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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| दृष्टो मृत्युः, विनाशकत्वात्; सोऽद्भिर्भक्ष्यते सोऽग्निरपामन्नम्; गृहाण तर्ह्यस्ति मृत्योर्मृत्युरिति । तेन सर्वं ग्रहातिग्रहजातं भक्ष्यते मृत्योर्मृत्युना तस्मिन् बन्धने नाशिते मृत्युना भक्षिते संसारान्मोक्ष उपपन्नो भवति । बन्धनं हि ग्रहातिग्रहलक्षणमुक्तम्, तस्माच्च मोक्ष उपपद्यत इत्येतत् प्रसाधितम्; अतो बन्धमोक्षाय पुरुषप्रयासः सफलो भवति । अतोऽपजयति पुनर्मृत्युम् । १०। | होनेसे अग्नि मृत्युरूप देखा गया है, उसे जल भक्षण कर जाता है, अतः वह अग्नि जलका खाद्य है; अतः यह समझ लो कि मृत्युका मृत्यु भी है। उस मृत्युके मृत्युद्वारा सम्पूर्ण ग्रहातिग्रहसमुदाय भक्षण कर लिया जाता है। उस बन्धनको नष्ट कर देनेपर अर्थात् मृत्युद्वारा उसका भक्षण कर लिये जानेपर संसारसे मोक्ष होना सम्भव है। बन्धन ग्रहातिग्रहरूप कहा गया है और उससे मोक्ष होना भी सम्भव है—यह बात सिद्ध कर दी गयी है, अतः उस बन्धनकी निवृत्तिके लिये पुरुषका [ श्रवणादिरूप ] प्रयत्न सफल होता है। अतः [ ज्ञानके द्वारा ] पुरुष पुनर्मृत्युको जीत लेता है ॥ १० ॥ |


तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उद्-
स्मात् प्राणाः क्रामन्त्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञ-
वल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्या-
ध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं?' 'नहीं, नहीं,'

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६६१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६६१


ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है, अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है'॥ ११॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
परेण मृत्युना मृत्यौ भक्षिते परमात्मदर्शनेन योऽसौ मुक्तो विद्वान् सोऽयं पुरुषो यत्र यस्मिन् काले म्रियते, उत् ऊर्ध्वम् अस्माद् ब्रह्मविदो म्रियमाणात्, प्राणाः—वागादयो ग्रहाः, नामादयश्चातिग्रहा वासनारूपा अन्तःस्थाः प्रयोजकाः क्रामन्त्यूर्ध्वम् उत्क्रामन्ति, आहोस्वन्नेति ?'परमात्मदर्शनरूप परमृत्युके द्वारा मृत्युके भक्षण कर लिये जानेपर जो यह मुक्त हुआ विद्वान् है, वह जब-जिस समय मरता है, उस समय इस मरनेवाले ब्रह्मवेत्तासे प्राण—वागादि ग्रह और नामादि अतिग्रह, जो वासनारूप और भीतर स्थित रहकर प्रेरणा करनेवाले हैं, उत्क्रमण करते हैं या नहीं?'
नेति होवाच याज्ञवल्क्यो नोत्क्रामन्ति, अत्रैवास्मिन्नेव परेणात्मनाविभागं गच्छन्ति विदुषि कार्याणि करणानि च स्वयोनौ परब्रह्मसतत्त्वे समवनीयन्ते एकीभावेन समवसृज्यन्ते, प्रलीयन्ते इत्यर्थः ऊर्मय इव समुद्रे। तथा च श्रुत्यन्तरं कलाशब्दवाच्यानां प्राणानां परस्मिन्नात्मनि प्रलयं दर्शयति—"एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति" (प्र० उ० ६। ५) इति।याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, वे उत्क्रमण नहीं करते। वे यहीं—इस परमात्मामें ही अभेदको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् इस विद्वान्‌में ये भूत और इन्द्रियवर्ग अपने मूलभूत परब्रह्मसत्तामें एकीभावसे विसृष्ट यानी लीन हो जाते हैं, जैसे कि समुद्रमें तरङ्गैं। इसी प्रकार "ऐसे ही इस सर्वद्रष्टाकी ये सोलह कलाएँ पुरुषायण हैं अर्थात् वे पुरुषको प्राप्त होकर अस्त हो जाती हैं" यह अन्य श्रुति भी कलाशब्दवाच्य प्राणोंका परमात्मामें लय दिखलाती है।
इति परेणात्मनाविभागं गच्छन्तीति दर्शितम्। न तर्हिइस प्रकार यह दिखलाया गया कि वे प्राण परमात्माके साथ अभेदको प्राप्त हो जाते हैं। तब तो यह

६६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| मृतः—न हि, मृतश्चायं यस्मात् स उच्छ्वयति—उच्छूनतां प्रतिपद्यते, आध्मायति बाह्येन वायुना पूर्यते दृतिवत्, आध्मातो मृतः शेते निश्चेष्टः। बन्धननाशे मुक्तस्य न क्वचिद्गमनमिति वाक्यार्थः ॥ ११ ॥ | कहना चाहिये कि वह मरता ही नहीं है; ऐसी बात नहीं है; यह मरता तो है; क्योंकि वह उच्छून-भावको प्राप्त होता है अर्थात् फूल जाता है। वह धोकनीके समान शरीरको बाह्य वायुसे भरता है और इस प्रकार भरकर मरा हुआ निश्चेष्ट पड़ा रहता है। इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि बन्धनका नाश हो जानेपर मुक्त पुरुषका कहीं गमन नहीं होता ॥ ११ ॥ | | मुक्तस्य किं प्राणा एव समवनीयन्ते, आहोस्वित् तत्प्रयोजकमपि सर्वम् ? अथ प्राणा एव, न तत्प्रयोजकं सर्वम्, प्रयोजके विद्यमाने पुनः प्राणानां प्रसङ्गः, अथ सर्वमेव कामकर्मादि, ततो मोक्ष उपपद्यते, इत्येवमर्थ उत्तरः प्रश्नः । | तो क्या मुक्त पुरुषके केवल प्राणोंका ही लय होता है अथवा उसके सब प्रयोजकोंका भी ? यदि कहें कि प्राण ही लीन होते हैं, उसके सभी प्रयोजक लीन नहीं होते, तो प्रयोजकोंके विद्यमान रहते हुए पुनः प्राणोंकी प्राप्तिका प्रसंग हो जायगा और यदि काम-कर्मादि सभीका लय माना जाय तो ही उसका मोक्ष होना बन सकता है; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये ही आगेका प्रश्न है— |

