बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण १] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ८४९
ब्राह्मण १] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ८४९
| यदेव ते कश्चिदब्रवीत्, उदङ्को नामतः शुल्बस्यापत्यं शौल्बायनोऽब्रवीत्; प्राणो वै ब्रह्मेति, प्राणो वायुर्देवता—पूर्ववत्। प्राण एव आयतनमाकाशः प्रतिष्ठा; उपनिषत्—प्रियमित्येनदुपासीत ।<br><br>कथं पुनः प्रियत्वम् ? प्राणस्य वै हे सम्राट् कामाय प्राणस्यार्थायायाज्यं याजयति पतितादिकमपि; अप्रतिगृह्यस्याप्युग्रादेः प्रतिगृह्णात्यपि; तत्र तस्यां दिशि वधनिमित्तमाशङ्कम्—वधाशङ्केत्यर्थः, यां दिशमेति तस्कराद्याकीर्णां च तस्यां दिशि वधाशङ्का; तच्चतत् सर्वं प्राणस्य प्रियत्वे भवति, प्राणस्यैव सम्राट् कामाय । तस्मात् प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं प्राणो जहाति; समानमन्यत् ॥ ३ ॥ | 'यदेव ते कश्चिदब्रवीत्' इत्यादि मुझ़से उदङ्क नामवाले शौल्बायन—शुल्बके पुत्रने कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है। पूर्ववत् 'प्राण' वायुदेवता है। प्राण ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। इसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे—यह उपनिषद् है।<br><br>'किंतु इसकी प्रियता किस प्रकार है?' 'हे सम्राट् ! प्राणकी ही कामनासे-प्राणके ही लिये अयाज्यसे पतितादिकसे भी यजन कराते हैं और प्रतिग्रहके अयोग्य उग्र (उद्दण्ड) आदिसे भी प्रतिग्रह लेते हैं तथा चोर और लुटेरों आदिसे आक्रान्त जिस दिशामें जाते हैं, उस दिशामें वधके कारण होनेवाली आशङ्का रखते हैं; उस दिशामें वधकी आशङ्का रहती है; यह सब प्राणकी प्रियता होनेपर ही होता है; हे सम्राट् ! प्राणके ही लिये यह सब होता है। अतः हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। [जो ऐसी उपासना करता है] उसे प्राण नहीं छोड़ता।' शेष पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
वर्कुके बताये हुए चक्षुर्ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्क्कुर्वाष्णर्श्नक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा
बृ० उ० ५४—
८५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
तद् वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किँस्या-
दित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येक-
पाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य
चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत
का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच
चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्रा-
क्षमिति तत् सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म
नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते। हस्त्यृषभँ
सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच
याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥४॥
[ याज्ञवल्क्य– ] ‘तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।’ [ जनक– ] ‘मुझसे वृष्णके पुत्र बर्कुने कहा है कि चक्षु ही ब्रह्म है।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान् आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णने ‘चक्षु ही ब्रह्म है’ ऐसा कहा है; क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?’ [ जनक– ] ‘मुझे नहीं बतलाये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।’ [ जनक– ] ‘याज्ञवल्क्यजी ! वह हमें आप बतलाइये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी ‘सत्य’ इस रूपसे उपासना करे।’ [ जनक– ] हे’ याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है ?’ ‘हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता है’ ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ‘हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही ‘क्या तूने देखा’ ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि ‘मैंने देखा’ तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥
| यदेव ते कश्चिद् बर्कुशिति नामतो वृष्णस्यापत्यं वार्ष्णः; चक्षुर्वै ब्रह्मेति; आदित्यो देवता चक्षुषि। उपनिषत्—सत्यम्; यस्माच्छ्रोत्रेण श्रुतममृतमपि स्यात्, न तु चक्षुषा दृष्टम्; तस्माद् वै सम्राट् पश्यन्तमाहुः—अद्राक्षीस्त्वं हस्तिनमिति, स चेदद्राक्षमित्याह, तत् सत्यमेव भवति यस्त्वन्यो ब्रूयात्—अहमश्रौषमिति; तद् व्यभिचरति; यत्तु चक्षुषा दृष्टं तद्व्यभिचारित्वात् सत्यमेव भवति ॥ ४ ॥ | 'यदेव ते कश्चित्'—बर्कु इस नामवाले वार्ष्ण—वृष्णके पुत्रने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; चक्षुमें आदित्य देवता है। उसकी 'सत्य' यह उपनिषद् है, क्योंकि कानसे सुना हुआ तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रसे देखा हुआ नहीं हो सकता; हे सम्राट् ! इसीसे देखनेवालेसे कहते हैं 'तुमने हाथी देखा ?' इसपर यदि वह कहे कि देखा है तो वह सत्य ही होता है। यदि कोई अन्य कहे कि मैंने सुना है तो उसमें तो अन्तर आ सकता है। किंतु जो नेत्रसे देखा हुआ होता है, उसमें अन्तर न आनेके कारण वह सत्य ही होता है ॥ ४ ॥ |
गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद् भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां
८५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा-नन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्र ँ श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन ँ श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभ ँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥५॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] 'मुझसे भारद्वाजगोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि श्रोत्र ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि न सुननेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं?' [ जनक ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बताइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अन-न्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं' और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएं देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥
| 'यदेव ते' गर्दभीविपीत इति नामतः, भारद्वाजो गोत्रतः; श्रोत्रं वै ब्रह्मेति—श्रोत्रे दिग् देवता, अनन्त इत्येनदुपासीत; कानन्तता श्रोत्रस्य ? दिश एव श्रोत्रस्यानन्त्यं यस्मात्, तस्माद् वै सम्राट् प्राचीमुदीचीं वा यां काञ्चिदपि दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छति कश्चिदपि; अतोऽनन्ता हि दिशः; दिशो वै सम्राट् श्रोत्रम्; तस्माद्दिगानन्त्यमेव श्रोत्रस्यानन्त्यम् ॥ ५ ॥ | 'यदेव ते'—गर्दभीविपीत ऐसे नामवाले गोत्रतः भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। श्रोत्रमें दिग् देवता है, उसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करनी चाहिये। श्रोत्रकी अनन्तता क्या है? हे सम्राट् ! चूँकि दिशाएँ ही श्रोत्रकी अनन्तता हैं, इसलिये पूर्व या उत्तर जिस किसी भी दिशाको जाय, कोई उसका अन्त नहीं पाता; इसलिये दिशाएँ अनन्त हैं। हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं; अतः दिशाओंकी अनन्तता ही श्रोत्रकी अनन्तता है॥ ५॥ |
जाबालोक्त मनोब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे-सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्या-यतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवा-यतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्द इत्येनदुपासीत कानन्दता
८५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति । ६।
