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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| यदैवं स्थितः शास्त्रार्थः, तदा जीवपरयोरभेदे परमात्मनः संसारिदोषोद्भावनम् त्वम्; तथा च सति शास्त्रानर्थक्यम्, असंसारित्वे चोपदेशानर्थक्यं स्पष्टो दोषः प्राप्तः। यदि तावत्परमात्मा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वशरीरसम्पर्कजनितदुःखान्यनुभवतीति स्पष्टं परस्य संसारित्वं प्राप्तम्। तथा च परस्यासंसारित्वप्रतिपादिकाः श्रुतयः कुप्येरन्, स्मृतयश्च, सर्वे च न्यायाः। अथ कथञ्चित्प्राणिशरीरसम्बन्धजैर्दुःखैर्न सम्बध्यत इति शक्यं प्रतिपादयितुं परमात्मनः साध्यपरिहार्याभावादुपदेशानर्थक्यदोषो न शक्यते निवारयितुम्।<br><br>अत्र केचित्परिहारमाचक्षते—<br>(जीवस्य परमात्मविकारत्वं प्रस्तूयते न)<br>परमात्मा न साक्षाद्भूतेष्वनुप्रविष्टः स्वेन रूपेण; किं तर्हि ? | जब इस प्रकार शास्त्रका अभिप्राय निश्चित होता है तो परमात्माका संसारी होना सिद्ध होता है; ऐसी स्थितिमें शास्त्र व्यर्थ हो जाता है और यदि जीवको असंसारी माना जाय तो उसे उपदेश करना व्यर्थ है—ऐसा यह स्पष्ट दोष प्राप्त होता है। यदि परमात्मा ही समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है और वही समस्त शरीरोंके सम्पर्कसे होनेवाले दुःखोंको अनुभव करता है तो स्पष्ट ही परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति हो जाती है। ऐसी स्थितिमें परमात्माके असंसारित्वका प्रतिपादन करनेवाली समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ और युक्तियाँ बाधित हो जाती हैं, और यदि किसी प्रकार यह प्रतिपादन भी किया जाय कि प्राणियोंके शरीरोंके सम्बन्धसे होनेवाले दुःखोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो परमात्माके लिये कोई ग्राह्य या त्याज्य न होनेके कारण उपदेशकी व्यर्थतारूप दोषका निवारण नहीं किया जा सकता।<br><br>यहाँ कोई लोग इस दोषका इस प्रकार परिहार बतलाते हैं—परमात्मा साक्षात् अपने रूपसे भूतोंमें अनुप्रविष्ट नहीं है; तो फिर क्या बात |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४७१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४७१


| विकारभावमापन्नो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपेदे । स च विज्ञानात्मा परस्मादन्योऽनन्यश्च । येनान्यः, तेन संसारित्वसम्बन्धी, येनानन्यः, तेन अहं ब्रह्मेत्यवधारणार्हः । एवं सर्वमविरुद्धं भविष्यतीति । <br><br> तत्र विज्ञानात्मनो विकारपक्षे एता गतयः—पृथिवीद्रव्यवदनेकद्रव्यसमाहारस्य सावयवस्य परमात्मन एकदेशविपरिणामो विज्ञानात्मा घटादिवत् । पूर्वसंस्थानावस्थस्य वा परस्यैकदेशो विक्रियते केशोषरादिवत्, सर्व एव वा परः परिणमेत्क्षीरादिवत् । | है? वह विकारभावको प्राप्त होकर विज्ञानात्मत्वको प्राप्त हुआ है और वह विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न एवं अभिन्न भी है। चूँकि वह भिन्न है, इसलिये संसारित्वसे सम्बन्ध रखनेवाला है और अभिन्न होनेके कारण 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारके निश्चयकी योग्यता रखता है। इस प्रकार माननेसे [श्रुति, स्मृति एवं न्यायादि] सब अनुकूल रहेंगे। <br><br> तहाँ (इस सिद्धान्तके अनुसार) विज्ञानात्माको परमात्माका विकार माननेके पक्षमें तीन गतियाँ हो सकती हैं—(१) पृथिवी द्रव्यके समान अनेक द्रव्योंके संघात रूप सावयव परमात्माका विज्ञानात्मा घटादिकी तरह एकदेशी परिणाम है' (२) अथवा अपने पूर्वरूपमें स्थित परमात्माका एक ही देश केश या ऊषरभूमिके समान [विज्ञानात्मरूपसे] विकारको प्राप्त होता है, (३) अथवा दुग्धादिके समान सारा ही परमात्मा विकारको प्राप्त हो जाता है। | | (उक्तपक्षप्रतिषेधः) <br> तत्र समानजातीयानेकद्रव्यसमूहस्य कश्चिद् द्रव्यविशेषो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपद्यते यदा, तदा समानजातीय- | इन पक्षोंमेंसे यदि [यह माना जाय कि] समान जातिवाले अनेक द्रव्योंके समुदायका कोई द्रव्यविशेष ही विज्ञानात्मत्वको प्राप्त होता है तो समानजातीय होनेके कारण उन |