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३


'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शन- के द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाच, यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति; आहेतरो—नामेति । सर्वं समवनीयत इत्यर्थः, नाममात्रं तु न लीयत आकृतिसम्बन्धात् । नित्यं हि नाम; अनन्तं वै नाम। नित्यत्वमेवानन्त्यं नाम्नः। तदानन्त्याधिकृता अनन्ता वै विश्वे देवाः। अनन्तमेव स तेन लोकं जयति। तन्नामानन्त्याधिकृतान् विश्वान् देवानात्मत्वेनोपेत्य तेनानन्त्यदर्शनेनानन्तमेव लोकं जयति ॥ १२ ॥ | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय यह पुरुष मर जाता है, इसे क्या नहीं छोड़ता ?' याज्ञवल्क्यने 'नाम' ऐसा कहा। तात्पर्य यह है कि सब कुछ लीन हो जाता है, किन्तु आकृतिसे सम्बन्ध होनेके कारण केवल नाम ही लीन नहीं होता। नाम तो नित्य है, वह अनन्त ही है। नित्य होना ही नामका अनन्तत्व है। उस अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं। अतः इस दर्शनसे वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है। अर्थात् नामके अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेवोंको आत्मभावसे प्राप्त होकर उस आनन्त्य-दर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥ |


इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार

| ग्रहातिग्रहरूपं बन्धनमुक्तं मृत्युरूपम्; तस्य च मृत्योर्मृत्युस- | ग्रहातिग्रहरूप जो मृत्युरूप बन्धन है, उसका वर्णन किया गया। उस मृत्युके मृत्युकी भी सत्ता होनेके |

६६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| द्भावान्मोक्षश्चोपपद्यते । स च मोक्षो ग्रहातिग्रहरूपाणामिहैव प्रलयः, प्रदीपनिर्वाणवत् । यत्तद् ग्रहातिग्रहाख्यं बन्धनं मृत्युरूपम्, तस्य यत् प्रयोजकं तत्स्वरूपनिर्धारणार्थमिदमारभ्यते-याज्ञवल्क्येति होवाच । | कारण उससे मोक्ष होना सम्भव है। वह मोक्ष दीपकके शान्त हो जानेके समान ग्रहातिग्रहरूपोंका यहीं प्रलय हो जाना है। वह जो ग्रहातिग्रहसंज्ञक मृत्युरूप बन्धन है, उसका जो प्रयोजक है, उसके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये 'याज्ञवल्क्येति होवाच' यह कण्डिका आरम्भ की जाती है। | | अत्र केचिद्वर्णयन्ति-ग्रहातिग्रहस्य सप्रयोजकस्य विनाशेऽपि किल न मुच्यते; नामावशिष्टोऽविद्यया ऊषरस्थानीयया स्वात्मप्रभवया परमात्मनः परिच्छिन्नो भोज्याच्च जगतो व्यावृतः उच्छिन्नकामकर्मो अन्तराले व्यप्रतिष्ठते । तस्य परमात्मैकत्वदर्शनेन द्वैतदर्शनमपनेतव्यमित्यतः परं परमात्मदर्शनमारब्धव्यम्, | यहाँ कुछ (ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी) लोग यों कहते हैं-प्रयोजकोंके सहित ग्रहातिग्रहका नाश हो जानेपर भी विद्वान् मुक्त नहीं होता; स्वात्मासे उत्पन्न ऊषरस्थानीया अविद्याके द्वारा परमात्मासे परिच्छिन्न तथा भोज्य जगत्‌से व्यावृत वह नाममात्रावशिष्ट विद्वान् काम और कर्मोंका उच्छेद हो जानेसे अन्तरालावस्थामें रहता है ।^२ परमात्मैकत्वदर्शनके द्वारा उसकी द्वैतदृष्टिको निवृत्त करना है, इसलिये आगे परमात्मदर्शनका आरम्भ करना |


१. यह लेशाविद्या उसके बन्धनकी हेतु नहीं होती; इसलिये इसे ऊषरस्थानीया कहा है।
२. तात्पर्य यह है कि ज्ञान-कर्मसमुच्चयका अनुष्ठान करनेसे काम-कर्मादि प्रयोजकोंके सहित स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहोंका नाश हो जानेपर भी यद्यपि उसे मुक्ति नहीं मिलती तो भी पुनः बन्धनकी योग्यता न रहनेके कारण वह मुक्ति और बन्धनके बीचकी अवस्थामें रहता है।

