बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१७ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१७ |
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| वल्क्यः, नामान्तरेण सम्बोधनं कृतवान् । यत्र यस्मिन्काले, एतद् हृदयमात्मास्य शरीरस्यान्यत्र क्वचिद्देशान्तरे, अस्मदस्मत्तो वर्तत इति मन्यासै मन्यसे—यद्धि यदि ह्येतद् हृदयमन्यत्रास्मत् स्याद् भवेत्, श्वानो वैनच्छरीरं तदा अद्युः, वयांसि वा पक्षिणो वैनद् विमथ्नीरन् विलोडयेयुः विकर्षेरन्निति । तस्मान्मयि शरीरे हृदयं प्रतिष्ठितमित्यर्थः । शरीरस्यापि नामरूपकर्मात्मकत्वात् हृदये प्रतिष्ठितत्वम् ॥ २५ ॥ | अर्थात् [ प्रेतवाची ] अन्य नामसे सम्बोधन किया । जिस समय यह हृदय-इस शरीरका आत्मा हमसे अन्यत्र किसी देशान्तरमें रहता है-ऐसा मानते हो; उस समय यदि इस शरीरसे यह हृदय-आत्मा अन्यत्र हो जाय, तो इस शरीरको या तो कुत्ते खा जायें या पक्षी इसे विमथित-विलोड़ित कर दें यानी चोंच मार-मारकर नोच डालें । अतः तात्पर्य यह है कि हृदय मुझ शरीरमें प्रतिष्ठित है । शरीर भी नाम, रूप एवं कर्ममय होनेके कारण हृदयमें ही प्रतिष्ठित है ॥ २५ ॥ |
समानपर्यन्त शरीरादिकी प्रतिष्ठा तथा आत्मस्वरूपका वर्णन और शाकल्यका शिरःपतन
| हृदयशरीरयोरेवमन्योन्यप्रतिष्ठोक्ता कार्यकारणयोः; अतस्त्वां पृच्छामि— | [शाकल्य-] इस प्रकार तुमने कार्य और कारणरूप शरीर एवं हृदयकी परस्पर प्रतिष्ठा बतलायी; इसलिये मैं तुमसे पूछता हूँ— |
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कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इत्यपान इति कस्मिन्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति ।
बृ० उ० ५२—
८१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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एतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति । तꣳह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यप जहुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥
'तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय) किसमें प्रतिष्ठित हो।' [याज्ञवल्क्य—] 'प्राणमें।' [शाकल्य—] 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है?' 'अपानमें।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'व्यानमें।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'उदानमें।' 'उदान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'समानमें।' जिसका [मधुकाण्डमें] 'नेति-नेति' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है—वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है—वह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है—वह संसक्त नहीं होता, असित है—वह व्यथित और हिंसित नहीं होता। ये आठ आयतन हैं, आठ लोक हैं, आठ देव हैं और आठ पुरुष हैं। वह जो उन पुरुषोंको निश्चयपूर्वक जानकर उनका अपने हृदयमें उपसंहार करके औपाधिक धर्मोंका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मैं पूछता हूँ; यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा। किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये उसका मस्तक गिर गया। यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ले गये ॥ २६ ॥
| कस्मिन्नु त्वं च शरीरमात्मा च तव हृदयं प्रतिष्ठितौ स्थ इति ? प्राण इति; देहात्मानौ प्राणे प्रतिष्ठितौ स्यातां प्राणवृत्तौ । कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति—सापि प्राणवृत्तिः | 'तुम शरीर और तुम्हारा आत्मा-हृदय किसमें प्रतिष्ठित हो?' 'प्राणमें; देह और आत्मा—ये दोनों प्राणमें—प्राणवृत्तिमें प्रतिष्ठित हैं।' 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है?' 'अपानमें, —क्योंकि वह प्राणवृत्ति भी यदि |
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ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९
