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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

अनात्मचिन्तानुपपत्तिः। पारिशेष्यादात्मचिन्तैव। तस्मात्तदुपासनमस्मिन्पक्षे न विधातव्यम्, प्राप्तत्वात्।न रहनेसे अनात्मचिन्तनकी सम्भावना नहीं रहती। फलतः आत्मचिन्तन ही रह जाता है। अतः इस पक्षमें आत्मोपासनाका विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः प्राप्त है।
उक्तार्थमीमांसा<br>तिष्ठतु तावत्पाक्षिक्यात्मोपासनप्राप्तिर्नित्या वेति, अपूर्वविधिः स्यात्; ज्ञानोपासनयोरेकत्वे सत्यप्राप्तत्वात्। 'न स वेद' इति विज्ञानं प्रस्तुत्य 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यभिधानाद्वेदोपासनशब्दयोरेकार्थतावगम्यते। "अनेन ह्येतत्सर्वं वेद" "आत्मानमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च विज्ञानमुपासनम्। तस्य चाप्राप्तत्वाद्विध्येयत्वम्।शङ्का—आत्मोपासनकी प्राप्ति पाक्षिक है अथवा नित्य है—इस विचारको अभी रहने दो, यह तो अपूर्वविधि ही है, क्योंकि यहाँ ज्ञान और उपासनाका एक ही अर्थ होनेके कारण वह स्वतः प्राप्त नहीं है। 'न स वेद' (वह नहीं जानता) इस वाक्यसे विज्ञानका आरम्भ कर 'आत्मेत्येवोपासीत' इस प्रकार कहनेके कारण यहाँ 'वेद' और 'उपासन' इन शब्दोंकी एकार्थता ज्ञात होती है। "इससे इस सबको जान लेता है" "आत्माको ही जाना" इत्यादि श्रुतियोंसे भी विज्ञान उपासनाहीका नाम है। और वह (उपासना) अप्राप्त होनेके कारण विधिकी योग्यता रखती है।¹
न च स्वरूपान्वाख्याने पुरुषप्रवृत्तिरुपपद्यते, तस्मादपूर्व-इसके सिवा स्वरूपके अनुवादमें पुरुषकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं

१. क्योंकि उपासना मानस कर्म है, वह स्वतः प्राप्त नहीं होता; इसलिये उसके लिये विधिकी आवश्यकता है।

२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विधिरेवायम् । कर्मविधिसामान्याच्च । यथा 'यजेत' 'जुहुयात्' इत्यादयः कर्मविधयः, न तैरस्य "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्यात्मोपासनविधेर्विशेषोऽवगम्यते । मानसक्रियात्वाच्च विज्ञानस्य; तथा 'यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां मनसा ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' इत्याद्या मानसी क्रिया विधीयते, तथा "आत्मेत्येवोपासीत" (१ । ४ । ७) "मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्या क्रियैव विधीयते ज्ञानात्मिका । तथावोचाम वेदोपासनशब्दयोरेकार्थत्वमिति ।<br><br>भावनांशत्रयोपपत्तेश्च—यथा | है; इसलिये यह अपूर्वविधि ही है। तथा कर्मविधिसे इसकी समानता होनेके कारण भी [ यही बात सिद्ध होती है ] । जिस प्रकार 'यजन करे' 'हवन करे' इत्यादि कर्मविधियाँ हैं, उनसे "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" "अयि मैत्रेयि ! यह आत्मा द्रष्टव्य है" इत्यादि आत्मोपासनसम्बन्धी विधियोंका कोई अन्तर नहीं जान पड़ता । तथा विज्ञान भी मानसक्रिया ही है [ इसलिये भी यह विधि है ] । जिस प्रकार 'जिस देवताके लिये हवि ग्रहण किया जाय उसका 'वषट्कार' करते हुए मनसे ध्यान करे' इत्यादिरूपसे मानसी क्रियाका विधान किया जाता है उसी प्रकार "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे", "आत्माका मनन करना चाहिये, निदिध्यासन करना चाहिये" इत्यादि रूपसे ज्ञानात्मिका क्रियाका ही विधान किया जाता है । तथा 'वेद' और 'उपासन' शब्दोंका एक ही अर्थ है—यह हम कह ही चुके हैं ।<br><br>इसके सिवा इस वाक्यमें भावनाके [ फल, करण और इतिकर्तव्यता-रूप ] तीनों अंश सम्भव होनेके |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७


[शाङ्करभाष्यम्][भाष्यार्थ]
हि यजेत इत्यस्यां भावनायाम्-किं केन कथम् इति भाव्याद्याकाङ्क्षापनयकारणमंशत्रयमवगम्यते, तथा उपासीत इत्यस्यामपि भावनायां विधीयमानायाम् किमुपासीत ? केनोपासीत? कथमुपासीत? इत्यस्यामाकाङ्क्षायाम् आत्मानमुपासीत मनसा त्यागब्रह्मचर्यशमदमोपरमतितिक्षादीतिकर्तव्यतासंयुक्तः इत्यादि शास्त्रेणैव समर्थ्यतेऽशत्रयम् । यथा च कृत्स्नस्य दर्शपूर्णमासादिप्रकरणस्य दर्शपूर्णमासादिविध्युद्देशत्वेनोपयोगः, एवमौपनिषदाम् आत्मोपासनप्रकरणस्य आत्मोपासनविध्युद्देशत्वेनैवोपयोगः। "नेति नेति" ( २ । ३ । ६ ) "अस्थूलम्" (३।८।८) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६ । २ । १) 'अशना-कारण भी यह विधिवाक्य है। जिस प्रकार 'यजेत' ( यजन करे ) इस भावनामें 'किस उद्देश्यसे किस साधनसे और किस प्रकार [ यजन करे ]' ऐसी भाव्यादिसम्बन्धिनी आकाङ्क्षाओंकी निवृत्तिके कारणभूत तीन अंश देखे जाते हैं, उसी प्रकार 'उपासीत' इस विधान की जानेवाली भावनामें भी 'किसकी उपासना करे?' 'किसके द्वारा उपासना करे?' और 'किस प्रकार उपासना करे?' ऐसी आकाङ्क्षा होनेपर 'आत्माकी उपासना करे', 'मनसे करे' तथा 'त्याग, ब्रह्मचर्य, शम, दम, उपरति तथा तितिक्षादिरूप इतिकर्तव्यतासे युक्त होकर करे' इत्यादि शास्त्रसे ही तीन अंशोंका समर्थन होता है। तथा जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादिसम्बन्धी शास्त्रके सम्पूर्ण प्रकरणका दर्शपूर्णमासकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है उसी प्रकार उपनिषदोंके आत्मोपासनसम्बन्धी प्रकरणका भी आत्मोपासनकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है । "नेति नेति" "अस्थूलम्" "एकमेवाद्वितीयम्"

