भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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बृहदारण्यकोपनिषद्

( सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित )


गीताप्रेस, गोरखपुर

प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर


सं० १९९५ से २०५० तक२६,२५०
सं० २०५२ सातवाँ संस्करण५,०००
योग३१,२५०
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मूल्य—सत्तर रुपये


मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
दूरभाष—३३४७२१

श्रीहरिः

प्रथम संस्करणकी प्रस्तावना

यस्य बोधोदये तावत् स्वप्नवद् भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥
( अष्टावक्रगीता )

आज प्रायः इक्कीस वर्ष होते हैं जब मैंने पहले-पहले बृहदारण्यक उपनिषद्‌का एक वाक्य सुना था । वह क्षण इस जीवनमें कभी भूल सकूँगा ऐसी आशा नहीं है । उस समय मैं आगरा कालेजका विद्यार्थी था । एक दिन स्थानीय डी० ए० वी० हाई-स्कूलमें कोई उत्सव था । एक श्रोताके रूपमें मैं भी वहाँ बैठा था । मेरे श्रद्धेय बन्धु श्रीधर्मेन्द्रनाथजी शास्त्री, तर्कशिरोमणिका भाषण हो रहा था । उन्होंने याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीके प्रसङ्गकी चर्चा करते हुए मैत्रेयीके ये शब्द कहे—

'येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् ।' ( २ । ४ । ३ )

उस समयसे यह वाक्य मेरा पथप्रदीप बन गया । वैराग्यकी जागृतिके लिये इसकी जोड़का कोई दूसरा वाक्य मैंने सम्भवतः अपने जीवनमें नहीं सुना । इससे अधिक मर्मस्पर्शी कोई दूसरी बात कही जा सकती है—ऐसी मेरी कल्पना भी नहीं है ।

अस्तु, आज करुणामय प्रभुने उसी उज्ज्वल रत्नकी खानि इस महाग्रन्थको जनताके सामने रखनेका मुझे सौभाग्य दिया है । इसकी महिमाका वर्णन करना सूर्यको दीपक दिखाना है । वस्तुतः उपनिषद् ही तत्त्वज्ञानके आदि स्रोत हैं । उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूपमें विकसित हुई ज्ञान-गङ्गा जीवोंके संसार-तापको शमन करती है । बृहदारण्यक उपनिषद् यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेयब्राह्मणके अन्तर्गत है । कलेवरकी दृष्टिसे यह समस्त उपनिषदोंकी अपेक्षा बृहत् है तथा अरण्य (वन) में अध्ययन की जानेके कारण इसे 'आरण्यक' कहते हैं । इस प्रकार

( ४ )

हैं। इस प्रकार 'बृहत्' और 'आरण्यक' होनेके कारण इसका नाम 'बृहदारण्यक' हुआ है। यह बात भगवान् भाष्यकारने ग्रन्थके आरम्भमें ही कही है। किन्तु उन्होंने केवल इसकी आकारनिष्ठ बृहत्ताका ही उल्लेख किया है; वार्त्तिककार श्रीसुरेश्वराचार्य तो अर्थतः भी इसकी बृहत्ता स्वीकार करते हैं—

'बृहत्त्वाद्ग्रन्थतोऽर्थाच्च बृहदारण्यकं मतम्।' (सं० वा० ६)

उनकी यह उक्ति अक्षरशः सत्य है। भाष्यकारने भी जैसा विशद और विवेचनापूर्ण भाष्य बृहदारण्यकपर लिखा है वैसा किसी दूसरे उपनिषद्पर नहीं लिखा। उपनिषद्भाष्योंमें इसे हम उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति कह सकते हैं।

इस प्रकार सामान्य दृष्टिसे विचार करके अब हम संक्षेपमें इसके कुछ प्रधान प्रसङ्गोंका दिग्दर्शन करानेका प्रयत्न करते हैं। ग्रन्थके आरम्भमें अश्वमेध ब्राह्मण है। इसमें यज्ञीय अश्वके अवयवोंमें विराट्के अवयवोंकी दृष्टिका विधान किया गया है। इसके कुछ आगे प्रजापतिके पुत्र देव और असुरोंके विग्रहका वर्णन है। इन्द्रियोंकी दैवी और आसुरी वृत्तियाँ देव और असुररूपसे भी मानी जा सकती हैं। इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुख ही हैं—

'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः।' (क० उ० २।१।१)

अतः सामान्यतः वैषयिक या आसुरी वृत्तियोंकी ही प्रधानता रहती है। इसीसे असुरोंको ज्येष्ठ और देवोंको कनिष्ठ कहा गया है। पुण्य और पापसंस्कारोंके कारण इन दोनों प्रकारकी वृत्तियोंका उत्कर्ष और अपकर्ष होता रहता है। शास्त्रविहित कर्म और उपासनासे दैवी वृत्तियोंका उत्कर्ष होता है और उन्हें छोड़कर स्वेच्छाचार करनेसे आसुरी वृत्तियोंका बल बढ़ जाता है। एक बार देवताओंने उद्गीथके द्वारा असुरोंका पराभव करनेका निश्चय किया। उद्गीथ एक यज्ञकर्मका अङ्ग है, उसके द्वारा उन्होंने आसुरी वृत्तियोंको दबानेका विचार किया। उन्होंने वाक्, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र और त्वक्‌के अभिमानी देवताओंसे अपने लिये उद्गान करनेको कहा। उन देवताओंमेंसे