| प्रागेव प्रेयात् अपानवृत्त्या चेन्न निगृह्येत। कस्मिन्नपानः प्रतिष्ठित इति ? व्यान इति—साप्यपानवृत्तिरध एव यायात् प्राणवृत्तिश्च प्रागेव, मध्यस्थया चेद्व्यानवृत्त्या न निगृह्येत। कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इति ? उदान इति—सर्वास्तिस्रोऽपि वृत्तय उदाने कीलस्थानीये चेन्न निबद्धा, विष्वग्गवेयुः। कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति ? समान इति—समानप्रतिष्ठा ह्येताः सर्वा वृत्तयः। | अपानवृत्तिद्वारा रोकी न जाय तो वह ऊपर-ही-ऊपर बाहर निकल जाय।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'व्यानमें,—क्योंकि यदि मध्यवर्तिनी व्यानवृत्तिसे न रोकी जाय तो अपानवृत्ति नीचेको ही चली जाय और प्राणवृत्ति ऊपरको ही निकल जाय।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'उदानमें,—यदि ये तीनों वृत्तियाँ कीलस्थानीय उदानवृत्तिमें बँधी न हों तो सब ओर ही चली जायँ।' 'उदान किसमें प्रतिष्ठित है?' समानमें,—ये सब वृत्तियाँ समानमें ही प्रतिष्ठित हैं।' |
| एतदुक्तं भवति—शरीरहृदयवायवोऽन्योन्यप्रतिष्ठाः, सङ्घातेन नियता वर्तन्ते विज्ञानमयार्थप्रयुक्ता इति। सर्वमेतद् येन नियतं यस्मिन् प्रतिष्ठितमाकाशान्तमोतं च प्रोतं च, तस्य निरुपाधिकस्य साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्मणो निर्देशः कर्तव्य इत्ययमारम्भः। | यहां कहा यह गया है कि शरीर, हृदय और प्राण—ये परस्पर प्रतिष्ठित हैं और विज्ञानमयके लिये प्रयुक्त होकर सङ्घातरूपसे नियमपूर्वक प्रवृत्त होते हैं। यह सब जिसके द्वारा नियत है, जिसमें प्रतिष्ठित है और जिसमें यह आकाशपर्यन्त ओतप्रोत है, उस निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मका निर्देश करना है, इसीसे यह आगे आरम्भ किया जाता है। |
| स एषः— स यो नेति नेतीति निर्दिष्टो मधुकाण्डे, एष सः। सोऽयमात्मागृह्यो न गृह्यः। | स एषः— वह, जिसका कि मधुकाण्डमें 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया है, यह है। वह यह आत्मा अगृह्य है, ग्रहण करने |
८२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| कथम् ? यस्मात् सर्वकार्यधर्मातीतः, तस्मादगृह्यः । कुतः ? यस्मान्न हि गृह्यते । यद्धि करणगोचरं व्याकृतं वस्तु, तद् ग्रहणगोचरम्; इदं तु तद्विपरीतमात्मतत्त्वम् । | योग्य नहीं है, किस प्रकार ? क्योंकि यह समस्त कार्यधर्मोंसे अतीत है, इसलिये अगृह्य है । क्यों अगृह्य है ? क्योंकि यह ग्रहण नहीं किया जा सकता । जो व्याकृत वस्तु इन्द्रियका विषय होती है, वही ग्रहणका विषय होती है, किंतु यह आत्मतत्त्व तो उससे विपरीत है । | | तथाशीर्यः; यद्धि मूर्तं संहतं शरीरादि तच्छीर्यते; अयं तु तद्विपरीतोऽतो न हि शीर्यते । | इसी प्रकार यह अशीर्य है; जो मूर्त और संहत शरीरादि हैं, वे ही शीर्ण होते हैं; यह उससे विपरीत है, इसलिये यह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता । तथा यह असङ्ग है । | | तथासङ्गो मूर्तो मूर्तान्तरेण सम्बध्यमानः सज्यतेऽयं च तद्विपरीतोऽतो न हि सज्यते । तथा- | मूर्त पदार्थ ही किसी दूसरे मूर्त पदार्थसे सम्बद्ध होनेपर उसमें संसक्त होता है, यह उससे विपरीत स्वभाववाला है, इसलिये कहीं संसक्त नहीं होता । तथा यह असित–अबद्ध है, | | सितोऽबद्धः, यद्धि मूर्तं तद् बध्यते; अयं तु तद्विपरीतत्वादबद्धत्वान्न व्यथते, अतो न रिष्यति—ग्रहणविशरणसम्बन्धकार्यधर्मरहितत्वान्न रिष्यति न हिंसामापद्यते न विनश्यतीत्यर्थः । | क्योंकि जो पदार्थ मूर्त होता है, वही बँधता है; किंतु यह उससे विपरीत (अमूर्त) और अबद्ध होनेके कारण व्यथित नहीं होता और इसीसे रिष (हिंसा) को नहीं प्राप्त होता है—ग्रहण, विशरण, सम्बन्ध आदि कार्य धर्मोंसे रहित होनेके कारण यह रिष अर्थात् हिंसाको नहीं प्राप्त होता; भाव यह कि वह कभी नष्ट नहीं होता । |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२१
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२१
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| क्रममतिक्रम्य औपनिषदस्य पुरुषस्य आख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुत्या स्वेन रूपेण त्वरया निर्देशः कृतः; ततः पुनराख्यायिकामेवाश्रित्याह—एतानि यान्युक्तान्यष्टावायतनानि 'पृथिव्येव यस्यायतनम्' इत्येवमादीनि, अष्टौ लोका अग्निलोकादयः, अष्टौ देवाः 'अमृतमिति होवाच' इत्येवमादयः; अष्टौ पुरुषाः शारीरः पुरुषः, इत्यादयः; स यः कश्चित् तान् पुरुषान्-शारीरप्रभृतीन् निरुह्य निश्चयेनोह्य गमयित्वाष्टचतुष्कभेदेन लोकस्थितिम उपपाद्य, पुनः प्राचीदिगादिद्वारेण प्रत्युह्य उपसंहृत्य स्वात्मनि