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६६५ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६६५
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
इत्येवमपवर्गाख्यामन्तरालावस्थां परिकल्प्योत्तरग्रन्थसम्बन्धं कुर्वन्ति ।चाहिये। इस प्रकार वे अपवर्गसंज्ञक अन्तरालावस्थाकी कल्पना करके आगेके ग्रन्थका सम्बन्ध लगाते हैं।
तत्र वक्तव्यम्--विशीर्णेषु करणेषु विदेहस्य परमात्मदर्शनश्रवणमनननिदिध्यासनानि कथमिति; समवनीतप्राणस्य हि नाममात्रावशिष्टस्येति तैरूच्यते ।इसमें हमें यह कहना है कि इन्द्रियोंके उच्छिन्न हो जानेपर जो देहहीन हो गया है, उसके द्वारा परमात्मदर्शन तथा श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन किस प्रकार किये जा सकते हैं ? इसपर वे कहते हैं कि जिसके प्राण लीन हो गये हैं और जो नाममात्र अवशिष्ट रह गया है, उसीका विद्यामें अधिकार है; क्योंकि श्रुतिके द्वारा पहले कहा गया है कि 'वह मरकर पड़ा रहता है।'
‘मृतः शेते’ इति ह्युक्तम् ।
न मनोरथेनाप्येतदुपपादयितुं शक्यते । अथ जीवन्नेवाविद्यामात्रावशिष्टो भोज्यादपावृत्त इति परिकल्प्यते, तत्तु किन्निमित्तमिति वक्तव्यम् ।किंतु मनोरथमात्रसे भी इस बातका उपपादन नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भोज्यवर्गसे व्यावृत्त अविद्यामात्रावशिष्ट जीवित पुरुष ही विद्याका अधिकारी है तो यह बतलाना चाहिये कि वह किस कारणसे भोज्यवर्गसे व्यावृत्त होता है।^१
समस्तद्वैतैकत्वात्मप्राप्तिनिमित्तमिति यद्युच्यते, तत् पूर्वमेव निराकृतम् । कर्मसहितेन द्वैतै-यदि यह कहा जाय कि इसका कारण समस्त द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनकी प्राप्ति है तो इसका पहले ही निराकरण किया जा चुका है।^२

१. क्योंकि बिना सम्यग्दर्शनके भोज्यवर्गसे वैराग्य नहीं हो सकता।
२. क्योंकि अपरविद्यासमुच्चित कर्म हिरण्यगर्भके भोगकी प्राप्ति करानेवाला है, वह भोज्यवर्गसे निवृत्त करनेवाला नहीं है—यह बात पहले अध्यायमें कही जा चुकी है।

६६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
कत्वात्मदर्शनेन सम्पन्नो विद्वान् मृतः समवनीतप्राणो जगदात्मत्वं हिरण्यगर्भस्वरूपं वा प्राप्नुयात्, असमवनीतप्राणो भोज्याज्जीवन्नेव वा व्यावृत्तो विरक्तः परमात्मदर्शनाभिमुखः स्यात् । न चोभयम् एकप्रयत्ननिष्पाद्येन साधनेन लभ्यम् । हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनं चेत्, न ततो व्यावृत्तिसाधनम्। परमात्माभिमुखीकरणस्य भोज्याद् व्यावृत्तेः साधनं चेत्, न हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनम् । न हि यद् गतिसाधनं तद् गतिनिवृत्तेरपि ।कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनसे सम्पन्न हुआ विद्वान् मरनेपर प्राणोंके लीन हो जानेपर या तो जगदात्मभावको प्राप्त हो जायगा और या हिरण्यगर्भस्वरूप हो जायगा; अथवा जबतक उसके प्राणोंका लय नहीं होगा तबतक वह जीवित रहता हुआ ही भोज्यवर्गसे व्यावृत्त यानी विरक्त रहकर परमात्मदर्शनके अभिमुख होगा। दोनों फल एक ही प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले साधनसे प्राप्त नहीं हो सकते। यदि वह प्रयत्न हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन होगा तो उससे व्यावृत्त होनेका साधन नहीं हो सकता; और यदि वह परमात्माके सम्मुख करने और भोज्यवर्गसे विरक्ति करानेका साधन होगा तो हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन नहीं हो सकता; क्योंकि जो गतिका साधन होता है, वही गतिकी निवृत्तिका भी साधन नहीं होता।
अथ मृत्वा हिरण्यगर्भं प्राप्य ततः समवनीतप्राणो नामावशिष्टः परमात्मज्ञानेऽधिक्रियते, ततोऽस्मदाद्यर्थं परमात्मज्ञानोपदेशोऽनर्थकः स्यात् । सर्वेषां हि ब्रह्मविद्या पुरुषार्थायोपदिश्यते—यदि कहो कि वह मरकर हिरण्यगर्भको प्राप्त होनेके पश्चात् लीनप्राण और नाममात्रावशिष्ट होकर परमात्मज्ञानका अधिकारी होता है तो हम लोगोंके लिये तो परमात्मज्ञानका उपदेश व्यर्थ ही होगा। किंतु “तद्यो यो देवानाम्” इत्यादिश्रुतिके

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७


"तद्यो यो देवानाम्" (बृ० उ० १ । ४ । १०) इत्याद्या श्रुत्या । तस्मादत्यन्तनिकृष्टा शास्त्रबाह्यैवेयं कल्पना । प्रकृतं तु वर्तयिष्यामः । तत्र केन प्रयुक्तं ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमित्येतन्निर्दिधारयिषया आह—द्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश सभीके पुरुषार्थसाधनके लिये किया गया है । अतः यह कल्पना अत्यन्त निकृष्ट और शास्त्रविरुद्ध ही है । अब हम प्रकृत विषयका अनुसरण करेंगे । यहाँ, यह निश्चय करनेके लिये कि वह ग्रहातिग्रहरूप बन्धन किसकी प्रेरणासे प्राप्त हुआ है ? श्रुति कहती है—

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीग्ँ शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्कायँ तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव यदूचतुरथ यत् प्रशशग्ँसतुः कर्म हैव तत् प्रशशग्ँसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय इस मृतपुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्यमें, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, हृदयाकाश भूताकाशमें, लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा लोहित और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे; यह प्रश्न जनसमुदायमें होने योग्य नहीं है।'