१. 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इत्यादि शास्त्र आत्मज्ञानके साधनका निरूपण करता है।

२१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| याद्यतीतः” इत्येवमादिवाक्यानाम् उपास्यआत्मस्वरूपविशेषसमर्पणेनोपयोगः। फलं च मोक्षोऽविद्यानिवृत्तिर्वा। | “अशनायाद्यतीतः” इत्यादि शास्त्रवाक्योंका उपयोग उपास्य आत्माके विशेष रूपको समर्पण करनेमें है तथा उसका फल मोक्ष या अविद्याकी निवृत्ति है। | | अपरे वर्णयन्ति उपासनेनात्मविषयं विशिष्टं विज्ञानान्तरं भावयेत्, तेनात्मा ज्ञायते, अविद्यानिवर्तकं च तदेव, नात्मविषयं वेदवाक्यजनितं विज्ञानमिति। एतस्मिन्नर्थे वचनान्यपि—“विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” (बृ० उ० ४।४।२१) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (२।४।५) “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः” (छा० उ० ४।७।१) इत्यादीनि। | कुछ अन्य लोगोंका कथन है कि उपासनाके द्वारा आत्मविषयक अन्य विशिष्ट विज्ञानकी भावना करनी चाहिये, उससे आत्माका ज्ञान होता है और वही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है। आत्मविषयक वेदवाक्यजनित विज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है। इस विषयमें ये वचन भी हैं—“उसे जानकर तद्विषयक बुद्धि करे” आत्माका साक्षात्कार करे तथा उसका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे”, “उसका अन्वेषण करना चाहिये तथा उसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये” इत्यादि। | | न, अर्थान्तराभावात्। न च ‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यपूर्वविधिः; कस्मात्? आत्मस्वरूपकथनानात्मप्रतिषेधवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण अर्थान्तरस्य कर्तव्यस्य मानसस्य बाह्यस्य | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्यका कोई अर्थान्तर नहीं हो सकता। ‘आत्मेत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मस्वरूपके कथन और अनात्मप्रतिषेधवाक्यजनित विज्ञानसे भिन्न इसका मानसिक या बाह्य कर्तव्यसम्बन्धी कोई दूसरा अर्थ |

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २१९ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ२१९
संस्कृतहिन्दी
वाभावात्। तत्र हि विधेः साफल्यं यत्र विधिवाक्यश्रवणमात्रजनितविज्ञानव्यतिरेकेण पुरुषप्रवृत्तिर्गम्यते। यथा "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादौ। न हि दर्शपूर्णमासविधिवाक्यजनितविज्ञानमेव दर्शपूर्णमासानुष्ठानम्; तच्चाधिकाराद्यपेक्षानुभावि।नहीं हो सकता। विधिकी सफलता वहीं होती है जहाँ विधिवाक्यके श्रवणमात्रसे होनेवाले विज्ञानके सिवा कोई अन्य पुरुषप्रवृत्ति भी जानी जाय। जैसे "स्वर्गकी कामनावाला दर्श-पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" इत्यादि वाक्योंमें। यहाँ दर्श-पूर्णमाससम्बन्धी विधिवाक्यसे होनेवाला विज्ञान ही दर्श-पूर्णमास यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं है; वह तो अधिकारी आदिकी अपेक्षासे पीछे होनेवाला है।
न तु "नेति नेति" (२। ३। ६) इत्याद्यात्मप्रतिपादकवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण दर्शपूर्णमासादिवत्पुरुषव्यापारः सम्भवति। सर्वव्यापारोपशमहेतुत्वात् तद्वाक्यजनितविज्ञानस्य।किन्तु "नेति नेति" इत्यादि आत्मप्रतिपादक वाक्योंसे होनेवाले विज्ञानके सिवा उससे, दर्श-पूर्णमासादिके समान, कोई और पुरुषव्यापार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंसे होनेवाला विज्ञान तो सब प्रकारके व्यापारकी निवृत्तिका हेतु है। अतः उदासीन विज्ञान प्रवृत्तिका जनक नहीं हो सकता। इसके सिवा "एकमेवाद्वितीयम्" "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्य अब्रह्म और अनात्मविषयक विज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले भी हैं और उसकी निवृत्ति होनेपर प्रवृत्तिका होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति और पुरुषप्रवृत्तिमें विरोध है।
न ह्युदासीनविज्ञानं प्रवृत्तिजनकम्, अब्रह्मानात्मविज्ञाननिवर्तकत्वाच्च "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्येवमादिवाक्यानाम्। न च तन्निवृत्तौ प्रवृत्तिरुपपद्यते; विरोधात्।
वाक्यजनितविज्ञानमात्रान्नाब्र-पूर्व०-किन्तु वाक्यजनित विज्ञान-

