता है कि ग्रह कितनी संख्यावाले हैं और अतिग्रह कितने हैं। इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं। तब आर्तभाग पूछता है—वे जो आठ ग्रह बतलाये गये, सो नियमसे किन्हें ग्रहण करना चाहिये ॥ १ ॥ |
घ्राणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्वनिरूपण
| तत्राह— | इसपर याज्ञवल्क्य कहता है – |
|---|
प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ २ ॥
६५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्राहसे गृहीत है, क्योंकि प्राण अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है ॥ २ ॥
| प्राणो वै ग्रहः— प्राण इति घ्राणमुच्यते, प्रकरणात् । वायुसहितः सः । अपानेनेति गन्धेनेत्येतत् । अपानसचिवत्वादपानो गन्ध उच्यते । अपानोपहृतं हि गन्धं घ्राणेन सर्वो लोको जिघ्रति । तदेतदुच्यते—अपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रतीति ।२। | प्राण ही ग्रह है—'प्राण' शब्दसे यहाँ घ्राणेन्द्रिय कही गयी है, क्योंकि उसीका प्रकरण है। वह वायुके सहित है। अपानसे अर्थात् गन्धसे। अपान गन्धका साथी है, इसलिये अपानको गन्ध कहा गया है, क्योंकि सम्पूर्ण लोक अपानद्वारा लाये गये गन्धको ही घ्राणेन्द्रियद्वारा सूँघता है। इसीसे यह कहा जाता है कि प्राणी अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है ॥ २ ॥ |
वाग् वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥ ३ ॥
जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥
चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्राहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥
श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञ्शृणोति ॥ ६ ॥
मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥
हस्तौ वै ग्रहः स कर्मणातिग्राहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥
त्वग् वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्राहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्से ही नामोंका उच्चारण करता है॥ ३॥ जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेषरूपसे जानता है ॥ ४ ॥ चक्षु ही ग्रह है, वह रूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है ॥ ५ ॥ श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है ॥ ६ ॥ मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है ॥ ७ ॥ हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं; क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है ॥ ८ ॥ त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोंको जानता है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ ६ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वाग् वै ग्रहः—वाचा ह्यध्यात्मपरिच्छिन्नया आसङ्गविषयास्पद-या असत्यानृतासभ्यबीभत्सादि-वचनेषु व्यापृतया गृहीतो लोकोऽपहृतः, तेन वाग् ग्रहः। स नाम्नातिग्राहेण गृहीतः—स वागाख्यो ग्रहः; नाम्ना वक्तव्येन विषयेणातिग्रहेण, अतिग्राहेणेति दैर्घ्यं छान्दसं नाम। वक्तव्यार्था हि वाक्; तेन वक्तव्येनार्थेन तादर्थ्येन प्रयुक्ता वाक् तेन वशीकृता; तेन तत्कार्यमकृत्वा नैव तस्या मोक्षः। अतो | वाक् ही ग्रह है; क्योंकि असत्य, अनृत, असभ्य एवं बीभत्सादि वचनोंमें प्रवृत्ता आसक्तिकी विषयभूता अध्यात्मपरिच्छिन्ना वाक्से ही गृहीत होकर लोक भूला हुआ है, इसलिये वाक् ग्रह है। वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है—वह वाक्संज्ञक ग्रह नाम अर्थात् वक्तव्य विषयरूप अतिग्रहसे गृहीत है। ‘अतिग्रहेण' के स्थानमें ‘अतिग्राहेण' ऐसा दीर्घ प्रयोग छान्दस (वैदिकप्रक्रियाके अनुसार) है। वाक् वक्तव्य विषयके ही लिये होती है; उस वक्तव्य अर्थसे उसीके लिये प्रयुक्त होनेवाली वाक् उसीके वशीभूत है; अतः उस कार्यको किये बिना उसकी मुक्ति |
बृ० उ० ४२-
६५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| नाम्नातिग्राहेण गृहीता वागित्युच्यते। वक्तव्यासङ्गेन हि प्रवृत्ता सर्वानर्थैर्युज्यते। समानमन्यत्। इत्येते त्वक्पर्यन्ता अष्टौ ग्रहाः स्पर्शपर्यन्ताश्चैतेऽष्टावतिग्रहा इति ॥ ३-९ ॥ | नहीं है। इसीसे यह कहा जाता है कि वाक् नामरूप अतिग्राहसे गृहीत है; क्योंकि वक्तव्यकी आसक्तिसे प्रवृत्त होनेपर वह समस्त अनर्थोंसे युक्त होती है। शेष मन्त्रोंका अर्थ इसीके समान है। इस प्रकार ये त्वक्पर्यन्त आठ ग्रह हैं और स्पर्शपर्यन्त आठ अतिग्रह हैं ॥ ३-६ ॥ |
सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है ?