६६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

तब उन दोनोंने उठकर [एकान्तमें] विचार किया। उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है, इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
यत्रास्य पुरुषस्यासम्यग्दर्शिनः शिरःपाण्यादिमतो मृतस्य वागग्निमप्येति, वातं प्राणोऽप्येति चक्षुरादित्यमप्येतीति सर्वत्र सम्बध्यते। मनश्चन्द्रम्, दिशः श्रोत्रम्, पृथिवीं शरीरम्, आकाशमात्मेति, अत्रात्मा अधिष्ठानं हृदयाकाशमुच्यते; स आकाशमप्येति; ओषधीरपियन्ति लोमानि; वनस्पतीनपियन्ति केशाः; अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयत इति पुनरादानलिङ्गम्। <br><br> सर्वत्र हि वागादिशब्देन देवताः परिगृह्यन्ते, न तु करणा-जिस समय इस सम्यग्ज्ञानहीन शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है, प्राण वायुमें लीन हो जाता है और चक्षु आदित्यमें लीन हो जाता है—इस प्रकार 'अप्येति' इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध है। इसी प्रकार मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, आत्मा आकाशमें—'आत्मा' शब्दसे यहाँ उसका आश्रयभूत हृदयाकाश कहा गया है, वह आकाशमें लीन हो जाता है—लोम ओषधिमें लीन हो जाते हैं, केश वनस्पतिमें विलुप्त हो जाते हैं और लोहित तथा शुक्र जलमें स्थापित हो जाते हैं—'निधीयते' यह क्रियापद लोहित और शुक्रके पुनर्ग्रहणको सूचित करनेवाला है [क्योंकि जो वस्तु कहीं स्थापित होती या रक्खी जाती है, उसको पुनः ग्रहण किया जा सकता है]। <br><br> यहाँ वागादिशब्दोंसे सर्वत्र देवता ही ग्रहण किये जाते हैं, मोक्ष होनेसे

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न्येवापक्रामन्ति प्राङ्मोक्षात् तत्र । देवताभिरनधिष्ठितानि करणानि न्यस्तदात्राद्युपमानानि, विदेहश्च कर्ता पुरुषोऽस्वतन्त्रः किमाश्रितो भवति ? इति पृच्छ्यते—क्वायं तदा पुरुषो भवतीति, किमाश्रितस्तदा पुरुषो भवति ? इति यमाश्रयमाश्रित्य पुनः कार्यकरणसङ्घातमुपादत्ते, येन ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनं प्रयुज्यते, तत् किम् ? इति प्रश्नः ।पूर्व इन्द्रियोंका उच्छेद नहीं होता । उस अवस्थामें देवताओंसे अनधिष्ठित इन्द्रियाँ कर्ताके हाथसे छूटे हुए दराँत आदि औजारोंके समान हो जाती हैं, अतः अस्वतन्त्र कर्ता पुरुष देहहीन होनेपर किसके आश्रित रहता है। यही 'क्वायं तदा पुरुषो भवति' इस वाक्यसे पूछा जाता है, अर्थात् उस समय यह पुरुष किसके आश्रित रहता है ? जिस आश्रयको आश्रित करके यह पुनः कार्य-करण संघातको ग्रहण करता है और जिसकी प्रेरणासे ग्रहातिग्रहरूप बन्धन प्राप्त होता है, वह आश्रय क्या है ? ऐसा प्रश्न है ।
अत्रोच्यते--स्वभावयदॄच्छाकालकर्मदैवविज्ञानमात्रशून्यानि वादिभिः परिकल्पितानि; अतोऽनेकविप्रतिपत्तिस्थानत्वान्नैव जल्पन्यायेन वस्तुनिर्णयः । अत्र वस्तुनिर्णयं चेदिच्छसि, आहर सोम्य हस्तमार्तभाग हे, आवामेवइस विषयमें यह कहा जाता है—वादियोंने स्वभाव, यदृच्छा, काल, कर्म, दैव, विज्ञानमात्र और शून्य ऐसे अनेकों आश्रयस्थानोंकी कल्पना की है; इसलिये अनेक विरोधोंका स्थान होनेके कारण केवल जल्पन्यायसे वस्तुका निर्णय नहीं हो सकता । इस विषयमें यदि तुम वस्तुका निर्णय सुनना चाहते हो तो हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तुम मुझे अपना हाथ पकड़ाओ । तुम्हारे प्रश्नका जो ज्ञातव्य

१. जीतकी इच्छासे किये हुए व्यर्थ उत्तर-प्रत्युत्तर या विवादको 'जल्प' कहते हैं।

६७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| एतस्य त्वत्पृष्टस्य वेदितव्यं यत्, वेदिष्यावो निरूपयिष्यावः; कस्मात् ? न नौ आवयोरेतद्वस्तु सजने जनसमुदाये निर्णेतुं शक्यते; अत एकान्तं गमिष्यावो विचारणाय । | है, उसे हम दोनों ही मिलकर निरूपण करेंगे । क्यों ? क्योंकि हम दोनों इस वस्तुका जनसमुदायमें निर्णय नहीं कर सकते; इसलिये इसका विचार करनेके लिये एकान्तमें चलेंगे । | | तौ हेत्यादि श्रुतिवचनम्, तौ याज्ञवल्क्यार्तभागावेकान्तं गत्वा किं चक्रतुः ? इत्युच्यते—तौ होत्क्रम्य सजनाद्देशान्मन्त्रयाञ्चक्राते; आदौ लौकिकवादिपक्षाणामेकैकं परिगृह्य विचारितवन्तौ । तौ ह विचार्य यदूचतुरपोह्य पूर्वपक्षान् सर्वानैव, तच्छृणु; कर्म हैव आश्रयं पुनः पुनः कार्यकारणोपादानहेतुं तत्रोचतुरुक्तवन्तौ । न केवलम्; कालकर्मदैवेश्वरेष्वभ्युपगतेषु हेतुषु यत् प्रशंसंसतुस्तौ, कर्म हैव तत् प्रशंसंसतुः । | 'तौ ह' इत्यादि श्रुतिका वचन है; उन याज्ञवल्क्य और आर्तभागने एकान्तमें जाकर क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उन्होंने जनसमुदाययुक्त स्थानसे निकलकर परस्पर विचार किया । पहले लौकिक वादियोंके पक्षोंमेंसे एक-एकको लेकर मीमांसा की । इस प्रकार मीमांसा कर समस्त पूर्वपक्षोंका निराकरण कर उन्होंने जो कहा, सो सुनो; वहाँ उन्होंने पुनः-पुनः कर्मको ही आश्रय अर्थात् देह और इन्द्रियोंके ग्रहणका हेतु बतलाया । इतना ही नहीं, अपितु स्वीकार किये हुए काल, कर्म, दैव, ईश्वर आदि हेतुओंमें भी उन्होंने जो प्रशंसा की वह कर्मको ही की । | | यस्मान्निर्धारितमेतत् कर्मप्रयुक्तं ग्रहातिग्रहादिकार्यकारणोपादानं पुनः पुनः, तस्मात् पुण्यो वै शास्त्रविहितेन पुण्येन कर्मणा | क्योंकि पुनः-पुनः यही निश्चय किया गया है कि ग्रहातिग्रहादिरूप कार्य-करणसंघातका ग्रहण कर्मजनित है, इसलिये पुरुष पुण्य यानी शास्त्रविहित कर्मसे पुण्य (पुण्ययोनियुक्त) |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६७१ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ६७१