२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| ज्ञानात्मविज्ञाननिवृत्तिरिति चेत् ? | मात्रसे ही अब्रह्म एवं अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती। | | न; "तत्त्वमसि" ( छा०उ० ६।८—१६) "नेति नेति" (बृ०उ०२।३।६) "आत्मैवेदम्" ( छा० उ० ७।२५।२) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) ब्रह्मैवेदममृतम्" (मु० उ० २।२।११) "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३।८।११) "तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि" (के०उ० १।४) इत्यादिवाक्यानां तद्वादित्वात्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि "तू वह है", "यह (कार्य) आत्मा नहीं है, यह (कारण) आत्मा नहीं है", "यह सब आत्मा ही है", "एक ही अद्वितीय है" "यह अमृत ब्रह्म ही है", "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है", "उसीको तू ब्रह्म जान" इत्यादि वाक्य उस (अनात्मप्रतिषेध) का ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। | | द्रष्टव्यविधेर्विषयसमर्पकाण्येतानीति चेत् ? | पूर्व०—ये तो ^१द्रष्टव्यविधिके विषयको समर्पण करनेवाले हैं। | | न, अर्थान्तराभावादित्युक्तोत्तरत्वात्। आत्मवस्तुस्वरूपसमर्पकैरेव वाक्यैः "तत्त्वमसि" इत्यादिभिः श्रवणकाल एव तद्दर्शनस्य कृतत्वाद् द्रष्टव्यविधेर्नानुष्ठानान्तरं कर्तव्यमित्युक्तोत्तरमेतत्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो; क्योंकि 'इनका अर्थान्तर नहीं हो सकता' ऐसा कहकर हम इसका उत्तर पहले ही दे चुके हैं। आत्मवस्तुके स्वरूपको समर्पण करनेवाले "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्योंसे ही उनके श्रवणकालमें ही आत्मदर्शन हो जानेके कारण द्रष्टव्यविधिसे कोई अन्य अनुष्ठान कर्त्तव्य नहीं है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। |


१. 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इस वाक्यसे होनेवाली विधि।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२१


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
आत्मस्वरूपान्वाख्यानमात्रेण आत्मविज्ञाने विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तत इति चेत् ?पूर्व०—किंतु बिना विधिके केवल आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रसे ही पुरुष आत्मविज्ञानमें प्रवृत्त नहीं हो सकता।
न, आत्मवादिवाक्यश्रवणेन आत्मविज्ञानस्य जनितत्वात्--किं भो कृतस्य करणम् ? तच्छ्रवणेऽपि न प्रवर्त्तत इति चेन्न, अनवस्थाप्रसङ्गात् । यथा आत्मवादिवाक्यार्थश्रवणे विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तते तथा विधिवाक्यार्थश्रवणेऽपि विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तिष्यत इति विध्यन्तरापेक्षा । तथा तदर्थश्रवणेऽपीत्यनवस्था प्रसज्येत ।सिद्धान्ती—ऐसा नहीं है क्योंकि आत्मविज्ञान तो आत्मवादी वाक्यके श्रवणमात्रसे ही उत्पन्न हो जाता है। फिर किये हुएको करनेका अर्थ ही क्या है ? यदि कहो कि [ विधिके बिना ] पुरुष उसे सुननेमें भी प्रवृत्त नहीं होता तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्थादोषका प्रसंग उपस्थित होता है। जिस प्रकार [ तुम्हारे मतानुसार ] पुरुष विधिके बिना आत्मवादी वाक्यके अर्थको श्रवण करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, इसी प्रकार वह विधिके बिना विधिवाक्यार्थको श्रवण करनेमें भी प्रवृत्त नहीं होगा, इसलिये एक दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी। इसी प्रकार उस विध्यन्तरका अर्थ श्रवण करनेमें भी अन्य विधिके बिना प्रवृत्त नहीं होगा—इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा।
वाक्यजनितात्मज्ञानस्मृतिसंततेः श्रवणविज्ञानमात्रादर्थान्तरत्वमिति चेत् ?पूर्व०—तो भी श्रवणविज्ञानमात्रसे वाक्यजनित आत्मज्ञानकी स्मृतिका प्रवाह तो दूसरी ही चीज है ?

२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
न, अर्थप्राप्तत्वात्। यदैवात्मप्रतिपादकवाक्यश्रवणाद् आत्मविषयं विज्ञानमुत्पद्यते, तदैव तदुत्पद्यमानं तद्विषयं मिथ्याज्ञानं निवर्तयदेवोत्पद्यते। आत्मविषयमिथ्याज्ञाननिवृत्तौ च तत्प्रभवाः स्मृतयो न भवन्ति स्वाभाविक्योऽनात्मवस्तुभेदविषयाः।सिद्धान्ती—नहीं, वह तो अर्थतः प्राप्त है। जिस समय भी आत्मप्रतिपादक वाक्यके श्रवणसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी समय वह उत्पन्न होनेवाला ज्ञान आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति करता हुआ ही उत्पन्न होता है; तथा आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर तज्जनित अनात्मवस्तुभेदविषयक स्वाभाविकी स्मृतियाँ भी नहीं होतीं।
अनर्थत्वावगतेश्च, आत्मावगतौ हि सत्यामन्यद्वस्त्वनर्थत्वेनावगम्यते, अनित्यदुःखाशुद्ध्यादिबहुदोषवत्त्वाद् आत्मवस्तुनश्च तद्विलक्षणत्वात्। तस्मादनात्मविज्ञानस्मृतीनाम् आत्मावगतेरभावप्राप्तिः। पारिशेष्यादात्मैकत्वविज्ञानस्मृतिसन्ततेरर्थत एव भावान्न विधेयत्वम्, शोकमोहभयायासादिदुःखदोषनिवर्तकत्वाच्च तत्स्मृतेः। विपरीतज्ञानप्रभवो हि शोकमोहादिदोषः। तथा चइसके सिवा अनात्मवस्तुविषयक स्मृतियाँ अनर्थकारिणी हैं—ऐसा बोध हो जानेसे भी उनकी आवृत्ति नहीं होती। आत्मज्ञान हो जानेपर अन्य वस्तुएँ अनर्थरूपसे ज्ञात होती हैं, क्योंकि वे अनित्यता, दुःख एवं अशुद्धि आदि अनेकों दोषोंसे युक्त हैं और आत्मवस्तु उनसे भिन्न स्वभावकी है। अतः आत्मज्ञान होनेपर अनात्मविज्ञानजनित स्मृतियोंका अभाव प्राप्त होता है। अन्ततोगत्वा आत्मैकत्वविज्ञानसम्बन्धी स्मृतिका प्रवाह अर्थतः प्राप्त होनेके कारण विधिका विषय नहीं है, क्योंकि आत्मस्मृति तो शोक, मोह, भय, श्रम आदि बहुत-से दुःख और दोषोंकी निवृत्ति करनेवाली है। शोकमोहादि दोष तो विपरीत ज्ञानसे ही होनेवाला है। इस विषयमें "उस