( ५ )

प्रत्येकने अपने-अपने कर्मद्वारा दैवी वृत्तियोंकी प्रबलताके लिये उद्गान किया; किन्तु उस कर्मका कल्याणमय फल स्वयं ही भोगना चाहा। यह उनका स्वार्थ था। ऋत्विक्‌का धर्म है कि वह जो कुछ क्रिया करे उसका फल यजमानके लिये ही चाहे। यह स्वार्थ स्वयं ही आसुरी वृत्ति है, इसलिये उनका वह कर्म व्यर्थ हो गया। अन्तमें मुख्यप्राणसे इस कर्मके लिये प्रार्थना की गयी। प्राण परम उदार और सर्वथा अनासक्त है। वह किसी भी विषयको स्वयं नहीं भोगता तथा उसकी कृपासे सारी इन्द्रियाँ अपने विषयोंको भोगती हैं। अन्य सब इन्द्रियाँ सोती भी हैं और जागती भी, किन्तु प्राण सर्वदा सजग रहता है। अतः उसके उद्गान करनेपर असुरोंका दांव बिलकुल खाली गया और देवताओंकी विजय हुई। इस आख्यायिकासे श्रुति यही बताती है कि पापवृत्तियोंका मूल वस्तुतः स्वार्थ ही है; जबतक हृदयमें स्वार्थका कुछ भी अंश है तबतक जीव भोगासक्तिरूप पापमय बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता और जिसने स्वार्थका सर्वथा त्याग कर दिया है, उसपर संसारके किसी भी प्रलोभनका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।

इसके बाद द्वितीय अध्यायके आरम्भमें दृप्तबालाकि गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद है। काशिराज अजातशत्रु तत्त्वज्ञ था और गार्ग्य दृप्त—ज्ञानाभिमानी था। उसने जब अजातशत्रुसे कहा कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करता हूँ तो राजाने उसे उसी क्षण एक सहस्र सुवर्ण-मुद्रा भेंट किये। इससे श्रुति यह सूचित करती है कि जो सच्चे महानुभाव होते हैं वे दूसरेके दोषकी ओर न देखकर उसका आदर ही करते हैं। साथ ही इससे ब्रह्मविद्याकी महत्ता भी सूचित की है, जिसकी केवल प्रतिज्ञा करनेपर ही गुणग्राही विद्वान्‌ने वक्ताके प्रति अपनी अनुपम उदारता व्यक्त कर दी। इसके पश्चात् गार्ग्यने जिन-जिन आदित्यादिके अभिमानी पुरुषोंमें ब्रह्मत्वका आरोप किया, राजा अजातशत्रुने उन्हें परिच्छिन्न देवमात्र बताकर उनकी उपासनाका भी विशिष्ट फल बताते हुए उन सबका निषेध कर दिया। इस प्रकार अपनी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो जानेसे गार्ग्यका अभिमान गलित हो

( ६ )

गया और उसने ब्रह्मज्ञानके लिये राजाकी ही शरण ली। राजा उसका हाथ पकड़कर महलके भीतर ले गया और वहां सोये हुए एक पुरुषके पास जाकर प्राणके अभिमानी चन्द्रमाके 'बृहत्, पाण्डरवास, सोम, राजन्' इत्यादि नाम लेकर पुकारा। किन्तु इन नामोंसे पुकारनेपर वह पुरुष नहीं उठा। तब राजाने उसे हाथसे दबाया और वह तुरंत उठकर खड़ा हो गया। इस प्रसङ्गद्वारा श्रुति यह बताती है कि जितने भी नाम-रूपाभिमानी देव हैं वे वस्तुतः विज्ञानमय आत्मा नहीं हैं; विज्ञानात्मा नाम-रूपसे परे है। सामान्यतया सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी हृदयदेशमें उसकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। वस्तुतः वही सबका प्रेरक और सच्चा भोक्ता है, अन्य इन्द्रियाभिमानी देव भी उसीकी विभूतियां हैं, उसकी सत्ताके बिना उनकी स्वतन्त्र शक्ति कुछ भी नहीं है। इन्द्रियोंको प्रेरित करनेके कारण ये प्राण हैं किन्तु प्राणोंका भी प्रेरक होनेसे वह प्राणोंका प्राण है।

इसी अध्यायके चौथे ब्राह्मणमें याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है। याज्ञवल्क्यकी दो स्त्रियां थीं—मैत्रेयी और कात्यायनी। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी स्त्रियोंके समान बुद्धिवाली। सम्प्रदायभेदसे इसी उपनिषद्में यह प्रसङ्ग चतुर्थ अध्यायके पञ्चम ब्राह्मणमें फिर आया है। वहां इन दोनोंके विषयमें यह बात स्पष्ट कही है। जब याज्ञवल्क्यकी इच्छा संन्यास लेनेकी हुई और उन्होंने दोनों स्त्रियोंको अपनी सम्पत्ति बांटनेका प्रस्ताव किया तो कात्यायनीके मुखसे तो कुछ निकला नहीं, क्योंकि वह प्रेयःकामिनी थी, उस धनमें ही उसका सारा सुख निहित था; किन्तु मैत्रेयी थी श्रेयः-कामिनी। उसने कहा, 'यदि धनसे भरी हुई यह सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी ?' याज्ञवल्क्य बोले, 'धनसे अमरता-की आशा तो नहीं की जा सकती; हाँ, सम्पन्न पुरुषोंका जैसा भोगमय जीवन होता है वैसा ही तुम्हारा हो सकता है ?' बस, अब मैत्रेयीको सच्ची कुंजी हाथ आ गयी और उसने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? मुझे तो वही बात

( ७ )

बताइये जिससे मैं अमर हो सकूँ।' वस्तुतः यही विवेक और वैराग्य-का सच्चा स्वरूप है, जिसके हृदयमें यह वृत्ति जाग्रत् नहीं हुई वह किसी भी प्रकार परमार्थ-तत्त्वको ग्रहण नहीं कर सकता। मैत्रेयीकी उत्कट जिज्ञासा देखकर भगवान् याज्ञवल्क्यने उसे ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया। उन्होंने ब्रह्म और आत्माका अभेद प्रतिपादन करते हुए आत्माके लिये ही सबकी प्रियता, आत्मज्ञानसे ही सबका ज्ञान, आत्मासे भिन्न किसी भी वस्तुको देखनेमें पराभव, आत्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंके उत्पत्ति और प्रलय तथा अज्ञानमें ही अनात्मवस्तुओंकी सत्ता बताकर अन्तमें यह उपदेश किया कि जिसकी दृष्टिमें सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कर्ता, क्रिया और करणका सर्वथा अभाव हो जाता हैं। वहाँ सूँघना, सुनना, मनन करना और जानना आदि कोई क्रिया नहीं रहती तथा वह आत्मतत्त्व किसीका ज्ञेय भी नहीं है, क्योंकि सबका ज्ञाता तो वह स्वयं ही है।

इसके आगे मधुब्राह्मण है। मधु अनेकों प्रकारके पुष्पोंका सार या कार्य होता है तथा पुष्प उसके कारण होते हैं। मधु उपकार्य है और पुष्प उपकारक हैं। यह उपकार्य उपकारकभाव ही इस ब्राह्मणमें 'मधु' नामसे कहा गया है। अतः यहाँ यह दिखाया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् और दिशा आदि सभी पदार्थ चारों भूतोंके कार्य हैं तथा भूत उनके कारण हैं। इस प्रकार उनका परस्पर उपकार्य-उपकारक सम्बन्ध है और इस नातेसे वे एक दूसरेके मधु हैं। यह तो हुई व्यावहारिक दृष्टि, किन्तु परमार्थतः उनका अधिष्ठान वह ज्योतिर्मय अमृतमय पुरुष ही है। वही उनका अध्यात्म—मूलभूत अर्थात् वास्तविक स्वरूप है। इसीका नाम आत्मा है और यह आत्मा ही अमृत ब्रह्म और सर्वरूप है। इस प्रकार इस ब्राह्मणमें अधिष्ठान-दृष्टिसे सम्पूर्ण प्रपञ्चकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन किया गया है और 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (२।५।१६) इस श्रुतिसे स्पष्ट कह दिया है कि वह आत्मतत्त्व ही अपनी मायाशक्तिस अनेकों आकार धारण करके क्रीडा कर रहा है।

( ८ )

यहाँ मधुकाण्ड समाप्त होता है। इसके आगे दो अध्याय याज्ञवल्कीय काण्डके हैं। इसके आरम्भमें ही राजा जनकके बहुत दक्षिणावाले यज्ञका प्रसङ्ग है। उनके यहाँ पाञ्चालदेशके सभी विद्वान् ब्राह्मण एकत्रित हुए थे। उन्होंने यह घोषणा कर दी कि जो उनमें सबसे बड़ा ब्रह्मज्ञानी हो वह मेरी गौशालामें बँधी हुई दस सहस्र गौएँ जिनके सींगोंमें दस-दस सुवर्णमुद्रा बँधे हुए हैं, ले जाय। एकत्रित ब्राह्मणोंमेंसे किसीका ऐसा साहस न हुआ जो ब्रह्मज्ञानी जनकके सामने अपनेको सर्वश्रेष्ठ तत्त्ववेत्ता घोषित कर सके। उस समय याज्ञवल्क्यने उठकर अपने ब्रह्मचारीको आज्ञा दी कि इन गौओंको खोलकर ले जाओ। इससे ब्राह्मणोंमें बड़ा क्षोभ हुआ और उनमेंसे एकने पूछा कि क्या तुम ही हम सबमें विशेष ब्रह्मज्ञानी हो? इसपर याज्ञवल्क्यने जो उत्तर दिया वह एक सच्चे महानुभावके अनुरूप ही था। वे बोले ‘ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी इच्छावाले हैं।' इसके पश्चात् एक-एक करके उनमेंसे कई ब्राह्मणोंने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किये और उन्होंने उन्हें समाधानकारक उत्तर देकर शान्त कर दिया। अन्तमें गार्गी खड़ी हुई। ब्रह्मवादिनी गार्गीने इस लोकसे आरम्भ करके उत्तरोत्तर प्रत्येक कारणका कारण पूछा। अन्तमें जब ब्रह्मलोकका भी कारण पूछा तो याज्ञवल्क्यने उसे रोक दिया, क्योंकि यह अति प्रश्न था। जहाँ किसी विषयका निर्णय करनेके लिये प्रश्नोत्तर होता है वहाँ निःसन्दिग्ध वस्तुके विषयमें भी सन्देह करना एक अपराध माना जाता है। इसी प्रकारके नियमको भङ्ग करनेसे शाकल्यका सिर कट गया था, जिसका आगे नवें ब्राह्मणमें उल्लेख है। इसके पश्चात् याज्ञवल्क्यने प्रश्न किये, किन्तु उपस्थित ब्राह्मणोंमेंसे कोई भी उनका उत्तर देनेका साहस नहीं कर सका। इस प्रकार तृतीय अध्याय समाप्त होता है।

चतुर्थ अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें जनक और याज्ञवल्क्यका संवाद है। जनकने भिन्न-भिन्न आचार्योंसे वाक्, प्राण, चक्षु आदिको ही ब्रह्म-रूपसे सुना था। याज्ञवल्क्यने उनमेंसे प्रत्येकके आयतन ( गोलक ) और प्रतिष्ठा ( अधिष्ठान ) पूछे। किन्तु जनकने उन आचार्योंसे उनके

( ६ )

विषयमें कुछ सुना नहीं था। तब याज्ञवल्क्यजीने उनके आयतन और प्रतिष्ठा बताकर उनकी भिन्न-भिन्न प्रकारसे उपासना करनेका विधान किया और उनमेंसे प्रत्येककी उपासनासे देवलोककी प्राप्ति बतलायी। जनकने प्रत्येक उपासनाका फल सुननेपर उसीको परम पुरुषार्थ मानकर याज्ञवल्क्यको एक हजार गौ देना चाहा। किन्तु याज्ञवल्क्यने कहा कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना धन लेना मेरे पिताके सिद्धान्तके विरुद्ध है, इसलिये मैं यह दक्षिणा स्वीकार नहीं कर सकता। द्वितीय ब्राह्मणमें जनकको अधिकारी समझकर याज्ञवल्क्यजीने विराट्का वर्णन करते हुए उस सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार करके परब्रह्मका उपदेश किया है। इससे जनक कृतकृत्यताका अनुभव करके अपना सारा राज्य गुरुदेवके चरणोंमें समर्पण कर देते हैं। इस प्रकार इस प्रकरणका उपसंहार होता है।

इस अध्यायके तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें भी जनक और याज्ञवल्क्यका ही संवाद है। इस प्रकार यद्यपि याज्ञवल्क्य इस संकल्पसे गये थे कि मैं स्वयं जनकसे कुछ नहीं कहूँगा। परन्तु पहले वे उन्हें इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर दे चुके थे। इसलिये उन्होंने स्वयं ही प्रश्न कर दिया कि 'यह पुरुष किस ज्योतिवाला है?' बस, यहींसे प्रश्नोत्तरके क्रमसे इन दोनों ब्राह्मणोंमें आत्मतत्त्वका बड़े विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है। यहाँ विविध प्रकारसे यही निर्णय हुआ है कि आत्मा ही चरम ज्योति है। वह स्वयंप्रकाश है। स्वप्नावस्थामें वही सम्पूर्ण दृश्यको खड़ा कर लेता है। सम्पूर्ण विषयोंका भोक्ता होनेपर भी वह सर्वथा असंग है। सुषुप्तावस्थामें वह सारे प्रपञ्चका उपसंहार करके अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित रहता है। वही द्रष्टाकी दृष्टि, घ्राताकी घ्राति, रसयिताकी रसनाशक्ति, वक्ताकी उक्ति, श्रोताकी श्रुति, मन्ताकी मति और विज्ञाताकी विज्ञाति है। इस प्रकार सबका स्वरूप होनेसे उसका कभी अभाव नहीं होता, क्योंकि जब जो कुछ रहता है उसका वास्तविक स्वरूप स्वयं आत्मा ही है। इस प्रकार जब वही सबका स्वरूप है तो उक्त दृष्टि आदिके विषय भी उससे भिन्न नहीं हैं। अतः

( १० )

एक अलुप्तशक्तिस्वरूप द्रष्टा ही सर्वमय है, वही निरतिशय आनन्दस्वरूप है और उसीके लेशमात्र आनन्दसे अन्य सब विषय आनन्दरूप जान पड़ते हैं। वह आत्मा सर्वरूप है। जिसे ऐसा बोध हो गया है वह निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है। उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता। वह ब्रह्मरूप ही है और ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो जाता है। इसके आगे चतुर्थ अध्यायके अन्ततक याज्ञवल्क्यजीने बड़ी ओजपूर्ण भाषामें इसी तत्त्वका वर्णन किया है। फिर पञ्चम ब्राह्मणमें याज्ञवल्कीय काण्डकी पद्धतिसे पूर्वोक्त याज्ञवल्क्य-मैत्रेयि-संवादका ही वर्णन है और छठे ब्राह्मण में आचार्यपरम्पराके उल्लेखपूर्वक मधुकाण्ड समाप्त होता है।

इससे आगे पञ्चम अध्यायसे खिलकाण्ड आरम्भ होता है। इसमें कई प्रकारकी उपासनाओंका वर्णन है। आरम्भमें ही एक बड़ा रोचक आख्यान है। प्रजापतिके पुत्र देव, असुर और मनुष्य अपने पिताके यहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका सेवन करते हैं और प्रजापतिसे उपदेश करनेकी प्रार्थना करते हैं। प्रजापति बारी-बारीसे उन तीनोंको एक ही अक्षर ‘द’ का उपदेश करते हैं और इस एक ही अक्षरसे उन्हें अपने-अपने लिये उपयुक्त उपदेश मिल जाता है। भोगप्रधान देवता समझते हैं, ‘पिताने हमें दमन (इन्द्रियसंयम) करनेका उपदेश किया है,’ क्रूरप्रकृति असुर समझते हैं, ‘प्रजापतिने हमें दया करनेका आदेश किया है’ और अर्थलोलुप मनुष्य मानते हैं, ‘पिताने हमें दान करनेकी आज्ञा दी है।’ इस प्रकार अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उपयुक्त उपदेश पाकर वे कृतकृत्य हो जाते हैं।

इसके सिवा इस अध्यायमें और भी कई प्रकारकी उपासनाएँ हैं। फिर छठे अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें इन्द्रियोंके विवादद्वारा प्राणकी उत्कृष्टता दिखायी गयी है तथा द्वितीय ब्राह्मणमें श्वेतकेतु और प्रवाहणका प्रसङ्ग है। श्वेतकेतु केवल शास्त्राध्ययन करके ही अपनेको विद्वान् मानने लगा था। वह राजसभामें अपनी विद्याकी धाक जमानेके उद्देश्यसे पाञ्चालनरेश प्रवाहणकी सभामें आया। राजाने उसे अभिमानी समझकर पाँच प्रश्न किये। उन प्रश्नोंका सम्बन्ध था जीवन-मरणकी समस्यासे। श्वेतकेतुसे उनका कुछ भी उत्तर न बना। तब वह उदास

( ११ )

होकर अपने पिता और गुरु आरुणिके पास आया। उसने भी उन प्रश्नोंके विषयमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। तब वे पिता-पुत्र दोनों प्रवाहणके पास गये और उससे उन प्रश्नोंका उत्तर पूछा। प्रवाहणने उन्हें पञ्चाग्निविद्याका उपदेश किया। इस प्रसङ्गका निरूपण छान्दोग्योपनिषद्में भी है। शाखाभेदसे एक ही विद्याका अनेक स्थानोंपर उल्लेख हो जाता है।

इसके पश्चात् तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें क्रमशः श्रीमन्थ और पुत्रमन्थ कर्मोंका वर्णन है। ये दोनों कर्म परस्परसम्बद्ध हैं। इनका प्रधान प्रयोजन सत्सन्ततिकी प्राप्ति है। पाँचवें ब्राह्मणमें खिलकाण्डकी आचार्य-परम्परा है। इस प्रकार यह उपनिषद् समाप्त होती है।

यहाँतक संक्षेपमें इस महाग्रन्थके प्रधान-प्रधान प्रसङ्गोंपर दृष्टिपात किया गया है। इस उपनिषद्की प्रतिपादन-शैली बहुत ही सुव्यवस्थित और युक्तियुक्त है। उपर्युक्त विवेचनके अनुसार इसमें दो दो अध्यायोंके मधु, याज्ञवल्कीय और खिलसंज्ञक तीन काण्ड हैं। इनमेंसे मधु और खिल काण्डोंमें प्रधानतया उपासनाका तथा याज्ञवल्कीय काण्डमें ज्ञानका विवेचन हुआ है। भाष्यकारने इसकी व्याख्या करते हुए अपना हृदय खोलकर रख दिया है। इसके भाषान्तरकी समाप्तिके साथ इन पंक्तियोंके लेखकके जीवनकी भी एक साध पूरी हो जाती है। आजसे प्रायः नौ वर्ष पूर्व इसके चित्तमें भगवान् शङ्कराचार्यके उपनिषद्भाष्यका अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था। वस्तुतः वह सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी ही प्रेरणा थी। उनको लीलाका मर्म कुछ जाना नहीं जाता। वे न जाने किससे क्या काम कराना चाहते हैं और फिर उसे किस प्रकार पूरा करा लेते हैं—यह एक गम्भीर रहस्य ही है। अपनी विद्या-बुद्धिको देखते हुए ऐसा संकल्प करना मेरा दुःसाहस ही था। कोई विधिवत् अध्ययनका भी तो बल नहीं था। किन्तु भगवत्प्रेरणाके आगे सभीको झुकना पड़ता है; वे ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित कर देते हैं कि जिनके कारण शक्ति न देखते हुए भी मनुष्य साहस कर बैठता है। ऐसी किसी परिस्थितिने ही इसे भी इस

( १२ )

महत्कार्यमें नियुक्त कर दिया और कई प्रकारकी अड़चनोंके पश्चात् आजसे प्रायः साढ़े चार वर्ष पूर्व इसकी पूर्णाहुति हो गयी । इस महान् कर्मका मेरे लिये तो वस्तुतः इतना ही लाभ है कि इसी बहाने शास्त्रचिन्तनमें समय बीत जाता है । अस्तु, जो कुछ हो, प्रभुके विधानमें किसीका दखल भी तो नहीं चलता ।

इन उपनिषद्भाष्योंके अनुवादमें मुझे जिन ग्रन्थोंसे सहायता मिली है उनके लेखकोंका मैं सर्वदा ऋणी ही रहूँगा । हार्दिक धन्यवादके सिवा मेरे पास उस ऋणके परिशोधका कोई और साधन नहीं है । जिनके कृपामय सहयोगसे मुझे वे ग्रन्थ प्राप्त हो सके थे उन महानुभावोंका भी मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ । भाई साहब श्रीशंकरलालजी गर्गने पं० पीताम्बरजीका हिन्दी अनुवाद किया था । पूज्य पं० श्रीकृष्णजी पन्तकी कृपासे मुझे पं० दुर्गाचरण मजूमदारविरचित बँगला-अनुवाद मिला था तथा बन्धुवर कुँवर विजयेन्द्रसिंहजीने पं० गंगानाथ झा और श्रीसीताराम शास्त्रीके अंग्रेजी अनुवाद दिये थे । छपाईके समय सम्मान्य सुहृद्वर पं० श्रीरामनारायणजी शास्त्रीने इन सभी ग्रन्थोंका संशोधन और प्रूफ शोधन किया है । उनके अथक अध्यवसायके बिना इनका इतने शुद्धरूपमें प्रकाशित होना प्रायः असम्भव ही था । अतः उनका भी मैं सर्वदा ऋणी ही रहूँगा ।

अन्तमें, जिनकी असीम अनुकम्पा और बाह्य एवं आन्तर प्रेरणासे यह दुष्कर कार्य सुकरकी भाँति सम्पन्न हुआ है उन अपने हृदय-सर्वस्व पूज्यपाद श्रीगुरुदेवके पावन करकमलोंमें यह तुच्छ भेंट समर्पण करता हूँ । इसके द्वारा मैं किसी प्रकार उनके परम पवित्र पादपद्मोंका विशुद्ध प्रेम प्राप्त कर सकूँ—यही मेरी आन्तरिक अभिलाषा है ।

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विनीत,
अनुवादक

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प्रथम अध्याय

॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठ
१—शान्तिपाठ२६

प्रथम अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

  • २—सम्बन्ध-भाष्य | ३०
  • ३—अश्वके अवयवोंमें कालादि-दृष्टि | ३६
  • ४—अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि | ४५

द्वितीय ब्राह्मण

  • ५—अश्वमेध-सम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति | ४८
  • ६—जलसे विराट्रूप अग्निकी उत्पत्ति | ६७
  • ७—विराट्रूप अग्निके अवयवोंमें प्राचीदिगादि-दृष्टि | ६६
  • ८—संवत्सर और वाक्‌की उत्पत्ति | ७२
  • ९—ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास | ७५
  • १०—प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका निष्क्रमण | ७८
  • ११—अश्वमेधोपासना और उसका फल | ८०

तृतीय ब्राह्मण

  • १२—देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ-सम्बन्धी विचार | ८८
  • १३—वाक्‌का उद्गान और उसका पापविद्ध होना | १०७
  • १४—प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना | १११
  • १५—मुख्य प्राणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल | ११५
  • १६—मुख्य प्राणका आङ्गिरसत्व | ११६
  • १७—प्राणकी शुद्धताका प्रतिपादन | १२१
  • १८—प्राणोपासकसे मृत्यु दूर रहता है—इसकी उपपत्ति | १२४
  • १९—प्राणद्वारा वागादिका अग्न्यादि देवभावको प्राप्त कराया जाना | १२७
  • २०—प्राणका अन्नाद्यागान | १३१
  • २१—प्राणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनाका फल | १३३

( १४ )

विषयपृष्ठ
२२-प्राणके आङ्गिरसत्वकी उपपत्ति ...... १३८
२३-प्राणके बृहस्पतित्वकी उपपत्ति ... ...... १४०
२४-प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वकी उपपत्ति ...... १४२
२५-प्राणके सामत्वकी उपपत्ति ... ...... १४४
२६-प्राणके उद्गीथत्वकी उपपत्ति... ....... १४७
२७-उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिका ...... १४८
२८-सामके स्वभूत स्वरको सम्पादन करनेकी आवश्यकता ...... १५०
२९-सामके सुवर्णको जाननेका फल ...... १५२
३०-सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल ...... १५३
३१-प्राणोपासकके लिये जपका विधान ...... १५५

चतुर्थ ब्राह्मण

विषयपृष्ठ
३२-ग्रन्थ-सम्बन्ध .... ...... १६३
३३-प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल ... ...... १६४
३४-प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति ...... १६८
३५-प्रजापतिसे मिथुनकी उत्पत्ति ... ...... १७५
३६-मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि ...... १७८
३७-प्रजापतिकी सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूपसे उसकी उपासना करनेका फल...... १८०
३८-प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि ...... १८१
३९-अव्याकृत कारण ब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति, दोनोंका अभेद और इस अभेदोपासनाका फल ...... १९०
४०-निरतिशय प्रियरूपसे आत्माकी उपासना ...... २३६
४१-ब्रह्मने सर्वरूप होनेके विषयमें प्रश्न ....... २३६
४२-ब्रह्मने क्या जाना ?—इसका उत्तर और उस प्रकार जाननेका फल...... २४३
४३-क्षत्रियसर्ग तथा ब्राह्मणजातिके साथ उसके सम्बन्धका वर्णन ...... २५६
४४-वैश्यजातिकी उत्पत्ति ... ...... २६०
४५-शूद्रवर्णकी उत्पत्ति ... ...... २६१
४६-धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन ...... २६२
४७-आत्मोपासनकी आवश्यकता ... ...... २६४
४८-कर्माधिकारी जीव किन-किन कर्मोंके कारण समस्त प्राणियोंका लोक है ? ... ...... ३०५
४९-प्रवृत्तिके बीजभूत काम और पाङ्क्तकर्मका वर्णन ...... ३११

( १५ )

विषयपृष्ठ
पञ्चम ब्राह्मण
५०-सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या३१९
५१-आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन३४२
५२-आत्मार्थ अन्नोंका आधिभौतिक विस्तार३४८
५३-आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार३५२
५४-इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल३५३
५५-आत्मार्थ अन्नोंकी अन्तवान् और अनन्तरूपसे उपासना करनेका फल३५५
५६-तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश३५७
५७-अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है३६२
५८-लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन३६४
५९-सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम३६६
६०-सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार३७४
६१-व्रतमीमांसा—अध्यात्मप्राणदर्शन३८१
६२-अधिदैवदर्शन३८६
६३-प्राणव्रतकी स्तुतिमें मन्त्र३८८
षष्ठ ब्राह्मण
६४-पूर्वोक्त अविद्याकार्यका उपसंहार—नामसामान्यभूता वाक्३९२
६५-रूपसामान्य चक्षुका वर्णन३९५
६६-कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना३९६
द्वितीय अध्याय<br>प्रथम ब्राह्मण
६७-उपक्रम४००
६८-ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये अपने पास आये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना४०४
६९-गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान४०६
७०-गार्ग्यद्वारा चन्द्रान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान४०८
७१-गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान४१०

( १६ )

विषय
७२—गार्ग्यद्वारा आकाश-ब्रह्मका उपदेश और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४११
७३—गार्ग्यद्वारा वायु-ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१२
७४—गार्ग्यद्वारा अग्नि-ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१३
७५—गार्ग्यद्वारा जलान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१४
७६—गार्ग्यद्वारा आदर्शान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... .... ... ४१४
७७—गार्ग्यद्वारा प्राण-ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१५
७८—गार्ग्यद्वारा दिग्ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१६
७९—गार्ग्यद्वारा छाया ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१७
८०—गार्ग्यद्वारा देहान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान ... ... ... ४१८
८१—गार्ग्यका पराभव और अजातशत्रुके प्रति उसकी उपसत्ति ... ४१६
८२—गार्ग्यका हाथ पकड़कर अजातशत्रुका एक सोये हुए पुरुषके पास जाना और प्राणोंके नामसे न उठनेपर उसे हाथ दबाकर जगाना ... ... ... ४२१
८३—सुषुप्तिमें विज्ञानमयकी स्थितिके विषयमें अजातशत्रुका प्रश्न ... ४३६
८४—विज्ञानात्माके शयनस्थानका प्रतिपादन तथा स्वपितिशब्दका निर्वचन ... ... ... ४३६
८५—स्वप्नवृत्तिका स्वरूप ... ... ... ४४२
८६—सुषुप्तिका स्वरूप ... ... ... ४४८
८७—आत्मासे जगत्‌की उत्पत्तिमें ऊर्णनाभि और अग्नि-विस्फुलिङ्गका दृष्टान्त ... ... ... ४५७

द्वितीय ब्राह्मण

८८—शिशुसंज्ञक मध्यम प्राणका उसके उपकरणोंसहित वर्णन ... ५०२
८९—मध्यम प्राणरूप शिशुके नेत्रान्तर्गत सात अक्षतियाँ ... ५०६

| तृतीय ब्राह्मण | |

( १७ )