[ याज्ञवल्क्य — ] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक — ] 'मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि मन ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालाके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं?' [ जनक — ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक — ] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य — ] 'मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक — ] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है, उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है ! हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्य को उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ८५५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ८५५
| सत्यकाम इति नामतो जबालया अपत्यं जाबालः। चन्द्रमा मनसि देवता। आनन्द इत्युपनिषत्। यस्मान्मन एवानन्दः, तस्मान्मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिकामयमानोऽभिहार्यते प्रार्थयत इत्यर्थः। तस्माद् यां स्त्रियमभिकामयमानोऽभिहार्यते, तस्यां प्रतिरूपोऽनुरूपः पुत्रो जायते; स आनन्दहेतुः पुत्रः; स येन मनसा निर्वर्त्यते, तन्मन आनन्दः ॥ ६ ॥ | सत्यकाम ऐसे नामवाले जाबाल–जबालाके पुत्रने। मनमें चन्द्रमा देवता है। 'आनन्द' यह उपनिषद् है। क्योंकि मन ही आनन्द है, इसलिये हे सम्राट् ! मनसे स्त्रीकी इच्छा करते हुए उसका अभिहरण अर्थात् प्रार्थना करता है। अतः जिस स्त्रीकी कामना करते हुए प्रार्थना करता है, उसमें प्रतिरूप–अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह पुत्र आनन्दका हेतु है। जिस मनके द्वारा वह निष्पन्न होता है, वह मन आनन्द है ॥ ६ ॥ |
शाकल्योक्त हृदयब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि किꣳ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनꣳ हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनꣳ हृदयं जहाति
८५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
८५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि हृदय ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितती क्या है ?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥
| विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति। हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानाम् आयतनम् । नाम- | विदग्ध शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। हे सम्राट् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है। |
ब्राह्मण २ ] \
ब्राह्मण २ ]
शाङ्करभाष्यार्थ
८५७
| रूपकर्मात्मकानि हि भूतानि हृदयाश्रयाणीत्यवोचाम शाकल्यब्राह्मणे हृदयप्रतिष्ठानि चेति। तस्माद् हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति। तस्माद् हृदयं स्थितिरित्युपासीत। हृदये च प्रजापतिः देवता ॥ ७ ॥ | नाम, रूप और कर्मात्मक भूत हृदयके ही आश्रित हैं और हृदयमें ही प्रतिष्ठित हैं-ऐसा हम शाकल्य-ब्राह्मणमें कह चुके हैं। अतः हे सम्राट् ! समस्त भूत हृदयमें ही प्रतिष्ठित हैं। अतः हृदयकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे। हृदयमें प्रजापति देवता है ॥ ७ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
प्रथमं षडाचार्यब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
जनक उपसत्ति
जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्ते-
ऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै
सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाद-
दीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्मास्येवं वृन्दारक
आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषद्वक इतो विमुच्यमानः
क्व गमिष्यसीति नाहं तद् भगवन् वेद यत्र गमिष्यामी-
त्यथ वै तेऽहं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति ब्रवीतु
भगवानिति ॥ १ ॥
विदेहराज जनकने कूर्च [नामक एक विशेष प्रकारके आसन] से उठकर [याज्ञवल्क्यके] समीप जाकर कहा, 'याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, मुझे उपदेश कीजिये।' उस (याज्ञवल्क्य) ने कहा, 'राजन् ! जिस प्रकार लंबे
८५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तू इन उपनिषदों (उपासनाओं) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गया है। इस प्रकार तू पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषत्क (जिसे आचार्यने उपनिषद्का उपदेश कर दिया है—ऐसा) हो गया है। इतना होनेपर भी तू इस शरीरसे छूटकर कहाँ जायगा?' [जनक—] 'भगवन्! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है।' [याज्ञवल्क्य—] 'अब मैं तुझे यही बतलाऊँगा—जहाँ तू जायगा।' [जनक—] 'भगवान् मुझे बतलावें' ॥ १ ॥