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २२३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २२३


संस्कृत मूलहिन्दी भाषार्थ
“तत्र को मोहः” (ईशा० ७) “विद्वान्न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० २।९।१) “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (बृ० उ० ४।२।४) “भिद्यते हृदयग्रन्थिः” (मु० उ० २।२।८) इत्यादिश्रुतयः ।अवस्थामें क्या मोह है”, “आत्मज्ञानी किसीसे भी भय नहीं मानता”, “हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है”, “हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है” इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं।
निरोधस्त्वर्थान्तरमिति चेत् ।<br><br>अथापि स्याच्चित्तवृत्तिनिरोधस्य वेदवाक्यजनितात्मविज्ञानादर्थान्तरत्वात्, तन्त्रान्तरेषु च कर्तव्यतयावगतत्वाद्बिधेयत्वमिति चेत् ?**पूर्व०—**तथापि ज्ञानसे भिन्न निरोध भी तो एक मोक्षका साधन है। तात्पर्य यह है कि वेदवाक्यजनित आत्मविज्ञानसे अर्थान्तर होने और शास्त्रान्तरमें [मोक्षप्राप्तिके लिये] कर्तव्यरूपसे ज्ञात होनेके कारण चित्तवृत्तिनिरोधकी विधेयता तो है ही।
न; मोक्षसाधनत्वेनानवगमात्। न हि वेदान्तेषु ब्रह्मात्मविज्ञानाद् अन्यत्परमपुरुषार्थसाधनत्वेनावगम्यते । “आत्मानमेवावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (१।४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २।१।१) “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “तस्य ताव-**सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह मोक्षके साधनरूपसे नहीं जाना जाता। वेदान्तशास्त्रोंमें ब्रह्मात्मविज्ञानके सिवा अन्य कुछ भी परमपुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूपसे नहीं जाना जाता; जैसा कि “आत्माको ही जाना”, “अतः वह सर्वरूप हो गया”, “ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है”, “जो भी उस परब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है,”

२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| देव चिरम्'' (६। १४। २)<br>''अभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद'' (बृ० उ० ४। ४। २५)<br>इत्येवमादिश्रुतिशतेभ्यः।<br>अनन्यसाधनत्वाच्च निरोधस्य। | ''उसके लिये तभीतक देरी है'',<br>''जो इस प्रकार जानता है अभय ब्रह्म ही हो जाता है'' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे सिद्ध होता है।<br><br>इसके सिवा निरोध भी किसी अन्य साधनसे सिद्ध होनेवाला नहीं | | न ह्यात्मविज्ञानतत्स्मृतिसन्तानव्यतिरेकेण चित्तवृत्तिनिरोधस्य साधनमस्ति। अभ्युपगम्येदमुक्तम्, न तु ब्रह्मविज्ञानव्यतिरेकेण अन्यन्मोक्षसाधनमवगम्यते। | है। अर्थात् आत्मविज्ञान और उसकी स्मृतिके प्रवाहके सिवा चित्तवृत्ति-निरोधका कोई अन्य साधन नहीं है। यह बात भी हम उसे मोक्षका साधन मानकर कहते हैं, वस्तुतः तो ब्रह्मविज्ञानके सिवा मोक्षका कोई दूसरा साधन जाननेमें ही नहीं आता। | | आकाङ्क्षाभावाच्च भावनाभावः। | [अब भावनात्रयका खण्डन करते हैं-] आत्मविज्ञानमें आकाङ्क्षाका अभाव होनेके कारण भावनाका भी अभाव है। | | भावनात्रय-खण्डनम्<br>यदुक्तं यजेतेत्यादौ किं केन कथम् इति भावनाकाङ्क्षायां फलसाधनेतिकर्त्तव्यताभिराकाङ्क्षापनयनं यथा, तद्वदिहाप्यात्मविज्ञानविधावप्युपपद्यत इति; तदसत्, ''एकमेवाद्वितीयम्'' (छा० उ० ६। | तुमने जो कहा कि 'यजेत' इत्यादि विधिमें 'किसका, किसके द्वारा, किस प्रकार [यजन करे],' ऐसी भावनाकी आकाङ्क्षा होनेपर जैसे फल, साधन और इतिकर्त्तव्यताके द्वारा उस आकाङ्क्षाकी निवृत्ति की जाती है उसी प्रकार यहाँ आत्मविज्ञानसम्बन्धी विधिमें भी उसका होना सम्भव है, सो तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि ''एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'' |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२६

