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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| दातृत्वं च, सेव्यात् फलप्राप्ति-दर्शनात् । अनुमानं च दर्शितम्—'द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः' इत्यादि ।<br><br>तथा च यजमानं देवा ईश्वराः सन्तो जीवनार्थेऽनुगताः, चरु-पुरोडाशाद्युपजीवनप्रयोजनेन, अन्यथापि जीवितुमुत्सहन्तः कृपणां दीनां वृत्तिमाश्रित्य स्थिताः, तच्च प्रशास्तुः प्रशासनात् स्यात् । तथा पितरोऽपि तदर्थं दर्वी दर्वीहोममन्वायत्ता अनुगता इत्यर्थः; समानं सर्वमन्यत् ॥ ९ ॥ | दातृत्वकी नहीं; क्योंकि सेव्यसे फलप्राप्ति होती देखी ही गयी है। इस विषयमें 'द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए स्थित हैं'—इत्यादि-रूपसे अनुमान भी दिखाया गया है।<br><br>इसी प्रकार देवगण समर्थ होने पर भी जो जीवनके लिये—चरुपुरो-डाशादिके आश्रय जीवनयापनके प्रयोजनसे यजमानके अनुगत रहते हैं, अर्थात् अन्य प्रकारसे जीवित रहनेमें समर्थ होनेपर भी वे जो इस कृपण-दीन वृत्तिको आश्रित करके स्थित रहते हैं, यह भी उस प्रशा-स्ताके प्रशासनसे ही होना सम्भव है। इसी प्रकार पितृगण भी जीविकाके लिये दर्वीके अर्थात् पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले दर्वीहोमके अन्वायत्त-अनुगत हैं। शेष सब इसीके समान समझना चाहिये ॥ ६ ॥ |

अक्षरके ज्ञान और अज्ञानके परिणाम

| इतश्चास्ति तदक्षरं यस्मात्तदज्ञाने नियता संसारोपपत्तिः । भवितव्यं तु तेन, यद्विज्ञानात् तद्विच्छेदः, न्यायोपपत्तेः । ननु क्रियात एव | इस अक्षरकी सत्ता इसलिये भी है; क्योंकि इसके अज्ञानसे ही नियमतः संसारकी उपपत्ति हो सकती है। जिसके विज्ञानसे उस (संसार) का विच्छेद हो सकता है, वह वस्तु होनी ही चाहिये क्योंकि यही न्यायोचित है। यदि |

ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७

ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७

तद्विच्छित्तिः स्यादिति चेत् ?<br><br>न—कहो कि उसका विच्छेद कर्मसे ही हो जायगा तो ऐसा कहना उचित नहीं [क्योंकि—]

यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥

हे गार्गि ! जो कोई इस लोकमें इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवान् ही होता है। जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण (दीन) है और हे गार्गि ! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥ १० ॥

यो वा एतदक्षरं हे गार्गि अविदित्वाविज्ञाय अस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते यद्यपि बहूनि वर्षसहस्राणि, अन्तवद् एवास्य तत् फलं भवति, तत्फलोपभोगान्ते क्षीयन्त एवास्य कर्माणि। अपि च यद्विज्ञानात् कार्पण्यात्ययः संसारविच्छेदः, यद्विज्ञानाभावाच्च कर्मकृत् कृपणः कृतफलस्यैवोपभोक्ता जननमरणप्रबन्धारूढः संसरति, तदस्यत्यक्षरंहे गार्गि ! इस लोकमें जो कोई इस अक्षरको न जानकर अर्थात् बिना जाने हवन, यज्ञ और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप भी करता है तो उसका वह फल अन्तवान् ही होता है; उस फल-भोगके पश्चात् इसके कर्म क्षीण हो ही जाते हैं। इसके सिवा जिसके विज्ञानसे कृपणताका अतिक्रमण और संसारका विच्छेद होता है तथा जिसका विज्ञान न होनेसे कर्मकर्त्ता कृपण, किये हुए कर्मके फलका ही उपभोग करनेवाला और जन्म-मरणकी परम्परापर आरूढ होकर संसारबन्धनको प्राप्त होता है, वह अक्षर ही

७७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| प्रशासितृ; तदेतदुच्यते—यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः, पणक्रीत इव दासादिः। अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥ | प्रशास्ता है। इसीसे यह कहा जाता है-हे गार्गि! जो भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह पैसोंसे खरीदे हुए गुलाम आदिकी तरह कृपण (दीन) है। और हे गार्गि! जो कोई इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥१०॥ |

अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व

अग्नेर्दहनप्रकाशकत्ववत् स्वाभाविकमस्य प्रशास्तृत्वमचेतनस्यैवेत्यत आह—[ प्रधानवादीका कथन है कि ] अग्निके दहन और प्रकाशकत्वके समान यह अचेतन ही स्वाभाविक शासन करनेवाला है, इसीसे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—

तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतँ श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११॥

हे गार्गि ! यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं, किंतु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किंतु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किंतु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है। इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है ॥ ११ ॥

तद् वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं<br><br>न केनचिद् दृष्टम्, अविषयत्वात्हे गार्गि ! वह यह अक्षर अदृष्ट है, दृष्टिका विषय न होनेके कारण वह किसीके द्वारा देखा नहीं गया है, किंतु

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७९

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७९


संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
स्वयं तु द्रष्टृ दृष्टिस্বরূপत्वात् । तथा श्रुतं श्रोत्राविषयत्वात्, स्वयं श्रोतॄ श्रुतिस्वरूपत्वात् । तथामतं मनसोऽविषयत्वात्, स्वयं मन्तृ मतिस्वरूपत्वात् । तथाविज्ञातं बुद्धेरविषयत्वात्, स्वयं विज्ञातृ विज्ञानस्वरूपत्वात् ।स्वयं दृष्टिस্বরূপ होनेके कारण द्रष्टा है। इसी प्रकार यह श्रोत्रका अविषय होनेके कारण सुना नहीं गया है, किंतु स्वयं श्रुतिस्वरूप होनेसे श्रोता है। तथा मनका अविषय होनेके कारण यह मननका विषय नहीं होता, किंतु स्वयं मतिस्वरूप होनेसे मन्ता है। इसी तरह बुद्धिका अविषय होनेके कारण विज्ञात नहीं है; किंतु स्वयं विज्ञानस्वरूप होनेसे विज्ञाता है।
किञ्च 'नान्यदतोऽस्मादक्षरादस्ति—नास्ति किञ्चिद् द्रष्टृ दर्शनक्रियाकर्तृ; एतदेवाक्षरं दर्शनक्रियाकर्तृ सर्वत्र । तथा नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ; तदेवाक्षरं श्रोतृ सर्वत्र । नान्यदतोऽस्ति मन्तृ; तदेवाक्षरं मन्तृ सर्वत्र सर्वमनोद्वारेण । नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ विज्ञानक्रियाकर्तृ, तदेवाक्षरं सर्वबुद्धिद्वारेण विज्ञानक्रियाकर्तृ, नाचेतनं प्रधानमन्यद् वा ।यही नहीं, इस अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा—दर्शन-क्रियाका कर्ता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन-क्रियाका कर्ता है; इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है। इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है; सम्पूर्ण मनोंके द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करनेवाला है और न इससे भिन्न कोई विज्ञाता—विज्ञान—क्रियाका कर्ता है, समस्त बुद्धियोंके द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रियाका कर्ता है—अचेतन प्रधान अथवा कोई अन्य नहीं।
एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरोऽशनायादि संसारधर्मातीतः, यस्मिन्नाकाश ओतश्च प्रोत-हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है। जो ही साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओतप्रोत

७८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| श्च, एषा परा काष्ठा, एषा परा गतिः, एतत् परं ब्रह्म, एतत् पृथिव्यादेराकाशान्तस्य सत्यस्य सत्यम् ॥ ११ ॥ | है, वह ( यह अक्षर ) ही पराकाष्ठा है, यह परा गति है, यह परब्रह्म है और यही पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त समस्त सत्यका सत्य है ॥ ११ ॥ |


गार्गीका निर्णय

सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्माननमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचकनव्युपरराम ॥ १२ ॥

उस गार्गीने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपलोग इसीको बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही छुटकारा मिल जाय। आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक वादमें जीतनेवाला नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी ॥ १२ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सा होवाच— हे ब्राह्मणा भगवन्तः शृणुत मदीयं वचः; तदेव बहु मन्येध्वम्; किं तत् ? यदस्माद् याज्ञवल्क्यान्नमस्कारेण मुच्येध्वम्— अस्मै नमस्कारं कृत्वा तदेव बहु मन्यध्वमित्यर्थः; जयस्त्वस्य मनसापि आशंसनीयः, किमुत कार्यतः; कस्मात् ? न वै युष्माकं मध्ये जातु कदाचिदपीमं याज्ञवल्क्यं ब्रह्मोद्यं प्रति जेता ।वह बोली, 'हे भगवन् (पूजनीय) ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो; तुमलोग इसीको बहुत समझो; सो किसको ? यही कि तुम इन याज्ञवल्क्यजीसे नमस्कारके द्वारा ही मुक्त हो जाओ अर्थात् यदि इन्हें नमस्कार करके ही छुटकारा पा जाओ तो इसीको बहुत मानो; इनको जीतनेकी तो मनसे भी आशा नहीं करनी चाहिये, कार्यद्वारा जीतनेकी तो बात ही क्या है? क्यों ? क्योंकि आपमेंसे कोई भी कभी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें जीतनेवाला नहीं है।

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
प्रश्नौ चेन्मह्यं वक्ष्यति, न जेता भवितेति पूर्वमेव मया प्रतिज्ञातम्; अद्यापि ममायमेव निश्चयः—ब्रह्मोद्यं प्रत्येतेत्तुल्यो न कश्चिद् विद्यत इति। ततो ह वाचक्नव्युपरराम।मैं पहले ही प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि यदि ये मेरे दो प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी विजयी नहीं होगा। आज भी मेरा यही निश्चय है कि ब्रह्मसम्बन्धी वादमें इनके समान कोई नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी।
अत्र अन्तर्यामिब्राह्मणे एतद् प्रकरणार्थ-परामर्श उक्तम्—यं पृथिवी न वेद, यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति च। यमन्तर्यामिणं न विदुर्यं च न विदुर्यच्च तदक्षरं दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वेन सर्वेषां चेतनाधातुरित्युक्तम्—कस्त्वेषां विशेषः, किं वा सामान्यमिति।यहाँ अन्तर्यामिब्राह्मणमें यह कहा गया था कि जिसे पृथिवी नहीं जानती तथा जिसे सम्पूर्ण भूत नहीं जानते इत्यादि। इस प्रकार जिस अन्तर्यामीको नहीं जानते, जो नहीं जानते और जो वह अक्षर है, जिसे समस्त विषयोंकी दर्शनादिक्रियाओंके कर्तारूपसे सबकी चेतनाका धातु कहा गया है-इन सबमें क्या अन्तर है और क्या समानता है?
तत्र केचिदाचक्षते—परस्य महासमुद्रस्थानीयस्य ब्रह्मणोऽक्षरस्य अप्रचलितस्वरूपस्येषत्प्रचलितावस्थान्तर्यामी; अत्यन्तप्रचलितावस्था क्षेत्रज्ञः, यस्तं न वेदान्तर्यामिणम्; तथान्याः पञ्चावस्थाः परिकल्पयन्ति; तथा अष्टावस्था ब्रह्मणो भवन्तीति वदन्ति।यहाँ कोई-कोई कहते हैं-महासमुद्रस्थानीय अविचलरूप अक्षर परब्रह्मकी किञ्चिद् विचलित अवस्थाका नाम अन्तर्यामी है और उसकी अत्यन्त विचलित अवस्था क्षेत्रज्ञ है, जो कि उस अन्तर्यामीको नहीं जानता; इनके सिवा वे उसकी [ पिण्ड, जाति, विराट्, सूत्र और दैव-इन ] अन्य पाँच अवस्थाओंकी भी कल्पना करते हैं; इस प्रकार वे कहते हैं कि ब्रह्मकी कुल आठ अवस्थाएँ हैं।

| ७८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |

७८२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
अन्येऽक्षरस्य शक्तय एता इति वदन्ति, अनन्तशक्तिमदक्षरमिति च । अन्ये त्वक्षरस्य विकारा इति वदन्ति । अवस्थाशक्ती तावन्नोपपद्येते अक्षरस्य, अशनायादिसंसारधर्मातीतत्वश्रुतेः । न ह्यशनायाद्यतीतत्वमशनायादिधर्मवदवस्थावत्त्वं चैकस्य युगपदुपपद्यते; तथा शक्तिमत्त्वं च । विकारावयवत्वे च दोषाः प्रदर्शिताश्चतुर्थे । तस्मादेता असत्याः सर्वाः कल्पनाः ।<br><br>कस्तर्हि भेद एषाम् ? उपाधिकृत इति ब्रूमः; न स्वत एषां भेदोऽभेदो वा, सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनैकरसस्वाभाव्यात्, “अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २।५।१९) “अयमात्मा ब्रह्म” (२।५।१९) इति च श्रुतेः । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इतिइनसे भिन्न दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि ये अक्षरकी शक्तियां हैं; और उनका यह भी कथन है कि वह अक्षर अनन्त शक्तिमान् है। इनके सिवा दूसरे लोग यह कहते हैं कि ये अक्षरके विकार हैं। किंतु इनका अक्षरकी अवस्था या शक्ति होना तो सम्भव नहीं है, क्योंकि वह क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत है—ऐसी श्रुति है। एक ही वस्तुका एक साथ क्षुधादि धर्मोंसे अतीत होना और क्षुधादि धर्मवाली अवस्थाओंसे युक्त होना सम्भव नहीं है; इसी प्रकार उसका शक्तिमान् होना भी असम्भव है। उसके विकार या अवयव माननेमें जो दोष हैं, वे चतुर्थ ब्राह्मणमें दिखाये जा चुके हैं। इसलिये ये सारी कल्पनाएँ असत्य हैं।<br><br>तो फिर इनका भेद क्या है ? हमारा कथन है कि इनका भेद उपाधिकृत है। स्वयं तो इनका भेद या अभेद कुछ भी नहीं है, क्योंकि ये सैन्धवघनके समान एकमात्र प्रज्ञानघनरसस्वरूप हैं। जैसा कि “वह कारणसे भिन्न, कार्यसे भिन्न अन्तररहित और अबाह्य है” “यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “वह बाहर-भीतरके सहित सर्वत्र विद्यमान एवं अजन्मा है” ऐसा आथर्वण

ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८३

ब्राह्मण ८ ]शाङ्करभाष्यार्थ७८३
संस्कृत-मूल (भाष्य)हिन्दी-भाष्यार्थ
चाथर्वणे । तस्मान्निरुपाधिकस्यात्मनो निरूपाख्यत्वान्निर्विशेषत्वादेकत्वाच्च “नेति नेति” ( बृ० उ० ३ । ९ । २६) इति व्यपदेशो भवति ।श्रुतिमें कहा है। अतः उपाधिशून्य आत्मा अनिर्वचनीय, निर्विशेष और एक होनेके कारण उसका “नेति नेति” इस प्रकार उपदेश किया जाता है ।
अविद्याकामकर्मविशिष्टकार्यकरणोपाधिरात्मा संसारी जीव उच्यते । नित्यनिरतिशयज्ञानशक्त्युपाधिरात्मान्तर्यामीश्वर उच्यते, स एव निरुपाधिः केवलः शुद्धः स्वेन स्वभावेनाक्षरं पर उच्यते, तथा हिरण्यगर्भाव्याकृतदेवताजातिपिण्डमनुष्यतिर्यक्प्रेतादिकार्यकरणोपाधिभिर्विशिष्टस्तदाख्यस्तद्रूपो भवति । तथा “तदेजति तन्नैजति” (ईशा० उ० ५) इति व्याख्यातम् । तथा “एष त आत्मा” (बृ० उ० ३ । ७ । ३–२३) “एष सर्वभूतान्तरात्मा” (मु० उ० २ । १ । ४) “एष सर्वेषु भूतेषु गूढः” (क० उ० १ । ३ । १२) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६।८।१६) “अहमेवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । १) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३ । ७ । २३) इत्यादिश्रुतयो न विरुध्यन्ते। कल्पनान्तरेष्वेताः श्रुतयो नअविद्या, काम और कर्मविशिष्ट देह एवं इन्द्रियरूप उपाधिवाला आत्मा संसारी जीव कहा जाता है । तथा नित्य निरतिशय ज्ञानशक्तिरूप उपाधिवाला आत्मा अन्तर्यामी ईश्वर कहा जाता है । वही उपाधिशून्य, केवल और शुद्ध होनेपर अपने स्वरूपसे अक्षर या पर कहा जाता है, तथा हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, देवता, जाति, पिण्ड, मनुष्य, तिर्यक्, प्रेत एवं शरीर और इन्द्रियरूप उपाधियोंसे विशिष्ट होकर वह उन्हीं नाम और रूपोंवाला होता है । ऐसा ही “वह चलता है, वह नहीं चलता” इत्यादि श्रुतिमें व्याख्या किया गया है और इस प्रकार “यह तेरा आत्मा”, “यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है”, “यह समस्त भूतोंमें छिपा हुआ है”, “वह तू है”, “मैं ही यह सब हूँ”, “यह सब आत्मा ही है”, “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध नहीं रहता । दूसरे प्रकारकी कल्पनाओंमें इन श्रुतियोंकी संगति नहीं लगती ।

७८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| गच्छन्ति । तस्मादुपाधिभेदेनैव एषां भेदो नान्यथा । 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यवधारणात् सर्वोपनिषत्सु ॥ १२ ॥ | अतः उपाधिके भेदसे ही इनमें भेद है, और किसी प्रकार नहीं; क्योंकि समस्त उपनिषदोंमें यही निश्चय किया गया है कि 'ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय ही है' ॥ १२ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्यायेऽष्टममक्षरब्राह्मणम् ॥ ८ ॥

नवम ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-शाकल्य-संवाद

| अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ । पृथिव्यादीनां सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण पूर्वस्य पूर्वस्य उत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्नोतप्रोतभावं कथयन् सर्वान्तरं ब्रह्म प्रकाशितवान्, तस्य च ब्रह्मणो व्याकृतविषये सूत्रभेदेषु नियन्तृत्वमुक्तम्—व्याकृतविषये व्यक्ततरं लिङ्गमिति । तस्यैव ब्रह्मणः साक्षादपरोक्षत्वे नियन्तव्यदेवताभेदसंकोचविका- | 'अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ' । पृथिवी आदिके सूक्ष्मतारतम्यक्रमसे पूर्व-पूर्व पदार्थका उत्तरोत्तरवर्ती पदार्थमें ओत-प्रोतभाव बतलाते हुए याज्ञवल्क्यने सर्वान्तर ब्रह्मको प्रकाशित किया है । और उस ब्रह्मका, नाम-रूपात्मक द्वैत-प्रपञ्चमें जो पृथिवी आदि भिन्न-भिन्न सूत्र हैं, उनमें नियन्तृत्व बतलाया गया है । व्याकृत विषयोंमें ब्रह्मके नियन्ता होनेमें अत्यन्त स्पष्ट लिङ्ग है¹ । उसी ब्रह्मका नियन्तव्य देवताभेदके [ प्राणपर्यन्त ] संकोच और [ आनन्त्यपर्यन्त ] विकासद्वारा साक्षात् एवं अपरोक्ष |


१. 'यः पृथिवीमन्तरो यमयति' इत्यादि मन्त्रोंमें जो परतन्त्र पृथिवी आदिका ग्रहण किया है, इससे इनका नियम्य होना और ब्रह्मका नियामक होना सूचित होता है ।

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७८५

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७८५


सद्द्वारेणाधिगन्तव्ये इति तदर्थं<br>शाकल्यब्राह्मणमारभ्यते—ज्ञान प्राप्त करना है, इसीलिये<br>शाकल्यब्राह्मण आरम्भ किया<br>जाता है—

देवताओंकी संख्या

अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिꣳशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥

इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! कितने देवगण हैं ?' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे कही जानेवाली निविद्से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन किया । 'जितने वैश्वदेवकी निविद्में अर्थात् देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंमें बतलाये गये हैं । वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र (तीन हजार तीन सौ छः) हैं ।' [तब शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा । फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'तैंतीस' । [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'तो, याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'छः ।' [शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा और फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'तीन !' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पुनः पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?'[याज्ञवल्क्य—] 'दो ।' [शाकल्य-

बृ० उ० ५०—

७८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

ने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'डेढ़।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा, और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'एक।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १ ॥

| अथ हैनँ विदग्ध इति नामतः शकलस्यापत्यं शाकल्यः पप्रच्छ—कतिसंख्याका देवा हे याज्ञवल्क्येति। स याज्ञवल्क्यः, ह किल, एतयैव वक्ष्यमाणया निविदा प्रतिपेदे संख्याम्, यां संख्यां पृष्टवाञ्शाकल्यः। यावन्तो यावत्संख्याका देवा वैश्वदेवस्य शस्त्रस्य निविदि—निविन्नाम देवतासंख्यावाचकानि मन्त्रपदानि, कानिचिद् वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यन्ते तानि निवित्संज्ञकानि; तस्यां निविदि यावन्तो देवाः श्रूयन्ते तावन्तो देवा इति। <br><br> का पुनः सा निविदिति तानि निवित्पदानि प्रदर्श्यन्ते—त्रयश्च त्री च शता—त्रयश्च देवाः, | फिर इस याज्ञवल्क्यसे विदग्ध इस नामवाले शाकल्य—शकलके पुत्रने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! देवगण कितनी संख्यावाले हैं?' उस याज्ञवल्क्यने, जो संख्या शाकल्यने पूछी थी उस संख्याका इस आगे बतलायी जानेवाली निविद्से निरूपण किया। जितने—जितनी संख्यावाले देवता विश्वेदेवसम्बन्धी शस्त्रकी निविद् (मन्त्र-पद) में बताये गये हैं (उतने सब देव हैं), निविद् कहते हैं देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंको, विश्वेदेव-सम्बन्धी शस्त्रमें देवसंख्याप्रतिपादक कुछ मन्त्रपदोंका उपदेश किया गया है, वे सब 'निविद्' कहलाते हैं। अतः तात्पर्य यह है कि उस निविद्में जितने देवगण श्रुतिद्वारा बताये जाते हैं, उतने ही कुल देवता हैं। <br><br> किंतु वह निविद् क्या है? वे निविद्के पद दिखलाये जाते हैं—'त्रयश्च त्री च शता' अर्थात् देवगण |

ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७

ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ७८७

| देवा॒नां त्री च॒ त्रीणि॑ च श॒तानि॑; पुन॒रप्ये॒वं त्रय॑श्च, त्री च सह॒स्रा सह॒स्राणि॑—एतावन्तो देवा इति शाकल्योऽप्योमिति होवाच।<br><br>एवमेषां मध्यमा संख्या सम्यक्तया ज्ञाता, पुनस्तेषामेव देवानां संकोचविषयां संख्यां पृच्छति—कतमेव देवा याज्ञवल्क्येति; त्रयस्त्रिंशत्; षट्, त्रयः, द्वौ, अध्यर्धः, एक इति। देवतासंकोचविकासविषयां संख्यां पृष्ट्वा पुनः संख्येयस्वरूपं पृच्छति—कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ | तीन हैं और तीन सौ हैं। तथा इसी प्रकार वे तीन और तीन सहस्र हैं। यानी सम्पूर्ण देव इतने हैं। इसपर शाकल्यने भी 'ठीक है' ऐसा कहा।<br><br>इस प्रकार इनकी मध्यमा संख्याका ठीक-ठीक पता लग गया। फिर शाकल्य उन्हीं देवताओंकी संकोचविषयिणी संख्या पूछता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! देव कितने हैं?' तब याज्ञवल्क्य क्रमशः 'तैंतीस, छः, तीन, दो, डेढ़ और एक' ऐसा बतलाते हैं। इस प्रकार देवताओंके संकोच और विकासविषयक संख्या पूछकर फिर संख्येयके स्वरूपके विषयमें पूछता है, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १॥ |


तैंतीस देवताओंका विवरण

स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिँशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिँशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिँशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिँशाविति ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'ये तो इनकी महिमाएँ ही हैं। देवगण तो तैंतीस ही हैं।' [ शाकल्य—] 'वे तैंतीस देव कौन-से हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य—ये इकतीस देवगण हैं तथा इन्द्र और प्रजापतिके सहित तैंतीस हैं' ॥ २ ॥

७८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

स होवाचेतरः—महिमानो विभूतयः, एषां त्रयस्त्रिंशतः देवानाम् एते त्रयश्च त्री च शतेत्यादयः; परमार्थतस्तु त्रयस्त्रिंशच्चैव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्युच्यते—अष्टौ वसवः एकादश रुद्राः, द्वादश आदित्यास्ते एकत्रिंशत्, इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति त्रयस्त्रिंशतः पूरणौ ॥ २ ॥इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—ये तीन और तीन सौ आदि देवगण इन तैंतीस देवताओंकी महिमा—विभूति ही हैं। वस्तुतः तो तैंतीस ही देवगण हैं, वे तैंतीस देवगण कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है-आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य-ये इकतीस हुए तथा इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीसकी पूर्ति करनेवाले हैं॥२॥

वसु कौन हैं ?

कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदँ सर्वँ हितमिति तस्माद्वसव इति ॥ ३ ॥

[ शाकल्य-] 'वसु कौन हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये वसु हैं; इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे ये वसु हैं' ॥ ३ ॥

कतमे वसव इति तेषां स्वरूपं प्रत्येकं पृच्छ्यते; अग्निश्च पृथिवी चेति—अग्न्याद्या नक्षत्रान्ता एते वसवः—प्राणिनां कर्मफलाश्रयत्वेन कार्यकारणसंघातरूपेण तन्निवासत्वेन च विपरिणमन्तो जगदिदं सर्वं वासयन्ति वसन्ति'वसु कौन है ?' इस प्रकार उनमेंसे प्रत्येकका स्वरूप पूछा जाता है । अग्निश्च पृथिवी च'—इस प्रकार अग्निसे लेकर नक्षत्रपर्यन्त ये सब वसु हैं । प्राणियोंके कर्मफलके आश्रय होकर उनके निवासस्थान देहेन्द्रियसंघातरूपसे विपरिणामको प्राप्त होकर इस सम्पूर्ण जगत्को बसाये हुए हैं और स्वयं भी बसते हैं; [ यह

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७८९

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७८९

च; ते यस्माद् वासयन्ति तस्माद् वसव इति ॥ ३ ॥उनका वसुत्व है]। वे चूँकि [दूसरोंको अपनेमें] बसाये हुए हैं, इसलिये वसु हैं ॥ ३ ॥

रुद्र कौन हैं ?

कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥ ४ ॥

[ शाकल्य—] ‘रुद्र कौन हैं?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘पुरुषमें ये दश प्राण (इन्द्रियाँ) और ग्यारहवां आत्मा (मन)। ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय रुलाते हैं; अतः उत्क्रमणकालमें चूँकि अपने सम्बन्धियोंको रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे] ‘रुद्र’ कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥

कतमे रुद्रा इति। दशेमे पुरुषे कर्मबुद्धीन्द्रियाणि प्राणाः, आत्मा मन एकादशः—एकादशानां पूरणः; ते एते प्राणा यदा अस्माच्छरीरान्मर्त्यात् प्राणिनां कर्मफलोपभोगक्षये उत्क्रामन्ति—अथ तदा रोदयन्ति तत्सम्बन्धिनः। तत्तत्र यस्माद्रोदयन्ति ते सम्बन्धिनः, तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥‘रुद्र कौन हैं ? [याज्ञवल्क्य—] ‘इस पुरुषमें कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय—ये दश प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा—मन, जो ग्यारहकी पूर्ति करनेवाला है। वे ये प्राण जिस समय प्राणियोंके कर्मफलोपभोगका क्षय हो जानेपर इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस समय ये उसके सम्बन्धियोंको रुलाते हैं। उस समय चूँकि ये सम्बन्धियोंको रुलाते हैं, इसलिये रोदनमें निमित्त होनेसे रुद्र कहलाते हैं’ ॥ ४ ॥

७९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

७९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


आदित्य कौन हैं ?

कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदँ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदँ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥५॥

[ शाकल्य—] ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य— ] ‘संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि ये इस सबका आदान ( ग्रहण ) करते हुए चलते हैं, इसलिये आदित्य हैं’ ॥ ५ ॥

| कतम आदित्या इति । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य कालस्यावयवाः प्रसिद्धाः, एते आदित्याः; कथम् ? एते हि यस्मात् पुनः पुनः परिवर्तमानाः प्राणिनामायूंषि कर्मफलं च आददाना गृह्णन्त उपाददतो यन्ति गच्छन्ति—ते यद् यस्मादेवमिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥ | ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘बारह महीने संवत्सररूप कालके अवयव प्रसिद्ध हैं—वे ही आदित्य हैं। सो किस प्रकार ? क्योंकि ये ही पुनः-पुनः परिवर्तित होते हुए प्राणियोंकी आयु और कर्मफलका आदान—ग्रहण यानी उपादान करते हुए चलते हैं। वे चूँकि इस प्रकार इस सबका आदान करते हुए चलते हैं, इसलिये ‘आददाना यन्ति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार आदित्य कहलाते हैं’ ॥ ५ ॥ |


इन्द्र और प्रजापति कौन हैं ?

कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥

[ शाकल्य—] ‘इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है ?’ [ याज्ञवल्क्य—] स्तनयित्नु ( विद्युत् ) ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।’ [ शाकल्य—]

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१


'स्तनयित्नु कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अशनि।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'पशुगण' ॥ ६ ॥

| कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति, स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति, कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति। अशनिर्वज्रं वीर्यं बलम्, यत् प्राणिनः प्रमापयति, स इन्द्रः; इन्द्रस्य हि तत् कर्म। कतमो यज्ञ इति पशव इति—यज्ञस्य हि साधनानि पशवः; यज्ञस्यारूपत्वात् पशुसाधनाश्रयत्वाच्च पशवो यज्ञ इत्युच्यते ॥ ६ ॥ | "इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है।' 'स्तनयित्नु ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।' स्तनयित्नु कौन है?' 'अशनि।' अशनि वज्र-वीर्य अर्थात् बल, जो प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह अशनि इन्द्र है; इन्द्रका ही वह कर्म है। 'यज्ञ कौन है?' 'पशुगण,' क्योंकि पशु यज्ञके साधन हैं; यज्ञ रूपरहित है और पशुरूप साधनके अधीन है इसलिये पशु यज्ञ हैं—ऐसा कहा जाता है ॥ ६ ॥ |

छः देवताओंका विवरण

कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीदँ सर्वं षडिति ॥७॥

[ शाकल्य-] 'छः देवगण कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक—ये छः देवगण हैं। ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि आदि छः ही हैं' ॥ ७ ॥

| कतमे षडिति; त एवाग्न्यादयो वसुत्वेन पठिताश्चन्द्रमसं नक्षत्राणि च वर्जयित्वा षड भवन्ति—षट्संख्याविशिष्टाः। एते हि यस्मात्, त्रयस्त्रिंशदादि यदुक्तमिदं सर्वम्, एत एव षड् भवन्ति। | 'छः देवगण कौन हैं?' 'वे वसु रूपसे पढ़े हुए अग्नि आदि ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंको छोड़कर छः अर्थात् षट्संख्याविशिष्ट होते हैं, क्योंकि ये तैंतीस आदि बतलाये हुए समस्त देवगण ये छः ही होते |

७९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
सर्वो हि वस्त्रादिविस्तर एतेष्वेव षट्स्वन्तर्भवतीत्यर्थः ॥ ७ ॥हैं। तात्पर्य यह है कि यह वसु आदि सम्पूर्ण देवताओंका विस्तार इन छःमें ही अन्तर्भूत हो जाता है ॥ ७ ॥

देवताओंकी तीन, दो और डेढ़ संख्याओंका विवरण

कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥८॥

[ शाकल्य—] 'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। इन्हींमें ये सब देव अन्तर्भूत हैं। [ शाकल्य—] 'वे दो देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अन्न और प्राण ।' [ शाकल्य—] 'डेढ़ देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो यह बहता है' ॥ ८ ॥

कतमे ते त्रयो देवा इति; इम एव त्रयो लोका इति— पृथिवीमग्निं चैकीकृत्यैको देवः, अन्तरिक्षं वायुं चैकीकृत्य द्वितीयः, दिवमादित्यं चैकीकृत्य तृतीयः—ते एव त्रयो देवा इति । एषु, हि यस्मात्, त्रिषु देवेषु सर्वे देवा अन्तर्भवन्ति तेन त एव देवास्त्रयः—इत्येष नैरुक्तानां केषाञ्चित् पक्षः । कतमौ तौ द्वौ देवाविति—अन्नं चैव'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। पृथिवी और अग्नि मिलाकर एक देव हैं, अन्तरिक्ष और वायु मिलाकर दूसरे देव हैं तथा द्युलोक और आदित्य मिलाकर तीसरे देव हैं। 'ते एव त्रयो देवाः' इति—क्योंकि इन तीन देवोंमें ही समस्त देवोंका अन्तर्भाव होता है, इसलिये ये ही तीन देव हैं—ऐसा किन्हीं निरुक्तवेत्ताओंका पक्ष है ।¹ 'वे दो देव कौन हैं ?' 'अन्न और प्राण—

१. तात्पर्य यह है कि कुछ ही लोगोंका ऐसा मत है, दूसरे लोग 'त्रयो लोकाः' इस पदसे 'भूः, भुवः, स्वः' इन नामोंसे प्रसिद्ध तीन लोक ही ग्रहण करते हैं।

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९३

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९३


प्राणश्चैतौ द्वौ देवौ, अनयोः सर्वेषामुक्तानामन्तर्भावः। कतमोऽध्यर्ध इति—योऽयं पवते वायुः ॥ ८ ॥ये दो देव हैं, इन्हींमें पूर्वोक्त सभी देवताओंका अन्तर्भाव हो जाता है।' 'डेढ़ देव कौन हैं?' 'जो यह बहता है, वह वायु डेढ़ देव है' ॥८॥

डेढ़ और एक देवका विवरण

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यस्मिन्निदँ सर्वमध्याध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥६॥

यहां ऐसा कहते हैं—'यह जो वायु है, एकही-सा बहता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ किस प्रकार है?' [ उत्तर— ] 'क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध ( डेढ़ ) है।' [ शाकल्य— ] 'एक देव कौन है?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको 'त्यत्' ऐसा कहते हैं' ॥ ६ ॥

तत्तत्राहुश्चोदयन्ति—यदयं वायुरेक इवैव एक एव पवते; अथ कथमध्यर्ध इति ? यदस्मिन्निदं सर्वमध्याध्नोत्—अस्मिन् वायौ सतीदं सर्वमध्याध्नोत्—अधिऋद्धिं प्राप्नोति, तेनाध्यर्ध इति ।<br><br>कतम एको देव इति ? प्राण इति स प्राणो ब्रह्म—सर्वदेवात्मकत्वान्महद् ब्रह्म, तेन स ब्रह्म त्य-इस विषयमें कोई ऐसा प्रश्न करते हैं—'यह जो वायु है 'एक इव'—एक-सा ही चलता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ क्यों है?' [उत्तर—] 'क्योंकि इसीमें यह सब 'अध्याध्नोत् (अधिऋद्धिं प्राप्नोत्)' अर्थात् इस वायुके रहते ही यह सब अधिऋद्धि-को प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध है।'<br><br>'एक देव कौन है?' 'प्राण' वह प्राण ब्रह्म है, सर्वदेवरूप होनेके कारण वह महद् ब्रह्म है; इसलिये

७९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७९४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| दित्याचक्षते—त्यदिति तद् ब्रह्म—चक्षते परोक्षाभिधायकेन शब्देन। <br> देवानाममेतदेकत्वं नानात्वं च। अनन्तानां देवानां निवित्संख्याविशिष्टेष्वन्तर्भावः, तेषामपि त्रयस्त्रिंशदादिषूत्तरोत्तरेषु यावदेकस्मिन् प्राणे। प्राणस्यैव चैकस्य सर्वोऽनन्तसङ्ख्यातो विस्तरः। एवमेकश्चानन्तश्च अवान्तरसंख्याविशिष्टश्च प्राण एव। तत्र च देवस्यैकस्य नामरूपकर्मगुणशक्तिभेदः, अधिकारभेदात् ॥ ९ ॥ | वह ब्रह्म 'त्यत्' है—ऐसा कहते हैं। अर्थात् उस ब्रह्मको 'त्यत्' इस परोक्षवाचक शब्दसे कहते हैं। <br> यही देवताओंका एकत्व और नानात्व है। अनन्त देवोंका निवित्संख्याविशिष्ट देवोंमें अन्तर्भाव है, और उनका भी तैंतीस आदि उत्तरोत्तर देवोंमें यहां तक कि अकेले प्राणमें ही अन्तर्भाव है। एक प्राणका ही यह सब अनन्त-संख्याके रूपमें विस्तार हुआ है। इस प्रकार एक, अनन्त तथा अन्यान्य संख्याओंसे विशिष्ट एक प्राण ही है। वहाँ अधिकारभेदसे एक ही देवके नाम, रूप, कर्म, गुण और शक्तिका भेद है ॥ ६ ॥ |

प्राणब्रह्मके आठ प्रकारके भेद

इदानीं तस्यैव प्राणस्य ब्रह्मणः पुनरष्टधा भेद उपदिश्यते—अब उस प्राणब्रह्मके ही आठ प्रकारके भेद बतलाये जाते हैं—

पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणग्ँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायग्ँ शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥

[ शाकल्य- ] 'पृथिवी ही जिसका आयतन है तथा अग्नि लोक ( दर्शनशक्ति ) और मन ज्योति ( संकल्प-विकल्पका साधन ) है, जो भी

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५


उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्यकारणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। यह जो शारीर पुरुष है, वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'अच्छा, उसका देवता कौन है?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा कहा ॥ १० ॥

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
पृथिव्येव यस्य देवस्यायतनमाश्रयः, अग्निर्लोको यस्य—लोकयत्यनेनेति लोकः, पश्यतीति—अग्निना पश्यतीत्यर्थः। मनोज्योतिः मनसा ज्योतिषा संकल्पविकल्पादिकार्यं करोति यः, सोऽयं मनोज्योतिः । पृथिवीशरीरोऽग्निदर्शनो मनसा संकल्पयिता पृथिव्यभिमानी कार्यकरणसंघातवान् देव इत्यर्थः ।जिस देवका पृथिवी ही आयतन अर्थात् आश्रय है, अग्नि जिसका लोक है—इसके द्वारा अवलोकन करता है, इसलिये यह इसका लोक है, 'लोकयति' का अर्थ है—देखता है अर्थात् वह अग्निसे देखता है। तथा मनोज्योति है—जो मनरूप ज्योतिसे संकल्प-विकल्पादि कार्य करता है, वह यह देव मनोज्योति है। तात्पर्य यह है कि यह पृथिवीका अभिमानी कार्यकारणसंघातवान् देव पृथिवीरूप शरीरवाला, अग्निरूप दर्शनशक्तिवाला और मनसे संकल्प करनेवाला है।
य एवं विशिष्टं वै तं पुरुषं विद्याद् विजानीयात् सर्वस्यात्मन आध्यात्मिकस्य कार्यकारणसंघातस्य आत्मनः परमयनं पर आश्रयस्तं परायणम् । मातृजेन त्वङ्मांसरुधिररूपेण क्षेत्रस्थानीयेन बीजस्थानीयस्य पितृजस्य अस्थि-जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त उस पुरुषको सम्पूर्ण आत्माका—आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातरूप आत्माका परम अयन यानी परम आश्रय जानता है अर्थात् मातृजनित क्षेत्रस्थानीय त्वचा, मांस और रुधिररूपसे पितृजनित बीजस्थानीय अस्थि-मज्जा और