बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| णम्; न तु पुरुषे मृत्युना वृक्णे पुनः प्ररोहणं दृश्यते; भवितव्यं च कुतश्चित्प्ररोहणेन; तस्माद् वः पृच्छामि—मर्त्यो मनुष्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ? मृतस्य पुरुषस्य कुतः प्ररोहणमित्यर्थः ॥ ४ ॥ | मृत्युद्वारा छेदन किये जानेपर पुरुषको पुनः अङ्कुरित होते नहीं देखा जाता; किंतु वह किसीसे अङ्कुरित अवश्य होना चाहिये; इसीसे मैं आपलोगोंसे पूछता हूँ कि यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय तो वह किस मूलसे अङ्कुरित होता है ? अर्थात् मरे हुए पुरुषकी उत्पत्ति कहांसे होती है ? ॥ ४ ॥ |
रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत् प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥५॥
वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [ मृत पुरुषसे नहीं ] । वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है, किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुनः अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है ॥ ५ ॥
| यदि चेदेवं वदथ—रेतसः प्ररोहतीति, मा वोचत मैवं वक्तुमर्हथ; कस्मात् ? यस्माज्जीवतः पुरुषात्तद् रेतः प्रजायते, न मृतात् । अपि च धानारुहः, धाना बीजम्, बीजरुहोऽपि वृक्षो भवति, न केवलं काण्डरुह एव; इवशब्दोऽनर्थकः; | यदि तुम ऐसा कहो कि वह वीर्यसे उत्पन्न होता है, तो मत कहो—ऐसा कहना उचित नहीं है; क्यों नहीं है ? क्योंकि वीर्य जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है, मरे हुएसे नहीं होता । वृक्ष धानारुह भी है, धाना बीजको कहते हैं, उस बीजसे उत्पन्न होनेवाला भी वृक्ष होता है; वह केवल तनेसे ही उत्पन्न नहीं होता; 'इव' शब्द- |
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
| वै वृक्षोऽञ्जसा साक्षात् प्रेत्य<br>मृत्वा सम्भवो धानातोऽपि प्रेत्य<br>सम्भवो भवेदञ्जसा पुनर्वन-<br>स्पतेः ॥ ५ ॥ | का कोई अर्थ नहीं है; यह प्रसिद्ध<br>है कि वृक्ष मरकर भी पुनः साक्षात्<br>उत्पन्न हो जाता है; धाना अर्थात्<br>बीजसे उत्पन्न हुए वनस्पतिका भी<br>कटनेके बाद पुनः प्रादुर्भाव हो<br>जाता है [ किंतु जीवके शरीरका<br>इस प्रकार आविर्भाव नहीं देखा<br>जाता ] ॥ ५ ॥ |
यत् समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ६ ॥
यदि वृक्षको मूलसहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा; इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ? ॥ ६ ॥
| यद् यदि सह मूलेन धानया<br>वा आवृहेयुरुद्यच्छेयुरुत्पाटयेयु-<br>र्वृक्षम्, न पुनराभवेत् पुनरागत्य<br>न भवेत् । तस्माद् वः पृच्छामि<br>सर्वस्यैव जगतो मूलम्—मर्त्यः<br>स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मू-<br>लात् प्ररोहति ॥ ६ ॥ | यदि वृक्षको मूल अथवा बीजके<br>सहित 'आवृहेयुः'—आकर्षित कर<br>लें-उखाड़ लें तो फिर वह वृक्ष<br>कहींसे आकर उत्पन्न नहीं होगा ।<br>इसलिये मैं तुमलोगोंसे सम्पूर्ण<br>जगत्के मूलके सम्बन्धमें प्रश्न कर<br>रहा हूँ—यदि मृत्यु मनुष्यका छेदन<br>कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न<br>होता है ? ॥ ६ ॥ |
जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य
तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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[ यदि ऐसा मानो कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वह मरकर पुनः उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? [ यह प्रश्न है; ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वयं ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान ) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
