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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

स होवाचेतरः—महिमानो विभूतयः, एषां त्रयस्त्रिंशतः देवानाम् एते त्रयश्च त्री च शतेत्यादयः; परमार्थतस्तु त्रयस्त्रिंशच्चैव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्युच्यते—अष्टौ वसवः एकादश रुद्राः, द्वादश आदित्यास्ते एकत्रिंशत्, इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति त्रयस्त्रिंशतः पूरणौ ॥ २ ॥इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—ये तीन और तीन सौ आदि देवगण इन तैंतीस देवताओंकी महिमा—विभूति ही हैं। वस्तुतः तो तैंतीस ही देवगण हैं, वे तैंतीस देवगण कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है-आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य-ये इकतीस हुए तथा इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीसकी पूर्ति करनेवाले हैं॥२॥

वसु कौन हैं ?

कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदँ सर्वँ हितमिति तस्माद्वसव इति ॥ ३ ॥

[ शाकल्य-] 'वसु कौन हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये वसु हैं; इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे ये वसु हैं' ॥ ३ ॥

कतमे वसव इति तेषां स्वरूपं प्रत्येकं पृच्छ्यते; अग्निश्च पृथिवी चेति—अग्न्याद्या नक्षत्रान्ता एते वसवः—प्राणिनां कर्मफलाश्रयत्वेन कार्यकारणसंघातरूपेण तन्निवासत्वेन च विपरिणमन्तो जगदिदं सर्वं वासयन्ति वसन्ति'वसु कौन है ?' इस प्रकार उनमेंसे प्रत्येकका स्वरूप पूछा जाता है । अग्निश्च पृथिवी च'—इस प्रकार अग्निसे लेकर नक्षत्रपर्यन्त ये सब वसु हैं । प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय होकर उनके निवासस्थान देहेन्द्रियसंघातरूपसे विपरिणामको प्राप्त होकर इस सम्पूर्ण जगत्को बसाये हुए हैं और स्वयं भी बसते हैं; [ यह

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७८९

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७८९

च; ते यस्माद् वासयन्ति तस्माद् वसव इति ॥ ३ ॥उनका वसुत्व है]। वे चूँकि [दूसरोंको अपनेमें] बसाये हुए हैं, इसलिये वसु हैं ॥ ३ ॥

रुद्र कौन हैं ?

कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥ ४ ॥

[ शाकल्य—] ‘रुद्र कौन हैं?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘पुरुषमें ये दश प्राण (इन्द्रियाँ) और ग्यारहवां आत्मा (मन)। ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय रुलाते हैं; अतः उत्क्रमणकालमें चूँकि अपने सम्बन्धियोंको रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे] ‘रुद्र’ कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥

कतमे रुद्रा इति। दशेमे पुरुषे कर्मबुद्धीन्द्रियाणि प्राणाः, आत्मा मन एकादशः—एकादशानां पूरणः; ते एते प्राणा यदा अस्माच्छरीरान्मर्त्यात् प्राणिनां कर्मफलोपभोगक्षये उत्क्रामन्ति—अथ तदा रोदयन्ति तत्सम्बन्धिनः। तत्तत्र यस्माद्रोदयन्ति ते सम्बन्धिनः, तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥‘रुद्र कौन हैं ? [याज्ञवल्क्य—] ‘इस पुरुषमें कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय—ये दश प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा—मन, जो ग्यारहकी पूर्ति करनेवाला है। वे ये प्राण जिस समय प्राणियोंके कर्मफलोपभोगका क्षय हो जानेपर इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय ये उसके सम्बन्धियोंको रुलाते हैं। उस समय चूँकि ये सम्बन्धियोंको रुलाते हैं, इसलिये रोदनमें निमित्त होनेसे रुद्र कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥

७९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

७९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


आदित्य कौन हैं ?

कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदँ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदँ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥५॥

[ शाकल्य—] ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य— ] ‘संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि ये इस सबका आदान ( ग्रहण ) करते हुए चलते हैं, इसलिये आदित्य हैं’ ॥ ५ ॥

| कतम आदित्या इति । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य कालस्यावयवाः प्रसिद्धाः, एते आदित्याः; कथम् ? एते हि यस्मात् पुनः पुनः परिवर्तमानाः प्राणिनामायूंषि कर्मफलं च आददाना गृह्णन्त उपाददतो यन्ति गच्छन्ति—ते यद् यस्मादेवमिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥ | ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘बारह महीने संवत्सररूप कालके अवयव प्रसिद्ध हैं—वे ही आदित्य हैं। सो किस प्रकार ? क्योंकि ये ही पुनः-पुनः परिवर्तित होते हुए प्राणियोंकी आयु और कर्मफलका आदान—ग्रहण यानी उपादान करते हुए चलते हैं। वे चूँकि इस प्रकार इस सबका आदान करते हुए चलते हैं, इसलिये ‘आददाना यन्ति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार आदित्य कहलाते हैं’ ॥ ५ ॥ |


इन्द्र और प्रजापति कौन हैं ?

कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥

[ शाकल्य—] ‘इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है ?’ [ याज्ञवल्क्य—] स्तनयित्नु ( विद्युत् ) ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।’ [ शाकल्य—]

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१


'स्तनयित्नु कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अशनि।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'पशुगण' ॥ ६ ॥

| कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति, स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति, कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति। अशनिर्वज्रं वीर्यं बलम्, यत् प्राणिनः प्रमापयति, स इन्द्रः; इन्द्रस्य हि तत् कर्म। कतमो यज्ञ इति पशव इति—यज्ञस्य हि साधनानि पशवः; यज्ञस्यारूपत्वात् पशुसाधनाश्रयत्वाच्च पशवो यज्ञ इत्युच्यते ॥ ६ ॥ | "इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है।' 'स्तनयित्नु ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।' स्तनयित्नु कौन है?' 'अशनि।' अशनि वज्र-वीर्य अर्थात् बल, जो प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह अशनि इन्द्र है; इन्द्रका ही वह कर्म है। 'यज्ञ कौन है?' 'पशुगण,' क्योंकि पशु यज्ञके साधन हैं; यज्ञ रूपरहित है और पशुरूप साधनके अधीन है इसलिये पशु यज्ञ हैं—ऐसा कहा जाता है ॥ ६ ॥ |

छः देवताओंका विवरण

कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीदँ सर्वं षडिति ॥७॥

[ शाकल्य-] 'छः देवगण कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक—ये छः देवगण हैं। ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि आदि छः ही हैं' ॥ ७ ॥

| कतमे षडिति; त एवाग्न्यादयो वसुत्वेन पठिताश्चन्द्रमसं नक्षत्राणि च वर्जयित्वा षड भवन्ति—षट्संख्याविशिष्टाः। एते हि यस्मात्, त्रयस्त्रिंशदादि यदुक्तमिदं सर्वम्, एत एव षड् भवन्ति। | 'छः देवगण कौन हैं?' 'वे वसु रूपसे पढ़े हुए अग्नि आदि ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंको छोड़कर छः अर्थात् षट्संख्याविशिष्ट होते हैं, क्योंकि ये तैंतीस आदि बतलाये हुए समस्त देवगण ये छः ही होते |

७९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
सर्वो हि वस्त्रादिविस्तर एतेष्वेव षट्स्वन्तर्भवतीत्यर्थः ॥ ७ ॥हैं। तात्पर्य यह है कि यह वसु आदि सम्पूर्ण देवताओंका विस्तार इन छःमें ही अन्तर्भूत हो जाता है ॥ ७ ॥

देवताओंकी तीन, दो और डेढ़ संख्याओंका विवरण

कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥८॥

[ शाकल्य—] 'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। इन्हींमें ये सब देव अन्तर्भूत हैं। [ शाकल्य—] 'वे दो देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अन्न और प्राण ।' [ शाकल्य—] 'डेढ़ देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो यह बहता है' ॥ ८ ॥

कतमे ते त्रयो देवा इति; इम एव त्रयो लोका इति— पृथिवीमग्निं चैकीकृत्यैको देवः, अन्तरिक्षं वायुं चैकीकृत्य द्वितीयः, दिवमादित्यं चैकीकृत्य तृतीयः—ते एव त्रयो देवा इति । एषु, हि यस्मात्, त्रिषु देवेषु सर्वे देवा अन्तर्भवन्ति तेन त एव देवास्त्रयः—इत्येष नैरुक्तानां केषाञ्चित् पक्षः । कतमौ तौ द्वौ देवाविति—अन्नं चैव'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। पृथिवी और अग्नि मिलाकर एक देव हैं, अन्तरिक्ष और वायु मिलाकर दूसरे देव हैं तथा द्युलोक और आदित्य मिलाकर तीसरे देव हैं। 'ते एव त्रयो देवाः' इति—क्योंकि इन तीन देवोंमें ही समस्त देवोंका अन्तर्भाव होता है, इसलिये ये ही तीन देव हैं—ऐसा किन्हीं निरुक्तवेत्ताओंका पक्ष है ।¹ 'वे दो देव कौन हैं ?' 'अन्न और प्राण—