हृदयेऽत्यक्रामदतिक्रान्तवानुपाधिधर्मं हृदयाद्यात्मत्वम्; स्वेनैवात्मना व्यवस्थितो य औपनिषदः पुरुषोऽशनायादिवर्जितः उपनिषत्स्वेव विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्यः, तं त्वा त्वां विद्याभिमानिनं पुरुषं पृच्छामि । तं चेद् यदि | यहाँ श्रुतिने उतावलीके कारण क्रमको छोड़कर आख्यायिकासे हटकर औपनिषद पुरुषका स्वरूपतः निर्देश कर दिया है; इसलिये अब फिर आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है—'ये जो 'पृथिव्येव यस्यायतनम्' इत्यादि प्रकारसे वर्णित आठ आयतन, 'अग्निलोक' आदि आठ लोक, 'अमृतमिति होवाच' इत्यादि प्रकारसे कहे हुए आठ देव तथा 'शारीर पुरुष' आदि आठ पुरुष बतलाये गये हैं; जो कोई इन शारीरप्रभृति आठ पुरुषोंको निरुह्य-निश्चयपूर्वक ऊहा करके अर्थात् इनका ज्ञान प्राप्त कराकर आयतन, लोक, देव और पुरुषरूप चार भेदोंके समुदायके क्रमसे आठ विभागोंद्वारा लोकस्थितिके अनुकूल विस्तारपूर्वक उपपादन कर फिर प्राची दिगादिके द्वारा उन्हें स्वात्मामें-अपने हृदयमें प्रत्युह्य अर्थात् उपसंहृत कर उपाधिधर्म हृदयादिरूपताका अतिक्रमण किये हुए है तथा जो क्षुधादिधर्मरहित औपनिषद पुरुष अपने ही स्वरूपसे स्थित और उपनिषदोंमें ही विज्ञेय है, किसी अन्य प्रमाणसे नहीं जाना जा सकता, उस पुरुषके विषयमें मैं विद्याका अभिमान रखनेवाले तुमसे प्रश्न करता हूँ, यदि तुम मेरे प्रति उसका विवि- |
८२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| मे न विवक्ष्यसि विस्पष्टं न कथयिष्यसि, मूर्धा ते विपतिष्यतीत्याह याज्ञवल्क्यः। | ख्यान—विशेष स्पष्टरूपसे निरूपण नहीं करोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। |
| तं त्वौपनिषदं पुरुषं शाकल्यो न मेने ह न विज्ञातवान् किल तस्य ह मूर्धा विपपात विपातितः। समाप्ताख्यायिका। श्रुतेर्वचनं तं ह न मेन इत्यादि। किं चापि हास्य परिमोषिणस्तस्करा अस्थीन्यपि संस्कारार्थं शिष्यैर्नीयमानानि गृहान् प्रत्यपजह्रुः—अपहृतवन्तः किन्निमित्तम् ? अन्यद् धनं नीयमानं मन्यमानाः। | उस औपनिषद पुरुषको शाकल्य नहीं जानता था—उसे उसका स्पष्ट ज्ञान नहीं था; अतः उसका मस्तक विपपात अर्थात् गिर गया। बस, आख्यायिका समाप्त हो गयी। 'तं ह न मेने' इत्यादि श्रुतिके वचन हैं। यही नहीं, उसके शिष्यगण जो उसकी अस्थियोंको संस्कारके लिये घरकी ओर ले जा रहे थे, उन्हें परिमोषी—लुटेरोंने छीन लिया। क्यों ? उन्हें ले जाये जाते हुए कोई अन्य धन समझकर। |
| पूर्ववृत्ताह्याख्यायिकेह सूचिता। अष्टाध्याय्यां<sup>१</sup> किल शाकल्येन याज्ञवल्क्यस्य समानान्त एव किल संवादो निवृत्तः; तत्र याज्ञवल्क्येन शापो दत्तः—पुरेऽतिथ्ये मरिष्यसि न तेऽस्थीनि च न गृहान् प्राप्स्यन्तीति। स ह तथैव ममार। तस्य हाप्यन्यन्मन्यमानाः परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुः; तस्मान्नोप- | यह पहले घटी हुई आख्यायिका ही यहाँ सूचित की गयी है। अष्टाध्यायीमें शाकल्यके साथ याज्ञवल्क्यका समानपर्यन्त ही संवाद हुआ है; फिर याज्ञवल्क्यने उसे शाप दिया है कि 'तू पुण्यक्षेत्रातिरिक्त देश और पुण्यतिथिशून्य कालमें मरेगा और तेरी हड्डियाँ भी घरतक नहीं पहुँचेंगी।' वह इसी प्रकार मरा। यहाँतक कि अन्य वस्तु समझकर उसकी हड्डियोंको लुटेरे ले गये; इसलिये उपवादी (तिरस्कार करनेवाला) नहीं होना |
१. यह बृहदारण्यकसे पूर्ववर्ती कर्मविषयक ग्रन्थ है।
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२३ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२३ |
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| वादी स्यादुत ह्येवंवित् परो भवतीति । सैषा आख्यायिका आचारार्थं सूचिता विद्यास्तुतये चेह ॥ २६ ॥ | चाहिए; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ होता है। यह आख्यायिका यहाँ आचारप्रदर्शन और विद्याकी स्तुतिके लिये सूचित की गयी है ॥ २६ ॥ |
याज्ञवल्क्यका सभासदोंको प्रश्न करनेके लिये आमन्त्रण