| जात एवेति मन्यध्वं यदि किमत्र प्रष्टव्यमिति—अनिष्यमाणस्य हि सम्भवः प्रष्टव्यः, न जातस्य, अयं तु जात एवातोऽस्मिन् विषये प्रश्न एव नोपपद्यत इति चेत्—न, किं तर्हि ? मृतः पुनरपि जायत एवान्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात्; अतो वः पृच्छामि—को न्वेनं मृतं पुनर्जनयेत् ? | यदि तुम ऐसा मानते हो कि पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, उसके विषयमें क्या पूछना—क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला होता है, उसीकी उत्पत्तिके विषयमें पूछा जाता है, जो उत्पन्न हो चुका है, उसके विषयमें नहीं पूछा जाता; वह पुरुष तो उत्पन्न हो चुका है, इसलिये इसके विषयमें प्रश्न करना उचित नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; तो क्या बात है ? मरनेपर भी तो यह पुनः उत्पन्न होता ही है, नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा; इसीसे मैं तुमलोगोंसे पूछता हूँ कि मरनेपर इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? |
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| तन्न बिजज्ञुब्रह्मणाः—यतो मृतः पुनः प्ररोहति जगतो मूलं न विज्ञातं ब्राह्मणैः; अतो ब्रह्मिष्ठत्वादू हृता गावः; याज्ञवल्क्येन | ब्राह्मणोंको इसका विशेष ज्ञान नहीं था, जहाँसे मरनेपर पुरुष पुनः जन्म लेता है; उस जगत्के मूलका ब्राह्मणोंको पता नहीं था। अतः ब्रह्मिष्ठ होनेके कारण याज्ञवल्क्यने गायोंको हरण कर लिया और वे |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| जिता ब्राह्मणाः । समाप्ता आख्यायिका । | ब्राह्मण जीत लिये गये । आख्यायिका समाप्त हुई । |
| यज्जगतो मूलम्, येन च शब्देन साक्षाद् व्यपदिश्यते ब्रह्म, यद् याज्ञवल्क्यो ब्राह्मणान् पृष्टवांस्तत् स्वेन रूपेण श्रुतिरस्मभ्यमाह—विज्ञानं विज्ञप्तिविज्ञानम्, तच्च आनन्दम्, न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम्, किं तर्हि ? प्रसन्नं शिवमतुलमानायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थः, किं तद् ब्रह्म उभयविशेषणवद् रातिः—रातेः षष्ठ्यर्थे प्रथमा, धनस्येत्यर्थः, धनस्य दातुः कर्मकृतो यजमानस्य परायणं परा गतिः कर्मफलस्य प्रदातृ । | जो जगत्का मूल है, जिस शब्दसे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश किया जाता है और जिसके विषयमें याज्ञवल्क्यने ब्राह्मणोंसे पूछा था, उसे श्रुति हमारे लिये स्वयं ही बतलाती है—विज्ञान—विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, वही आनन्द भी है, विषयविज्ञानके समान वह दुःखसे अनुविद्ध नहीं है, तो फिर कैसा है ? प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास नित्यतृप्त और एकरस है—ऐसा इसका तात्पर्य है । जो [विज्ञान और आनन्द इन] दोनों विशेषणोंसे युक्त है वह ब्रह्म क्या है ? रातिः—रातेः (रातिका) अर्थात् धनका इस प्रकार 'रातिः' शब्दमें षष्ठीके अर्थमें प्रथमा विभक्ति है, तात्पर्य यह कि धन देनेवाले अर्थात् कर्म करनेवाले यजमानका परायण—परा गति अर्थात् कर्मफल प्रदान करनेवाला है । |
| किञ्च व्युत्थायैषणाभ्यस्तस्मिन्नेव ब्रह्मणि तिष्ठत्यकर्मकृत्, तद् ब्रह्म वेत्तीति तद्विच्च; तस्य—तिष्ठमानस्य च तद्विदः; ब्रह्मविद इत्यर्थः, परायणमिति । | इसी प्रकार जो एषणाओंसे अलग होकर उस ब्रह्ममें ही परिनिष्ठित है, कर्मकर्ता नहीं है, और उस ब्रह्मको जानता है, इसलिये तद्वित् (ब्रह्मविद्) है, उस ब्रह्मनिष्ठ और तद्विद् यानी ब्रह्मवेत्ताका भी परायण है । |
८३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| अत्रे॒दं विचार्यते—आनन्दशब्दो लोके सुखवाची प्रसिद्धः; अत्र च ब्रह्मणो विशेषणत्वेन आनन्दशब्दः श्रूयते—आनन्दं ब्रह्मेति। श्रुत्यन्तरे च—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० ३।६।१) “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० ३।२।४।१) “यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” (तै० उ० २।८।१।) “यो वै भूमा तत् सुखम्” (छा० उ० ७।२३।