१. तात्पर्य यह है कि कुछ ही लोगोंका ऐसा मत है, दूसरे लोग 'त्रयो लोकाः' इस पदसे 'भूः, भुवः, स्वः' इन नामोंसे प्रसिद्ध तीन लोक ही ग्रहण करते हैं।

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९३

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९३


प्राणश्चैतौ द्वौ देवौ, अनयोः सर्वेषामुक्तानामन्तर्भावः। कतमोऽध्यर्ध इति—योऽयं पवते वायुः ॥ ८ ॥ये दो देव हैं, इन्हींमें पूर्वोक्त सभी देवताओंका अन्तर्भाव हो जाता है।' 'डेढ़ देव कौन हैं?' 'जो यह बहता है, वह वायु डेढ़ देव है' ॥८॥

डेढ़ और एक देवका विवरण

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यस्मिन्निदँ सर्वमध्याध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥६॥

यहां ऐसा कहते हैं—'यह जो वायु है, एकही-सा बहता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ किस प्रकार है?' [ उत्तर— ] 'क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध ( डेढ़ ) है।' [ शाकल्य— ] 'एक देव कौन है?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको 'त्यत्' ऐसा कहते हैं' ॥ ६ ॥

तत्तत्राहुश्चोदयन्ति—यदयं वायुरेक इवैव एक एव पवते; अथ कथमध्यर्ध इति ? यदस्मिन्निदं सर्वमध्याध्नोत्—अस्मिन् वायौ सतीदं सर्वमध्याध्नोत्—अधिऋद्धिं प्राप्नोति, तेनाध्यर्ध इति ।<br><br>कतम एको देव इति ? प्राण इति स प्राणो ब्रह्म—सर्वदेवात्मकत्वान्महद् ब्रह्म, तेन स ब्रह्म त्य-इस विषयमें कोई ऐसा प्रश्न करते हैं—'यह जो वायु है 'एक इव'—एक-सा ही चलता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ क्यों है?' [उत्तर—] 'क्योंकि इसीमें यह सब 'अध्याध्नोत् (अधिऋद्धिं प्राप्नोत्)' अर्थात् इस वायुके रहते ही यह सब अधिऋद्धि-को प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध है।'<br><br>'एक देव कौन है?' 'प्राण' वह प्राण ब्रह्म है, सर्वदेवरूप होनेके कारण वह महद् ब्रह्म है; इसलिये

७९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७९४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| दित्याचक्षते—त्यदिति तद् ब्रह्म—चक्षते परोक्षाभिधायकेन शब्देन। <br> देवानाममेतदेकत्वं नानात्वं च। अनन्तानां देवानां निवित्संख्याविशिष्टेष्वन्तर्भावः, तेषामपि त्रयस्त्रिंशदादिषूत्तरोत्तरेषु यावदेकस्मिन् प्राणे। प्राणस्यैव चैकस्य सर्वोऽनन्तसङ्ख्यातो विस्तरः। एवमेकश्चानन्तश्च अवान्तरसंख्याविशिष्टश्च प्राण एव। तत्र च देवस्यैकस्य नामरूपकर्मगुणशक्तिभेदः, अधिकारभेदात् ॥ ९ ॥ | वह ब्रह्म 'त्यत्' है—ऐसा कहते हैं। अर्थात् उस ब्रह्मको 'त्यत्' इस परोक्षवाचक शब्दसे कहते हैं। <br> यही देवताओंका एकत्व और नानात्व है। अनन्त देवोंका निवित्संख्याविशिष्ट देवोंमें अन्तर्भाव है, और उनका भी तैंतीस आदि उत्तरोत्तर देवोंमें यहां तक कि अकेले प्राणमें ही अन्तर्भाव है। एक प्राणका ही यह सब अनन्त-संख्याके रूपमें विस्तार हुआ है। इस प्रकार एक, अनन्त तथा अन्यान्य संख्याओंसे विशिष्ट एक प्राण ही है। वहाँ अधिकारभेदसे एक ही देवके नाम, रूप, कर्म, गुण और शक्तिका भेद है ॥ ६ ॥ |

प्राणब्रह्मके आठ प्रकारके भेद

इदानीं तस्यैव प्राणस्य ब्रह्मणः पुनरष्टधा भेद उपदिश्यते—अब उस प्राणब्रह्मके ही आठ प्रकारके भेद बतलाये जाते हैं—

पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणग्ँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायग्ँ शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥

[ शाकल्य- ] 'पृथिवी ही जिसका आयतन है तथा अग्नि लोक ( दर्शनशक्ति ) और मन ज्योति ( संकल्प-विकल्पका साधन ) है, जो भी

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५


उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्यकारणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। यह जो शारीर पुरुष है, वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'अच्छा, उसका देवता कौन है?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा कहा ॥ १० ॥

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
पृथिव्येव यस्य देवस्यायतनमाश्रयः, अग्निर्लोको यस्य—लोकयत्यनेनेति लोकः, पश्यतीति—अग्निना पश्यतीत्यर्थः। मनोज्योतिः मनसा ज्योतिषा संकल्पविकल्पादिकार्यं करोति यः, सोऽयं मनोज्योतिः । पृथिवीशरीरोऽग्निदर्शनो मनसा संकल्पयिता पृथिव्यभिमानी कार्यकरणसंघातवान् देव इत्यर्थः ।जिस देवका पृथिवी ही आयतन अर्थात् आश्रय है, अग्नि जिसका लोक है—इसके द्वारा अवलोकन करता है, इसलिये यह इसका लोक है, 'लोकयति' का अर्थ है—देखता है अर्थात् वह अग्निसे देखता है। तथा मनोज्योति है—जो मनरूप ज्योतिसे संकल्प-विकल्पादि कार्य करता है, वह यह देव मनोज्योति है। तात्पर्य यह है कि यह पृथिवीका अभिमानी कार्यकारणसंघातवान् देव पृथिवीरूप शरीरवाला, अग्निरूप दर्शनशक्तिवाला और मनसे संकल्प करनेवाला है।
य एवं विशिष्टं वै तं पुरुषं विद्याद् विजानीयात् सर्वस्यात्मन आध्यात्मिकस्य कार्यकारणसंघातस्य आत्मनः परमयनं पर आश्रयस्तं परायणम् । मातृजेन त्वङ्मांसरुधिररूपेण क्षेत्रस्थानीयेन बीजस्थानीयस्य पितृजस्य अस्थि-जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त उस पुरुषको सम्पूर्ण आत्माका—आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातरूप आत्माका परम अयन यानी परम आश्रय जानता है अर्थात् मातृजनित क्षेत्रस्थानीय त्वचा, मांस और रुधिररूपसे पितृजनित बीजस्थानीय अस्थि-मज्जा और

७९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| मज्जाशुक्ररूपस्य परमयनम्, करणात्मनश्च, स वै वेदिता स्यात् । य एतदेवं वेत्ति स वै वेदिता पण्डितः स्यादित्यभिप्रायः । याज्ञवल्क्य त्वं तमजानन्नेव पण्डिताभिमानीत्यभिप्रायः । | वीर्यरूपका तथा इन्द्रियात्माका वह परम अयन है—ऐसा जानता है, वही जाननेवाला है। तात्पर्य यह है कि जो इसे इस प्रकार जानता है, वही वेत्ता यानी पण्डित है। 'हे याज्ञवल्क्य ! तुम तो उसे बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान करते हो'—ऐसा इसका अभिप्राय है। | | यदि तद्विज्ञाने पाण्डित्यं लभ्यते, वेद वै अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ यं कथयसि तमहं वेद । तत्र शाकल्यस्य वचनं द्रष्टव्यम्—यदि त्वं वेत्थ तं पुरुषम्, ब्रूहि—किंविशेषणोऽसौ ? शृणु यद्विशेषणः सः—य एवायं शारीरः—पार्थिवांशे शरीरे भवः शारीरो मातृजकोशत्रयरूप इत्यर्थः, स एष देवः, यस्त्वया पृष्टः, हे शाकल्य । किन्त्वस्ति तत्र वक्तव्यं विशेषणान्तरम्, तद् वदैव पृच्छैवेत्यर्थः, हे शाकल्य । | [ याज्ञवल्क्य—] 'यदि उसके विज्ञानसे ही पाण्डित्यकी प्राप्ति होती है तो मैं उस पुरुषको तो जानता हूँ; तुम जिसे सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो उस पुरुषका मुझे पता है।' यहाँ शाकल्यका यह वचन समझना चाहिये—'यदि तुम उस पुरुषको जानते हो तो बताओ वह किन विशेषणोंवाला है।' [ याज्ञवल्क्य—], अच्छा, वह जिन विशेषणोंसे युक्त है, सो सुनो—जो भी यह शारीर है—शरीररूप पार्थिवांशमें होनेवालेको शारीर कहते हैं अर्थात् जो मातृजनित कोशत्रयरूप है, हे शाकल्य ! वही वह देव है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है। किंतु उसके विषयमें एक और विशेषण बतलाना आवश्यक है सो हे शाकल्य ! उसको कहो अर्थात् उसके सम्बन्धमें पूछो।' |

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७


| स एवं प्रक्षोभितोऽमर्षवशग आह—तोत्त्रार्दित इव गजः— तस्य देवस्य शारीरस्य का देवता ? यस्मान्निष्पद्यते यः सा तस्य देवतेत्यस्मिन् प्रकरणे विवक्षितः; अमृतमिति होवाच । अमृतमिति यो भुक्तस्यान्नस्य रसो मातृजस्य लोहितस्य निष्पत्तिहेतुः । तस्माद्ध्यन्नरसाल्लोहितं निष्पद्यते स्त्रियां श्रितम्, ततश्च लोहितमयं शरीरं बीजाश्रयम् । समानमन्यत् ॥ १० ॥ | इस प्रकार अत्यन्त क्षुभित किये जानेपर उसने अंकुशसे पीडित हुए हाथीके समान क्रोधके वशीभूत होकर पूछा, 'उस शरीरमें होनेवाले देवका देवता कौन है ?' जिसके द्वारा जो निष्पन्न होता है वही उसका देवता है-ऐसा इस प्रकरणमें बताना अभीष्ट है [ शाकल्यके किये हुए प्रश्नके उत्तरमें ] 'वह अमृत है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । खाये हुए अन्नका जो रस मातृजनित लोहितकी निष्पत्तिका कारण होता है, वही अमृत है । उस अन्नके रससे ही स्त्रीमें आश्रित लोहित निष्पन्न होता है । उसीसे बीजका आश्रयभूत लोहितमय शरीर बनता है । आगेके अन्य पर्यायोंका अर्थ भी इसीके समान है ॥ १० ॥ |


काम एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥

[ शाकल्य—] 'काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करण-

७९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

समूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हों !] ।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह काममय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य — ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'स्त्रियां' ॥ ११ ॥

| काम एव यस्यायतनम्। स्त्रीव्यतिकराभिलाषः कामः कामशरीर इत्यर्थः। हृदयं लोको हृदयेन बुद्ध्या पश्यति । य एवायं काममयः पुरुषोऽध्यात्ममपि काममय एव । तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच; स्त्रीतो हि कामस्य दीप्तिर्जायते ॥ ११ ॥ | काम ही जिसका आयतन है। स्त्रीप्रसङ्गकी अभिलाषाका नाम काम है, अतः तात्पर्य यह है कि जो कामरूप शरीरवाला है। हृदय जिसका लोक है—जो हृदय यानी बुद्धिसे देखता है। जो भी यह काममय पुरुष है अर्थात् जो अध्यात्म भी काममय ही है । [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' याज्ञवल्क्यने 'स्त्रियां' ऐसा कहा, क्योंकि स्त्रीसे ही कामका उद्दीपन होता है ॥ ११ ॥ |

रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥

[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [तुम तो बिना जाने ही

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य! और बोलो।’ [शाकल्य-] ‘उसका देवता कौन है?’ तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा ॥ १२ ॥

| रूपाण्येव यस्यायतनम् । रूपाणि शुक्लकृष्णादीनि । य एवासावादित्ये पुरुषः—सर्वेषां हि रूपाणां विशिष्टं कार्यमादित्ये पुरुषः। तस्य का देवतेति ? सत्यमिति होवाच । सत्यमिति चक्षुरुच्यते, चक्षुषो ह्यध्यात्मतः आदित्यस्याधिदैवतस्य निष्पत्तिः ॥ १२ ॥ | रूप ही जिसका आयतन हैं। रूप हैं शुक्ल-कृष्ण आदि। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है—सम्पूर्ण रूपोंका जो विशिष्ट कार्य है वही आदित्यमें पुरुष है। उसका देवता कौन है? तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा। सत्य-इस शब्दसे चक्षु कहा गया है, क्योंकि अध्यात्म-चक्षु-से ही अधिदैवत आदित्यकी निष्पत्ति होती है ॥ १२ ॥ |

आकाश एव यस्यायतनँ श्रोत्रं लोको मनो- ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायँ श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥

[शाकल्य-] ‘आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य! [तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण कहते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क पुरुष है, यही वह है, हे शाकल्य!

८०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

और बोलो।' [ शाकल्य-] 'उसका कौन देवता है?' तब याज्ञवल्क्यने 'दिशाएँ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥

| आकाश एव यस्यायतनम् य एवायं श्रोत्रे भवः श्रौत्रः, तत्रापि प्रतिश्रवणवेलायां विशेषतो भवतीति प्रातिश्रुत्कः, तस्य का देवतेति ? दिश इति होवाच । दिग्भ्यो ह्यसावाध्यात्मिको निष्पद्यते ॥ १३ ॥ | आकाश ही जिसका आयतन है। जो भी यह श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्र और उसमें भी जो प्रतिश्रवणके समय विशेषरूपसे रहता है, वह प्रातिश्रुतक हे, उसका देवता कौन है ? इसपर [याज्ञवल्क्यने] कहा, 'दिशाएँ' क्योंकि दिशाओंसे ही यह आध्यात्मिक पुरुष निष्पन्न होता है ॥ १३ ॥ |

तम एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनो-
ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ
स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ
सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः
पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति
मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥

[ शाकल्य–] 'तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो !]।' [ याज्ञवल्क्य–] 'तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य–] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'मृत्यु' ऐसा कहा ॥ १४ ॥

| तम एव यस्यायतनम् । तम इति शार्वराद्यन्धकारः परिगृह्यते । | तम ही जिसका आयतन है। 'तम' शब्दसे रात्रि आदिका अन्धकार |

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८०१

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८०१


| अध्यात्मं छायामयोऽज्ञानमयः पुरुषः । तस्य का देवतेति ? मृत्युरिति होवाच । मृत्युरधिदैवतं तस्य निष्पत्तिकारणम् ॥ १४ ॥ | ग्रहण किया जाता है । अध्यात्मपक्षमें छायामय—अज्ञानमय पुरुष ही तम है । उसका कौन देवता है । 'मृत्यु' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । अधिदैवत मृत्यु¹ ही उस ( छायामय पुरुष ) की निष्पत्तिका कारण है ॥ १४ ॥ |


रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५॥

[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, नेत्र लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] १' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदर्श ( दर्पण ) के भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'असु' ऐसा कहा ॥ १५ ॥

| रूपाण्येव यस्यायतनम् । पूर्वं साधारणानि रूपाण्युक्तानि, इह तु | रूप ही जिसका आयतन है । पहले साधारण रूप कहे गये हैं, |


१. 'मृत्यु' शब्दसे यहाँ ईश्वर ( अव्याकृत ) समझना चाहिये, जैसा कि यह श्रुति कहती है—'मृत्युनैवेदमावृतमासीत्' अर्थात् पहले यह मृत्युसे ही व्याप्त था । अविवेककी प्रवृत्ति ईश्वरके ही अधीन है, इसलिये वह अज्ञानमय आध्यात्मिक पुरुषकी उत्पत्तिका कारण है ।

बृ० उ० — ५१

८०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| प्रकाशकानि विशिष्टानि रूपाणि गृह्यन्ते। रूपायतनस्य देवस्य विशेषाsubयतनं प्रतिबिम्बाधारमादर्शादि तस्य का देवतेति ? असुरिति होवाच। तस्य प्रतिबिम्बाख्यस्य पुरुषस्य निष्पत्तिरसोः प्राणात् ॥ १५ ॥ | किंतु यहाँ प्रकाश करनेवाले विशिष्ट रूप ग्रहण किये जाते हैं। रूप जिसका आयतन (आश्रय) है, उस देवका विशेष आयतन प्रतिबिम्बके आधारभूत आदर्शादि हैं। उसका कौन देवता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा 'असु' ( प्राण ) । अर्थात् उस प्रतिबिम्ब-संज्ञक पुरुषकी निष्पत्ति असु¹—प्राणसे होती है ॥ १५ ॥ |


आप एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥

[ शाकल्य—] 'जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह जलमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है!' तब याज्ञवल्क्यने 'वरुण' ऐसा कहा ॥ १६ ॥


१. प्राणद्वारा घर्षण करनेपर ही आदर्शादि प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके योग्य होते हैं; इसलिये असुको प्रतिबिम्बसंज्ञक पुरुषकी निष्पत्तिका कारण बतलाना उचित ही है।

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०३

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०३


| आप एव यस्य आयतनम् । साधारणाः सर्वा आप आयतनम्; वापीकूपतडागाद्याश्रयास्वप्सु विशेषावस्थानम् । तस्य का देवतेति ? वरुण इति; वरुणात् सङ्घातकर्योऽध्यात्ममाप एव वाप्याद्यपां निष्पत्तिकारणम् ॥ १६ ॥ | जल ही जिसका आयतन है। सभी साधारण जल जिसका आयतन हैं; वापी, कूप और तडागादिमें रहनेवाले जलमें जिसकी विशेष स्थिति है। उसका देवता कौन है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'वरुण'; क्योंकि वरुणके द्वारा संघात करनेवाला अध्यात्म जल ही वापी आदिके जलकी निष्पत्तिका कारण है¹॥ १६ ॥ |

रेत एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥

[ शाकल्य— ] 'वीर्य ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]' [ याज्ञवल्क्य— ] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-संघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य— ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'प्रजापति' ऐसा कहा ॥ १७ ॥


१. वापी एवं कूपादिसे पिया हुआ जल जो शरीरमें मूत्रादि संघातको करता है वह वरुणसे ही होता है। रश्मियोंद्वारा पृथिवीपर गिरा हुआ जल 'वरुण' शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि वह सूर्यकिरणोंसे पृथिवीपर गिरनेवाला जल ही पिये जानेवाले वापी-कूपादिके जलकी उत्पत्तिका कारण है, इसलिये वह जलमय अध्यात्म पुरुषका भी कारण है।

८०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८०४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| रेत एव यस्यायतनम् । य एवायं पुत्रमयो विशेषायतनं रेत आयतनस्य, पुत्रमय इति च अस्थिमज्जाशुक्राणि पितुर्ज्ञातानि । तस्य का देवतेति ? प्रजापतिरिति होवाच । प्रजापतिः पितोच्यते, पितृतो हि पुत्रस्योत्पत्तिः ॥ १७ ॥ | वीर्य ही जिसका आयतन है। जो भी यह वीर्यरूप आयतनवाले पुरुषका पुत्ररूप विशेष आयतन है; पुत्रमय अर्थात् पितासे उत्पन्न हुए अस्थि, मज्जा और शुक्र। उसका देवता कौन है ? 'प्रजापति' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'प्रजापति' पिताको कहते हैं, क्योंकि पितासे ही पुत्रकी उत्पत्ति होती है ॥ १७ ॥ |

शाकल्यको चेतावनी

| अष्टधा देवलोकपुरुषभेदेन त्रिधा त्रिधा आत्मानं प्रविभज्यावस्थित एकैको देवः प्राणभेद एवोपासनार्थं व्यपदिष्टः । अधुना दिग्विभागेन पञ्चधा विभक्तस्य आत्मन्युपसंहारार्थमाह । तूष्णीम्भूतं शाकल्यं याज्ञवल्क्यो ग्रहेणेवावेशयन्नाह— | एक-एक देवता ही अपनेको देवलोक और पुरुषभेदसे¹ तीन-तीन भागोंमें विभक्त करके आठ प्रकारसे स्थित हुआ है; प्राणभेद अर्थात् पृथक्-पृथक् इन्द्रिय-समुदाय ही वह देवता है, उपासनाकी सुविधाके लिये यहाँ विभागपूर्वक उनका उपदेश किया गया है। अब विभिन्न दिशाओंके अनुसार पाँच भागोंमें विभक्त हुए उस प्राणभेदका आत्मामें उपसंहार करनेके लिये श्रुति कहती है। अपने प्रश्नोंका उत्तर पाकर मौन हुए शाकल्यको ग्रहाविष्ट-सा करते हुए याज्ञवल्क्यने कहा— |

शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥


१. लोकका अर्थ है—सामान्य आकार, पुरुषका अर्थ है—विशेष-विशेष आकारमें स्थित चेतन तथा देवताका अर्थ है—इन दोनोंका कारण।

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०५

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०५


'शाकल्य !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इन ब्राह्मणोंने निश्चय ही तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बना रखा है' ॥ १८ ॥

शाकल्येति होवाच याज्ञ-'हे शाकल्य !' ऐसा याज्ञ-
वल्क्यः। त्वां स्विदिति वितर्के,वल्क्यने कहा। 'त्वां स्विद्' इसमें
इमे नूनं ब्राह्मणाः, अङ्गारावक्ष-'स्विद्' यह निपात वितर्क अर्थमें
यणम्—अङ्गारा अवक्षीयन्तेहै, निश्चय ही इन ब्राह्मणोंने तुम्हें
यस्मिन् सन्दंशादौ तदङ्गारावक्ष-अङ्गारावक्षयण-जिस चिमटे आदि-
यणम्—तद् नूनं त्वामक्रतपर अंगारे अवक्षीण होते अर्थात्
कृतवन्तो ब्राह्मणाः, त्वं तु तन्नपड़ते हैं, उसे अङ्गारावक्षयण कहते
बुध्यसे आत्मानं मया दह्यमानम्हैं-सो निश्चय ही तुम्हें इन ब्राह्मणों-
इत्यभिप्रायः ॥ १८ ॥ने आगमें जलनेवाला चिमटा ही
बना रखा है। अभिप्राय यह है कि
मेरे द्वारा तुम्हारा दाह हो रहा
है—किंतु तुम्हें इसका पता नहीं
है ॥ १८ ॥

देवता और प्रतिष्ठासहित दिशाओंके ज्ञानकी प्रतिज्ञा

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरु-
पञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति
दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ
सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने कहा, 'यह जो तुम इन कुरुपाञ्चाल-देशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता हो—ऐसी समझकर करते हो ?' [ याज्ञवल्क्य—मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] 'मैं देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंका ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य— ] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो' ॥ १९ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यः—'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने
यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा-कहा, 'तुमने जो यह कुरुपाञ्चाल-
नत्यवादीः-अत्युक्तवानसि—स्वयंदेशीय ब्राह्मणोंका अतिवाद-अति-
भाषण (आक्षेपद्वारा तिरस्कार) किया

८०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

८०६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| भीतास्त्वामङ्गारावक्षयणं कृतवन्त इति—किं ब्रह्म विद्वान् सन्नेवमधिक्षिपसि ब्राह्मणान् ? याज्ञवल्क्य आह—ब्रह्म विज्ञानं तावदिदं मम, किं तत् ? दिशो वेद दिग्विषयं विज्ञानं जाने । तच्च न केवलं दिश एव, सदेवा देवैः सह दिगधिष्ठातृभिः, किञ्च सप्रतिष्ठाः प्रतिष्ठाभिश्च सह । इतर आह—यद् यदि दिशो वेत्थ सदेवाः, सप्रतिष्ठा इति, सफलं यदि विज्ञानं त्वया प्रतिज्ञातम् ॥ १९ ॥ | है कि 'ये स्वयं भयग्रस्त होनेके कारण तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बनाये हुए हैं' सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण इस प्रकार ब्राह्मणोंका तिरस्कार करते हो ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरा ब्रह्मज्ञान तो यह है, क्या है ? कि मैं दिशाओंको जानता हूँ, मुझे दिशासम्बन्धी विज्ञानका ज्ञान है । वह भी केवल दिशाओंका ही नहीं, सदेवा तथा सप्रतिष्ठा दिशाओंका ज्ञान है अर्थात् दिशाओंके अधिष्ठाता देवताओंके साथ और दिशाओंके अधिष्ठानसहित उन दिशाओंका मुझे ज्ञान है । इसपर शाकल्यने कहा, 'यदि तुम देव और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो—यदि तुमने फलसहित विज्ञानकी प्रतिज्ञा की है तो' ॥ १९ ॥ |

देवता और प्रतिष्ठासहित पूर्वदिशाका वर्णन

किन्दे॑वतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


'इस पूर्वदिशामें तुम किस देवतासे युक्त हो?' [ याज्ञवल्क्य— 'वहाँ मैं आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमें।' [शाकल्य-] 'नेत्र किसमें प्रतिष्ठित है? [याज्ञवल्क्य-] 'रूपोंमें, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [शाकल्य-] 'रूप किसमें प्रतिष्ठित है?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोंको जानता है, अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है' ॥ २० ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
किन्देवतः का देवतास्य तव दिग्भूतस्य । असौ हि याज्ञवल्क्यो हृदयमात्मानं दिक्षु पञ्चधा विभक्तं दिगात्मभूतम्, तद्द्वारेण सर्वं जगदात्मत्वेनोपगम्य, अहमस्मि दिगात्मेति व्यवस्थितः, पूर्वाभिमुखः—सप्रतिष्ठावचनाद्, यथा याज्ञवल्क्यस्य प्रतिज्ञा तथैव पृच्छति—किन्देवतस्त्वमस्यां दिश्यसीति ।तुम किस देवतावाले हो ? अर्थात् दिशास्वरूपमें स्थित हुए तुम्हारा कौन देवता है ? यहाँ इस प्रकार प्रश्न करनेका कारण यह है कि वे याज्ञवल्क्य दिशाओंमें पांच प्रकारसे विभक्त अपने हृदयोपाधिक आत्माको 'दिगात्म' स्वरूप समझकर और उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को आत्मभावसे जानकर 'मैं दिक्स्वरूप हूँ' इस प्रकार स्थित हैं; वह पूर्वाभिमुख है [ इसलिये पहले पूर्वदिशाके विषयमें ही पूछा जाता है ] तथा उसका कथन है कि प्रतिष्ठासहित दिशाओंको जानता हूँ, [इससे यह जान पड़ता है कि वह समस्त जगत्को आत्मरूप जानकर स्थित है।] इसलिये जैसी याज्ञवल्क्यकी प्रतिज्ञा है, वैसे ही शाकल्य पूछता है—'तुम इस पूर्वदिशामें कौन-से देवतावाले हो ?'
सर्वत्र हि वेदे यां यां देवतामुपास्ते, इहैव तद्भूतस्तां तां प्रति-वेदमें सभी जगह पुरुष जिस-जिस देवताकी उपासना करता है, इस लोकमें तद्रूप हुआ ही वह