| उपसंहृतेषु ग्रहातिग्रहेषु आह पुनः— | ग्रह और अतिग्रहोंका उपसंहार हो जानेपर आर्तभाग फिर कहता है— |
|---|
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है; सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है।' [ इसपर याज्ञवल्क्य कहता है— ] 'अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके ज्ञानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है' ॥ १० ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच, यदिदं सर्वं मृत्योरन्नम्—यदिदं व्याकृतं सर्वं मृत्योरन्नम्, सर्वं जायते विपद्यते च ग्रहातिग्रहलक्षणेन मृत्युना ग्रस्तम्—का स्वित् का नु | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'वह जो कुछ है, सब मृत्युका खाद्य है—यह जितना व्याकृत जगत् है, सब मृत्युका खाद्य है; क्योंकि ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे ग्रस्त होकर सब उत्पन्न होता और नाशको प्राप्त होता है, अतः वह |
|---|
ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५९
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५९ |
|---|
| स्यात् सा देवता, यस्या देवताया मृत्युरपि अन्नं भवेत् "मृत्युर्यस्योपसेचनम्" (क० उ० १ । २ । २५) इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अयमभिप्रायः प्रष्टुः—यदि मृत्योर्मृत्युं वक्ष्यति, अनवस्था स्यात् । अथ न वक्ष्यति, अस्माद् ग्रहातिग्रहलक्षणान्मृत्योः मोक्षो नोपपद्यते; ग्रहातिग्रहमृत्युविनाशे हि मोक्षः स्यात्; स यदि मृत्योरपि मृत्युः स्याद् भवेद् ग्रहातिग्रहलक्षणस्य मृत्योर्विनाशः, अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्वानः पृच्छति 'का स्वित् सा देवता' इति ।<br><br>अस्ति तावन्मृत्योर्मृत्युः ।<br><br>नन्वनवस्था स्यात् तस्याप्यन्यो मृत्युरिति ।<br><br>नानवस्था; सर्वमृत्योर्मृत्युत्वन्तरानुपपत्तेः ।<br><br>कथं पुनरवगम्यतेऽस्ति मृत्योर्मृत्युुरिति ।<br><br>दृष्टत्वात्; अग्निस्तावत् सर्वस्य | देवता कौन है जिसका मृत्यु भी खाद्य है, जैसा कि "मृत्यु जिसके लिये साग है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है ।<br><br>यहाँ प्रश्नकर्ताका यह अभिप्राय है—यदि याज्ञवल्क्यने कोई मृत्युका मृत्यु बता दिया, तब तो अनवस्था-दोष होगा और यदि न बतलाया तो इस ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे छुटकारा नहीं हो सकेगा; क्योंकि मोक्ष तो ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका नाश होनेपर ही होगा, अतः यदि कोई मृत्युका भी मृत्यु होगा, तभी ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका विनाश होगा, इसलिये इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन समझकर पूछता है कि 'वह कौन देवता है ?'<br><br>सिद्धान्ती–मृत्युका मृत्यु तो है ।<br><br>पूर्व०—तब तो अनवस्था-दोष होगा; क्योंकि फिर उसका भी कोई अन्य मृत्यु हो सकता है ।<br><br>सिद्धान्ती–अनवस्था-दोष नहीं होगा; क्योंकि जो सबका मृत्यु है, उसके लिये किसी दूसरे मृत्युका होना सम्भव नहीं है ।<br><br>पूर्व०–किंतु यह कैसे जाना जाता है कि मृत्युका मृत्यु भी है ।<br><br>सिद्धान्ती–क्योंकि ऐसा देखा गया है; सबका नाश करनेवाला |