४७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्वादेकत्वमुपचारितमेव न तु परमार्थतः । तथा च सति सिद्धान्तविरोधः ।(परमात्मा और विज्ञानात्मा) का एकत्व उपचारसे ही होगा, परमार्थतः नहीं । ऐसा माननेपर सिद्धान्तसे विरोध आवेगा ।
अथ नित्यायुतसिद्धावयवानुगतोऽवयवी पर आत्मा, तस्य तदवस्थस्यैकदेशो विज्ञानात्मा संसारी--तदापि सर्वावयवानुगतत्वादवयविन एवावयवगतो दोषो गुणो वेति, विज्ञानात्मनः संसारित्वदोषेण पर एवात्मा सम्बध्यत इति, इयमप्यनिष्टा कल्पना ।और यदि परमात्मा नित्य अयुतसिद्ध अवयवोंमें अनुगत अवयवी है और उसी रूपमें स्थित हुए उस परमात्माका एकदेश संसारी विज्ञानात्मा है तो उस अवस्था में भी अवयवगत गुण या दोष समस्त अवयवोंमें अनुगत होनेके कारण अवयवीमें ही रहेगा; इस प्रकार विज्ञानात्माके संसारित्वरूप दोषसे परमात्माका ही सम्बन्ध सिद्ध होता है । अतः यह कल्पना भी इष्ट नहीं हो सकती ।
क्षीरवत्सर्वपरिणामपक्षे सर्वश्रुतिस्मृतिकोपः, स चानिष्टः । "निष्कल निष्क्रियं शान्तम्” (श्वे० उ० ६ । १९) "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु०उ० २ । १ । २) "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः” “स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतः”(बृ० उ० ४ । ४ । २५) "न जायते म्रियते वा कदाचित्” (गीता २ । २०) "अव्यक्तोऽयम्” (गीता २।२५) इत्यादिदुग्धके समान सम्पूर्ण परमात्माका परिणाम माननेके पक्षमें भी समस्त श्रुति-स्मृतियोंसे विरोध होता है और यह इष्ट नहीं है । अतः ये सब पक्ष "निष्कल, निष्क्रिय और शान्त है” 'पुरुष दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है” “वह आकाशके समान सर्वगत और नित्य है”, “वह यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर एवं अमृत है”, "वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है”, वह "अव्यक्त है”

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धा एते सर्वे पक्षाः।इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे विरुद्ध हैं।
अचलस्य परमात्मन एकदेशपक्षे विज्ञानात्मनः कर्मफलवद्देशसंसरणानुपपत्तिः, परस्य वा संसारित्वम्—इत्युक्तम्। परस्यैकदेशोऽग्निविस्फुलिङ्गवत्स्फुटितो विज्ञानात्मा संसरतीति चेत् — तथापि परस्यावयवस्फुटनेन क्षतप्राप्तिः, तत्संसरणे च परमात्मनः प्रदेशान्तरावयव्यूहे छिद्रताप्राप्तिः; अव्रणत्ववाक्यविरोधश्च । आत्मावयवभूतस्य विज्ञानात्मनः संसरणे परमात्मशून्यप्रदेशाभावादवयवान्तरनोदनव्यूहनाभ्यां हृदयशूलेनेव परमात्मनो दुःखित्वप्राप्तिः ।अचल परमात्माके एक देशमें विज्ञानात्मा है—इस पक्षमें विज्ञानात्माका कर्मफलयुक्त देशमें जाना सम्भव नहीं है तथा परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। यदि कहो कि अग्निसे चिनगारीके समान परमात्माका एक देशरूप विज्ञानात्मा उससे अलग होकर आता-जाता है तो भी अवयवके फूटकर अलग हो जानेसे परमात्मामें क्षतकी प्राप्ति होगी तथा उसके जानेपर परमात्माके अन्य देशस्थ अवयवसमुदायमें छेदकी भी प्राप्ति होगी और इस प्रकार परमात्माकी निश्छिद्रताका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यसे विरोध होगा। परमात्मासे शून्य देशका अभाव होनेके कारण आत्माके अवयवभूत विज्ञानात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होनेपर अवयवान्तरके ह्रास और वृद्धिके कारण परमात्माको हृदयशूलके समान दुःखकी प्राप्ति होगी।
अग्निविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्तश्रुतेर्न दोष इति चेत् ?पूर्व०—किंतु आगकी चिनगारी आदि दृष्टान्तोंका वर्णन करनेवाली श्रुति होनेके कारण ऐसा माननेमें भी कोई दोष नहीं हो सकता—यदि ऐसा कहें तो ?

४७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न, श्रुतेर्ज्ञापकत्वात्; न शास्त्रं पदार्थानन्यथा कर्तुं प्रवृत्तम्। किं तर्हि ? यथाभूतानामज्ञातानां ज्ञापने। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुति तो केवल ज्ञान ही करानेवाली है। शास्त्रकी प्रवृत्ति पदार्थोंको अन्यथा करनेके लिये नहीं है। तो फिर किस लिये है ? यथाभूत अज्ञात पदार्थोंको ज्ञात करानेके लिये। | | किञ्चातः ! | पूर्व०-इससे क्या होता है ? | | शृणु—अतो यद्भवति, यथाभूता मूर्तामूर्तादिपदार्थधर्मा लोके प्रसिद्धाः। तद्दृष्टान्तोपादानेन तदविरोध्येव वस्त्वन्तरं ज्ञापयितुं प्रवृत्तं शास्त्रं न लौकिकवस्तुविरोधज्ञापनाय लौकिकमेव दृष्टान्तमुपादत्ते। उपादीयमानोऽपि दृष्टान्तोऽनर्थकः स्याद्दाष्टन्तिकासङ्गतेः। न ह्यग्निः शीत आदित्यो न तपतीति वा दृष्टान्तशतेनापि प्रतिपादयितुं शक्यम्, प्रमाणान्तरेणान्यथाधिगतत्वाद्वस्तुनः। न च प्रमाणं प्रमाणान्तरेण विरुध्यते, प्रमाणान्तराविषयमेव हि प्रमाणा- | सिद्धान्ती-इससे जो होता है, सो सुनो। लोकमें वास्तविक ही मूर्त और अमूर्तादिरूप पदार्थ-धर्म प्रसिद्ध हैं। उन्हें दृष्टान्तरूपसे ग्रहण कर शास्त्र उनसे अविरोधी एक अन्य वस्तुको बतलानेके लिये प्रवृत्त होता है। वह लौकिक वस्तुओंका विरोध सूचित करनेके लिये लौकिक दृष्टान्तोंको ही ग्रहण करता हो-ऐसी बात नहीं है। ऐसा दृष्टान्त तो दाष्टन्तिकसे असंगत होनेके कारण ग्रहण किये जानेपर भी व्यर्थ ही होगा। अग्नि शीतल होता है, अथवा सूर्य नहीं तपता-यह बात, सैकड़ों दृष्टान्तोंसे भी प्रतिपादित नहीं हो सकती; क्योंकि अन्य प्रमाणसे तो वह वस्तु दूसरे प्रकारकी जानी जाती है। एक प्रमाणका दूसरे प्रमाणसे विरोध नहीं होता। जो वस्तु एक प्रमाणसे नहीं जानी जाती उसीको |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७५ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७५

संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
न्तरं ज्ञापयति । न च लौकिकपदपदार्थाश्रयणव्यतिरेकेणागमेन शक्यमज्ञातं वस्त्वन्तरमवगमयितुम् । तस्मात्प्रसिद्धन्यायमनुसरता न शक्या परमात्मनः सावयवांशांशित्वकल्पना परमार्थतः प्रतिपादयितुम् ।<br><br>“क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) “ममैवांशः” (गीता १५।७) इति च श्रूयते स्मर्यते चेति चेन्न, एकत्वप्रत्ययार्थपरत्वात् । अग्नेर्हि विस्फुलिङ्गोऽग्निरैव इत्येकत्वप्रत्ययार्हो दृष्टो लोके; तथा चांशोंऽशिनैकत्वप्रत्ययार्हः; तत्रैवं सति विज्ञानात्मनः परमात्मविकारांशत्ववाचकाः शब्दाः परमात्मैकत्वप्रत्ययाधित्सवः ।<br><br>उपक्रमोपसंहाराभ्यां च—दूसरा प्रमाण बतलाता है । तथा लौकिक पद और पदार्थोंका आश्रय लिये बिना शास्त्रके द्वारा किसी अज्ञात वस्त्वन्तरको नहीं जाना जा सकता । अतः इस प्रसिद्ध न्यायका अनुसरण करनेवाले पुरुषके द्वारा परमात्माके सावयवत्व और [जीवके साथ उसके] अंशांशित्वकी कल्पनाका परमार्थतः प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।<br><br>यदि कहो कि “क्षुद्र विस्फुलिङ्ग” और “मेरा ही अंश है' इस प्रकार श्रुति और स्मृति भी कहती हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे तो [जीवात्मा और परमात्माके] एकत्वकी प्रीतितिके लिये हैं। अग्निकी चिनगारी अग्नि ही होती है, इसलिये लोकमें वह अग्निके साथ एकत्व-प्रतीतिका योग्य देखा गया है । इसी प्रकार अंशीके साथ अंश भी एकत्व-प्रतीतिका योग्य है।' अतः ऐसी स्थितिमें विज्ञानात्माको परमात्माका विकार या अंश बतलानेवाले शब्द परमात्माके साथ उसके एकत्वकी प्रतीति कराना चाहते हैं ।<br><br>उपक्रम और उपसंहारसे भी यही बात सिद्ध होती है । सभी उप-

४७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| सर्वासु ह्युपनिषत्सु पूर्वमेकत्वं प्रतिज्ञाय, दृष्टान्तैर्हेतुभिश्च परमात्मनो विकारांशादित्वं जगतः प्रतिपाद्य, पुनरेकत्वमुपसंहरति; तद्यथेहैव तावत् "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति प्रतिज्ञाय, उत्पत्तिस्थितिलयहेतुदृष्टान्तैर्विकारविकारित्वाद्येकत्वप्रत्ययहेतून्प्रतिपाद्य "अनन्तरमबाह्यम्" (२।५।१९) "अयमात्मा ब्रह्म" (२।५।१९) इत्युपसंहरिष्यति । तस्मादुपक्रमोपसंहाराभ्यामयमर्थो निश्चीयते परमात्मैकत्वप्रत्ययद्रढिम्न उत्पत्तिस्थितिलयप्रतिपादकानि वाक्यानीति । | निषदोंने पहले उनके एकत्वकी प्रतिज्ञा कर हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा जगत्‌को परमात्माका विकार या अंशादि बतलाकर फिर उनके एकत्वका उपसंहार किया है, जैसे कि यहाँ भी पहले "यह जो कुछ है, सब आत्मा है" ऐसी प्रतिज्ञाकर उत्पत्ति, स्थिति, लय, हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा उनके एकत्वज्ञानके हेतुभूत विकार और विकारित्वादिका प्रतिपादन कर "अन्तरबाह्यशून्य है", "यह आत्मा ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार किया जायगा। अतः उपक्रम और उपसंहारके द्वारा यह तात्पर्य निश्चित होता है कि जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य परमात्माके साथ उसके एकत्वज्ञानकी दृढ़ता करानेके लिये हैं। | | अन्यथा वाक्यभेदप्रसङ्गाच्च—<br>सर्वोपनिषत्सु हि विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वप्रत्ययो विधीयत इत्यविप्रतिपत्तिः सर्वेषामुपनिषद्विदिनाम् । तद्विध्येकवाक्ययोगे च सम्भवत्युत्पत्त्यादिवाक्यानां वा- | यदि ऐसा न माना जायगा तो वाक्यभेदका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। सभी उपनिषदोंमें परमात्माके साथ विज्ञानात्माके एकत्वज्ञानका विधान किया गया है, इस विषयमें सभी उपनिषद्‌वेत्ताओंकी एक राय है—किसीका मतभेद नहीं है। उत्पत्त्यादि वाक्योंकी भी उस विधिके साथ एकवाक्यता सम्भव होनेपर उन्हें भिन्न |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७७
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
क्यान्तरत्वकल्पनायां न प्रमाणमस्ति; फलान्तरं च कल्पयितव्यं स्यात्; तस्मादुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्वप्रतिपादनपराः ।अर्थका प्रतिपादन करनेवाला माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। इसके सिवा [उन्हें अन्यार्थपरक माननेपर] उनके फलान्तरकी भी कल्पना करनी पड़ेगी। अतः उत्पत्त्यादि श्रुतियाँ आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाली ही हैं।
अत्र च सम्प्रदायविद् आख्यायिकां सम्प्रचक्षते—कश्चित्किल राजपुत्रो जातमात्र एव मातापितृभ्यामपविद्धो व्याधगृहे संवर्धितः, सोऽमुष्य वंश्यतामजानन्व्याधजातिप्रत्ययो व्याधजातिकर्माप्येवानुवर्तते; न राजास्मीति राजजातिकर्माण्यनुवर्तते । यदा पुनः कश्चित्परमकारुणिको राजपुत्रस्य राजश्रीप्राप्तियोग्यतां जानन्नमुष्य पुत्रतां बोधयति—‘न त्वं व्याधोऽमुष्य राज्ञः पुत्रः-कथञ्चिद्व्याधगृगमनुप्रविष्टः’इति— स एवं बोधितस्त्यक्त्वा व्याधजाति-इस विषयमें सम्प्रदायवेत्ता (श्रीद्रविडाचार्य) यह आख्यायिका कहते हैं-कोई राजपुत्र जन्म होते ही माता-पिताद्वारा त्याग दिया जानेके कारण व्याधके घरमें पाला-पोसा गया। वह अपनी कुलीनताको न जाननेके कारण अपनेको व्याधजातिका ही मानकर व्याधजातिके कर्मोंका ही अनुवर्तन करता था, 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानकर राजोचित कर्म नहीं करता था। जब कोई अत्यन्त कृपालु पुरुष, जो राजपुत्रकी राजश्री प्राप्त करनेकी योग्यता जानता है, उसे उसकी राजपुत्रताका बोध करा देता है और यह बतला देता है कि 'तू व्याध नहीं है, अमुक राजाका पुत्र है, किसी प्रकार इस व्याधके घरमें आ गया है' तो इस प्रकार बोध कराये जानेपर वह व्याधजातिके प्रत्ययसे होनेवाले कर्मोंको छोड़कर 'मैं राजा हूँ' ऐसा