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२६


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
२ । १) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) “नेति नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) “अनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २ । ५ । १९) “अयमात्मा ब्रह्म” (२ । ५ । १९) इत्यादिवाक्यार्थविज्ञानसमकालमेव सर्वाकाङ्क्षाविनिवृत्तेः । न च वाक्यार्थविज्ञाने विधिप्रयुक्तः प्रवर्तते विध्यन्तरप्रयुक्तौ चानवस्थादोषमवोचाम । न च “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिवाक्येषु विधिरवगम्यते । आत्मस्वरूपान्वाख्यानेनैवावसितत्वात् ।“तत्त्वमसि”, “नेति नेति”, “अनन्तरमबाह्यम्” “अयमात्मा ब्रह्म” इत्यादि वाक्योंके अर्थका ज्ञान होते ही सब प्रकारकी आकाङ्क्षाएँ निवृत्त हो जाती हैं । तथा वाक्यार्थके ज्ञानमें पुरुष विधिसे प्रेरित होकर प्रवृत्त नहीं होता । उसमें विध्यन्तरका प्रयोग माननेसे अनवस्था दोष आता है—यह हम ऊपर बतला चुके हैं । इसके सिवा “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादि वाक्योंमें विधि देखी भी नहीं जाती, क्योंकि उनका पर्यवसान तो आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रमें ही हो जाता है ।
वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वादप्रामाण्यमिति चेत् । अथापि स्याद्यथा “सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्” इत्येवमादौ वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वादप्रामाण्यम्, एवमात्मार्थवाक्यानामपीति चेत् ?पूर्व०—वस्तुस्वरूपके अनुवादमात्र होनेसे तो उनकी अप्रामाणिकता सिद्ध होती है । अर्थात् जैसे “सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्”<sup></sup> इत्यादि वाक्योंमें वस्तुके स्वरूपका अनुवादमात्र होनेसे उनकी प्रामाणिकता नहीं मानी जाती, उसी प्रकार आत्मविषयक वाक्योंकी भी प्रामाणिकता नहीं है—ऐसी बात हो तो ?
न; विशेषात् । न वाक्यस्य वस्त्वन्वाख्यानं क्रियान्वाख्यानंसिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन अर्थवादवाक्योंसे आत्मार्थवाक्योंकी विशेषता है । वस्तु या क्रियाका अनुवाद ही वाक्यको

१. वह (अग्नि) रोया और वह जो रोया वही उस रुद्रका रुद्रत्व है ।
बृ० उ० १५—

२२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२२६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| वा प्रामाण्याप्रामाण्यकारणम्, किं तर्हि? निश्चितफलवद्विज्ञानोत्पादकत्वम्। तद्यत्रास्ति तत्प्रमाणं वाक्यम्, यत्र नास्ति तदप्रमाणम्।<br><br>किञ्च भो पृच्छामस्त्वाम्—आत्मस्वरूपान्वाख्यानपरेषु वाक्येषु फलवन्निश्चितं च विज्ञानमुत्पद्यते, न वा ? उत्पद्यते चेत्कथमप्रामाण्यमिति? किं वा न पश्यसि अविद्याशोकमोहभयादिसंसारबीजदोषनिवृत्तिं विज्ञानफलम्। न शृणोषि वा किम् “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) “मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित्सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयतु” (छा० उ० ७।१।३) इत्येवमाद्युपनिषद्वाक्यशतानि ? एवं विद्यते किं सोऽरोदीदित्यादिषु निश्चितं फलवच्च विज्ञानम्। न चेद्विद्यतेऽस्त्वप्रामाण्यम्। तद- | प्रामाणिकताका अथवा अप्रामाणिकताका कारण नहीं है। तो फिर क्या है ? निश्चित फलवाले विज्ञानको उत्पन्न करना। वह जिसमें है वही वाक्य प्रामाणिक है और जिसमें नहीं है वही अप्रामाणिक है।<br><br>सो, भाई ! हम तुमसे यह पूछते हैं कि आत्मस्वरूपका निरूपण करनेवाले वाक्योंसे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न होता है या नहीं ? यदि उत्पन्न होता है तो उनकी अप्रामाणिकता कैसे हो सकती है ? क्या तुम उस विज्ञानका अविद्या, शोक, मोह और भय आदि संसारके बीजभूत दोषोंकी निवृत्तिरूप फल नहीं देखते ? क्या तुम “उस अवस्थामें एकत्व देखनेवालेको क्या मोह और क्या शोक है ?”, “[नारद कहते हैं—] भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैं शोक करता हूँ, ऐसे मुझको, हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये” इत्यादि प्रकारके सैकड़ों उपनिषद्वाक्य नहीं सुनते ? क्या ‘सोऽरोदीत्’ इत्यादि वाक्योंमें इसी प्रकार निश्चित और सफल विज्ञान है ? यदि नहीं है तो भले ही उनकी अप्रामाणिकता |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७


प्रामाण्ये फलवन्निश्चितविज्ञानोत्पादकस्य किमित्यप्रामाण्यं स्यात् ?<br><br>तदप्रामाण्ये च दर्शपूर्णमासादिवाक्येषु को विश्रम्भः ।रहे। उनकी अप्रामाणिकतासे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न करनेवाले वाक्योंकी अप्रामाणिकता क्यों होनी चाहिये ? यदि उनकी अप्रामाणिकता मानी जाय तो दर्शपूर्णमासादिविषयक वाक्योंमें ही क्या विश्वास किया जा सकता है ?
ननु दर्शपूर्णमासादिवाक्यानां पुरुषप्रवृत्तिविज्ञानोत्पादकत्वात् प्रामाण्यम् । आत्मविज्ञानवाक्येषु तन्नास्तीति ।पूर्व०—दर्श-पूर्णमासादि वाक्योंकी प्रामाणिकता तो पुरुषप्रवृत्तिसम्बन्धी विज्ञानके उत्पन्न करनेवाले होनेसे है; आत्मविज्ञानविषयक वाक्योंमें यह बात नहीं है ।
सत्यमेवम्, नैष दोषः । प्रामाण्यकारणोपपत्तेः । प्रामाण्यकारणं च यथोक्तमेव, नान्यत् ।सिद्धान्ती—ठीक है, ऐसा ही है; किंतु यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आत्मविज्ञानविषयक वाक्योंमें भी प्रामाणिकताका युक्तियुक्त कारण उपलब्ध है। प्रामाणिकताका कारण जैसा ऊपर बताया गया है वही है, दूसरा नहीं ।
अलङ्कारश्चायम्, यत्सर्वप्रवृत्तिबीजनिरोधफलवद्विज्ञानोत्पादकत्वम् आत्मप्रतिपादकवाक्यानां नाप्रामाण्यकारणम् ।सब प्रकारकी प्रवृत्तिके बीजका निरोध जिसका फल है—ऐसे विज्ञानका उत्पन्न करनेवाला होना तो आत्मप्रतिपादक वाक्योंका भूषण है, यह उनकी अप्रामाणिकताका कारण नहीं हो सकता ।
यत्तूक्तम् "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" (बृ० उ० ४ । ४ । २१) इत्यादिवचनानां वाक्यार्थविज्ञानव्यतिरेकेण उपासनार्थ-इसके सिवा यह जो कहा कि "आत्माको जानकर तद्विषयक बुद्धि करे" इत्यादि वाक्य वाक्यार्थविज्ञानसे अलग उपासनाके लिये हैं, सो यह