१) इति च; “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्येवमाद्याः। संवेद्ये च सुखे आनन्दशब्दः प्रसिद्धः; ब्रह्मानन्दश्च यदि संवेद्यः स्याद् युक्ता एते ब्रह्मण्यानन्दशब्दाः।<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मानन्दस्य वेद्यत्वावेद्यत्वं मीमांस्यते)<br><br>ननु च श्रुतिप्रामाण्यात् संवेद्यानन्दस्वरूपमेव ब्रह्म, किं तत्र विचार्यम् ?<br><br>इति न, विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात्—सत्यम्, आनन्दशब्दो ब्रह्मणि श्रूयते; | यहाँ यह विचार किया जाता है—लोकमें 'आनन्द' शब्द सुखवाची प्रसिद्ध है; और यहाँ 'आनन्दं ब्रह्म' इस प्रकार 'आनन्द' शब्द ब्रह्मके विशेषणरूपमें श्रुत है; अन्य श्रुतियोंमें भी यह ब्रह्मके विशेषणरूपसे श्रुत हुआ है; जैसे—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्"¹ "आनन्दं² ब्रह्मणो विद्वान्" "यदेष³ आकाश आनन्दो न स्यात्" "यो⁴ वै भूमा तत् सुखम्" इत्यादि तथा ऐसी ही "एष⁵ परम आनन्दः" इत्यादि श्रुतियाँ हैं। किंतु 'आनन्द' शब्द संवेद्य (ज्ञेय) सुखके अर्थमें ही प्रसिद्ध है; अतः यदि ब्रह्मानन्द भी संवेद्य (ज्ञेय) हो तभी ब्रह्ममें ये 'आनन्द' शब्द सार्थक हो सकते हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु श्रुतिके प्रमाणसे ब्रह्म संवेद्य आनन्दस्वरूप तो है ही, फिर इसमें विचार क्या करना है ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं—यह तो ठीक है कि ब्रह्ममें 'आनन्द' शब्द श्रुत होता है; |
१. आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना।
२. ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला।
३. यदि यह आकाश आनन्द न होता।
४. जो भी भूमा है, वही सुख है।
५. यह परम आनन्द है।
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३
| विज्ञानप्रतिषेधश्चैकत्वे—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१५) "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" (छा० उ० ७।२४।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद" (बृ० उ० ४।३।२१) इत्यादि; विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात् तेन कर्तव्यो विचारः; तस्माद् युक्तं वेदवाक्यार्थनिर्णयाय विचारयितुम् । | किंतु साथ ही एक होनेके कारण उसके विज्ञानका प्रतिषेध भी श्रुत होता है। जैसे—"जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, उस अवस्थामें किसके द्वारा किसको देखे और किसके द्वारा किसको जाने?" "जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता और अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा है" "प्रज्ञानात्मासे आलिङ्गित (अभिन्न) होकर यह बाह्य कुछ भी नहीं जानता" इत्यादि। इस प्रकार उससे विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं, इसलिये विचार करना आवश्यक है; अतः वेदके वचनोंका तात्पर्य निर्णय करनेके लिये विचार करना उचित ही है। | | मोक्षवादिविप्रतिपत्तेश्च—सांख्या वैशेषिकाश्च मोक्षवादिनो नास्ति मोक्षे सुखं संवेद्यमित्येवं विप्रतिपन्नाः; अन्ये निरतिशयं सुखं स्वसंवेद्यमिति; किं तावद् युक्तम् ? | इसके सिवा मोक्षवादियोंमें मतभेद होनेके कारण भी विचार करना आवश्यक है—सांख्य और वैशेषिक मोक्षवादियोंका ऐसा विपरीत विचार है कि मोक्षमें संवेद्य सुख है ही नहीं, किंतु दूसरे मोक्षवादियोंका मत है कि मोक्षमें निरतिशय स्वसंवेद्य सुख है; सो इनमें कौन-सी बात ठीक है? | | आनन्दादिश्रवणात् "जक्षत् क्रीडन् रममाणः" (छा० उ० ८।१२।३) "स यदि पितृलोककामो भवति" (छा० उ० ८।२।१) | पूर्व०—आनन्दादिका श्रवण होनेसे तथा "भक्षण करता हुआ, क्रीडा करता हुआ, रमण करता हुआ" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला |
बृ० उ० ५३—
८३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| "यः सर्वज्ञः सर्ववित्" (मुण्डक० १ । १ । ९) "सर्वान् कामान् समश्नुते" (तै० उ० २ । ५ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यो मोक्षे सुखं संवेद्यमिति । | होता है" "जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है" "समस्त कामोंको प्राप्त करता है" इत्यादि श्रुतियोंसे तो मोक्षमें संवेद्य सुख जान पड़ता है। |