| ४७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

४७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
प्रत्ययकर्मणि पितृपैतामहीमात्मनः पदवीमनुवर्तते राजाहमस्मीति ।मानकर अपने बाप-दादोंके मार्गका अनुसरण करने लगता है ।
तथा किलायं परस्मादग्निविस्फुलिङ्गादिवत्तज्जातिरेव विभक्त इह देहेन्द्रियादिगहने प्रविष्टोऽसंसारी सन् देहेन्द्रियादिसंसारधर्ममनुवर्तते ‘देहेन्द्रियसङ्घातोऽस्मि कृशः स्थूलः सुखी दुःखी’ इति परमात्मतामजानन्नात्मनः । न त्वमेतदात्मकः परमेव ब्रह्मास्यसंसारीति प्रतिबोधित आचार्येण हित्वैषणात्रयानुवृत्तिं ब्रह्मैवास्मीति प्रतिपद्यते । अत्र राजपुत्रस्य राजप्रत्ययवद्ब्रह्मप्रत्ययो दृढीभवति—विस्फुलिङ्गवदेव त्वं परस्माद् ब्रह्मणो भ्रष्ट इत्युक्ते विस्फुलिङ्गस्य प्रागग्नेर्भ्रंशाद्दग्न्येकत्वदर्शनात् ।<br>तस्मादेकत्वप्रत्ययदाढ्र्याय सुवर्णमणिलोहाग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्ताः,इसी प्रकार अग्निकी चिनगारियोंके समान परमात्मासे विभक्त यह उसी (परमात्मा) की जातिवाला विज्ञानात्मा यहाँ देह एवं इन्द्रियादि गहनवनमें प्रविष्ट होनेपर असंसारी होकर भी अपनी परमात्मस्वरूपताको न जाननेके कारण ‘मैं देहेन्द्रियादिका संघात तथा कृश, स्थूल एवं सुखी या दुखी हूँ’ ऐसा मानकर देह एवं इन्द्रियादि सांसारिक धर्मोंका अनुवर्तन करता है। किंतु ‘तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं है, अपि तु असंसारी ब्रह्म ही है’ इस प्रकार आचार्यद्वारा बोध कराये जानेपर यह एषणात्रयकी अनुवृत्तिको छोड़कर ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ ऐसा जान लेता है। तथा यहाँ ऐसा कहनेपर कि ‘तू अग्निसे विस्फुलिङ्गके समान परब्रह्मसे ही च्युत हुआ है’ राजपुत्रके राजप्रत्ययके समान उसका ब्रह्मप्रत्यय दृढ़ हो जाता है, क्योंकि अग्निसे च्युत होनेसे पूर्व विस्फुलिङ्गकी अग्निके साथ एकता देखी गयी है।<br>अतः सुवर्ण, मणि, लोह एवं अग्नि-विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त एकत्वज्ञानकी दृढ़ताके लिये हैं,

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७९ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७९
संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
नोत्पत्त्यादिभेदप्रतिपादनपराः। सैन्धवघनवत्प्रज्ञप्त्येकरसनैरन्तर्यावधारणात् "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) इति च। यदि च ब्रह्मणश्चित्रपटवद्वृक्षसमुद्रादिवच्चोत्पत्त्याद्यनेकधर्मविचित्रता विजिग्राहयिषिता, एकरसं सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमिति नोपसमहरिष्यत्, 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्' इति च न प्रायोक्ष्यत्— "य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) इति निन्दावचनं च। तस्मादेकरूपैकत्वप्रत्ययदार्ढ्यायैव सर्ववेदान्तेषूत्पत्तिस्थितिलयादिकल्पना, न तत्प्रत्ययकरणाय।उत्पत्ति आदिका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तथा "उसे एकरूप ही देखना चाहिये" इस श्रुतिसे नमकके डलेके समान उसे ज्ञानरूप एकरससे निरन्तर परिपूर्ण भी निश्चय किया गया है। यदि चित्रपट अथवा वृक्ष या समुद्रादिके समान उत्पत्ति आदि अनेक धर्मोंके कारण ब्रह्मकी विचित्रताका ही ग्रहण करना अभीष्ट होता तो 'वह नमकके डलेके समान एकरस एवं अन्तरबाह्यशून्य है' इस प्रकार उपसंहार न किया जाता तथा उसे "एकरूप ही देखना चाहिये" ऐसे आदेशका और "जो इसे नानावत् देखता है [ वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ]" ऐसे निन्दासूचक वचनका भी प्रयोग न होता। अतः समस्त वेदान्तोंमें जो उत्पत्ति, स्थिति एवं लय आदिकी कल्पना है, वह ब्रह्मकी एकरूपताके ज्ञानकी दृढ़ताके लिये ही है, उन ( उत्पत्त्यादि ) की प्रतीति करानेके लिये नहीं है।
न च निरवयवस्य परमात्मनोऽसंसारिणः संसार्येकदेशकल्पना न्याय्या, स्वतोऽदेशत्वात्परमात्मनः। अदेशस्य परस्य एकदेश-इसके सिवा निरवयव और असंसारी परमात्माके संसारीरूप एक देशकी कल्पना करना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि स्वयं परमात्मामें तो देश है नहीं। देशहीन परमात्माके