२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२२८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
त्वमिति, सत्यमेतत्, किन्तु नापूर्वविध्यर्थता; पक्षे प्राप्तस्य नियमार्थतैव ।तो ठीक है; किंतु यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती, बल्कि एक पक्षमें प्राप्त होनेवाली उपासनाका नियम करनेके लिये ही है।
कथं पुनरुपासनस्य पक्षप्राप्तिः?पूर्व०—किंतु एक पक्षमें उपासनाकी प्राप्ति कैसे हो सकती है?
यावता पारिशेष्यादात्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिः नित्यैवेत्यभिहितम्।क्योंकि ऊपर यह कहा जा चुका है कि परिशेषतः आत्मविज्ञान-सम्बन्धिनी स्मृतिका प्रवाह नित्य प्राप्त ही है।
(आत्मोपासन-वाक्यानां नियम-विध्यर्थत्वसाधनम्)<br><br>बाढम्, यद्यप्येवम्; शरीरारम्भकस्य कर्मणो नियतफलत्वात्, सम्यग्ज्ञानप्राप्तावप्यवश्यम्भाविनी प्रवृत्तिर्वाङ्मनःकायानाम्, लब्धवृत्तेः कर्मणो बलीयस्त्वात् मुक्तेष्वादिप्रवृत्तिवत् । तेन पक्षे प्राप्तं ज्ञानप्रवृत्तिदौर्बल्यम्। तस्मात्त्यागवैराग्यादि-साधनबलावलम्बेन आत्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिर्नियन्तव्या भवति, न त्वपूर्वा कर्तव्या; प्राप्तत्वाद्सिद्धान्ती—ठीक है, यद्यपि ऐसा ही है; तथापि शरीरारम्भक कर्मका फल निश्चित होनेके कारण सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी वाणी, मन और शरीरकी चेष्टा अवश्यम्भाविनी ही है, क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो चुका है वह तो छूटे हुए बाण आदिकी प्रवृत्तिके समान अधिक बलवान् है ही। अतः एक पक्षमें ज्ञानप्रवृत्तिकी दुर्बलता प्राप्त होती है। अतः त्याग-वैराग्यादि साधनोंके बलका आश्रय लेकर आत्मविज्ञानस्मृतिके प्रवाहका नियमन ही करना होता है, उसे अपूर्व रूपसे नहीं करना पड़ता, क्योंकि

१. अर्थात् आत्मज्ञानसे अनात्मचिन्तनकी निवृत्ति हो जानेपर अन्तमें।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
इत्यवोचाम। तस्मात् प्राप्तविज्ञान-स्मृतिसन्ताननियमविध्यर्थानि “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि-वाक्यानि, अन्यार्थासम्भवात्।हम कह चुके हैं कि आत्मज्ञान होनेपर वह प्राप्त है ही। अतः “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि वाक्य प्राप्त विज्ञानकी स्मृतिके प्रवाहकी नियम-विधिके लिये ही हैं, क्योंकि उनका अन्य अर्थ होना असम्भव है।
नन्वनात्मोपासनमिदम्, इति-शब्दप्रयोगात्; यथा 'प्रियमित्‍येतदुपासीत' इत्यादौ न प्रियादि-गुणा एवोपास्याः, किं तर्हि ? प्रियादिगुणवत्प्राणाद्येवोपास्यम्; तथेहापि इतिपरात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मगुणवदनात्मवस्तूपास्यमिति गम्यते।पूर्व०—किंतु 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अनात्मोपासना जान पड़ती है। जिस प्रकार 'प्रियमित्‍येतदुपासीत' इत्यादि वाक्योंमें प्रियादि गुण ही उपास्य नहीं हैं; तो फिर कौन उपास्य है ? प्रियादि गुणवान् प्राणादि ही उपास्य हैं, उसी प्रकार यहाँ भी 'इति' जिसके आगे है ऐसे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग होनेसे यही जान पड़ता है कि आत्माके समान गुणोंवाली अनात्मवस्तु ही उपास्य है।
आत्मोपास्यत्ववाक्यवैलक्षण्याच्च, परेण च वक्ष्यति—“आत्मानमेव लोकमुपासीत” (१।४।१५) इति। तत्र च वाक्ये आत्मैवो-पास्यत्वेनाभिप्रेतो द्वितीयाश्रवणा-दात्मानमेवेति। इह तु न द्वितीयाइसके सिवा आत्माका उपास्यत्व बतलानेवाले वाक्यसे इसकी विलक्ष-णता होनेके कारण भी यह वाक्य अनात्मोपासनसम्बन्धी ही है। आगे श्रुति कहेगी “आत्मानमेवं लोक-मुपासीत ।” वहाँ इस वाक्यमें उपास्यरूपसे आत्मा ही अभिप्रेत है, क्योंकि 'आत्मानमेव' इस प्रकार 'आत्मानम्' पदमें वहाँ द्वितीया सुनी जाती है; किंतु यहाँ द्वितीया