| यस्य नेति नेतीत्यन्यप्रतिषेधद्वारेण ब्रह्मणो निर्देशः कृतः, तस्य विधिमुखेन कथं निर्देशः कर्तव्यः, इति पुनराख्यायिकामेव आश्रित्याह मूलं च जगतो वक्तव्यमिति । आख्यायिकासम्बन्धस्त्वब्रह्मविदो ब्राह्मणाञ्जित्वा गोधनं हर्तव्यमिति । न्यायं मत्वाऽह— | जिस ब्रह्मका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार अन्य पदार्थोंके प्रतिषेधद्वारा निर्देश किया गया है, उसका विधिमुखसे किस प्रकार निर्देश करना चाहिये, अतः इस उद्देश्यसे कि जगत्का मूल बतलाना है, श्रुति पुनः आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है। आख्यायिकाका सम्बन्ध तो यही है कि अब्रह्मज्ञ ब्राह्मणोंको जीतकर गोधन ले जाना उचित है। अतः न्याय समझकर याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७ ॥
फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न करे, अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें, इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मैं प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥
८२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| अथ होवाच । अथानन्तरं तूष्णीम्भूतेषु ब्राह्मणेषु होवाच, हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्येवं सम्बोध्य–यो वो युष्माकं मध्ये कामयते इच्छति--याज्ञवल्क्यं पृच्छामीति, स मा मामागत्य पृच्छतु; सर्वे वा मा पृच्छत—सर्वे वा यूयं मा मां पृच्छत । यो वः कामयते याज्ञवल्क्यो मां पृच्छत्विति, तं वः पृच्छामि; सर्वान् वा वो युष्मानहं पृच्छामि । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः-ते ब्राह्मणा एवमुक्ता अपि न प्रगल्भाः संवृत्ताः किञ्चिदपि प्रत्युत्तरं वक्तुम् ॥ २७ ॥ | 'अथ होवाच'—अथ—इसके अनन्तर ब्राह्मणोंके मौन हो जाने-पर याज्ञवल्क्यने 'हे पूज्य ब्राह्मण-गण !' इस प्रकार सम्बोधन करके कहा, 'आपमें जिसकी ऐसी कामना-इच्छा हो कि मैं याज्ञवल्क्यसे प्रश्न करूँ, वह मेरे सामने आकर पूछ सकता है । 'सर्वे वा मा पृच्छत'-अथवा आप सभी मुझसे पूछ सकते हैं। और आपमेंसे जिसकी ऐसी इच्छा हो कि याज्ञवल्क्य मुझसे प्रश्न करे, उससे मैं पूछता हूँ अथवा आप सभीसे मैं पूछता हूँ।' उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ-इस प्रकार कहे जानेपर भी वे ब्राह्मण किसी प्रकारका प्रत्युत्तर देनेकी प्रगल्भता (धृष्टता) न कर सके ॥ २७ ॥ |
याज्ञवल्क्यके प्रश्न
तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ—
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति (विशा-लता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिस धर्मोंसे युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है । वृक्षके पत्ते होते हैं और उस पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोएँ होते हैं; उसके शरीरमें जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमें छाल होती है ॥ १ ॥
ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२५
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२५ |
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| तेषु अप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेषु तान् हतैर्वक्ष्यमाणैः श्लोकैः पप्रच्छ पृष्टवान्। यथा लोके वृक्षो वनस्पतिः, वृक्षस्य विशेषणं वनस्पतिरिति, तथैव पुरुषोऽमृषा—अमृषा सत्यमेतत्—तस्य लोमानि; तस्य पुरुषस्य लोमानीतरस्य वनस्पतेः पर्णानि; त्वगस्योत्पाटिका बहिः—त्वगस्य पुरुषस्य इतरस्योत्पाटिका वनस्पतेः ॥ १ ॥ | जब वे ब्राह्मण कुछ बोलनेका साहस न कर सके तो याज्ञवल्क्यने उनसे इन आगे कहे जानेवाले श्लोकोंद्वारा पूछा। जिस प्रकार लोकमें वनस्पति अर्थात् विशालता आदि गुणोंसे युक्त वृक्ष है—वनस्पति यह वृक्षका विशेषण है—उसी प्रकार यानी उस वृक्षके समान धर्मोंसे सम्पन्न पुरुष भी है—यह बिल्कुल सत्य बात है। उसके लोम—उस पुरुषके लोम हैं और उन्हींके समान इतर यानी इस वनस्पतिके पत्ते होते हैं तथा 'त्वगस्योत्पाटिका बहिः' इस पुरुषके शरीरमें जो त्वचा है, उसकी समानता रखनेवाली इतर यानी इस वनस्पति वृक्षके बाहरी भागमें छाल है ॥ १ ॥ |
त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदातृण्णात् प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥२॥
इस पुरुषकी त्वचासे ही रक्त चूता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षसे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है ॥ २ ॥
| त्वच एव सकाशादस्य पुरुषस्य रुधिरं प्रस्यन्दि, वनस्पतेस्त्वच | इस पुरुषकी त्वचाके ही पाससे रक्त चूकर गिरता हे और वनस्पतिकी |