६६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| दृष्टो मृत्युः, विनाशकत्वात्; सोऽद्भिर्भक्ष्यते सोऽग्निरपामन्नम्; गृहाण तर्ह्यस्ति मृत्योर्मृत्युरिति । तेन सर्वं ग्रहातिग्रहजातं भक्ष्यते मृत्योर्मृत्युना तस्मिन् बन्धने नाशिते मृत्युना भक्षिते संसारान्मोक्ष उपपन्नो भवति । बन्धनं हि ग्रहातिग्रहलक्षणमुक्तम्, तस्माच्च मोक्ष उपपद्यत इत्येतत् प्रसाधितम्; अतो बन्धमोक्षाय पुरुषप्रयासः सफलो भवति । अतोऽपजयति पुनर्मृत्युम् । १०। | होनेसे अग्नि मृत्युरूप देखा गया है, उसे जल भक्षण कर जाता है, अतः वह अग्नि जलका खाद्य है; अतः यह समझ लो कि मृत्युका मृत्यु भी है। उस मृत्युके मृत्युद्वारा सम्पूर्ण ग्रहातिग्रहसमुदाय भक्षण कर लिया जाता है। उस बन्धनको नष्ट कर देनेपर अर्थात् मृत्युद्वारा उसका भक्षण कर लिये जानेपर संसारसे मोक्ष होना सम्भव है। बन्धन ग्रहातिग्रहरूप कहा गया है और उससे मोक्ष होना भी सम्भव है—यह बात सिद्ध कर दी गयी है, अतः उस बन्धनकी निवृत्तिके लिये पुरुषका [ श्रवणादिरूप ] प्रयत्न सफल होता है। अतः [ ज्ञानके द्वारा ] पुरुष पुनर्मृत्युको जीत लेता है ॥ १० ॥ |
तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उद्-
स्मात् प्राणाः क्रामन्त्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञ-
वल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्या-
ध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥
'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं?' 'नहीं, नहीं,'
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६६१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६६१
ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है, अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है'॥ ११॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| परेण मृत्युना मृत्यौ भक्षिते परमात्मदर्शनेन योऽसौ मुक्तो विद्वान् सोऽयं पुरुषो यत्र यस्मिन् काले म्रियते, उत् ऊर्ध्वम् अस्माद् ब्रह्मविदो म्रियमाणात्, प्राणाः—वागादयो ग्रहाः, नामादयश्चातिग्रहा वासनारूपा अन्तःस्थाः प्रयोजकाः क्रामन्त्यूर्ध्वम् उत्क्रामन्ति, आहोस्वन्नेति ? | 'परमात्मदर्शनरूप परमृत्युके द्वारा मृत्युके भक्षण कर लिये जानेपर जो यह मुक्त हुआ विद्वान् है, वह जब-जिस समय मरता है, उस समय इस मरनेवाले ब्रह्मवेत्तासे प्राण—वागादि ग्रह और नामादि अतिग्रह, जो वासनारूप और भीतर स्थित रहकर प्रेरणा करनेवाले हैं, उत्क्रमण करते हैं या नहीं?' |
| नेति होवाच याज्ञवल्क्यो नोत्क्रामन्ति, अत्रैवास्मिन्नेव परेणात्मनाविभागं गच्छन्ति विदुषि कार्याणि करणानि च स्वयोनौ परब्रह्मसतत्त्वे समवनीयन्ते एकीभावेन समवसृज्यन्ते, प्रलीयन्ते इत्यर्थः ऊर्मय इव समुद्रे। तथा च श्रुत्यन्तरं कलाशब्दवाच्यानां प्राणानां परस्मिन्नात्मनि प्रलयं दर्शयति—"एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति" (प्र० उ० ६। ५) इति। | याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, वे उत्क्रमण नहीं करते। वे यहीं—इस परमात्मामें ही अभेदको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् इस विद्वान्में ये भूत और इन्द्रियवर्ग अपने मूलभूत परब्रह्मसत्तामें एकीभावसे विसृष्ट यानी लीन हो जाते हैं, जैसे कि समुद्रमें तरङ्गैं। इसी प्रकार "ऐसे ही इस सर्वद्रष्टाकी ये सोलह कलाएँ पुरुषायण हैं अर्थात् वे पुरुषको प्राप्त होकर अस्त हो जाती हैं" यह अन्य श्रुति भी कलाशब्दवाच्य प्राणोंका परमात्मामें लय दिखलाती है। |