| जनको ह वैदेहः । यस्मात् सविशेषणानि सर्वाणि ब्रह्माणि जानाति याज्ञवल्क्यः, तस्मादाचार्यकत्वं हित्वा जनकः कूर्चादासनविशेषादुत्थाय उप समीपमवसपन् पादयोर्निपतन्नित्यर्थः, उवाचोक्तवान्—नमस्ते तुभ्यमस्तु हे याज्ञवल्क्य; अनु मा शाध्यनुशाधि मामित्यर्थः; इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ।<br><br>स होवाच याज्ञवल्क्यः—यथा वै लोके हे सम्राट् महान्तं दीर्घमध्वानमेष्यन् गमिष्यन्, रथं वा स्थलेन गमिष्यन्, नावं वा जलेन गमिष्यन् समाददीत—एवमेवैतानि ब्रह्मण्येताभिरुपनिषद्भिर्युक्तानि उपासीनः समाहितात्मा- | 'जनको ह वैदेहः' । चूँकि याज्ञवल्क्य विशेषणोंके सहित सम्पूर्ण ब्रह्मोंको जानता है, इसलिये जनक आचार्यकत्व (ज्ञानित्वाभिमान) को छोड़कर कूर्च-आसनविशेषसे उठकर उसके समीप जा अर्थात् चरणोंमें गिरकर बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! तुम्हें नमस्कार है; 'अनु मा शाधि' अर्थात् मेरा अनुशासन करो। [शाधीति इसमें] 'इति' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।<br><br>उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट्! लोकमें जिस प्रकार महान् यानी लंबे मार्गको जानेवाला पुरुष स्थलसे जानेपर रथ और जलसे जानेपर नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तू इन उपनिषदों—उपासनाओंसे युक्त इन ब्रह्मोंकी उपासना करके समाहितचित्त हो |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८५९ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८५९ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सि, अत्यन्तमेताभिरुपनिषद्भिः संयुक्तात्मासि; न केवलमुपनिषत्समाहितः, एवं वृन्दारकः पूज्यश्चाढयश्चेश्वरश्च न दरिद्र इत्यर्थः; अधीतवेदोऽधीतो वेदो येन स त्वमधीतवेदः, उक्ताश्चोपनिषद आचार्यैस्तुभ्यं स त्वमुक्तोपनिषत्कः। | गया है, अर्थात् इन उपासनाओंसे अत्यन्त संयुक्तचित्त हो गया है; केवल उपनिषदों (उपासनाओं) से समाहित (संयुक्त) ही नहीं है, इसी प्रकार वृन्दारक—पूज्य और आढ्य अर्थात् श्रीमान् भी है, भाव यह कि दरिद्र नहीं है; तथा तू अधीतवेद—जिसने वेदाध्ययन कर लिया है, ऐसा अधीतवेद है और उक्तोपनिषत्क—जिसे आचार्योंने उपनिषदोंका उपदेश कर दिया है, ऐसा तू उक्तोपनिषत्क है। |
| एवं सर्वविभूतिसम्पन्नोऽपि सन् भयमध्यस्थ एव परमात्मज्ञानेन विनाकृतार्थ एव तावदित्यर्थः, यावत् परं ब्रह्म न वेत्सि। इतोऽस्माद्देहाद् विमुच्यमान एताभिर्नौरथस्थानीयाभिः समाहितः क्व कस्मिन् गमिष्यसि, किं वस्तु प्राप्स्यसीति ? | 'इस प्रकार सम्पूर्ण विभूतियोंसे सम्पन्न होनेपर भी परमात्माका बोध हुए बिना तू भयके मध्यमें ही स्थित है अर्थात् तबतक तो तू अकृतार्थ ही है, जबतक कि परब्रह्मको नहीं जानता। तू यहाँसे—इस देहसे छूटकर इन नौका और रथस्थानीय उपासनाओंसे समाहित होकर कहाँ जायगा ? किस वस्तुको प्राप्त करेगा ?' |
| नाहं तद् वस्तु भगवन् पूज्यावन् वेद जाने यत्र गमिष्यामीति। | [जनक—] 'हे भगवन्! हे पूज्य ! मैं उस वस्तुको नहीं जानता, जहाँ कि मैं [देह छोड़नेपर] जाऊँगा।' |
| अथ यद्येवं न जानीषे यत्र गतः कृतार्थः स्याः, अहं वै ते तुभ्यं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति। | [ याज्ञवल्क्य—] 'अच्छा, यदि तू यह नहीं जानता कि कहाँ जानेपर तू कृतार्थ होगा तो मैं तुझे वह स्थान बतलाऊँगा जहाँ तू जायगा।' |
८६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ८६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
|---|
| ब्रवीतु भगवानिति, यदि प्रसन्नो मां प्रति। <br><br> शृणु—॥ १ ॥ | [जनक—] 'यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो भगवान् मुझे उसका उपदेश करें।' <br><br> [याज्ञवल्क्य—] 'सुन'—॥ १ ॥ |
दक्षिणनेत्रस्थ इन्द्रसंज्ञक पुरुषका परिचय
इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥
यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं ॥ २ ॥
| इन्धो ह वै नाम—इन्ध इत्येवंनामा, यश्चक्षुर्वै ब्रह्मेति पुरोक्त आदित्यान्तर्गतः पुरुषः स एषः, योऽयं दक्षिणेऽक्षन् अक्षणि विशेषेण व्यवस्थितः—स च सत्यनामा; तं वै एतं पुरुषं दीप्तिगुणत्वात् प्रत्यक्षं नाम अस्येन्ध इति, तमिन्धं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण; यस्मात् परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः प्रत्यक्षनामग्रहणं द्विषन्ति । एष त्वं वैश्वानरमात्मानं सम्पन्नोऽसि ॥ २ ॥ | 'इन्धो ह वै नाम'—'इन्ध' ऐसे नामवाला है, 'चक्षु ही ब्रह्म है' इस प्रकार जिस आदित्यान्तर्गत पुरुषका पहले वर्णन किया गया है, वह यह है जो कि विशेषरूपसे दक्षिण नेत्रमें स्थित है; वह सत्य नामवाला है; दीप्ति गुणवाला होनेसे इसका 'इन्ध' यह प्रत्यक्ष नाम है, उस इस पुरुषको, इन्ध होते हुए भी, परोक्षरूपसे 'इन्द्र' ऐसा कहते हैं; क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षद्वेषी हैं—प्रत्यक्ष नामग्रहणसे द्वेष करते हैं। यह तू वैश्वानर आत्माको प्राप्त हो गया है ॥ २ ॥ |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६१
वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराटका परिचय और उन दोनोंके संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन
अथैतत् वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सँस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डोऽथैतयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतदास्रवदास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥
और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस (इन्द्र) की पत्नी विराट् (अन्न) है; उन दोनोंका यह संस्ताव (मिलनका स्थान) है जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्तर्गत लाल पिण्ड है। उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्तर्गत जाल-सा है। उन दोनोंका यह मार्ग—संचार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाड़ी जाती है। जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाड़ियां हृदयके भीतर स्थित हैं। इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [शरीरमें] जाता है; इसीसे इस (स्थूल शरीराभिमानी वैश्वानर) से यह (सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ ३ ॥
| अथैतद् वामेऽक्षणि पुरुषरूपम्, एषास्य पत्नी—यं त्वं वैश्वानरमात्मानं सम्पन्नोऽसि तस्यास्येन्द्रस्य भोक्तुर्भोग्यैषा पत्नी विराडन्नं | और यह जो वाम नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इसकी पत्नी है—तुम जिस वैश्वानर आत्माको सम्पन्न हुए हो, उस इस भोक्ता इन्द्रकी यह भोग्यरूपा पत्नी है, भोग्यभूहोनेके |
|---|
८६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| भोग्यत्वादेव। तदेतदन्नं चात्ता चैकं मिथुनं स्वप्ने। कथम् ? तयोरेष इन्द्राण्या इन्द्रस्य चैष संस्तवः, सम्भूय यत्र संस्तवं कुर्वाते अन्योन्यं स एष संस्तवः। कोऽसौ ? य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः, अन्तर्हृदये हृदयस्य मांसपिण्डस्य मध्ये। | कारण विराट् अन्न है। वह यह अन्न और अत्ता स्वप्नमें एक मिथुन होते हैं। किस प्रकार ? उन इन्द्राणी और इन्द्रका यह संस्ताव है; जहाँ दोनों मिलकर एक-दूसरेका संस्तव (प्रशंसा) करते हैं, वह संस्ताव कहलाता है। वह संस्ताव क्या है ? जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। अन्तर्हृदयमें अर्थात् मांसपिण्डरूप हृदयके भीतर। |