भवति, तद्विपरीतेन विपरीतो भवति पापः पापेन—इत्येवं याज्ञवल्क्येन प्रश्नेषु निर्णीतेषु, ततोऽशक्यप्रकम्पत्वाद् याज्ञवल्क्यस्य, ह जारत्कारव आर्तभाग उपराम ॥ १३ ॥होता है और उससे विपरीत पापकर्मसे पापयोनियुक्त होता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा प्रश्नोंका निर्णय हो जानेपर याज्ञवल्क्यको वादके द्वारा स्वसिद्धान्तसे विचलित करना अशक्य समझकर जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
द्वितीयमार्तभागब्राह्मणम् ॥ २ ॥


तृतीय ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-भुज्यु-संवाद

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[पूर्ववृत्तानुवादः]
अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ । ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमुक्तम्; यस्यात् सप्रयोजकान्मुक्तो मुच्यते, येन वा बद्धः संसरति, स मृत्युः। तस्माच्च मोक्षः उपपद्यते, यस्मान्मृत्योर्मृत्युरस्ति मुक्तस्य च न गतिः क्वचित्, सर्वोत्सादो नाममात्रावशेषः प्रदीपनिर्वाणवत्—इति चावधृतम् ।'अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ' । ग्रहातिग्रहरूप बन्धनका वर्णन किया गया। जिस सप्रयोजक बन्धनसे मुक्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है और जिससे बँधा होनेपर वह संसारको प्राप्त होता है, वही मृत्यु है। उससे मुक्त होना सम्भव है, क्योंकि उस मृत्युका मृत्यु भी है। और जो मुक्त है, उसका कहीं गमन नहीं होता; क्योंकि वह तो प्रदीपनिर्वाणके समान सबका उच्छेद होकर केवल नाममात्र अवशिष्ट रह जाता है—ऐसा निश्चय किया जा चुका है।

६७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| [शुभाशुभकर्मक्षये एव मोक्षसम्भवः]<br><br>तत्र संसरतां मुच्यमानानां च कार्यकारणानां स्वकारणसंसर्गे समाने मुक्तानामत्यन्तमेव पुनरनुपादानम्; संसरतां तु पुनः पुनरुपादानं येन प्रयुक्तानां भवति, तत् कर्म इत्यवधारितं विचारणापूर्वकम्। तत्तक्षये च नामावशेषेण सर्वोत्सादो मोक्षः। तच्च पुण्यपापाख्यं कर्म, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन' (बृ० उ० ३ । २ । १३) इत्यवधारितत्वात्, एतत्कृतः संसारः। | उनमें संसारबन्धनको प्राप्त और मुक्त होते हुए देह और इन्द्रियोंका अपने कारणसे संसर्ग होना समान होनेपर भी मुक्त पुरुषोंको उनका पुनः सर्वथा अग्रहण होता है; और जिसकी प्रेरणासे संसारमें आनेवाले पुरुषोंको उनका पुनर्ग्रहण होता है, वह कर्म है—ऐसा विचारपूर्वक निर्णय किया गया है। उस (कर्म) का क्षय हो जानेपर जो नाममात्र शेष रहकर बाकी सबका उच्छेद हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं। वह कर्म पुण्य और पाप संज्ञावाला है; क्योंकि 'पुण्यकर्मसे पुण्यशरीरयुक्त होता है और पापकर्मसे पापशरीरयुक्त' ऐसा पहले निश्चय किया गया है; इसका किया हुआ ही संसार है। | | [मोक्षस्य पुण्यफलत्वनिरासायोत्तरब्राह्मणम्]<br><br>तत्रापुण्येन स्थावरजङ्गमेषु स्वभावदुःखबहुलेषु नरकतिर्यक्प्रेतादिषु च दुःखमनुभवति पुनः पुनर्जायमानो म्रियमाणश्चेत्येतद् राजवर्त्मवत् सर्वलोकप्रसिद्धम्। यस्तु शास्त्रीयः 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' तत्रैवादरः क्रियत | उनमें पापकर्मसे जिनमें स्वभावतः ही दुःखकी अधिकता है, उन नरक, तिर्यक् एवं प्रेतादि स्थावरजङ्गमयोनियोंमें पुनः-पुनः जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ पुरुष दुःख अनुभव करता है—यह बात राजमार्गके समान समस्त जगत्में प्रसिद्ध है। यहाँ श्रुति 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' इस वाक्यसे प्रतिपादित जो शास्त्रीय मार्ग है, उसीमें आदर करती है। पुण्यकर्म ही |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३