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८२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ८२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| उत्पटः—त्वच एवोत्स्फुटति यस्मात्; एवं सर्वं समानमेव वनस्पतेः पुरुषस्य च; तस्माद् आत्ण्णात् हिंसितात् प्रति तद् रुधिरं निर्गच्छति वृक्षादिव आहताच्छिन्नाद् रसः ॥ २ ॥ | भी त्वचा (छाल) से ही उत्पट अर्थात् गोंद निकलता है; क्योंकि वह (गोंद) वृक्षकी छालसे ही फूटकर बहता है। इस प्रकार वनस्पति और पुरुषकी सभी बातें एक-ही-जैसी हैं। इसीलिये आहत अर्थात् कटे हुए वृक्षसे निकले हुए रसकी भाँति चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे भी वह रुधिर निकलता है ॥ २ ॥ |
मांसान्यस्य शकराणि किनाटँ स्नाव तत् स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३॥
पुरुषके शरीरमें मांस होते हैं और वनस्पतिके शकर (छालका भीतरी अंश), पुरुषके स्नायु—जाल होते हैं और वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अंश-विशेष)। वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु-जालके भीतर जैसे हड्डियां होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ हैं तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की गयी है ॥ ३ ॥
| एवं मांसान्यस्य पुरुषस्य, वनस्पतेस्तानि शकराणि शकलानीत्यर्थः । किनाटं वृक्षस्य, किनाटं नाम शकलेभ्योऽभ्यन्तरं वल्कलरूपं काष्ठसंलग्नम्, तत् स्नाव पुरुषस्य; तत् स्थिरम्—तच्च किनाटं स्नाववद् | इसी प्रकार इस पुरुषके मांस हैं और वनस्पतिके मांसस्थानीय शकर—शकल (छालके भीतरका अंश) हैं। वृक्षके किनाट होता है, किनाट उसे कहते हैं जो शकलोंसे भीतर काठसे लगी हुई छाल होती है, वह [अर्थात् उसके सदृश] पुरुषकी शिराएँ हैं। वह स्थिर है अर्थात् वह किनाट शिराओंके समान दृढ़ है। पुरुषकी |
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७
| दृढं हि तत्; अस्थीनि पुरुषस्य, स्नाव्नो ऽन्तरतोऽस्थीनि भवन्ति; तथा किनाटस्याभ्यन्तरतो दारूणि काष्ठानि; मज्जा, मज्जैव वनस्पतेः पुरुषस्य च मज्जोपमा कृता, मज्जाया उपमा मज्जोपमा, नान्यो विशेषोऽस्तीत्यर्थः; यथा वनस्पतेर्मज्जा तथा पुरुषस्य, यथा पुरुषस्य तथा वनस्पतेः॥३॥ | शिराओंके भीतर अस्थियां होती हैं; इसी प्रकार किनाटके भीतर काष्ठ होता है; मज्जा-वनस्पति तथा पुरुषकी मज्जा ही मज्जाकी उपमा नियत की गयी है, मज्जाकी उपमा ही मज्जोपमा है, अर्थात् उनमें कोई अन्य भेद नहीं है; जिस प्रकार वनस्पतिकी मज्जा होती है, वैसे ही पुरुषकी होती है और जैसे पुरुषकी होती है वैसे ही वनस्पतिको होती है ॥ ३ ॥ |
यद् वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥४॥
किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो अपने मूलसे पुनः और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो जाता है; इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह किस मूलसे उत्पन्न होगा ? ॥ ४ ॥
| यद् यदि वृक्षो वृक्णश्छिन्नो रोहति पुनः पुनः प्ररोहति प्रादुर्भवति मूलात् पुनर्नवतरः पूर्वस्मादभिनवतरः; यदेतस्माद् विशेषात् प्राग् वनस्पतेः पुरुषस्य च, सर्वं सामान्यमवगतम्; अयं तु वनस्पतौ विशेषो दृश्यते यच्छिन्नस्य प्ररोह- | यदि वृक्षको काट दिया जाय तो वह पुनः-पुनः अपनी जड़से अतिशय नवीन—पहलेकी अपेक्षा नवीनतर होकर अङ्कुरित-प्रादुर्भूत हो जाता है। इस विशेषणसे पूर्व वनस्पति और पुरुषकी सब प्रकार समानता जानी गयी है; किंतु कट जानेपर पुनः अङ्कुरित हो जाना यह वनस्पतिमें विशेषता देखी जाती है; परंतु |
८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| णम्; न तु पुरुषे मृत्युना वृक्णे पुनः प्ररोहणं दृश्यते; भवितव्यं च कुतश्चित्प्ररोहणेन; तस्माद् वः पृच्छामि—मर्त्यो मनुष्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ? मृतस्य पुरुषस्य कुतः प्ररोहणमित्यर्थः ॥ ४ ॥ | मृत्युद्वारा छेदन किये जानेपर पुरुषको पुनः अङ्कुरित होते नहीं देखा जाता; किंतु वह किसीसे अङ्कुरित अवश्य होना चाहिये; इसीसे मैं आपलोगोंसे पूछता हूँ कि यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय तो वह किस मूलसे अङ्कुरित होता है ? अर्थात् मरे हुए पुरुषकी उत्पत्ति कहांसे होती है ? ॥ ४ ॥ |
रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत् प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥५॥
वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [ मृत पुरुषसे नहीं ] । वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है, किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुनः अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है ॥ ५ ॥
| यदि चेदेवं वदथ—रेतसः प्ररोहतीति, मा वोचत मैवं वक्तुमर्हथ; कस्मात् ? यस्माज्जीवतः पुरुषात्तद् रेतः प्रजायते, न मृतात् । अपि च धानारुहः, धाना बीजम्, बीजरुहोऽपि वृक्षो भवति, न केवलं काण्डरुह एव; इवशब्दोऽनर्थकः; | यदि तुम ऐसा कहो कि वह वीर्यसे उत्पन्न होता है, तो मत कहो—ऐसा कहना उचित नहीं है; क्यों नहीं है ? क्योंकि वीर्य जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है, मरे हुएसे नहीं होता । वृक्ष धानारुह भी है, धाना बीजको कहते हैं, उस बीजसे उत्पन्न होनेवाला भी वृक्ष होता है; वह केवल तनेसे ही उत्पन्न नहीं होता; 'इव' शब्द- |
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
| वै वृक्षोऽञ्जसा साक्षात् प्रेत्य<br>मृत्वा सम्भवो धानातोऽपि प्रेत्य<br>सम्भवो भवेदञ्जसा पुनर्वन-<br>स्पतेः ॥ ५ ॥ | का कोई अर्थ नहीं है; यह प्रसिद्ध<br>है कि वृक्ष मरकर भी पुनः साक्षात्<br>उत्पन्न हो जाता है; धाना अर्थात्<br>बीजसे उत्पन्न हुए वनस्पतिका भी<br>कटनेके बाद पुनः प्रादुर्भाव हो<br>जाता है [ किंतु जीवके शरीरका<br>इस प्रकार आविर्भाव नहीं देखा<br>जाता ] ॥ ५ ॥ |
यत् समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ६ ॥
यदि वृक्षको मूलसहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा; इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ? ॥ ६ ॥
| यद् यदि सह मूलेन धानया<br>वा आवृहेयुरुद्यच्छेयुरुत्पाटयेयु-<br>र्वृक्षम्, न पुनराभवेत् पुनरागत्य<br>न भवेत् । तस्माद् वः पृच्छामि<br>सर्वस्यैव जगतो मूलम्—मर्त्यः<br>स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मू-<br>लात् प्ररोहति ॥ ६ ॥ | यदि वृक्षको मूल अथवा बीजके<br>सहित 'आवृहेयुः'—आकर्षित कर<br>लें-उखाड़ लें तो फिर वह वृक्ष<br>कहींसे आकर उत्पन्न नहीं होगा ।<br>इसलिये मैं तुमलोगोंसे सम्पूर्ण<br>जगत्के मूलके सम्बन्धमें प्रश्न कर<br>रहा हूँ—यदि मृत्यु मनुष्यका छेदन<br>कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न<br>होता है ? ॥ ६ ॥ |
जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य
तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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[ यदि ऐसा मानो कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वह मरकर पुनः उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? [ यह प्रश्न है; ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वयं ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान ) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
| जात एवेति मन्यध्वं यदि किमत्र प्रष्टव्यमिति—अनिष्यमाणस्य हि सम्भवः प्रष्टव्यः, न जातस्य, अयं तु जात एवातोऽस्मिन् विषये प्रश्न एव नोपपद्यत इति चेत्—न, किं तर्हि ? मृतः पुनरपि जायत एवान्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात्; अतो वः पृच्छामि—को न्वेनं मृतं पुनर्जनयेत् ? | यदि तुम ऐसा मानते हो कि पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, उसके विषयमें क्या पूछना—क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला होता है, उसीकी उत्पत्तिके विषयमें पूछा जाता है, जो उत्पन्न हो चुका है, उसके विषयमें नहीं पूछा जाता; वह पुरुष तो उत्पन्न हो चुका है, इसलिये इसके विषयमें प्रश्न करना उचित नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; तो क्या बात है ? मरनेपर भी तो यह पुनः उत्पन्न होता ही है, नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा; इसीसे मैं तुमलोगोंसे पूछता हूँ कि मरनेपर इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? |
|---|---|
| तन्न बिजज्ञुब्रह्मणाः—यतो मृतः पुनः प्ररोहति जगतो मूलं न विज्ञातं ब्राह्मणैः; अतो ब्रह्मिष्ठत्वादू हृता गावः; याज्ञवल्क्येन | ब्राह्मणोंको इसका विशेष ज्ञान नहीं था, जहाँसे मरनेपर पुरुष पुनः जन्म लेता है; उस जगत्के मूलका ब्राह्मणोंको पता नहीं था। अतः ब्रह्मिष्ठ होनेके कारण याज्ञवल्क्यने गायोंको हरण कर लिया और वे |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| जिता ब्राह्मणाः । समाप्ता आख्यायिका । | ब्राह्मण जीत लिये गये । आख्यायिका समाप्त हुई । |
| यज्जगतो मूलम्, येन च शब्देन साक्षाद् व्यपदिश्यते ब्रह्म, यद् याज्ञवल्क्यो ब्राह्मणान् पृष्टवांस्तत् स्वेन रूपेण श्रुतिरस्मभ्यमाह—विज्ञानं विज्ञप्तिविज्ञानम्, तच्च आनन्दम्, न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम्, किं तर्हि ? प्रसन्नं शिवमतुलमानायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थः, किं तद् ब्रह्म उभयविशेषणवद् रातिः—रातेः षष्ठ्यर्थे प्रथमा, धनस्येत्यर्थः, धनस्य दातुः कर्मकृतो यजमानस्य परायणं परा गतिः कर्मफलस्य प्रदातृ । | जो जगत्का मूल है, जिस शब्दसे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश किया जाता है और जिसके विषयमें याज्ञवल्क्यने ब्राह्मणोंसे पूछा था, उसे श्रुति हमारे लिये स्वयं ही बतलाती है—विज्ञान—विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, वही आनन्द भी है, विषयविज्ञानके समान वह दुःखसे अनुविद्ध नहीं है, तो फिर कैसा है ? प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास नित्यतृप्त और एकरस है—ऐसा इसका तात्पर्य है । जो [विज्ञान और आनन्द इन] दोनों विशेषणोंसे युक्त है वह ब्रह्म क्या है ? रातिः—रातेः (रातिका) अर्थात् धनका इस प्रकार 'रातिः' शब्दमें षष्ठीके अर्थमें प्रथमा विभक्ति है, तात्पर्य यह कि धन देनेवाले अर्थात् कर्म करनेवाले यजमानका परायण—परा गति अर्थात् कर्मफल प्रदान करनेवाला है । |
| किञ्च व्युत्थायैषणाभ्यस्तस्मिन्नेव ब्रह्मणि तिष्ठत्यकर्मकृत्, तद् ब्रह्म वेत्तीति तद्विच्च; तस्य—तिष्ठमानस्य च तद्विदः; ब्रह्मविद इत्यर्थः, परायणमिति । | इसी प्रकार जो एषणाओंसे अलग होकर उस ब्रह्ममें ही परिनिष्ठित है, कर्मकर्ता नहीं है, और उस ब्रह्मको जानता है, इसलिये तद्वित् (ब्रह्मविद्) है, उस ब्रह्मनिष्ठ और तद्विद् यानी ब्रह्मवेत्ताका भी परायण है । |
८३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| अत्रे॒दं विचार्यते—आनन्दशब्दो लोके सुखवाची प्रसिद्धः; अत्र च ब्रह्मणो विशेषणत्वेन आनन्दशब्दः श्रूयते—आनन्दं ब्रह्मेति। श्रुत्यन्तरे च—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० ३।६।१) “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० ३।२।४।१) “यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” (तै० उ० २।८।१।) “यो वै भूमा तत् सुखम्” (छा० उ० ७।२३।१) इति च; “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्येवमाद्याः। संवेद्ये च सुखे आनन्दशब्दः प्रसिद्धः; ब्रह्मानन्दश्च यदि संवेद्यः स्याद् युक्ता एते ब्रह्मण्यानन्दशब्दाः।<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मानन्दस्य वेद्यत्वावेद्यत्वं मीमांस्यते)<br><br>ननु च श्रुतिप्रामाण्यात् संवेद्यानन्दस्वरूपमेव ब्रह्म, किं तत्र विचार्यम् ?<br><br>इति न, विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात्—सत्यम्, आनन्दशब्दो ब्रह्मणि श्रूयते; | यहाँ यह विचार किया जाता है—लोकमें 'आनन्द' शब्द सुखवाची प्रसिद्ध है; और यहाँ 'आनन्दं ब्रह्म' इस प्रकार 'आनन्द' शब्द ब्रह्मके विशेषणरूपमें श्रुत है; अन्य श्रुतियोंमें भी यह ब्रह्मके विशेषणरूपसे श्रुत हुआ है; जैसे—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्"¹ "आनन्दं² ब्रह्मणो विद्वान्" "यदेष³ आकाश आनन्दो न स्यात्" "यो⁴ वै भूमा तत् सुखम्" इत्यादि तथा ऐसी ही "एष⁵ परम आनन्दः" इत्यादि श्रुतियाँ हैं। किंतु 'आनन्द' शब्द संवेद्य (ज्ञेय) सुखके अर्थमें ही प्रसिद्ध है; अतः यदि ब्रह्मानन्द भी संवेद्य (ज्ञेय) हो तभी ब्रह्ममें ये 'आनन्द' शब्द सार्थक हो सकते हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु श्रुतिके प्रमाणसे ब्रह्म संवेद्य आनन्दस्वरूप तो है ही, फिर इसमें विचार क्या करना है ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं—यह तो ठीक है कि ब्रह्ममें 'आनन्द' शब्द श्रुत होता है; |
१. आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना।
२. ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला।
३. यदि यह आकाश आनन्द न होता।
४. जो भी भूमा है, वही सुख है।
५. यह परम आनन्द है।
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३
| विज्ञानप्रतिषेधश्चैकत्वे—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१५) "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" (छा० उ० ७।२४।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद" (बृ० उ० ४।३।२१) इत्यादि; विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात् तेन कर्तव्यो विचारः; तस्माद् युक्तं वेदवाक्यार्थनिर्णयाय विचारयितुम् । | किंतु साथ ही एक होनेके कारण उसके विज्ञानका प्रतिषेध भी श्रुत होता है। जैसे—"जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, उस अवस्थामें किसके द्वारा किसको देखे और किसके द्वारा किसको जाने?" "जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता और अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा है" "प्रज्ञानात्मासे आलिङ्गित (अभिन्न) होकर यह बाह्य कुछ भी नहीं जानता" इत्यादि। इस प्रकार उससे विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं, इसलिये विचार करना आवश्यक है; अतः वेदके वचनोंका तात्पर्य निर्णय करनेके लिये विचार करना उचित ही है। | | मोक्षवादिविप्रतिपत्तेश्च—सांख्या वैशेषिकाश्च मोक्षवादिनो नास्ति मोक्षे सुखं संवेद्यमित्येवं विप्रतिपन्नाः; अन्ये निरतिशयं सुखं स्वसंवेद्यमिति; किं तावद् युक्तम् ? | इसके सिवा मोक्षवादियोंमें मतभेद होनेके कारण भी विचार करना आवश्यक है—सांख्य और वैशेषिक मोक्षवादियोंका ऐसा विपरीत विचार है कि मोक्षमें संवेद्य सुख है ही नहीं, किंतु दूसरे मोक्षवादियोंका मत है कि मोक्षमें निरतिशय स्वसंवेद्य सुख है; सो इनमें कौन-सी बात ठीक है? | | आनन्दादिश्रवणात् "जक्षत् क्रीडन् रममाणः" (छा० उ० ८।१२।३) "स यदि पितृलोककामो भवति" (छा० उ० ८।२।१) | पूर्व०—आनन्दादिका श्रवण होनेसे तथा "भक्षण करता हुआ, क्रीडा करता हुआ, रमण करता हुआ" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला |
बृ० उ० ५३—
८३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ८३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| "यः सर्वज्ञः सर्ववित्" (मुण्डक० १ । १ । ९) "सर्वान् कामान् समश्नुते" (तै० उ० २ । ५ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यो मोक्षे सुखं संवेद्यमिति । | होता है" "जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है" "समस्त कामोंको प्राप्त करता है" इत्यादि श्रुतियोंसे तो मोक्षमें संवेद्य सुख जान पड़ता है। |
| नन्वेकत्वे कारकविभागाभावाद् विज्ञानानुपपत्तिः, क्रियायाश्चानेककारकसाध्यत्वाद् विज्ञानस्य च क्रियात्वात् । | सिद्धान्ती—किंतु उस समय एकत्व होनेके कारण कारकविभागका अभाव होनेसे विज्ञान होना सम्भव नहीं है, क्योंकि क्रिया अनेक कारकद्वारा साध्य होती है और विज्ञान भी एक क्रिया ही है। |
| नैष दोषः; शब्दप्रामाण्याद् भवेद् विज्ञानमानन्दविषये; "विज्ञानमानन्दम्" इत्यादीनि आनन्दस्वरूपस्यासंवेद्यत्वेऽनुपपन्नानि वचनानीत्यवोचाम । | पूर्व०—यह दोष नहीं हो सकता; शब्दप्रामाण्य होनेके कारण उस समय आनन्दविषयक विज्ञान रहना ही चाहिये; यदि आनन्दस्वरूप असंवेद्य होगा तो "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादि वाक्य अनुपपन्न हो जायँगे—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। |
| ननु वचनेनाप्यग्नेः शैत्यमुदकस्य चौष्ण्यं न क्रियते एव, ज्ञापकत्वाद् वचनानाम्। न च देशान्तरेऽग्निः शीत इति शक्यते ज्ञापयितुम्; अगम्ये वा देशान्तरे उष्णमुदकमिति । | सिद्धान्ती—किंतु वचनके द्वारा भी अग्निकी शीतलता और जलकी उष्णता नहीं की जा सकती, क्योंकि वचन तो ज्ञापक ही हैं और यह बात बतलायी नहीं जा सकती कि किसी देशान्तरमें अग्नि शीतल है और किसी अगम्य देशान्तरमें जल उष्ण है। |
| न, प्रत्यगात्मन्यानन्दविज्ञानदर्शनात्; न 'विज्ञानमानन्दम्' इत्येवमादीनां वचनानां शीतो- | पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मामें तो आनन्दका विज्ञान देखा जाता है। 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि वाक्य 'अग्नि शीत है'- |