| अथैनयोरेतद् वक्ष्यमाणमन्नं भोज्यं स्थितिहेतुः; किं तत् ? य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डो लोहित एव पिण्डाकारापन्नो लोहितपिण्डः। अन्नं जग्धं द्वेधा परिणमते; यत् स्थूलं तदधो गच्छति; यदन्यत्तत् पुनरग्निना पच्यमानं द्वेधा परिणमते—यो मध्यमो रसः स लोहितादिक्रमेण पाञ्चभौतिकं पिण्डं शरीरमुपचिनोति, योऽणिष्ठो रसः स लोहितपिण्ड इन्द्रस्य लिङ्गात्मनो हृदये मिथुनीभूतस्य, यं तैजसमाच- | और इन दोनोंका यह आगे कहा जानेवाला अन्न-भोज्य यानी स्थितिका हेतु है, वह क्या है ? जो कि यह हृदयके भीतर लोहितपिण्ड है—पिण्डाकारको प्राप्त हुआ लोहित ही लोहितपिण्ड है। खाया हुआ अन्न दो प्रकारसे परिणत होता है; जो स्थूल होता है, वह नीचे चला जाता है और जो दूसरे प्रकारका होता है, वह पुनः अग्निसे पचाया जाकर दो प्रकारसे परिणत हो जाता है—जो मध्यम रस होता है, वह लोहितादि क्रमसे पाञ्चभौतिक पिण्डरूप शरीरको पुष्ट बनाता है और जो सूक्ष्मतम रस होता है, वह हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए लिङ्गात्मा इन्द्रका यह लोहितपिण्ड है, जिसे तैजस कहते |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| क्षते । स तयोरिन्द्रेन्द्राण्योर्हृदये मिथुनीभूतयोःसूक्ष्मासु नाडीष्वनुप्रविष्टः स्थितिहेतुर्भवति; तदेतदुच्यते—अथैनयोरेतदन्नमित्यादि । | हैं। वह सूक्ष्म नाड़ियोंमें अनुप्रविष्ट होकर हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए उन इन्द्र और इन्द्राणीकी स्थितिका कारण होता है; यही बात 'अथैनयोरेतदन्नम्' इत्यादि वाक्यसे कही जाती है। |
| किञ्चान्यत्, अथैनयोरेतत् प्रावरणम्; भुक्तवतोः स्वपतोश्च प्रावरणं भवति लोके, तत्सामान्यं हि कल्पयति श्रुतिः; किं तदिह प्रावरणम् ? यदेतदन्तर्हृदये जालकमिव—अनेकनाडीच्छिद्रबहुलत्वाज्जालकमिव । | इसके सिवा दूसरी बात यह है—यही इन दोनोंका प्रावरण है। लोकमें भोजन करनेवालों और सोनेवालोंका प्रावरण (आच्छादन) होता है, श्रुति उसीकी समानताकी कल्पना करती है। यहाँ वह प्रावरण क्या है ? यह जो हृदयके भीतर जाल-सा है—अनेक नाड़ीछिद्रोंकी बहुलता होनेके कारण जालके समान है। |
| अथैनयोरेषा सृतिर्मार्गः, सञ्चरतोऽनयेति सञ्चरणी, स्वप्नाज्जागरितदेशागमनमार्गः; का सा सृतिः ? यैषा हृदयाद् हृदयदेशादूर्ध्वाभिमुखी सती उच्चरति नाडी; तस्याः परिमाणमिदमुच्यते—यथा लोके केशः सहस्रधा भिन्नोऽत्यन्तसूक्ष्मो भवति, एवं सूक्ष्मा अस्य देहस्य सम्बन्धिन्यो हिता नाम हिता इत्येवं ख्याता नाड्यः; ताश्चान्तर्हृदये मांसपिण्डे | और यह इनकी सृति यानी मार्ग है; इससे संचार करते हैं, इसलिये यह सञ्चरणी अर्थात् स्वप्नसे जागरित देशमें आनेका मार्ग है। वह मार्ग क्या है ? जो कि यह हृदयसे—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर नाडी जाती है; यह उसका परिमाण बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार सहस्रों भागोंमें बाँटा हुआ केश अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, इसी प्रकार इस देहसे सम्बन्ध रखनेवाली ये हिता-हिता नामसे विख्यात नाड़ियाँ सूक्ष्म होती हैं, तथा ये हृदयके भीतर मांस-पिण्डमें |
८६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| प्रतिष्ठिता भवन्ति; हृदयाद् विप्ररूढास्ताः सर्वत्र कदम्बकेसरवत्; एताभिर्नाडीभिरत्यन्तसूक्ष्माभिरेतदन्नमास्रवद् गच्छदास्रवति गच्छति ।<br><br>तदेतद् देवताशरीरमनेनान्नेन दामभूतेनोपचीयमानं तिष्ठति; तस्माद् यस्मात् स्थूलेनान्नेनोपचितः पिण्डः, इदं तु देवताशरीरं लिङ्गं सूक्ष्मेणान्नेनोपचितं तिष्ठति। पिण्डोपचयकरमप्यन्नं प्रविविक्तमेव मूत्रपुरीषादिस्थूलमपेक्ष्य लिङ्गस्थितिकरं त्वन्नं ततोऽपि सूक्ष्मतरम्; अतः प्रविविक्ताहारः पिण्डः; तस्मात् प्रविविक्ताहारादपि प्रविविक्ताहारतर एष लिङ्गात्मा इवैव भवति । अस्माच्छरीराच्छरीरमेव शारीरं तस्माच्छारीरादात्मनो वैश्वानरात्तैजसः सूक्ष्मान्नेनोपचितो भवति ॥ ३ ॥ | प्रतिष्ठित हैं; कदम्ब-पुष्पकी केसरके समान ये हृदयसे सब ओर फैली हुई हैं; इन अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियोंसे जाता हुआ यह अन्न [ शरीरमें सर्वत्र ] जाता है ।<br><br>वह यह देवताशरीर इस रज्जुभूत अन्नसे बढ़ता ( पुष्टि पाता ) रहता है; अतः चूँकि पिण्ड स्थूल अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता है, यह देवताशरीररूप लिङ्गदेह सूक्ष्म अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता हुआ स्थित रहता है । मलमूत्रादि स्थूल भागकी अपेक्षा तो पिण्डकी वृद्धि करनेवाला अन्न भी सूक्ष्म ही है; उससे भी लिङ्गदेहकी स्थिति करनेवाला अन्न तो अत्यन्त सूक्ष्मतर है । अतः पिण्ड सूक्ष्माहारी है, उस सूक्ष्माहारीसे भी यह लिङ्गात्मा सूक्ष्मतर आहार करनेवाला ही है । इस शरीरसे—शरीर ही शारीर है, उस शारीर आत्मा वैश्वानरसे तैजस अधिक सूक्ष्म अन्नद्वारा उपचित होता है ॥ ३ ॥ |