| इह श्रुत्या। पुण्यमेव च कर्म सर्वपुरुषार्थसाधनमिति सर्वे श्रुति-स्मृतिवादाः। मोक्षस्यापि पुरुषार्थत्वात् तत्साध्यता प्राप्ता। यावद्यावत्पुण्योत्कर्षः तावत्तावत्फलोत्कर्षप्राप्तिः; तस्मादुत्तमेन पुण्योत्कर्षेण मोक्षो भविष्यतीत्या-शङ्का स्यात्, सा निवर्तयितव्या। ज्ञानसहितस्य च प्रकृष्टस्य कर्मण एतावती गतिः, व्याकृतनाम-रूपास्पदत्वात् कर्मणस्तत्फलस्य च, न त्वकार्ये नित्येऽव्याकृत-धर्मिणि अनामरूपात्मके क्रिया-कारकफलस्वभाववर्जिते कर्मणो व्यापारोऽस्ति; यत्र च व्यापारः स संसार एवेत्यस्यार्थस्य प्रदर्श-नाय ब्राह्मणमारभ्यते। | समस्त पुरुषार्थोंका साधक है—ऐसा समस्त श्रुति-स्मृतियोंका सिद्धान्त है। अतः पुरुषार्थ होनेके कारण मोक्षका भी उस पुण्यकर्मसे साध्य होना प्राप्त होता है जितनी-जितनी पुण्यकी उत्कृष्टता होती है, उतनी-उतनी ही फलकी उत्कृष्टता प्राप्त होती है; इसलिये ऐसी आशङ्का हो सकती है कि उत्तम पुण्योत्कर्षसे मोक्ष प्राप्त होगा, सो इसकी निवृत्ति करनी चाहिये। ज्ञानसहित प्रकृष्ट कर्मकी तो इतनी (संसारमात्र) ही गति है; क्योंकि कर्म और उसके फलके आश्रय व्याकृत नाम-रूप ही हैं। जो किसी-का कार्य नहीं है, उस नित्य अव्या-कृतधर्मा, नामरूपरहित, क्रिया-कारकफलस्वभावहीन मोक्षमें कर्म-का कोई व्यापार नहीं हो सकता; और जहाँ व्यापार है, वहाँ संसार ही है—इस बातको प्रदर्शित करने-के लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। | | यत्तु कैश्चिदुच्यते—विद्यासहितं<br><sub>विद्यासहितस्य</sub> कर्म निरभिसन्धि विष-कर्मण एव दध्यादिवत् कार्यान्तर- | कुछ लोगोंका जो कथन है कि फलाकाङ्क्षासे रहित होकर किया हुआ विद्यासहित कर्म विष और दधि आदिके समान कार्यान्तरका आरम्भ |

बृ० उ० ४३—

६७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ ]

६७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३ ]

| मोक्षजनकत्वमित्यनूद्य दूषयति—<br>मारभत इति; तन्न; अनारभ्यत्वान्मोक्षस्य। बन्धननाश एव हि मोक्षः; न कार्यभूतः; बन्धनं चाविद्येत्यवोचाम; अविद्यायाश्च न कर्मणा नाश उपपद्यते, दृष्टविषयत्वाच्च कर्मसामर्थ्यस्य। उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्कारा हि कर्मसामर्थ्यस्य विषयाः। उत्पादयितुं प्रापयितुं विकर्तुं संस्कर्तुं च सामर्थ्यं कर्मणो नातो व्यतिरिक्तविषयोऽस्ति कर्मसामर्थ्यस्य, लोके अप्रसिद्धत्वात्; न च मोक्ष एषां पदार्थानामन्यतमः, अविद्यामात्रव्यवहित इत्यवोचाम। | करता है,' सो ठीक नहीं है; क्योंकि मोक्षका आरम्भ होनेवाला नहीं है। मोक्ष तो बन्धनका नाशमात्र ही है, वह किसीका कार्य नहीं है और बन्धन अविद्या है—ऐसा हम कह चुके हैं। तथा अविद्याका कर्मसे नाश होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जिनमें कर्मका सामर्थ्य है, वे विषय तो प्रत्यक्ष हैं। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार ही कर्मके सामर्थ्यके विषय हैं। उत्पन्न करने, प्राप्त कराने, विकार करने और संस्कार करनेमें ही कर्मका सामर्थ्य है; कर्मके सामर्थ्यका इनसे भिन्न कोई विषय नहीं है; कारण, लोकमें कर्मके सामर्थ्यका कोई अन्य विषय प्रसिद्ध नहीं है; और इनमेंसे ही किसी एक पदार्थका नाम मोक्ष है नहीं, वह तो केवल अविद्यासे ही व्यवधानयुक्त है—ऐसा हम कह चुके हैं। | | बाढम्, भवतु केवलस्यैव कर्मण एवंस्वभावता, विद्यासंयुक्तस्य तु निरभिसन्धेः भवत्य- | पूर्व०—ठीक है, केवल कर्मका ऐसा ही स्वभाव रहे, किंतु जो ज्ञानसहित और फलाशासे रहित है, |


१. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार केवल विष और दही मृत्यु तथा ज्वरादिके कारण होते हैं किंतु औषधविशेष और शर्कराके साथ सेवन किये जानेपर वे ही आरोग्यवर्द्धक हो जाते हैं, उसी प्रकार यद्यपि केवल कर्म बन्धनका कारण है, तथापि निष्काम और ज्ञानके सहित होनेपर वही मुक्तिका कारण हो जाता है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६७५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६७५


न्यथा स्वभावः। दृष्टं ह्यन्यशक्तित्वेन निर्ज्ञातानामपि पदार्थानां विषदध्यादीनां विद्यामन्त्रशर्करादिसंयुक्तानामन्यविषये सामर्थ्यम्। तथा कर्मणोऽप्यस्त्विति चेत् ?उसका दूसरा स्वभाव है। यह बात देखी गयी है कि जो अन्य शक्तिवाले माने गये हैं, उन विष एवं दधि आदि पदार्थोंका विद्या, मन्त्र एवं शर्करादिसे संयुक्त होनेपर अन्य विषयमें सामर्थ्य हो जाता है। इसी प्रकार विद्यासहित कर्मका भी अन्य स्वभाव हो सकता है—ऐसा माना जाय तो !
न, प्रमाणाभावात्। तत्र हि कर्मण उक्तविषयव्यतिरेकेण विषयान्तरे सामर्थ्यास्तित्वे प्रमाणं न प्रत्यक्षं नानुमानं नोपमानं नार्थापत्तिर्न शब्दोऽस्ति।सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ कर्मके उक्त विषयोंसे भिन्न किसी अन्य विषयमें सामर्थ्य होनेका न प्रत्यक्ष प्रमाण है, न अनुमान है, न उपमान है, न अर्थापत्ति है और न शब्दप्रमाण है।
ननु फलान्तराभावे चोदनान्यथानुपपत्तिः प्रमाणमिति। न हि नित्यानां कर्मणां विश्वजिन्यायेन फलं कल्प्यते, नापि श्रुतंपूर्व०—किंतु [नित्य और निष्काम कर्मोंका मोक्षके सिवा] कोई अन्य फल न होनेपर किसी अन्य कारणसे इनकी विधिकी उपपत्ति न होना ही इसमें [अर्थापत्ति] प्रमाण है। [तात्पर्य यह है कि] नित्य-कर्मोंका विश्वजित्न्यायसे तो कोई फल कल्पना किया नहीं जाता और उनका कोई

१. 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्यागसे यजन करे—इस वाक्यमें याग-कर्तव्यतारूप विधि देखी जाती है। इस विधिका कोई नियोज्य पुरुष होना चाहिये अर्थात् यह बतलाना चाहिये कि विश्वजित् यागसे कौन यजन करे। तो वहाँ 'स स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्' अर्थात् 'जहाँ किसी कर्मका कोई विशिष्ट फल न बतलाया गया हो, वहाँ उसका फल स्वर्ग ही समझना चाहिये, क्योंकि स्वर्ग सभी कर्मोंका सामान्य फल है, इस न्यायसे स्वर्गकाम (स्वर्गकी इच्छावाला) ही विश्वजित् यागका नियोज्य है—ऐसी कल्पना कर ली जायगी। यही विश्वजित्-न्याय है।

६७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| फलमस्ति; चोद्यन्ते च तानि; पारिशेष्यान्मोक्षस्तेषां फलमिति गम्यते; अन्यथा हि पुरुषा न प्रवर्तेरन् । | श्रुत फल भी है नहीं; तथा उनकी विधि है ही; इसलिये परिशेषतः मोक्ष ही उनका फल है—ऐसा जाना जाता है। नहीं तो पुरुषोंकी उनमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी। | | ननु विश्वजिन्न्‍याय एव आयातो मोक्षस्य फलस्य कल्पितत्वात् । मोक्षे वान्यस्मिन् वा फलेऽकल्पिते पुरुषा न प्रवर्तेरन्निति मोक्षः फलं कल्प्यते श्रुतार्थापत्त्या, यथा विश्वजिति। नन्वेवं सति कथमुच्यते विश्वजिन्न्‍यायो न भवतीति । फलं च कल्प्यते विश्वजिन्न्‍यायश्च न भवतीति विप्रतिषिद्धमभिधीयते । | सिद्धान्ती— तब तो यहाँ भी विश्वजित्न्याय ही आ जाता है; क्योंकि मोक्षरूप फलकी कल्पना की गयी है। मोक्ष अथवा किसी अन्य फलकी कल्पना न करनेपर पुरुषोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी, इसीसे विश्वजित्यागके स्वर्गरूप फलके समान यहाँ 'श्रुतार्थापत्ति'से मोक्षरूप फलकी कल्पना की जाती है। किंतु ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि यहाँ विश्वजित्न्याय नहीं है। फलकी कल्पना भी की जाती है और विश्वजित्न्याय भी नहीं है—यह कथन तो विरुद्ध है। | | मोक्षः फलमेव न भवतीति चेन्न; प्रतिज्ञाहानात्। कर्म कार्यान्तरं विषदध्यादिवदारभत इति | यदि कहो कि मोक्ष तो किसीका फल ही नहीं है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा भङ्ग होती है। तुमने यह प्रतिज्ञा की है कि विष और दधि आदिके समान |


१. जहाँ कोई बात स्वीकार किये बिना किसी श्रुत अर्थमें आपत्ति या अनुपपत्ति आती हो, वहाँ उसे स्वीकार करना पड़ता है—यही श्रुतार्थापत्ति प्रमाण है। मोक्षरूप फल स्वीकार किये बिना नित्यकर्मोंमें किसीकी प्रवृत्ति न होनेसे उसकी विधि व्यर्थ हो जायगी, इसलिये श्रुतार्थापत्ति प्रमाणसे वह स्वीकार करना पड़ता है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
हि प्रतिज्ञातम्। स चेन्मोक्षः कर्मणः कार्यं फलमेव न भवतीति सा प्रतिज्ञा हीयेत। कर्मकार्यत्वे च मोक्षस्य स्वर्गादिफलेभ्यो विशेषो वक्तव्यः, अथ कर्मकार्यं न भवति, 'नित्यानां कर्मणां फलं मोक्षः' इत्यस्या वचनव्यक्तेः कोऽर्थ इति वक्तव्यम्। न च कार्यफलशब्दभेदमात्रेण विशेषः शक्यः कल्पयितुम्। अफलं च मोक्षः, नित्यैश्च कर्मभिः क्रियते; नित्यानां कर्मणां फलम्; न कार्यम्; इति चैषोऽर्थो विप्रतिषिद्धोऽभिधीयते यथाग्निः शीत इति।[नित्य और निष्काम] कर्म कार्यान्तरका आरम्भ करता है। यदि वह मोक्ष कर्मका कार्य—फल ही न हो तो वह प्रतिज्ञा भंग हो जाती है। यदि मोक्ष कर्मका कार्य है तो स्वर्गादि फलोंसे उसका भेद बतलाना चाहिये और यदि वह कर्मका कार्य नहीं है तो 'मोक्ष नित्य कर्मोंका फल है' इस वाक्यका क्या अर्थ होगा—यह बतलाना चाहिये। 'कार्य' और 'फल' शब्दोंके भेदमात्रसे ही किसी भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती। मोक्ष किसीका फल नहीं है और नित्य कर्मोंसे होता है, वह नित्य कर्मोंका फल है और कार्य नहीं है—यह सब विषय तो विरुद्ध ही कहा जाता है, जैसे कोई कहे—'अग्नि शीतल है।'
ज्ञानवदिति चेत्— यथा ज्ञानस्य कार्यं मोक्षो ज्ञानेनाक्रियमाणोऽप्युच्यते, तद्वत् कर्मकार्यत्वमिति चेत् ? न; अज्ञाननिवर्तकत्वाज्ज्ञानस्य अज्ञानव्यवधाननिवर्त-यदि कहो कि वह ज्ञानके समान उसका फल है अर्थात् जैसे ज्ञानद्वारा न किया जानेपर भी मोक्ष ज्ञानका कार्य कहा जाता है, उसी प्रकार वह कर्मका भी कार्य हो सकता है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि ज्ञान तो अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है। ज्ञान मोक्षके अज्ञानरूप व्यवधानकी निवृत्ति करने-

६७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| कत्वाज्ज्ञानस्य मोक्षो ज्ञानकार्यमित्युपचर्यते; न तु कर्मणा निवर्तयितव्यमज्ञानम्, न चाज्ञानव्यतिरेकेण मोक्षस्य व्यवधानान्तरं कल्पयितुं शक्यम्, नित्यत्वान्मोक्षस्य साधकस्वरूपाव्यतिरेकाच्च—यत्कर्मणा निवर्त्येत। | वाला है, इसलिये उपचारसे ऐसा कहा जाता है कि मोक्ष ज्ञानका कार्य है; किंतु कर्मसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती और अज्ञानके सिवा मोक्षके किसी अन्य व्यवधानकी कल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी कि कर्मसे निवृत्ति हो; क्योंकि मोक्ष नित्य है और साधकके स्वरूपसे अभिन्न है। | | अज्ञानमेव निवर्तयतीति चेन्न, विलक्षणत्वात्। अनभिव्यक्तिरज्ञानम्, अभिव्यक्तिलक्षणेन ज्ञानेन विरुद्धयते; कर्म तु नाज्ञानेन विरुध्यते; तेन ज्ञानविलक्षणं कर्म। यदि ज्ञानाभावो यदि संशयज्ञानं यदि विपरीतज्ञानं वोच्यतेऽज्ञानमिति, सर्वं हि तज्ज्ञानेनैव निवर्त्यते, न तु कर्मणा, अन्यतमेनापि विरोधाभावात्। | यदि कहो कि कर्म भी अज्ञानकी ही निवृत्ति करता है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। अज्ञान अप्रकाशरूप है, वह प्रकाशरूप ज्ञानका ही विरोधी है, कर्मका अज्ञानसे विरोध नहीं है; इसलिये कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। यदि ज्ञानाभावको, संशयज्ञानको अथवा विपरीत ज्ञानको अज्ञान कहा जाय तो इन सभीकी निवृत्ति ज्ञानसे ही हो सकती है; किसी भी कर्मसे नहीं हो सकती, क्योंकि उसका [इनमेंसे किसी भी प्रकारके] अज्ञानके साथ विरोध नहीं है। | | अथादृष्टं कर्मणामज्ञाननिवर्तकत्वं कल्प्यमिति चेन्न, ज्ञानेन अज्ञाननिवृत्तौ गम्यमानायाम् | यदि कहो कि कर्मोंका अज्ञाननिवर्तकत्व—यह अदृष्ट फल है ऐसी कल्पना कर लेनी चाहिये तो ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ६७९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ६७९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अदृष्टनिवृत्तिकल्पनानुपपत्तेः । यथा अवघातेन व्रीहीणां तुषनिवृत्तौ गम्यमानायाम् अग्निहोत्रादिनित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते तुषनिवृत्तिः। तद्वदज्ञाननिवृत्तिरपि नित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते । ज्ञानेन विरुद्धत्वं चासकृत् कर्मणामवोचाम। यदविरुद्धं ज्ञानं कर्मभिस्तद्देवलोकप्राप्तिनिमित्तमित्युक्तम्; "विद्यया देवलोकः" (१।५।१६) इति श्रुतेः।जब साक्षात् अनुभव होती है, तो अदृष्टफलके रूपमें निवृत्तिकी कल्पना करनी उपयुक्त नहीं है। जिस प्रकार [ मुसलसे ] कूटनेपर धानके तुषकी निवृत्ति होती है—यह स्पष्टतया ज्ञात होनेपर ऐसी कल्पना नहीं की जाती कि वह अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका अदृष्ट कार्य है। इसी प्रकार अज्ञाननिवृत्ति भी नित्यकर्मोंका कार्य एवं अदृष्ट फल है—ऐसी कल्पना नहीं की जाती। ज्ञानसे कर्मोंका विरोध है—यह तो हम अनेकों बार कह चुके हैं। जो ज्ञान कर्मोंसे अविरुद्ध है, वह तो "विद्यासे देवलोककी प्राप्ति होती है" इस श्रुतिके अनुसार देवलोककी प्राप्तिका कारण है—ऐसा पहले बतलाया गया है।
किञ्चान्यत्, कल्प्ये च फले नित्यानां कर्मणां श्रुतानां यत् कर्मभिर्विरुध्यते द्रव्यगुणकर्मणां कार्यमेव न भवति, किं तत् कल्प्यताम्, यस्मिन् कर्मणः सामर्थ्यमेव न दृष्टम् ? किं वा यस्मिन् दृष्टं सामर्थ्यम्, यच्च कर्मणां फलम् अविरुद्धम्, तत् कल्प्यताम् ? इति । पुरुषप्रवृत्तिजननायावश्यंइसके सिवा, यदि श्रुति-प्रतिपादित नित्य कर्मोंके फलकी कल्पना करनी ही है तो जो कर्मोंसे विरुद्ध स्वभाववाला है—जो द्रव्य, गुण और कर्मोंका कार्य ही नहीं हो सकता तथा जिसमें कर्मका सामर्थ्य ही नहीं देखा गया, क्या उसीकी कल्पना करनी चाहिये अथवा जिसमें कर्मोंका सामर्थ्य देखा गया है तथा जो कर्मोंका अविरुद्ध फल है, उसकी कल्पना की जाय ? यदि पुरुषोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये कर्मफलकी