| इति परेणात्मनाविभागं गच्छन्तीति दर्शितम्। न तर्हि | इस प्रकार यह दिखलाया गया कि वे प्राण परमात्माके साथ अभेदको प्राप्त हो जाते हैं। तब तो यह |
६६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| मृतः—न हि, मृतश्चायं यस्मात् स उच्छ्वयति—उच्छूनतां प्रतिपद्यते, आध्मायति बाह्येन वायुना पूर्यते दृतिवत्, आध्मातो मृतः शेते निश्चेष्टः। बन्धननाशे मुक्तस्य न क्वचिद्गमनमिति वाक्यार्थः ॥ ११ ॥ | कहना चाहिये कि वह मरता ही नहीं है; ऐसी बात नहीं है; यह मरता तो है; क्योंकि वह उच्छून-भावको प्राप्त होता है अर्थात् फूल जाता है। वह धोकनीके समान शरीरको बाह्य वायुसे भरता है और इस प्रकार भरकर मरा हुआ निश्चेष्ट पड़ा रहता है। इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि बन्धनका नाश हो जानेपर मुक्त पुरुषका कहीं गमन नहीं होता ॥ ११ ॥ | | मुक्तस्य किं प्राणा एव समवनीयन्ते, आहोस्वित् तत्प्रयोजकमपि सर्वम् ? अथ प्राणा एव, न तत्प्रयोजकं सर्वम्, प्रयोजके विद्यमाने पुनः प्राणानां प्रसङ्गः, अथ सर्वमेव कामकर्मादि, ततो मोक्ष उपपद्यते, इत्येवमर्थ उत्तरः प्रश्नः । | तो क्या मुक्त पुरुषके केवल प्राणोंका ही लय होता है अथवा उसके सब प्रयोजकोंका भी ? यदि कहें कि प्राण ही लीन होते हैं, उसके सभी प्रयोजक लीन नहीं होते, तो प्रयोजकोंके विद्यमान रहते हुए पुनः प्राणोंकी प्राप्तिका प्रसंग हो जायगा और यदि काम-कर्मादि सभीका लय माना जाय तो ही उसका मोक्ष होना बन सकता है; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये ही आगेका प्रश्न है— |
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शन- के द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच, यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति; आहेतरो—नामेति । सर्वं समवनीयत इत्यर्थः, नाममात्रं तु न लीयत आकृतिसम्बन्धात् । नित्यं हि नाम; अनन्तं वै नाम। नित्यत्वमेवानन्त्यं नाम्नः। तदानन्त्याधिकृता अनन्ता वै विश्वे देवाः। अनन्तमेव स तेन लोकं जयति। तन्नामानन्त्याधिकृतान् विश्वान् देवानात्मत्वेनोपेत्य तेनानन्त्यदर्शनेनानन्तमेव लोकं जयति ॥ १२ ॥ | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय यह पुरुष मर जाता है, इसे क्या नहीं छोड़ता ?' याज्ञवल्क्यने 'नाम' ऐसा कहा। तात्पर्य यह है कि सब कुछ लीन हो जाता है, किन्तु आकृतिसे सम्बन्ध होनेके कारण केवल नाम ही लीन नहीं होता। नाम तो नित्य है, वह अनन्त ही है। नित्य होना ही नामका अनन्तत्व है। उस अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं। अतः इस दर्शनसे वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है। अर्थात् नामके अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेवोंको आत्मभावसे प्राप्त होकर उस आनन्त्य-दर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥ |
इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार
| ग्रहातिग्रहरूपं बन्धनमुक्तं मृत्युरूपम्; तस्य च मृत्योर्मृत्युस- | ग्रहातिग्रहरूप जो मृत्युरूप बन्धन है, उसका वर्णन किया गया। उस मृत्युके मृत्युकी भी सत्ता होनेके |