| नन्वेकत्वे कारकविभागाभावाद् विज्ञानानुपपत्तिः, क्रियायाश्चानेककारकसाध्यत्वाद् विज्ञानस्य च क्रियात्वात् । | सिद्धान्ती—किंतु उस समय एकत्व होनेके कारण कारकविभागका अभाव होनेसे विज्ञान होना सम्भव नहीं है, क्योंकि क्रिया अनेक कारकद्वारा साध्य होती है और विज्ञान भी एक क्रिया ही है। |
| नैष दोषः; शब्दप्रामाण्याद् भवेद् विज्ञानमानन्दविषये; "विज्ञानमानन्दम्" इत्यादीनि आनन्दस्वरूपस्यासंवेद्यत्वेऽनुपपन्नानि वचनानीत्यवोचाम । | पूर्व०—यह दोष नहीं हो सकता; शब्दप्रामाण्य होनेके कारण उस समय आनन्दविषयक विज्ञान रहना ही चाहिये; यदि आनन्दस्वरूप असंवेद्य होगा तो "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादि वाक्य अनुपपन्न हो जायँगे—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। |
| ननु वचनेनाप्यग्नेः शैत्यमुदकस्य चौष्ण्यं न क्रियते एव, ज्ञापकत्वाद् वचनानाम्। न च देशान्तरेऽग्निः शीत इति शक्यते ज्ञापयितुम्; अगम्ये वा देशान्तरे उष्णमुदकमिति । | सिद्धान्ती—किंतु वचनके द्वारा भी अग्निकी शीतलता और जलकी उष्णता नहीं की जा सकती, क्योंकि वचन तो ज्ञापक ही हैं और यह बात बतलायी नहीं जा सकती कि किसी देशान्तरमें अग्नि शीतल है और किसी अगम्य देशान्तरमें जल उष्ण है। |
| न, प्रत्यगात्मन्यानन्दविज्ञानदर्शनात्; न 'विज्ञानमानन्दम्' इत्येवमादीनां वचनानां शीतो- | पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मामें तो आनन्दका विज्ञान देखा जाता है। 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि वाक्य 'अग्नि शीत है'- |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३५ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| ऽग्निरित्यादिवाक्यवत् प्रत्यक्षादिविरुद्धार्थप्रतिपादकत्वम् । अनुभूयते त्वविरुद्धार्थता; सुख्यहमिति सुखात्मकमात्मानं स्वयमेव वेदयते; तस्मात् सुतरां प्रत्यक्षाविरुद्धार्थता; तस्मादानन्दं ब्रह्म विज्ञानात्मकं सत् स्वयमेव वेदयते । तथा आनन्दप्रतिपादिकाः श्रुतयः समजसाः स्युः 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्येवमाद्याः पूर्वोक्ताः । | इत्यादि वाक्योंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं । इनकी अविरुद्धार्थताका तो अनुभव होता है । 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार सुखस्वरूप आत्माको पुरुष स्वयं ही जानता है, इसलिये इनकी अविरुद्धता तो अत्यन्त प्रत्यक्ष ही है । अतः आनन्द ब्रह्म विज्ञानात्मक होते हुए स्वयं ही जानता है । इसी प्रकार पहले कही हुई 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्यादि आनन्दका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियां सुसंगत हो सकती हैं । |
| न, कार्यकारणाभावेऽनुपपत्तेर्विज्ञानस्य — शरीरवियोगो हि मोक्ष आत्यन्तिकः; शरीराभावे च करणानुपपत्तिः, आश्रयाभावात्; ततश्च विज्ञानानुपपत्तिः, अकार्यकरणत्वात्; देहाद्यभावे च विज्ञानोत्पत्तौ सर्वेषां कार्यकारणोपादानानर्थक्यप्रसङ्गः । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि देह और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर विज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—शरीरका वियोग हो जाना ही आत्यन्तिक मोक्ष है और शरीर न रहनेपर आश्रयका अभाव हो जानेके कारण इन्द्रियोंका रहना भी असम्भव है; अतः देह और इन्द्रियोंका अभाव हो जानेसे उस समय विज्ञान नहीं हो सकता; यदि देहादिके अभावमें भी विज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तो समस्त जीवोंके देह और इन्द्रियोंको ग्रहण करनेकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । |
८३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| **एकत्वविरोधाच्च—**परं चेद् ब्रह्म आनन्दात्मकमात्मानं नित्यविज्ञानत्वान्नित्यमेव विजानीयात्, तन्न, संसार्थपि संसारविनिर्मुक्तः स्वाभाव्यं प्रतिपद्येत; जलाशय इवोदकाञ्जलिः क्षिप्तो न पृथक्त्वेन व्यवतिष्ठते आनन्दात्मकब्रह्मविज्ञानाय, तदा मुक्त आनन्दात्मकमात्मानं वेदयते इत्येतदनर्थकं वाक्यम्। | इसके सिवा एकत्वसे विरोध होनेके कारण भी विज्ञान होना अनुपपन्न है—यदि ऐसा मानो कि नित्यविज्ञानानन्दस्वरूप होनेके कारण परब्रह्म अपने आनन्दमय स्वरूपको नित्य ही जानता रहता है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि संसारी जीव भी संसारसे मुक्त होनेपर ब्रह्मस्वरूपताको प्राप्त हो जाता है, जलाशयमें डाली हुई जलकी अञ्जलिके समान वह भी आनन्दस्वरूप ब्रह्मके विज्ञानके लिये पृथक् होकर स्थित नहीं हो सकता; ऐसी स्थितिमें यह कहना कि मुक्त पुरुष आनन्दस्वरूप आत्माको जानता है, निरर्थक ही है। |
| अथ ब्रह्मानन्दमन्यःसन् मुक्तो वेदयते, प्रत्यगात्मानं च, अहमस्म्यानन्दस्वरूप इति, तदैकत्वविरोधः, तथा च सति सर्वश्रुतिविरोधः, तृतीया च कल्पना नोपपद्यते। | और यदि ऐसा कहो कि मुक्त पुरुष ब्रह्मसे अलग रहकर ब्रह्मानन्दको और 'मैं आनन्दस्वरूप हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्माको जानता है तो ऐसी स्थितिमें एकत्वसे विरोध आता है; और ऐसा होनेपर सभी श्रुतियोंसे विरोध होता है। इन दो पक्षोंके¹ सिवा कोई तीसरी कल्पना होनी सम्भव नहीं है। |
| किञ्चान्यत्, ब्रह्मणश्च निरन्तरात्मानन्दविज्ञाने विज्ञानाविज्ञान- | एक बात और भी है, ब्रह्मको आत्मानन्दका निरन्तर विज्ञान माननेपर उसके विज्ञान और अविज्ञानकी |
¹ १. मुक्त पुरुषको ब्रह्मसे अभिन्न या भिन्न माननेके सिवा।
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७
| कल्पनानर्थक्यम्; निरन्तरं चेदात्मानन्दविषयं ब्रह्मणो विज्ञानम्, तदेव तस्य स्वभाव इत्यात्मानन्दं विजानातीति कल्पनानुपपन्ना; अतद्विज्ञानप्रसङ्गे हि कल्पनाया अर्थवत्त्वम्, यथा आत्मानं परं च वेत्तीति, न हीष्वाद्यासक्तमनसो नैरन्तर्येणेषुज्ञानाज्ञानकल्पनाया अर्थवत्त्वम् ।<br><br>अथ विच्छिन्नमात्मानन्दं विजानाति—विज्ञानस्य आत्मविज्ञानच्छिद्रे अन्यविषयत्वप्रसङ्गः; आत्मनश्च विक्रियावत्त्वं ततश्चानित्यत्वप्रसङ्गः; तस्माद् विज्ञानमानन्दमिति स्वरूपान्वाख्यानपरैव श्रुतिः, नात्मानन्दसंवेद्यत्वार्था ।<br><br>'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादिश्रुति- | कल्पना भी व्यर्थ हो जाती है; यदि ब्रह्मको आत्मानन्दविषयक विज्ञान निरन्तर रहता है, तो वही उसका स्वभाव समझना चाहिये; अतः वह आत्मानन्दको जानता है—यह कल्पना नहीं बन सकती । इस कल्पनाकी सार्थकता तो उसका विज्ञान न होनेका प्रसङ्ग होनेपर ही हो सकती है; जैसे—वह अपनेको और दूसरेको जानता है; जिसका चित्त निरन्तर बाणमें लगा हुआ है, उसके विषयमें बाणके ज्ञान और अज्ञानकी कल्पना सार्थक नहीं हो सकती ।<br><br>और यदि वह विच्छिन्नरूपसे ही आत्मानन्दको जानता है तो आत्मविज्ञानके छिद्रमें अर्थात् जिस समय आत्मानन्दका ज्ञान नहीं रहता, उस क्षणमें किसी अन्य विषयके विज्ञानके रहनेका प्रसङ्ग होगा; इससे आत्मा विकारी सिद्ध होगा और ऐसा होनेसे उसके अनित्य होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; अतः 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' यह श्रुति ब्रह्मके स्वरूपका निर्देश करनेवाली ही है, आत्मानन्दका संवेद्यत्व बतलानेवाली नहीं है ।<br><br>पूर्व०—किंतु आत्मानन्दका |