१. यह प्रिय है—इस प्रकार उपासना करे।
२. 'आत्मा' रूप ही लोककी उपासना करे।

२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| श्रूयते। इतिपरश्चात्मशब्दः 'आत्मेत्येवोपासीत' इति। अतो नात्मोपास्य आत्मगुणश्चान्य इति त्ववगम्यते। | नहीं सुनी जाती और 'आत्मेत्येवोपासीत' इसमें 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' भी है। अतः यही ज्ञात होता है कि यहाँ 'आत्मा' उपास्य नहीं है, अपितु आत्माके समान गुणवाला उससे भिन्न—अनात्मा ही उपास्य है। | | न; वाक्यशेष आत्मन उपास्यत्वेनावगमात्। अस्यैव वाक्यस्य शेषे आत्मैवोपास्यत्वेनावगम्यते—"तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा", (बृ० उ० १।४।७) "अन्तरतरं यदयमात्मा" (बृ०उ० १।४।८) "आत्मानमेवावेत्" (१।४।१०) इति। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वाक्यशेषमें आत्मा ही उपास्यरूपसे जाना गया है। इसी वाक्यके अन्तमें उपास्यरूपसे आत्मा ही जाना जाता है, यथा—"यह जो आत्मा है वही इस सम्पूर्ण जगत्का प्राप्तव्य है", "यह जो आत्मा है अन्तरतर है", "आत्माहीको जाना" इत्यादि। | | प्रविष्टस्य दर्शनप्रतिषेधादनुपास्यत्वमिति चेत्। यस्यात्मनः प्रवेश उक्तः तस्यैव दर्शनं वार्यते "तं न पश्यन्ति" (४।३।२३) इति प्रकृतोपादानात्। तस्मादात्मनोऽनुपास्यत्वमेवेति चेत्! | पूर्व०- किंतु [शरीरके भीतर] प्रविष्ट आत्माके दर्शनका प्रतिषेध होनेसे तो उसका अनुपास्यत्व सिद्ध होता है। जिस आत्माका प्रवेश बतलाया गया है उसीके दर्शनका "तं¹ न पश्यन्ति" इस वाक्यके 'तम्' पदसे ग्रहण करके निषेध करते हैं। अतः आत्माका अनुपास्यत्व ही सिद्ध होता है। | | न, अकृत्स्नत्वदोषात्। दर्शन- | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, वह तो असम्पूर्णतारूपदोषके कारण |


१. उसे नहीं देखते।

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
प्रतिषेधोऽकृत्स्नत्वदोषाभिप्रायेण नात्मोपास्यत्वप्रतिषेधाय । प्राणनादिक्रियाविशिष्टत्वेन विशेषणात् । आत्मनश्चेदुपास्यत्वमनभिप्रेतं प्राणनाद्येकैकक्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽकृत्स्नत्ववचनमनर्थकं स्यात् “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति” (१ । ४ । ७) इति । अतोऽनेकैकविशिष्टस्त्वात्मा कृत्स्नत्वादुपास्य एवेति सिद्धम् ।<br><br>यस्त्वात्मशब्दस्य इतिपरः प्रयोगः, आत्मशब्दप्रत्यययोः आत्मतत्त्वस्य परमार्थतोऽविषयत्वज्ञापनार्थम्, अन्यथा आत्मानमुपासीतेत्येवमवक्ष्यत् । तथा चार्थादात्मनि शब्दप्रत्ययावनुज्ञातौ स्याताम्; तच्चानिष्टम्, “नेति नेति” (२ । ३ । ६) “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”, (२ । ४ । १४) “अविज्ञातं विज्ञातृ” (३ । ८ । १२) “यतोहै । अर्थात् आत्माके दर्शनका प्रतिषेध तो उसमें असम्पूर्णतारूप दोषके अभिप्रायसे है, आत्माके उपास्यत्वका प्रतिषेध करनेके अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि प्राणनादि क्रियाविशिष्टत्वसे उसे विशेषित किया गया है । यदि आत्माका उपास्यत्व अभिप्रेत न होता तो “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति”¹ इस वाक्यसे प्राणनादि एक-एक क्रियासे विशिष्ट आत्माको असम्पूर्ण बतलाना व्यर्थ होता । अतः यह सिद्ध होता है कि जो एक-एक क्रियासे विशिष्ट नहीं है, वह आत्मा तो पूर्ण होनेके कारण उपास्य ही है ।<br><br>तथा ‘आत्मा’ शब्दका जो उसके आगे ‘इति’ शब्द लगाकर प्रयोग किया गया है वह आत्मतत्त्वको परमार्थतः आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययका अविषय सूचित करनेके लिये है । नहीं तो श्रुति ‘आत्मानमुपासीत’—आत्माकी उपासना करे—ऐसा ही कहती । ऐसा कहनेपर आत्मामें स्वतः ही आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययकी विषयता अनुमोदित हो जाती और ऐसा होना “यह नहीं है, यह नहीं है”, “अरे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किससे जाने”, “वह [स्वयं] अविज्ञात [किंतु दूसरोंका] विज्ञाता

१. अतः एक-एक क्रियासे विशिष्ट होनेके कारण यह असम्पूर्ण ही होता है ।

| २३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

| २३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'' (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः। यत्तु ''आत्मानमेव लोकमुपासीत'' (१।४।१५) इति तदनात्मोपासनप्रसङ्गनिवृत्तिपरत्वान्न वाक्यान्तरम्।है'' "जहाँसे वाणी उसे न पाकर मनके सहित लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार इष्ट नहीं है। और "आत्मारूप ही लोककी उपासना करे" ऐसी जो श्रुति है वह अनात्मोपासनके प्रसंगकी निवृत्ति करनेवाली होनेसे कोई भिन्न प्रकारका वाक्य नहीं है।
कथमात्मैवोपास्यः<br>अविज्ञातत्वसामान्यादात्मा ज्ञातव्योऽनात्मा च। तत्र कस्मादात्मोपासने एव यत्न आस्थीयते “आत्मत्येवोपासीत” इति नेतरविज्ञान इति ?पूर्व०-किंतु पूर्णतया ज्ञात न होनेमें समान होनेके कारण तो आत्मा और अनात्मा दोनों ही ज्ञातव्य हैं। फिर इनमेंसे "आत्मत्येवोपासीत" इस वाक्यके अनुसार आत्मोपासनामें ही यत्न करनेकी आस्था क्यों की जाय, अनात्मोपासनामें क्यों नहीं ?
अत्रोच्यते—तदेतदेव प्रकृतं पदनीयं गमनीयं नान्यत्। अस्य सर्वस्येति निर्धारणार्था षष्ठी। अस्मिन्सर्वस्मिन्नित्यर्थः। यदयमात्मा यदेतदात्मतत्त्वम्।सिद्धान्ती—इसपर हमारा कथन है कि इन सबमें यह प्रकृत आत्मा ही पदनीय—गन्तव्य है, अन्य (अनात्मा) नहीं। 'अस्य सर्वस्य' इन पदोंमें निश्चयार्थिका षष्ठी है; इसका तात्पर्य 'अस्मिन् सर्वस्मिन्' (इस सबमें) ऐसा है। 'यदयमात्मा' अर्थात् यह जो आत्मतत्त्व है [वह सबमें गन्तव्य—ज्ञातव्य है]।
किं न विज्ञातव्यमेवान्यत् ? न; किं तर्हि ? ज्ञातव्यत्वेऽपि न पृथग्ज्ञानान्तरमपेक्षत आत्मज्ञानात्। कस्मात् ? अनेनात्मनातो क्या अन्य ज्ञातव्य ही नहीं है ? ऐसी बात नहीं है। तो क्या है ?—ज्ञातव्य होनेपर भी उसे आत्मज्ञानसे भिन्न किस ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं है। क्यों नहीं है ?

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३३


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
ज्ञातेन हि यस्मादेतत्सर्वमनात्मजातम् अन्यद्यत्तत्सर्वं समस्तं वेद जानाति।क्योंकि इस आत्माके जान लेनेपर ही अन्य जो कुछ अनात्मजात है उस सभीको पुरुष जान लेता है।
नन्वन्यज्ञानेनान्यन्न ज्ञायत इति।पूर्व०—किंतु अन्य पदार्थके ज्ञानसे दूसरेका ज्ञान तो हुआ नहीं करता।
अस्य परिहारं दुन्दुभ्यादिग्रन्थेन वक्ष्यामः। कथं पुनरेतत् पदनीयमित्युच्यते—यथा ह वै लोके पदेन, गवादिखुराङ्कितो देशः पदमित्युच्यते तेन पदेन, नष्टं विवित्सितं पशुं पदेनान्वेषमाणोऽनुविन्देल्लभेत्। एवमात्मनि लब्धे सर्वमनुलभत इत्यर्थः।सिद्धान्ती—इसका निराकरण हम दुन्दुभ्यादि ग्रन्थसे करेंगे। किंतु यह आत्मा पदनीय (गमनीय) किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार लोकमें पदसे—गौ आदिके खुरसे अङ्कित देश 'पद' कहा जाता है, उस पदसे—उस पदके द्वारा खोजनेवाला पुरुष जिसको पाना अभीष्ट है ऐसे खोये हुए पशुको पा लेता है उसी प्रकार आत्माके प्राप्त हो जानेपर पुरुष सभी पा लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
नन्वात्मनि ज्ञाते सर्वमन्यज्ज्ञायत इति ज्ञाने प्रकृते, कथं लाभोऽप्रकृत उच्यत इति ?पूर्व०—किंतु 'आत्माको जाननेपर अन्य सबको जान लेता है' इस प्रकार यहाँ ज्ञानका प्रसंग होनेपर [ 'अनुविन्देत्' इस पदसे ] जिसका कोई प्रसंग नहीं है उस लाभकी बात क्यों कही जाती है ?
न; ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मनो ह्यलाभोऽज्ञा-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान और लाभ इनकी एकार्थता ही विवक्षित है। अज्ञान ही आत्माका अलाभ है, अतः ज्ञान ही

२३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

२३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| नमेव, तस्माज्ज्ञानमेवात्मनो लाभः, नानात्मलाभवदप्राप्तप्राप्तिलक्षण आत्मलाभः, लब्धृलब्धव्ययोर्भेदाभावात् । यत्र ह्यात्मनोऽनात्मा लब्धा, लब्धव्योऽनात्मा । स चाप्राप्त उत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः कारकविशेषोपादानेन क्रियाविशेषमुत्पाद्य लब्धव्यः । | आत्माका लाभ है, अनात्मलाभके समान आत्मलाभ अप्राप्तकी प्राप्ति होना नहीं है, क्योंकि यहाँ लाभ करनेवाले और लब्ध होनेवाली वस्तुमें कोई भेद नहीं है। जहाँ अनात्मा आत्माका लब्धव्य होता है वहाँ ही आत्मा उपलब्ध करनेवाला और अनात्मा उपलब्ध होने योग्य होता है। वह अप्राप्त अर्थात् उत्पाद्यादि क्रियाओंसे व्यवहित होता है तथा कारकविशेषके उपादानसे क्रियाविशेषको उत्पन्न करके उसे प्राप्त करना होता है। | | स त्वप्राप्तप्राप्तिलक्षणोऽनित्यः, मिथ्याज्ञानजनितकामकियाप्रभवत्वात्, स्वप्ने पुत्रादिलाभवत् । | वह अनात्मलाभ तो मिथ्या ज्ञानजनित काम और क्रियासे उत्पन्न होनेवाला होनेके कारण स्वप्नमें पुत्रादिलाभके समान अप्राप्तप्राप्तिरूप और अनित्य होता है; किंतु यह आत्मा तो उससे विपरीत स्वभाववाला है। आत्मा ही होनेके कारण यह उत्पाद्यादि क्रियासे व्यवहित नहीं है। नित्यप्राप्तस्वरूप होनेपर भी अविद्या ही उसका व्यवधान है। जिस प्रकार विपरीत ज्ञानवश रजतरूपसे भासनेवाली गृह्यमाण शुक्तिका ( सीप ) का अग्रहण विपरीत ज्ञानरूप व्यवधानवाला ही है तथा ज्ञान ही उसका ग्रहण है, क्योंकि वह ज्ञान विपरीत ज्ञानरूप | | अयं तु तद्विपरीत आत्मा । आत्मत्वादेव नोत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः । नित्यलब्धस्वरूपत्वेऽपि सत्यविद्यामात्रं व्यवधानम् । यथा गृह्यमाणाया अपि शुक्तिकाय विपर्ययेण रजताभासाया अग्रहणं विपरीतज्ञानव्यवधानमात्रम्, तथा ग्रहणं ज्ञानमात्रमेव, विपरीतज्ञा- | |