प्राणात्मभूत विद्वान्की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण
| स एष हृदयभूतस्तैजसः सूक्ष्मभूतेन प्राणेन विध्रियमाणः प्राण एव भवति । | वह यह हृदयभूत तैजस सूक्ष्मभूत प्राणसे धारण किया जाकर प्राण ही हो जाता है । |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६५
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद् याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥
उस विद्वान्के पूर्व दिशा पूर्व प्राण हैं, दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण हैं, पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण हैं, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति-नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है, उसका सङ्ग नहीं होता; वह अबद्ध है, व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'हे भगवन् याज्ञवल्क्य ! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार हो, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं ॥४॥
| तस्यास्य विदुषः क्रमेण वैश्वानरात्तैजसं प्राप्तस्य हृदयात्मानमापन्नस्य हृदयात्मनश्च प्राणात्मानमापन्नस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राग्गताः प्राणाः, तथा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः, तथा प्रतीची | क्रमशः वैश्वानरसे तैजसको, उससे हृदयात्माको और हृदयात्मासे प्राणात्मभावको प्राप्त हुए उस इस विद्वान्के प्राची दिशा पूर्वगत प्राण हैं तथा दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण |
बृ० उ० ५५—
८६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| दिक् प्रत्यञ्चः प्राणाः, उदीची दिगुदञ्चः प्राणाः, ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणाः, अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः, सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः । | हैं; इसी प्रकार पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व दिशा ऊर्ध्व प्राण हैं; नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। |
| एवं विद्वान् क्रमेण सर्वात्मकं प्राणमात्मत्वेनोपगतो भवति । तं सर्वात्मानं प्रत्यगात्मन्युपसंहृत्य द्रष्टुर्हि द्रष्टृभावं नेति नेत्यात्मानं तुरीयं प्रतिपद्यते । यमेष विद्वाननेन क्रमेण प्रतिपद्यते, स एष नेति नेत्यात्मेत्यादि न रिष्यतीत्यन्तं व्याख्यातमेतत् । | इस प्रकार विद्वान् क्रमशः सर्वात्मक प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जाता है । उस सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार कर द्रष्टाके द्रष्टृभाव अर्थात् ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किये गये तुरीय आत्माको प्राप्त हो जाता है । इस क्रमसे यह विद्वान् जिसे प्राप्त होता है, वह यह ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा है । ‘नेति नेति आत्मा’ इससे लेकर ‘न रिष्यति’ यहाँतककी व्याख्या पहले की जा चुकी है। |
| अभयं वै जन्ममरणादिनिमित्तभयशून्यं हे जनक प्राप्तोऽसि, इति हैवं किलोवाचोक्तवान् याज्ञवल्क्यः । तदेतदुक्तम् । अथ वै तेऽहं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति । | हे जनक ! तू अभयको अर्थात् जन्म-मरणादिशून्य ब्रह्मको प्राप्त हो गया है—ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा। इस प्रकार यह कहा गया। अब तुझे यह बतलाता हूँ जहाँ कि तू जायगा। |
| स होवाच जनको वैदेहोऽभयमेव त्वा त्वामपि गच्छताद् गच्छतु यस्त्वं नोऽस्मान् हे याज्ञवल्क्य भगवन् पूजावन् अभयं ब्रह्म वेदयसे ज्ञापयसि प्रापितवानुपाधिकृताज्ञानव्यवधानापनयनेन इत्यर्थः । | उस वैदेह जनकने कहा—हे भगवन्-पूज्य याज्ञवल्क्य ! जो आप हमें अभय ब्रह्मका ज्ञान करा रहे हैं, अर्थात् उपाधिकृत अज्ञानरूप पर्देको हटाकर ब्रह्मकी प्राप्ति करा रहे हैं, उन आपको भी अभय ही प्राप्त |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८६७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८६७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| किमन्यदहं विद्यानिष्क्रयार्थं प्रयच्छामि, साक्षादात्मानमेव दत्तवते; अतो नमस्तेऽस्तु इमे विदेहास्तव यथेष्टं भुज्यन्ताम्; अयं चाहमस्मि दासभावे स्थितः; यथेष्टं मां राज्यं च प्रतिपद्यस्वेत्यर्थः ॥ ४ ॥ | हो । साक्षात् आत्माका ही दान करनेवाले आपको मैं इस विद्याके बदलेमें और क्या दूँ ? इसलिये आपको नमस्कार है; यह विदेह-राज्य आपका ही है, आप इसका यथेच्छ भोग करें और यह मैं भी आपके दासभावमें स्थित हूँ; तात्पर्य यह है कि मुझे और इस राज्यको आप इच्छानुसार प्राप्त करें ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
द्वितीयं कूर्चब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
</div>| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| [उपक्रमः] जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगामेत्यस्याभिसम्बन्धः ।<br><br>सम्बन्धः । विज्ञानमय आत्मा साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तरः पर एव—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br><br>स एष इह प्रविष्टो वदनादिलिङ्गः, अस्ति व्यतिरिक्त इति मधुकाण्डेऽजातशत्रुसंवादे प्राणादिकर्तृत्व- | 'जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम' इत्यादि रूपसे आरम्भ होनेवाले ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है—विज्ञानमय आत्मा साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर परब्रह्म ही है; जैसा कि 'इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई द्रष्टृ नहीं है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इस देहमें प्रविष्ट वह भाषणादि लिङ्गवाला विज्ञानात्मा शरीरसे भिन्न है—ऐसा मधुकाण्डमें अजातशत्रुके संवादमें [ गार्ग्य और काश्यके प्रश्नमें ] प्राणादिके कर्तृत्व- |
८६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ८६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
|---|
| भोक्तृत्वप्रत्याख्यानेनाधिगतोऽपि सन् पुनः प्राणनादिलिङ्गसमुपन्यस्य औषस्तप्रश्ने प्राणनादिलिङ्गो यः सामान्येनाधिगतः 'प्राणेन प्राणिति' इत्यादिना, 'दृष्टेर्द्रष्टा' इत्यादिना ऽलुप्तशक्तिस्वभावोऽधिगतः । | भोक्तृत्वके निराकरणद्वारा ज्ञात होनेपर भी फिर औषस्त (उषस्त चाक्रायण) के प्रश्नमें जो 'प्राणसे प्राणन करता है' इत्यादि वाक्यद्वारा प्राणनादि लिङ्गका उपन्यास कर सामान्यरूपसे प्राणनादि लिङ्गवाला जाना गया है, वही 'दृष्टिका द्रष्टा है' इत्यादि वाक्यसे अलुप्तशक्तिस्वभाव ज्ञात हुआ है। | | तस्य च परोपाधिनिमित्तः संसारः—यथा रज्जूरूषरशुक्तिकागगनादिषु सर्पोदकरजतमलिनत्वादि पराध्यारोपणनिमित्तमेव, न स्वतः, तथा । | उसे [अज्ञान और उसके कार्य अन्तःकरणादि इस] अन्य उपाधिके कारण संसारकी प्राप्ति हुई है, जिस प्रकार कि रज्जु, ऊसर, शुक्ति और आकाशादिमें सर्प, जल, रजत और मलिनता आदिकी प्रतीति दूसरोंके आरोप करनेके कारण ही है, स्वतः नहीं, उसी प्रकार [यहाँ समझना चाहिये]। | | निरुपाधिको निरुपाख्यो नेति नेतीति व्यपदेश्यः साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तर आत्मा ब्रह्माक्षरमन्तर्यामी प्रशास्ता औपनिषदः पुरुषो विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यधिगतम् । तदेव पुनरिन्धसंज्ञः प्रविविक्ताहारः, ततोऽन्तर्हृदये लिङ्गात्मा प्रविविक्ताहारतरः; ततः | इस प्रकार निरुपाधिक, निरुपाख्य (मन और वाणीका अविषय), 'नेति नेति' इस वाक्यसे निर्देश्य, साक्षात् अपरोक्ष, सर्वान्तर आत्मा, ब्रह्म, अक्षर, अन्तर्यामी, प्रशास्ता, औपनिषद पुरुष विज्ञान-आनन्दरूप ब्रह्म है—यह ज्ञात हुआ। वही फिर सूक्ष्माहार करनेवाला इन्धसंज्ञक वैश्वानर, फिर उससे भी सूक्ष्मतर आहार करनेवाला हृदयान्तर्वर्ती लिङ्गात्मा और फिर उससे भी |