८३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| विरोधोऽसंवेद्यत्व इति चेत् ! | असंवेद्यत्व माननेपर 'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा। | | न; सर्वात्मैकत्वे यथाप्राप्तानुवादित्वात्—मुक्तस्य सर्वात्मभावे सति यत्र क्वचिद् योगिषु देवेषु वा जक्षणादि प्राप्तम्, तद् यथाप्राप्तमेवानूद्यते—तत्तस्यैव सर्वात्मभावादिति सर्वात्मभावमोक्षस्तुतये । | सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मैकत्वकी अनुभूति होनेपर यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली है। मुक्त पुरुषको सर्वात्मैकत्वकी प्राप्ति हो जानेपर जहाँ-कहीं योगियों अथवा देवताओंमें भक्षणादिकी प्राप्ति होती है, उस यथाप्राप्त भक्षणादिका ही इसके द्वारा अनुवाद किया गया है। अर्थात् सर्वात्मभाव होनेके कारण वह भक्षणादि उस मुक्त पुरुषका ही है—इस प्रकार यह कथन मोक्षकी स्तुतिके लिये है। | | यथाप्राप्तानुवादित्वे दुःखित्वमपीति चेत्—योग्यादिषु यथाप्राप्तजक्षणादिवत् स्थावरादिषु यथाप्राप्तदुःखित्वमपीति चेत् ! | पूर्व०—यदि यह श्रुति यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली हे तब तो उसका दुःखी होना भी प्राप्त होगा—योगी आदिकोंमें यथाप्राप्त भक्षणादिकी प्राप्तिके समान उसे स्थावरादिमें यथाप्राप्त दुःखित्वकी भी प्राप्ति होगी—ऐसा कहें तो ? | | न, नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिसम्पर्कजनितभ्रान्त्यध्यारोपितत्वात् सुखित्वदुःखित्वादिविशेष- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुखित्व और दुःखित्व आदि विशेष धर्म नाम-रूपजनित देह और इन्द्रियरूप उपाधिके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित हैं—इस प्रकार इन सब शङ्काओंका पहले ही |
| ब्राह्मण ९] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३९ |
| ब्राह्मण ९] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३९ |
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| स्येति परिहृतमेतत् सर्वम् । विरुद्धश्रुतीनां च विषयमवोचाम । तस्मात् "एषोऽस्य परम आनन्दः" (बृ० उ० ४ । ३ । ३२) इतिवत् सर्वाण्यानन्दवाक्यानि द्रष्टव्यानि ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥ | परिहार किया जा चुका है। विरुद्धश्रुतियोंका विषय भी हम पहले कह चुके हैं¹। अतः आनन्दप्रतिपादक समस्त वाक्योंको "एषोऽस्य परम आनन्दः" इस वाक्यके समान ही समझना चाहिये ॥ ७ ॥ २८ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
नवमं शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ९ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. मधुकाण्डमें जो ब्रह्मका वेद्यत्व है, वह सोपाधिक होनेके कारण है। निरुपाधिक ब्रह्म तो अवेद्य ही है।
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद
| संस्कृत | हिन्दी-अनुवाद |
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| जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे ।<br><br>उपोद्घातः<br>अस्य सम्बन्धः—<br>शारीराद्यष्टौ पुरुषान्निरूह्य, प्रत्युह्य पुनर्हृदये, दिग्भेदेन च पुनः पञ्चधा व्यूह्य, हृदये प्रत्युह्य, हृदयं शरीरं च पुनरन्योन्यप्रतिष्ठं प्राणादिपञ्चवृत्त्यात्मके समानाख्ये जगदात्मनि सूत्र उपसंहृत्य, जगदात्मानं शरीरहृदयसूत्रावस्थमतिक्रान्तवान् य औपनिषदः पुरुषो नेति नेतीति व्यपदिष्टः, स साक्षाच्चोपादानकारणस्वरूपेण च निर्दिष्टः 'विज्ञानमानन्दम्' इति । तस्यैव वागादिदेवताद्वारेण पुनरधिगमः कर्तव्य इत्यधि- | ‘जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे’ इसका पहले अध्यायसे इस प्रकार सम्बन्ध है—शारीरादि आठ पुरुषोंका निरूपण करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा फिर दिशाओंके भेदसे उन्हें पाँच भागोंमें विभक्त करके पुनः उनका हृदयमें उपसंहार कर तथा एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हृदय और शरीरका प्राणादि पाँच वृत्तियोंवाले समानसंज्ञक जगदात्मा सूत्रमें उपसंहार कर जो ‘नेति-नेति’ इस प्रकार बतलाया हुआ औपनिषद पुरुष शरीर, हृदय और सूत्रमें स्थित जगदात्माको अतिक्रमण किये हुए है, उसीका ‘ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है’ इस प्रकार साक्षात् और उपादान कारणरूपसे निर्देश किया गया है। उसीका वागादि देवतारूप द्वारसे पुनः बोध कराना है, इसीलिये इन |