विषयपृष्ठ
६०—श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरमें चमस-दृष्टिका विधान... ५०८
६१—श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि... ५१०
तृतीय ब्राह्मण
६२—ब्रह्मके दो रूप... ५१३
६३—मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन... ५१५
६४—विशेषणोंसहित अमूर्तरूप और उसके रसका वर्णन... ५१७
६५—अध्यात्म मूर्तामूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन... ५२१
६६—अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन... ५२३
६७—इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन... ५२४
चतुर्थ ब्राह्मण
६८—याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद... ५३८
६९—मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न... ५४६
१००—याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन... ५४७
१०१—प्रियतम आत्माके लिये ही अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं... ५४८
१०२—आत्मा सबसे अभिन्न है, इसका प्रतिपादन... ५५२
१०३—सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहणमें दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त... ५५३
१०४—परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन... ५५७
१०५—आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त... ५६१
१०६—विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जलमें डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त... ५६५
१०७—मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान... ५७२
१०८—व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थ व्यवहारातीत है... ५७४
पञ्चम ब्राह्मण
१०९—पृथिवी आदिमें मधुदृष्टि तथा उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर-पुरुषकी अभिन्नता... ५८२
११०—आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण... ५९५
१११—दध्यङ् ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका... ६००
षष्ठ ब्राह्मण
११२—मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा... ६१५

बृ० उ० २—

| तृतीय अध्याय | |

( १८ )

विषयपृष्ठ
### तृतीय अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
११३—याज्ञवल्कीय काण्ड ... ... ...६१६
११४—राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना ... ... ...६२०
११५—याज्ञवल्क्यका गौएं ले जानेके लिये अपने शिष्यको आज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न ... ... ...६२२
११६—मृत्युग्रस्त कर्मसाधनोंकी आसक्तिसे पार पानेका उपाय ...६२५
११७—अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन ... ...६२६
११८—तिथ्यादिरूप कालरूपसे अतिमुक्तिका साधन ... ...६३१
११९—परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको पार करनेके आश्रयका वर्णन ...६३३
१२०—शस्त्रसम्बन्धी ऋचाएँ और उनसे प्राप्त होनेवाला फल ...६३७
१२१—होम-सम्बन्धिनी आहुतियाँ और उनसे प्राप्त होनेवाले फल ...६३८
१२२—ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... ... ...६४१
१२३—स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन ... ... ...६४४
द्वितीय ब्राह्मण
१२४—याज्ञवल्क्य-आर्तभाग-संवाद ... ...६४७
१२५—ग्रह और अतिग्रहकी संख्या एवं स्वरूप ... ...६५२
१२६—घ्राणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्वनिरूपण६५५
१२७—सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है ? ... ...६५८
१२८—तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम ... ...६६०
१२९—इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार ... ...६६३
तृतीय ब्राह्मण
१३०—याज्ञवल्क्य-भुज्यु-संवाद ... ... ...६७१
१३१—पारिक्षित कहाँ रहे ? ... ... ...६८०
१३२—पारिक्षितोंकी गतिका वर्णन ... ... ...६८४
चतुर्थ ब्राह्मण
१३३—याज्ञवल्क्य-उषस्त-संवाद ... ... ...६८८

( १६ )

विषयपृष्ठ
१३४—सर्वान्तर आत्माका निरूपण ...... ६६८
१३५—आत्माकी अनिर्वचनीयता ...... ७०२

पञ्चम ब्राह्मण

१३६—याज्ञवल्क्य-कहोल-संवाद ... ... | ... ७०६ १३७—संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण ... | ... ७०६

षष्ठ ब्राह्मण

१३८—याज्ञवल्क्य-गार्गी-संवाद ... ... | ... ७३५ १३९—जलसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्तरोत्तर अधिष्ठान तत्त्वोंका निरूपण ... ... , | ७३६

सप्तम ब्राह्मण

१४०—याज्ञवल्क्य-आरुणि-संवाद ... | ... ७४१ १४१—सूत्र और अन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न ... | ... ७४१ १४२—सूत्रका निरूपण ... ... | ... ७४६ १४३—अन्तर्यामीका निरूपण ... ... | ... ७४६

अष्टम ब्राह्मण

१४४—दो प्रश्न पूछनेके लिये गार्गीका आज्ञा माँगना | १४५—पहला प्रश्न ... ... | ... ७६१ १४६—याज्ञवल्क्यका उत्तर ... ... | ... ७६२ १४७—उपक्रमसहित दूसरा प्रश्न ... ... | ... ७६४ १४८—याज्ञवल्क्यका उत्तर ... ... | ... ७६५ १४९—अनुमानप्रमाणद्वारा अक्षरका निरूपण ... | ... ७६६ १५०—अक्षरके ज्ञान और अज्ञानके परिणाम ... | ... ७७६ १५१—अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व ... | ... ७७८ १५२—गार्गीका निर्णय ... ... | ... ७८०

नवम ब्राह्मण

१५३—याज्ञवल्क्य-शाकल्य-संवाद ... ... | ... ७८४ १५४—देवताओंकी संख्या ... ... | ... ७८५ १५५—तैंतीस देवताओंका विवरण ... ... | ... ७८७ १५६—वसु कौन हैं ? ... ... | ... ७८८ १५७—रुद्र कौन हैं ? ... ... | ... ७८६