४८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४८०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| संसारित्वकल्पनायां पर एव संसारीति कल्पितं भवेत् । अथ परोपाधिकृत एकदेशः परस्य, घटकरकाद्याकाशवत्; न तदा तत्र विवेकिनां परमात्मैकदेशः पृथक्संव्यवहारभागिति बुद्धिरुत्पद्यते । | एकदेशमें संसारित्वकी कल्पना करनेमें 'परमात्मा ही संसारी है' ऐसी कल्पना हो जायगी और यदि ऐसा माना जाय कि घटाकाश और करकाकाशादिके समान किसी अन्य उपाधिके कारण विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश है तो उसमें विवेकी पुरुषोंको ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती कि परमात्माका एकदेश पृथक् व्यवहार करनेमें समर्थ है। | | अविवेकिनां विवेकिनां चोपचरिता बुद्धिर्दृष्टेति चेत् ? | पूर्व०-किंतु [मैं कर्ता हूँ] ऐसी गौणी¹ बुद्धि तो अविवेकियों और विवेकियोंको भी होती देखी गयी है ? | | न; अविवेकिनां मिथ्याबुद्धित्वात्, विवेकिनां च संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वात्-यथा कृष्णो रक्तश्चाकाश इति विवेकिनामपि कदाचित्कृष्णता रक्तता च आकाशस्य संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वं प्रतिपद्यत इति, न परमार्थतः कृष्णो रक्तो वा आकाशो भवितुमर्हति । अतो न पण्डितै- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि अविवेकियोंकी तो वह बुद्धि मिथ्या होती है और विवेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे व्यवहारको आलम्बन करनेके लिये; जिस प्रकार कि [अविवेकियोंके समान] विवेकियोंकी दृष्टिमें भी कभी-कभी 'आकाश काला अथवा लाल है' इस प्रकार आकाशकी कृष्णता अथवा लाली व्यवहारमात्रके आलम्बनार्थत्वको प्राप्त हो जाती है, किंतु वस्तुतः आकाश काला या लाल नहीं हो सकता। अतः विद्वानों- |


१. वस्तुतः जीव अपरिच्छिन्न ब्रह्ममात्र है, इसलिये इस परिच्छिन्न बुद्धिको गौणी बतलाया गया है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१


| ब्रह्मस्वरूपप्रतिपत्तिविषये ब्रह्मणोंऽशांश्येकदेशैकदेशिविकारविकारित्वकल्पना कार्या, सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम् ।<br><br>अतो हित्वा सर्वकल्पनामाकाशस्येव निर्विशेषता प्रतिपत्तव्या—<br>“आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः”<br>“न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः” (क० उ० २।२।११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; नात्मानं ब्रह्मविलक्षणं कल्पयेत्—उष्णात्मक इवाग्नौ शीतैकदेशम्, प्रकाशात्मके वा सवितरि तमएकदेशम्—सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम्। तस्मान्नामरूपोपाधिनिमित्ता एव आत्मन्यसंसारधर्मिणि सर्वे व्यवहाराः; “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” (क०उ० २।२।९-१०) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा- | को ब्रह्मस्वरूपके ज्ञानके विषयमें ब्रह्मके अंशांशी, एकदेश-एकदेशी अथवा विकार-विकारित्वादिकी कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सारी उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है।<br><br>इसलिये सारी कल्पनाओंको छोड़कर “ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है” “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उससे बाह्य है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंके अनुसार आकाशके समान उसकी निर्विशेषताका ही अनुभव करना चाहिये, उष्णस्वरूप अग्निमें एक शीतल देशके समान तथा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें एक अन्धकारमय देशके समान ब्रह्मसे भिन्न आत्माकी कल्पना न करे; क्योंकि सब उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है। अतः असंसारधर्मी आत्मामें सारे व्यवहार नाम एवं रूपकृत उपाधिके कारण ही हैं, जैसा कि “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया है” “धीर पुरुष समस्त रूपोंकी रचना कर उनके नाम रखकर उनके द्वारा बोलता |

बृ० उ० ३१—

४८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| भिवदन्यदास्ते" इत्येवमादिमन्त्रवर्णेभ्यः।<br><br>न स्वत आत्मनः संसारित्वम्, अलक्तकाद्युपाधिसंयोगजनितरक्तस्फटिकादिबुद्धिवद्भ्रान्तमेव, न परमार्थतः। "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४ । ३ । ७) "न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्" (४ । ४ । २३) "न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (४ । ४ । २३) "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम्" (गीता १३ । २७) "शुनि चैव श्वपाके च" (गीता ५ । १८) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परमात्मनोऽसंसारित्वैव। अत एकदेशो विकारः शक्तिर्वा विज्ञानात्मा अन्यो वेति विकल्पयितुं निरवयवत्वाभ्युपगमे विशेषतो न शक्यते। अंशादिश्रुतिस्मृतिवादाश्चैकत्वार्थाः, न तु भेदप्रतिपादकाः, विवक्षितार्थैकवाक्ययोगात्—इत्यवोचाम।<br><br>(उपनिषत्प्रामाण्यमीमांसा)<br>सर्वोपनिषदां परमात्मैकत्वज्ञापनपरत्वे अथ किमर्थं तत्प्रतिकूलोऽर्थो विज्ञानात्मभेदः परि- | रहता है" इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध होता है।<br><br>आत्माका संसारित्व स्वतः नहीं है, अपितु लाक्षा आदि उपाधिके संयोगसे होनेवाली 'स्फटिक लाल है' इत्यादि बुद्धिके समान भ्रान्तिजनित ही है, परमार्थतः नहीं। "मानो ध्यान करता है, मानो अधिक चलता है", "यह कर्मसे न बढ़ता है, न छोटा होता है" "यह पापकर्मसे लिप्त नहीं होता" "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित", "कुत्ते और चाण्डालमें" इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे परमात्माका असंसारित्व ही सिद्ध होता है। अतः विशेषतः आत्माका निरवयवत्व स्वीकार करनेपर ऐसा विकल्प नहीं किया जा सकता कि विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश, विकार, शक्ति अथवा और कुछ है। उसके अंशादि होनेका प्रतिपादन करनेवाले श्रुतिस्मृतिवाद भी आत्माके एकत्वके ही लिये हैं, भेदका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि उपनिषदोंके विवक्षित अर्थकी एकवाक्यता होनी चाहिये—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।<br><br>समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य परमात्माके एकत्वमें है, फिर विज्ञानात्माके भेदरूप उससे प्रतिकूल विषयकी कल्पना किस लिये की जाती |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३


| कल्प्यत इति ? कर्मकाण्डप्रामाण्यविरोधपरिहारायेत्येके; कर्मप्रतिपादकानि हि वाक्यानि अनेकक्रियाकारकफलभोक्तृकर्त्राश्रयाणि, विज्ञानात्मभेदाभावे ह्यसंसारिण एव परमात्मन एकत्वे कथमिष्टफलासु क्रियासु प्रवर्त्तयेयुः? अनिष्टफलाभ्यो वा क्रियाभ्यो निवर्त्तयेयुः? कस्य वा बद्धस्य मोक्षायोपनिषदारभ्येत ? अपि च परमात्मैकत्ववादिपक्षे कथं परमात्मैकत्वोपदेशः ? कथं वा तदुपदेशग्रहणफलम् ? बद्धस्य हि बन्धनाशायोपदेशस्तदभाव उपनिषच्छास्त्रं निर्विषयमेव । | है ? इसपर किन्हीं (मीमांसकों) का तो कहना है कि यह कल्पना कर्मकाण्डके प्रामाण्यसे प्रतीत होनेवाले विरोधका परिहार करनेके लिये है, क्योंकि कर्मका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य अनेकों क्रिया, कारक, फल, भोक्ता और कर्त्ताओंको आश्रय करनेवाले हैं, विज्ञानात्माका भेद न होनेपर असंसारी परमात्माका एकत्व रहते हुए वे किस प्रकार लोगोंको इष्टफलोंवाली क्रियाओंमें प्रवृत्त अथवा अनिष्ट फलोंवाली क्रियाओंसे निवृत्त कर सकेंगे। तथा किस बद्ध जीवकी मुक्तिके लिये उपनिषद्का आरम्भ किया जायगा ? इसके सिवा परमात्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवालोंके मतमें किसीको परमात्माके एकत्वका उपदेश भी क्यों दिया जायगा और किस प्रकार उसके उपदेशग्रहणका फल होगा ? क्योंकि बद्ध जीवके बन्धनका नाश करनेके लिये ही इसका उपदेश किया जाता है, बन्धन न होनेपर तो उपनिषच्छास्त्रका कोई विषय ही नहीं रहता । | | एवं तर्हि उपनिषद्वादिपक्षस्य कर्मकाण्डवादिपक्षेण चोद्यपरिहार- | पूर्वं०—ऐसी स्थितिमें तो उपनिषद्वादी पक्षके शङ्का-समाधानका मार्ग कर्मकाण्डवादी पक्षके समान ही |

| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

४८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी
योः समानः पन्थाः—येन भेदाभावे कर्मकाण्डं निरालम्बनमात्मानं न लभते प्रामाण्यं प्रति तथोपनिषदपि। एवं तर्हि यस्य प्रामाण्ये स्वार्थविघातो नास्ति, तस्यैव कर्मकाण्डस्यास्तु प्रामाण्यम्; उपनिषदां तु प्रामाण्यकल्पनायां स्वार्थविघातो भवेदिति मा भूत्प्रामाण्यम्। न हि कर्मकाण्डं प्रमाणं सदप्रमाणं भवितुमर्हति; न हि प्रदीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति, न प्रकाशयति चेति।है, क्योंकि जिस प्रकार भेद न होनेपर कर्मकाण्ड निरालम्ब (अधिकारि-शून्य) होकर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार उपनिषद् भी स्वयं प्रामाणिक नहीं हो सकती। यदि ऐसी बात है, तब तो जिसकी प्रामाणिकता माननेपर स्वार्थका¹ विघात नहीं होता, उस कर्मकाण्डकी ही प्रामाणिकता माननी चाहिये। उपनिषदोंके प्रामाण्यकी कल्पना करनेमें तो स्वार्थका विघात होता है, इसलिये उनकी प्रामाणिकता भले ही न हो। कर्मकाण्ड प्रामाणिक होकर अप्रामाणिक नहीं हो सकता, क्योंकि दीपक अपने प्रकाश्य पदार्थको प्रकाशित करता है और प्रकाशित नहीं भी करता—ऐसा नहीं होता।
प्रत्यक्षादिप्रमाणविप्रतिषेधाच्च—<br>न केवलमुपनिषदो ब्रह्मैकत्वं प्रतिपादयन्त्यः स्वार्थविघातं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातं च कुर्वन्ति; प्रत्यक्षादिनिश्चितभेदप्रतिपत्त्यर्थप्रमाणैश्च विरुध्यन्ते। तस्माद-इसके सिवा अभेद-श्रुतियोंका प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध भी है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें केवल स्वार्थविघात और कर्मकाण्डके प्रामाण्यका विघात ही नहीं करतीं अपितु निश्चित भेदका ज्ञान करनेवाले प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उनका विरोध भी है।

१. शब्दकी शक्तिवृत्तिसे प्रतीत होनेवाले सृष्ट्यादि भेदका।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५


प्रामाण्यमेवोपनिषदाम्; अन्यार्थता वाऽस्तु; न त्वेव ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थता।अतः उपनिषदें अप्रामाणिक ही हैं, अथवा उनका कोई अन्य प्रयोजन हो सकता है, वे ब्रह्मका एकत्व प्रतिपादन करनेके लिये ही नहीं हो सकतीं।
न; उक्तोत्तरत्वात्। प्रमाणस्य हि प्रमाणत्वमप्रमाणत्वं वा प्रमोत्पादनानुत्पादननिमित्तम्, अन्यथा चेत्स्तम्भादीनां प्रामाण्यप्रसङ्गाच्छब्दादौ प्रमेये।सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। प्रमाणकी प्रमाणता अथवा अप्रमाणता प्रमाकी उत्पत्ति करने या न करनेके कारण ही होती है, यदि ऐसा न माना जायगा तो शब्दादि प्रमेयमें स्तम्भादिकी भी प्रमाणताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा¹।
किञ्चातः ?पूर्व०-सो, इससे क्या हुआ ?
यदि तावदुपनिषदो ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिप्रमां कुर्वन्ति, कथमप्रमाणं भवेयुः ?सिद्धान्ती-यदि उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, तो वे किस प्रकार अप्रामाणिक होंगी ?
न कुर्वन्त्येवेति चेद्यथाग्निः शीतमिति ?पूर्व०-किंतु 'अग्नि शीतल होता है, इस वाक्यके समान यदि वे प्रमा उत्पन्न करती ही न हों तो ?
स भवानेवं वदन्वक्तव्यः-उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थं भवतो वाक्यमुपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधं किंसिद्धान्ती-इस प्रकार बोलनेवाले आपसे हमें यह कहना है कि उपनिषद्के प्रामाण्यका प्रतिषेध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ आपका वाक्य उपनिषद्के प्रामाण्यका निषेध क्या

१. स्तम्भादिसे शब्दादिकी प्रमा नहीं होती; किंतु यदि प्रमाणके लिये प्रमाको उत्पन्न करना आवश्यक न मानें तो उन्हें भी प्रमाण क्यों न माना जाय ?

४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न करोत्येवाग्निर्वा रूपप्रकाशम् ? | नहीं करता है तथा अग्नि रूपको क्या प्रकाशित नहीं करता है ? | | अथ करोति । | पूर्व०— करता तो है । | | यदि करोति भवतु तदा प्रतिषेधार्थं प्रमाणं भवद्वाक्यम्, अग्निश्च रूपप्रकाशको भवेत्; प्रतिषेधवाक्यप्रामाण्ये भवत्येवोपनिषदां प्रामाण्यम् । अत्र भवन्तो ब्रुवन्तु कः परिहार इति ? | सिद्धान्ती— यदि वह उसका प्रतिषेध करता है तो उसका प्रतिषेध करनेमें आपका वाक्य प्रमाण हो सकता है तथा अग्नि भी रूपका प्रकाशक हो सकता है । अतः यदि आपका प्रतिषेधक वाक्य प्रामाणिक है तो उपनिषदोंकी प्रामाणिकता होनी ही चाहिये । अब आप बतलाइये इसका क्या परिहार हो सकता है ? | | नन्वत्र प्रत्यक्षा मद्वाक्य उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थप्रतिपत्तिरग्नौ च रूपप्रकाशनप्रतिपत्तिः प्रमा । | पूर्व०— यहाँ मेरे वाक्यमें उपनिषत्प्रामाण्यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप प्रमा तथा अग्निमें रूपप्रकाशनका ज्ञानरूप प्रमा तो प्रत्यक्ष ही है । | | कस्तर्हि भवतः प्रद्वेषो ब्रह्मैकत्वप्रत्यये प्रमां प्रत्यक्षां कुर्वतीषूपनिषत्सूपलभ्यमानासु ? प्रतिषेधानुपपत्तेः । शोकमोहादिनिवृत्तिश्च प्रत्यक्षं फलं ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिपारम्पर्यजनितमित्यवोचाम। तस्मादुक्तोत्तरत्वादुपनिषदं प्रत्य- | सिद्धान्ती— तो फिर ब्रह्मैकत्वज्ञानमें प्रमाको प्रत्यक्ष करती हुई उपलब्ध होनेवाली उपनिषदोंमें ही आपका क्या द्वेष है ? क्योंकि उनके प्रामाण्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । तथा हम यह कह चुके हैं कि शोकमोहादिकी निवृत्ति—यह ब्रह्मैकत्वज्ञानकी परम्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष फल है । अतः इसका उत्तर ऊपर दे दिया जानेके कारण उपनिषदोंमें |


१. 'उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, यह उत्तर ऊपर दिया गया है ।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७


प्रामाण्यशङ्का तावन्नास्ति ।अप्रामाण्यकी शङ्का तो हो नहीं सकती ।
यच्चोक्तं स्वार्थविघातकरत्वा- <br> दप्रामाण्यमिति, तदपि न, तदर्थ- <br> प्रतिपत्तेर्बाधकाभावात् । न हि <br> उपनिषद्भ्यः—ब्रह्मैकमेवाद्विती- <br> यम्, नैव च—इति प्रतिपत्तिरस्ति; <br> यथाग्निरुष्णः शीतश्चेत्यस्माद्वा- <br> क्याद्विरुद्धार्थद्वयप्रतिपत्तिः । अ- <br> भ्युपगम्य चैतदवोचाम; न तु <br> वाक्यप्रामाण्यसमय एष न्यायः— <br> यदुतैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वम्। <br> सति चानेकार्थत्वे, स्वार्थश्च स्यात्, <br> तद्विघातकृच्च विरुद्धोऽन्योऽर्थः। न <br> त्वेतत्—वाक्यप्रमाणकानां विरु- <br> द्धमविरुद्धं च' एकं वाक्यम्, अने- <br> कमर्थं प्रतिपादयतीत्येष समयः, <br> अर्थैकत्वाद्वह्येकवाक्यता ।और ऐसा जो कहा कि अपने अर्थका विघात करनेवाली होनेसे उनकी अप्रामाणिकता है, सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि उनसे होनेवाले अर्थज्ञानका कोई बाधक नहीं है । उपनिषदोंसे यह ज्ञान नहीं होता कि ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है भी और नहीं भी है, जिस प्रकार कि 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, इस एक ही वाक्यसे दो विरुद्ध अर्थोंका ज्ञान होता है । तथा यह समझकर ही हम ऐसा कह चुके हैं कि वाक्यकी प्रामाणिकताके समय एक वाक्यके अनेक अर्थ मानने उचित नहीं हैं । यदि वाक्यके अनेक अर्थ होंगे तो एक उसका अपना अर्थ होगा और दूसरा उसका विघात करनेवाला अर्थ होगा । 'एक ही वाक्य बहुत-से विरुद्ध और अविरुद्ध अर्थोंका भी प्रतिपादन करता है, यह वाक्यको प्रमाण माननेवालोंका सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि अर्थकी एकता होनेसे ही सबकी एकवाक्यता होती है ।
न च कानिचिदुपनिषद्वाक्यानि <br> ब्रह्मैकत्वप्रतिषेधं कुर्वन्ति । यत्तु, <br> लौकिकं वाक्यम्—अग्निरुष्णःकोई-कोई उपनिषद्वाक्य ब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हों—ऐसी भी बात नहीं है । 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, यह जो लौकिक

४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
शीतश्चेति, न तत्रैकवाक्यता, तदेकदेशस्य प्रमाणान्तरविषयानुवादित्वात्। अग्निः शीत इत्येतदेकं वाक्यम्; अग्निरुष्ण इति तु प्रमाणान्तरानुभवस्मारकम्, न तु स्वयमर्थावबोधकम्। अतो नाग्निः शीत इत्यनेनैकवाक्यता, प्रमाणान्तरानुभवस्मारेणैवोपक्षीणत्वात्। यत्तु विरुद्धार्थप्रतिपादकमिदं वाक्यमिति मन्यते, तच्छीतोष्णपदाभ्याम् अग्निपदसामानाधिकरण्यप्रयोगनिमित्ता भ्रान्तिः; न त्वेवैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वं लौकिकस्य वैदिकस्य वा।वाक्य है, वहाँ एकवाक्यता नहीं होती; क्योंकि उसका एकदेश प्रमाणान्तरके विषयभूत अर्थका अनुवाद करनेवाला है। 'अग्नि शीतल होता है' यह एक वाक्य है और 'अग्नि उष्ण होता है' यह प्रमाणान्तरसे प्राप्त हुए अनुभवका अनुवादक है, स्वयं किसी विशेष अर्थका द्योतक नहीं है। अतः 'अग्नि शीतल होता है' इस वाक्यसे उसकी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि वह प्रमाणान्तरसे होनेवाले अनुभवकी स्मृति कराकर ही समाप्त हो जाता है। और ऐसा जो माना जाता है कि यह वाक्य विरुद्ध अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाला है, वह शीत और उष्ण पदोंका अग्निपदके समानाधिकरणरूपसे प्रयोग होनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति¹ है। वास्तवमें तो लौकिक हो अथवा वैदिक, एक वाक्यके अनेक अर्थ हो ही नहीं सकते।
[कर्मकाण्डप्रामाण्योपपादनम्]<br>यच्चोक्तं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातकृदुपनिषद्व्राक्यमिति, तन्न; अन्यार्थत्वात्। ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनपरा ह्युपनिषदो नेष्टार्थप्राप्तौऔर ऐसा जो कहा कि उपनिषद्वाक्य कर्मकाण्डकी प्रामाणिकताको नष्ट करनेवाले हैं, सो यह बात नहीं है; क्योंकि उनका तात्पर्य तो दूसरा है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी

१. तात्पर्य यह है कि वस्तुतः यह किसी प्रमाका उत्पादक नहीं है।

ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४८९

| साधनोपदेशं तस्मिन्वा पुरुषनियोगं वारयन्ति, अनेकार्थत्वानुपपत्तेरेव । | प्राप्तिके लिये साधनके उपदेश तथा उसमें पुरुषके नियोगका निवारण नहीं करतीं; क्योंकि उनके अनेक अर्थ होने सम्भव ही नहीं हैं। | | न च कर्मकाण्डवाक्यानां स्वार्थे प्रमा नोत्पद्यते । असाधारणे चेत्स्वार्थे प्रमामुत्पादयति वाक्यम्, कुतोऽन्येन विरोधः स्यात् ? | तथा कर्मकाण्डसम्बन्धी वाक्योंकी स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है ! यदि कोई वाक्य अपने असाधारण अर्थमें प्रमा उत्पन्न करता है तो उसका दूसरे वाक्यसे विरोध क्यों होगा ? | | ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वात्प्रमा नोत्पद्यत एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें ब्रह्मकी एकता माननेपर तो कर्मकाण्डपरक वाक्योंका कोई विषय ही नहीं रहता, इसलिये प्रमा उत्पन्न हो ही नहीं सकती; तो ? | | न, प्रत्यक्षत्वात्प्रमायाः । "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" "ब्राह्मणो न हन्तव्यः" इत्येवमादिवाक्येभ्यः प्रत्यक्षा प्रमा जायमाना; 'सा नैव भविष्यति, यद्युपनिषदो ब्रह्मैकत्वं बोधयिष्यन्ति' इत्यनुमानम्; न चानुमानं प्रत्यक्षविरोधे प्रामाण्यं लभते; तस्मादसदेवैतद्ब्रूयते—प्रमैव नोत्पद्यत इति। अपि च यथाप्राप्तस्यैव | सिद्धान्ती —ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनसे प्रमाका होना तो प्रत्यक्ष है। "स्वर्गकी इच्छावाला दर्श और पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" "ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये" इत्यादि ऐसे ही वाक्योंसे प्रमा प्रत्यक्ष उत्पन्न होती देखी जाती है; 'यदि उपनिषदें ब्रह्मकी एकताका ज्ञान करायेंगी तो वह नहीं होगी' यह तो अनुमान है। और प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं रह सकती। इसलिये यह कहना कि उनसे प्रमा ही उत्पन्न नहीं होती—असत् ही है। अपितु जो पुरुष |