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जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१
| गमनोपायान्तरार्थोऽयमारम्भो ब्राह्मणद्वयस्य । आख्यायिका त्वाचारप्रदर्शनार्था— | दो ब्राह्मणोंका आरम्भ किया गया है । [ यहाँ ] आख्यायिका तो आचार प्रदर्शित करनेके लिये है। |
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जनककी सभामें याज्ञवल्क्यका आगमन, जनकका प्रश्न
ॐ जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रेऽथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तꣳ होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उभयमेव सम्राडिति होवाच ॥ १ ॥
विदेह जनक आसनपर स्थित था । तभी [उसके पास] याज्ञवल्क्यजी आये । उनसे [ जनकने ] कहा, 'याज्ञवल्क्यजी ! कैसे आये ? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [ प्रश्न श्रवण करने ] के लिये ?' 'राजन् ! मैं दोनोंके लिये आया हूँ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥
| जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे आसनं कृतवानास्थायिकां दत्तवानित्यर्थः, दर्शनकामेभ्यो राज्ञः । अथ ह तस्मिन्नवसरे याज्ञवल्क्यः आवव्राज—आगतवानात्मनो योगक्षेमार्थम्, राज्ञो वा विविदिषां दृष्ट्वानुग्रहार्थम् । तमागतं याज्ञवल्क्यं यथावत् पूजां कृत्वोवाच होक्तवाञ्जनकः—हे याज्ञवल्क्य किमर्थम् अचारीः—आगतोऽसि ? किं पशूनिच्छन् पुनरपि, आहोस्विदण्वन्तान् सूक्ष्मान्तान् सूक्ष्मवस्तुनिर्णयान्तान् प्रश्नान् मत्तः श्रोतुमिच्छन्निति । | विदेह देशका राजा जनक आसनपर स्थित था—आसन लगाये हुए था अर्थात् उसने राजाका दर्शन करनेकी इच्छावालोंके लिये अवसर दे रखा था। तब उस समय अपने-योगक्षेमके अथवा राजाकी जिज्ञासा देखकर उसपर कृपा करनेके लिये वहां याज्ञवल्क्यजी आये। उन याज्ञवल्क्यजीको आये देख उनकी यथावत् पूजा कर राजा जनकने कहा, 'हे याज्ञवल्क्य ! आप किसलिये आये हैं ? क्या पुनः पशुओंकी इच्छासे ही आये हैं, अथवा मुझसे सूक्ष्मान्त—सूक्ष्म वस्तुके निर्णयमें समाप्त होनेवाले प्रश्न सुननेकी इच्छासे ?' |
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८४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| उभयमेव पशून् प्रश्नांश्च हे सम्राट् — सम्राडिति वाजपेययाजिनो लिङ्गम्; यश्च आज्ञया राज्यं प्रशास्ति, स सम्राट्; तस्यामन्त्रणं हे सम्राडिति; समस्तस्य वा भारतस्य वर्षस्य राजा ॥१॥ | 'हे सम्राट् ! पशु और प्रश्न दोनोंहीके लिये [ आया हूँ ]।' 'सम्राट्' यह पद वाजपेय यज्ञ करनेवालेका सूचक है; जो भी अपनी आज्ञासे राज्यपर शासन करता है, वह सम्राट् होता है; 'हे सम्राट्' यह उसीका सम्बोधन है; अथवा समस्त भारतवर्षका राजा [ सम्राट् कहा गया है ] ॥ १ ॥ |
शैलिनिके बतलाये हुए वाक्-ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत । का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य । वागेव सम्राडिति होवाच । वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायते ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टँ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग् वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग् जहाति सर्वाण्वेनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ८४३
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ८४३ |
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विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ २ ॥
[ याज्ञवल्क्य- ] 'तुझसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा हे कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक- ] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वाङ्गिरसवेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागता, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा, 'मैं आपको-जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी-सहस्र गौएँ देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥
| किंतु यत्ते तुभ्यं कश्चिदब्रवी- | किंतु तुमसे जो कुछ किसी आचार्यने कहा है, वह हम सुनें, |
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| दाचार्यः, अनेकाचार्यसेवी हि | क्योंकि तुम बहुत-से आचार्योंकी सेवा |
८४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवान्; तच्छृणवामेति । इतर आह—अब्रवीदुक्तवान् मे ममाचार्यः, जित्वा नामतः, शिलिनस्यापत्यं शैलिनिः—वाग् वै ब्रह्मेति वाग्देवता ब्रह्मेति ।<br><br>आहेतरः—यथा मातृमान् माता यस्य विद्यते पुत्रस्य सम्यगनुशास्त्री अनुशासनकर्त्री स मातृमान्; अत ऊर्ध्वं पिता यस्यानुशास्ता स पितृमान्; उपनयनादूर्ध्वमा समावर्तनादाचार्यो यस्यानुशास्ता स आचार्यवान्; एवं शुद्धित्रयहेतुसंयुक्तः स साक्षादाचार्यः स्वयं न कदाचिदपि प्रमाण्याद् व्यभिचरति; स यथा ब्रूयाच्छिष्याय तथासौ जित्वा शैलिनिरुक्तवान् वाग् वै ब्रह्मेति; अवदतो हि किं स्यादिति—न हि मूकस्येहार्थममुत्रार्थं वा किञ्चन स्यात् । किंतु, अब्रवीदुक्तवांस्ते तुभ्यं तस्य ब्रह्मण आयतनं प्रतिष्ठां च—आयतनं | करनेवाले हो; इतर ( जनक ) ने कहा, मुझसे जित्वा नामवाले शिलिनके पुत्र शैलिनिने कहा था कि 'वाक् ही ब्रह्म है' अर्थात् 'वाग्देवता ब्रह्म है।'<br><br>इतर ( याज्ञवल्क्यजी ) बोले, 'जिस प्रकार मातृमान्-जिस पुत्रका सम्यक् प्रकारसे अनुशासन करनेवाली माता विद्यमान है, वह मातृमान्, इसके पश्चात् जिसका अनुशासन करनेवाला पिता है, वह पितृमान् तथा उपनयनके पश्चात् समावर्तन संस्कारतक आचार्य जिसका अनुशासन करनेवाला है, वह आचार्यवान् है; इस प्रकार जो तीन प्रकारकी शुद्धिके हेतुओंसे संयुक्त है, वह साक्षात् आचार्य कभी भी प्रमाणसे व्यभिचरित नहीं हो सकता, वह जिस प्रकार अपने शिष्यको उपदेश करे, उसी प्रकार इस शिलिनके पुत्र जित्वाने तुम्हें यह उपदेश किया है कि वाक् ही ब्रह्म है; क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? मूकको तो लौकिक या पारलौकिक कोई भी लाभ नहीं हो सकता; किंतु क्या उसने तुम्हें उस ब्रह्मके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८४५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नाम शरीरम्; प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेषु य आश्रयः।<br>आहेतरः—न मेऽब्रवीदिति। | थे ? आयतन शरीरको कहते हैं और जो तीनों कालोंमें आश्रय हो वह प्रतिष्ठा कहलाता है।<br>दूसरे (जनक) ने कहा, 'मुझे नहीं बतलाये।' |
| इतर आह—यद्येवमेकपाद् वै एतत्; एकः पादो यस्य ब्रह्मणस्तदिदं एकपाद् ब्रह्म त्रिभिः पादैः शून्यमुपास्यमानमपि न फलाय भवतीत्यर्थः।<br>यद्येवम्, स त्वं विद्वान् सन्बोऽस्मभ्यं ब्रूहि हे याज्ञवल्क्येति। | अन्य (याज्ञवल्क्य) बोला, 'यदि ऐसी बात है तो वह एकपाद ब्रह्म है, जिस ब्रह्मका एक पाद हो वह एकपाद ब्रह्म है, तात्पर्य यह है कि वह तीन पादोंसे शून्य ब्रह्म उपासना किये जानेपर भी फलप्रद नहीं होता।'<br>(जनक-) 'यदि ऐसी बात है तो हे याज्ञवल्क्यजी ! आप उसके ज्ञाता हैं, इसलिये हमारे प्रति उसका वर्णन कीजिये।' |
| स चाह—वागेवायतनम्, वाग्देवस्य ब्रह्मणो वागेव करणमायतनं शरीरम्, आकाशोऽव्याकृताख्यः प्रतिष्ठोत्पत्तिस्थितिलयकालेषु। प्रज्ञेत्येनदुपासीत—प्रज्ञेतीयमुपनिषद् ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः—प्रज्ञेति कृत्वैनद् ब्रह्मोपासीत। | याज्ञवल्क्यने कहा—'वाक् ही आयतन है—उस वाग्देवरूप ब्रह्मका वाक् ही करण—आयतन अर्थात् शरीर है तथा उसकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय अव्याकृतसंज्ञक आकाश उसकी प्रतिष्ठा है। उसकी 'प्रज्ञा' इस रूपसे उपासना करे। 'प्रज्ञा' यह उपनिषद् उस ब्रह्मका चतुर्थ पाद है। 'प्रज्ञा' ऐसा मानकर उस ब्रह्मकी उपासना करे।' |
| का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य ? किं | [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता |