भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१२४- शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना १२५- अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकटमुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन १२६- राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र १२७- सोमक और जन्तुका उपाख्यान १२८- सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना १२९- कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुना-तीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा १३०- विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ १३१- राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना १३२- अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना १३३- अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप १३४- बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समंगामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना १३५- कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु १३६- यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु १३७- भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना १३८- अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना १३९- पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड-यात्रा और लोमशजी-द्वारा उसकी दुर्गमताका कथन १४०- भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान १४१- युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना १४२- पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना १४३- गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना

१४४- द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन १४५- घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन १४६- भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान्‌जीसे भेंट १४७- श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद १४८- हनुमान्‌जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना १४९- हनुमान्‌जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन १५०- श्रीहनुमान्‌जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन १५१- श्रीहनुमान्‌जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना १५२- भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना १५३- क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना १५४- भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना १५५- भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादनपर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना १५६- पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुनः नर-नारायणाश्रममें लौटना

(जटासुरवधपर्व)

१५७- जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुर-का वध

(यक्षयुद्धपर्व)

१५८- नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना १५९- प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश १६०- पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान्‌का वध करना १६१- कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट १६२- कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान

१६३- धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन १६४- पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन

(निवातकवचयुद्धपर्व)

१६५- अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना १६६- इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना १६७- अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा १६८- अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन १६९- अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ १७०- अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध १७१- दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन १७२- निवातकवचोंका संहार १७३- अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन १७४- अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्र-दर्शनकी इच्छा प्रकट करना १७५- नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना

(आजगरपर्व)

१७६- भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान १७७- पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश १७८- महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना १७९- भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज १८०- युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना १८१- युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना

(मार्कण्डेयसमस्यापर्व)

**१८२-** वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुनः द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश **१८३-** काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन **१८४-** तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य **१८५-** ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा **१८६-** तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद **१८७-** वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा **१८८-** चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना **१८९-** भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना **१९०-** युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन **१९१-** भगवान् कल्कि के द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश **१९२-** इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित्का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता **१९३-** इन्द्र और बक मुनिका संवाद **१९४-** क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा **१९५-** राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान **१९६-** सेदुक और वृषदर्भका चरित्र **१९७-** इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा **१९८-** देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन **१९९-** राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा **२००-** निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्री-जप, चित्त-शुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन

२०१- उत्तंककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्‌का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना २०२- उत्तंकका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह २०३- ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु-कैटभका वध २०४- धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना २०५- पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य २०६- कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन २०७- कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन २०८- धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन २०९- धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन २१०- विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन २११- पंचमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन २१२- तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन २१३- प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय २१४- माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन २१५- धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना २१६- कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान २१७- अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति २१८- अंगिराकी संततिका वर्णन २१९- बृहस्पतिकी संततिका वर्णन २२०- पांचजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन २२१- अग्निस्वरूप तप और भानु (मनुकी) संततिका वर्णन २२२- सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनः उनका प्राकट्य २२३- इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार २२४- इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन

२२५- स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण २२६- विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना २२७- पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान २२८- स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन २२९- स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह २३०- कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन २३१- स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा २३२- कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन

(द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व)

२३३- द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना २३४- पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा २३५- सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान

(घोषयात्रापर्व)

२३६- पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्गार २३७- शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभारना २३८- दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना २३९- कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान २४०- दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद २४१- कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय २४२- गन्धर्वोंद्वारा दुर्योधन आदिकी पराजय और उनका अपहरण

२४३- युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा २४४- पाण्डवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध २४५- पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय २४६- चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा २४७- सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन २४८- दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना २४९- दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दुःशासनको राजा बननेका आदेश, दुःशासनका दुःख और कर्णका दुर्योधनको समझाना २५०- कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय २५१- शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोप-वेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना २५२- दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान २५३- भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान २५४- कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार २५५- कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी २५६- दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति २५७- दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति

(मृगस्वप्नोद्भवपर्व)

२५८- पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन

(व्रीहिद्रौणिकपर्व)

२५९- युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन २६०- दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना २६१- देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने

<u>आश्रमको लौट जाना</u>

(द्रौपदीहरणपर्व)

२६२- दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना २६३- दुर्वासाका पाण्डवोंके आश्रमपर असमयमें आतिथ्यके लिये जाना, द्रौपदीके द्वारा स्मरण किये जानेपर भगवान्‌का प्रकट होना तथा पाण्डवोंको दुर्वासाके भयसे मुक्त करना और उनको आश्वासन देकर द्वारका जाना २६४- जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना २६५- कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना २६६- द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर २६७- जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद २६८- द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथ-द्वारा उसका अपहरण २६९- पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयीकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना २७०- द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन २७१- पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना

(जयद्रथविमोक्षणपर्व)

२७२- भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन

(रामोपाख्यानपर्व)

२७३- अपनी दुरवस्थासे दुःखी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना २७४- श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति २७५- रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वर-प्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना २७६- देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचारसे बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनियोंमें संतान उत्पन्न

करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना २७७- श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना २७८- मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण २७९- रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्यस्वरूपसे वार्तालाप २८०- राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिका में राक्षसोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन २८१- रावण और सीताका संवाद २८२- श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान्‌जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना २८३- वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना २८४- अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम २८५- श्रीराम और रावणकी सेनाओंका द्वन्द्वयुद्ध २८६- प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दुःखी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना २८७- कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध २८८- इन्द्रजित्‌का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा २८९- श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्‌का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना २९०- राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध २९१- श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना २९२- मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन

(पतिव्रतामाहात्म्यपर्व)

२९३- राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण

२९४- सावित्रीका सत्यवान्‌के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय २९५- सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना २९६- सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्‌के साथ उसका वनमें जाना २९७- सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान्‌को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान २९८- पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान्‌के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्‌का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वर-प्राप्तिका विवरण बताना २९९- शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति

(कुण्डलाहरणपर्व)

३००- सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना ३०१- सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना ३०२- सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय ३०३- कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना ३०४- कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या ३०५- कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना ३०६- कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद ३०७- सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन ३०८- कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना ३०९- अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन ३१०- इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना

(आरणेयपर्व)

३११- ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन-काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दुःखी होना ३१२- पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना ३१३- यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना ३१४- यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना ३१५- अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोका-कुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना ३१६- वनपर्व-श्रवण-महिमा

विराटपर्व

(पाण्डवप्रवेशपर्व)

१- विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन २- भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश ३- नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन ४- धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना ५- पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र-शस्त्र रखना ६- युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना ७- युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना ८- भीमसेनका राजा विराटकी सभामें प्रवेश और राजाके द्वारा आश्वासन पान ९- द्रौपदीका सैरन्ध्रीके वेशमें विराटके रनिवासमें जाकर रानी सुदेष्णासे वार्तालाप करना और वहाँ निवास पाना १०- सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति ११- अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना १२- नकुलका विराटके अश्वोंकी देख-रेखमें नियुक्त होना

(समयपालनपर्व)

१३- भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध

(कीचकवधपर्व)

१४- कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणय-याचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना १५- रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना १६- कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान १७- द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना १८- द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्गार प्रकट करना

१९- पाण्डवोंके दुःखसे दुःखित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप २०- द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना २१- भीमसेन और द्रौपदीका संवाद २२- कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचक-वध २३- उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशान-भूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना २४- द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत

(गोहरणपर्व)

२५- दुर्योधनके पास उसके गुप्तचरोंका आना और उनका पाण्डवोंके विषयमें कुछ पता न लगा, यह बताकर कीचकवधका वृत्तान्त सुनाना २६- दुर्योधनका सभासदोंसे पाण्डवोंका पता लगानेके लिये परामर्श तथा इस विषयमें कर्ण और दुःशासनकी सम्मति २७- आचार्य द्रोणकी सम्मति २८- युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति २९- कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय ३०- सुशर्माके प्रस्तावके अनुसार त्रिगतों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा ३१- चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान ३२- मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध ३३- सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना ३४- राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा ३५- कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना ३६- उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना ३७- बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान ३८- उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना ३९- द्रोणाचार्यद्वारा अर्जुनके अलौकिक पराक्रमकी प्रशंसा ४०- अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश ४१- उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना

४२- उत्तरका बृहन्नलासे पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्रोंके विषयमें प्रश्न करना ४३- बृहन्नलाद्वारा उत्तरको पाण्डवोंके आयुधोंका परिचय कराना ४४- अर्जुनका उत्तरकुमारसे अपना और अपने भाइयोंका यथार्थ परिचय देना ४५- अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण ४६- उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पातसूचक अपशकुनोंका वर्णन ४७- दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति ४८- कर्णकी आत्मप्रशंसापूर्ण अहंकारोक्ति ४९- कृपाचार्यका कर्णको फटकारते हुए युद्धके विषयमें अपना विचार बताना ५०- अश्वत्थामाके उद्गार ५१- भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न ५२- पितामह भीष्मकी सम्मति ५३- अर्जुनका दुर्योधनकी सेनापर आक्रमण करके गौओंको लौटा लेना ५४- अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित्का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन ५५- अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना ५६- अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये देवताओंका आकाशमें विमानोंपर आगमन ५७- कृपाचार्य और अर्जुनका युद्ध तथा कौरवपक्षके सैनिकोंद्वारा कृपाचार्यको हटा ले जाना ५८- अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन ५९- अश्वत्थामाके साथ अर्जुनका युद्ध ६०- अर्जुन और कर्णका संवाद तथा कर्णका अर्जुनसे हारकर भागना ६१- अर्जुनका उत्तरकुमारको आस्वासन तथा अर्जुनसे दुःशासन आदिकी पराजय ६२- अर्जुनका सब योद्धाओं और महारथियोंके साथ युद्ध ६३- अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना ६४- अर्जुन और भीष्मका अद्भुत युद्ध तथा मूर्छित भीष्मका सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना

६५- अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओं-सहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना ६६- अर्जुनके द्वारा समस्त कौरवदलकी पराजय तथा कौरवोंका स्वदेशको प्रस्थान ६७- विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान ६८- राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना ६९- राजा विराट और उत्तरकी विजयके विषयमें बातचीत

(वैवाहिकपर्व)

७०- अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना ७१- विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना ७२- अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह

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चित्र-सूची

सादा

१- श्रीकृष्णके द्वारा द्रौपदीको आश्वासन २- द्रौपदी और भीमसेनका युधिष्ठिरसे संवाद ३- अर्जुनकी तपस्या ४- अर्जुनका किरातवेषधारी भगवान् शिवपर बाण चलाना ५- नलकी पहचानके लिये दमयन्तीकी लोक-पालोंसे प्रार्थना ६- सती दमयन्तीके तेजसे पापी व्याधका विनाश ७- भगवान् शंकरका मंकणक मुनिको नृत्य करनेसे रोकना ८- देवताओंद्वारा वृत्रासुरके वधके लिये दधीचिसे उनकी अस्थियोंकी याचना ९- देवराज इन्द्रका वज्रके प्रहारसे वृत्रासुरका वध करना १०- महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निसे सगरपुत्रोंका भस्म होना ११- महर्षि अगस्त्यका समुद्रपान १२- भगवान् परशुरामद्वारा सहस्रार्जुनका वध १३- प्रभासक्षेत्रमें पाण्डवोंकी यादवोंसे भेंट १४- राजा शिबिका कबूतरकी रक्षाके लिये बाजको अपने शरीरका मांस काटकर देना १५- द्रौपदीका भीमसेनको सौगन्धिक पुष्प भेंट करके वैसे ही और पुष्प लानेका आग्रह १६- स्वर्गसे लौटकर अर्जुन धर्मराजको प्रणाम कर रहे हैं १७- वनमें पाण्डवोंसे श्रीकृष्ण-सत्यभामाका मिलना १८- तपस्वीके वेशमें मण्डूकराजका राजाको आश्वासन १९- ययातिसे ब्राह्मणकी याचना २०- भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका जाँघोंपर वध २१- कौशिक ब्राह्मण और माता-पिताके भक्त धर्मव्याध २२- कार्तिकेयके द्वारा महिषासुरका वध २३- द्रौपदी-सत्यभामा-संवाद २४- अर्जुन-चित्रसेन-युद्ध २५- सीताजीका रावणको फटकारना २६- हनुमान्जीकी श्रीसीताजीसे भेंट २७- यम-सावित्री २८- कर्णको इन्द्रका शक्ति-दान

वनपर्व

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

वनपर्व

अरण्यपर्व

प्रथमोऽध्यायः

पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
'अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।

जनमेजय उवाच

एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः ।
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम ॥ १ ॥
श्राविताः परुषा वाचः सृजद्भिर्वैरमुत्तमम् ।
किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः ॥ २ ॥
**जनमेजयने पूछा—**विप्रवर! मन्त्रियोंसहित धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंने जब इस प्रकार कपटपूर्वक कुन्तीकुमारोंको जूएमें हराकर कुपित कर दिया और घोर वैरकी नींव डालते हुए उन्हें अत्यन्त कठोर बातें सुनायीं, तब मेरे पूर्वपितामह युधिष्ठिर आदि कुरुवंशियोंने क्या किया? ॥ १-२ ॥

कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमेयुषः ।
वने विजह्रिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः ॥ ३ ॥

तथा जो सहसा ऐश्वर्यसे वंचित हो जानेके कारण महान् दुःखमें पड़ गये थे, उन इन्द्रके तुल्य तेजस्वी पाण्डवोंने वनमें किस प्रकार विचरण किया? ॥ ३ ॥ के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान् व्यसनमुत्तमम् ।
किमाचाराः किमाहाराः क्व च वासो महात्मनाम् ॥ ४ ॥
उस भारी संकटमें पड़े हुए पाण्डवोंके साथ वनमें कौन-कौन गये थे? वनमें वे किस आचार-व्यवहारसे रहते थे? क्या खाते थे? और उन महात्माओंका निवास-स्थान कहाँ था? ॥ ४ ॥
कथं च द्वादश समा वने तेषां महामुने ।
व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ शूराणामरिघातिनाम् ॥ ५ ॥
महामुने! ब्राह्मणश्रेष्ठ! शत्रुओंका संहार करनेवाले उन शूरवीर महारथियोंके बारह वर्ष वनमें किस प्रकार बीते? ॥ ५ ॥
कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोषिताम् ।
पतिव्रता महाभागा सततं सत्यवादिनी ॥ ६ ॥
वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत ।
एतदाचक्ष्व मे सर्वं विस्तरेण तपोधन ॥ ७ ॥
तपोधन! संसारकी समस्त सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ, पतिव्रता एवं सदा सत्य बोलनेवाली वह महाभागा राजकुमारी द्रौपदी, जो दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं थी, वनवासके भयंकर कष्टको कैसे सह सकी? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ ६-७ ॥
श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम् ।
कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे ॥ ८ ॥
ब्रह्मन्! मैं आपके द्वारा कहे जाते हुए महान् पराक्रम और तेजसे सम्पन्न पाण्डवोंके चरित्रको सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें अत्यन्त कौतूहल हो रहा है ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः ।
धार्तराष्ट्रैः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! इस प्रकार मन्त्रियोंसहित दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंद्वारा जूएमें पराजित करके क्रुद्ध किये हुए कुन्तीकुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ९ ॥
वर्धमानपुरद्वारादभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः ।
उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया ॥ १० ॥
वर्धमानपुरकी दिशामें स्थित नगरद्वारसे निकलकर शस्त्रधारी पाण्डवोंने द्रौपदीके साथ उत्तराभिमुख होकर यात्रा आरम्भ की ॥ १० ॥

इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परि चतुर्दश ।
रथैरनुययुः शीघ्रैः स्त्रिय आदाय सर्वशः ॥ ११ ॥
इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक सारी स्त्रियोंको शीघ्रगामी रथोंपर बिठाकर उनके पीछे-पीछे चले ॥ ११ ॥

गतानेतान् विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः ।
गर्हयन्तोऽसकृद् भीष्मविदुरद्रोणगौतमान् ॥ १२ ॥
ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम् ।
पाण्डव वनकी ओर गये हैं, यह जानकर हस्तिनापुरके निवासी शोकसे पीडित हो बिना किसी भयके भीष्म, विदुर, द्रोण और कृपाचार्यकी बारंबार निन्दा करते हुए एक-दूसरेसे मिलकर इस प्रकार कहने लगे ॥ १२ १/२ ॥

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पौरा ऊचुः

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नेदमस्ति कुलं सर्वं न वयं न च नो गृहाः ॥ १३ ॥
यत्र दुर्योधनः पापः सौबलेनाभिपालितः ।
कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति ॥ १४ ॥